हमसफर

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

सेर्गेई एसेनिन: रूसी कविता का अमर लोकगायक

(21.09.1895-28.12.1925)
‘इस जीवन में मरण कहीं से भी नया नहीं

लेकिन जीवन, सचमुच और भी नया है’

यह अथाह जीवन राग जिस विद्रोही कवि का है उसने यह पंक्तियाँ आत्महत्या से दो दिन पहले अपने लहू से लिखी थीं. मृत्यु से दो दिन पहले अपने लहू से लिखे इस विदा गीत से कवि के अपार जीवन राग को समझा जा सकता है, तीस साल के जीवन में पाँच शादियां, छह प्रेम और दो दर्जन से अधिक किताबें, हाँ, छोटे से जीवन को मस्ती के राग में जीनेवाला यह कवि सेर्गेई अलेक्सांद्रोविच येसेनिन सिर्फ 23 साल में राष्ट्र की ऐसी हस्ती हो जाता है कि पार्टी नेता तथा साम्यवादी आलोचकों को उनकी ‘जुबान पर ताला’ लगाने की ओछी हरकत करने को मजबूर होना पड़ता है. उन्होंने अपनी आलोचना और हैसियत का इतना इस्तेमाल तो किया ही कि किसानी राग और ग्राम्य संवेदना में रची-बसी कविता के सर्जक को देश छोड़ देना पड़ता है. अपने समकालीनों की घोर उपेक्षा, उनके असहयोग और रचनाओं पर दशकों लंबे प्रतिबंध के बाद किसी की रचना किस तरह जिंदा रहती है सेर्गेई एसेनिन इसके अन्यतम उदाहरण हैं. ऐसेनिन ने 1917 में लिखी अपनी एक कविता में एक जगह कहा भी है ‘आनन्द की भीख मांगनेवाला कमजोर होता है/ सिर्फ गर्व ही मजबूती से जीता है’. सचमुच आत्मसम्मान और जीवन का आनन्द जैसे उनकी फिलासोफी थी. वैसे उनकी नियति आत्महंता कवयित्री मारीना और कुछ-कुछ मायाकोव्स्की से जरूर मिलती है. मारीना ने 49 वर्ष की आयु में आत्महत्या की थी. हाँ, मायकोव्स्की को अपने समय में अल्पकालिक ही सही, पर थोड़ी मान्यता जरूर मिली थी. वैसे 1918 तक महज 23 साल की उम्र में मैरिंगोफ (एसेनिन के जीवन पर आधारित विख्यात व विवादास्पद संस्मरण ‘ए नोवेल विदाउट लाइज’ के लेखक) से मुलाकात के समय तक वह एक राष्ट्रीय हस्ती जरूर बन गये थे.

रूस के नियोजन क्षेत्र के कोस्टेटिनो (अब येसेनिनो) के एक गाँव में किसान परिवार में जन्मे एसेनिन बालपन से ही बाबा-दादी के पास भेज दिए गए. अपनी आत्मकथा में एसेनिन ने बचपन को याद करते हुए बर्बर चाचाओं के दुर्दांत खिलंदड़ेपन का    लोमहर्षक ब्यौरा दिया है (भारत में दलित लेखकों की जीवनी में ही ऐसे ब्यौरे मिलते हैं)। उसके एक चाचा थे जो उसे तीन साल की उम्र में अकेले घोड़ा पर बैठा कर सरपट दौड़ा देते थे। ऐसे में बालक एसेनिन पागल की तरह चिल्ला पड़ता था। फिर उसे तैरना सिख्या गया। एक चाचा साशा तो उसे नाव पर बिठाकर तट से बहुत दूर निकल जाते थे। इसी दौरान बालक एसेनिन के सारे कपड़े खोलकर उसे नगी में फेक देते थे। वह नन्हा बालक कीचड़ में फंसकर जब तड़फड़ाने लगता तो वे उसे नीच-अभागा कहते हुए फटकार लगाते। इसी तरह कवि ने अपने किशोर वय के दुर्दांत अनुभव संसार का भी पट खोला है। कवि जब आठ साल का था तो उसके एक अन्य चाचा उसका इस्तेमाल शिकारी कुत्ते की तरह करते। मारे गए बत्तख को पकड़ने के लिए वे उसके पीछे पानी तैरकर जाने को मजबूर करते। पेड़ पर चढ़ने में वह माहिर था। आस-पड़ोस के बच्चों के बीच उस किशोर को एक कुशल साईस तथा लड़ाकू के रूप में जाना जाता था। यही कारण है कि उसके चेहरे पर हमेशा ही खरोंचें रहतीं। इस दुर्दांत अनुभव से गुजरते हुए मुक्ति के लिए भटकते एसेनिन को देखकर रूसी कथाकार मैक्सिम गोर्की के मां उपन्यास के नाना की याद जीवंत हो उठती है। अपनी आत्मकथा में वे कहते हैं कि सिर्फ ही दादी थी जो उसे दुष्टताओं के लिए फटकारती, डांट पिलाती। बहुत ही स्वाभाविक ढंग से चाचाओं की क्रूरताओं के बीच बालक एसेनिन में दुष्टता पलने लगी थी। दादी के इस प्रतिरोध का उसके दादा यह कहकर विरोध करते कि ऐसे ही यह बालक मजबूती के साथ विकास करेगा और कायदे का इंसान बनेगा। दादा दादी को इसके लिए कोसते थे। वे तो दादी को बालक एसेनिन के पास फटकने तक से रोकते थे। बेइंतहा नजाकत से भरी दादी इस बालक को हद से ज्यादा प्यार करती थी। हर शनिवार को वह इस बालक के नाखुन काट देती और खास तरह के तेल लगाकर उसके केश काढ़ देती थी, घुंघराले होने के कारण उसके केश में कंघी करना मुश्किल होता था। नौ साल की अल्पवय में ही एसेनिन ने कविता लिखनी शुरू कर दी. साहित्यिक विलक्षणता से संपन्न एसेेनिन 1912 में मास्को आ गये और प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े प्रतिष्ठानों में प्रूफरीडिंग का काम करने लगे. अगले साल मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी में बतौर बाहरी छात्रा दाखिला ले लिया और यहाँ डेढ़ साल तक पढ़ाई की. उनकी शुरुआती कविताएँ, रूसी लोककथाओं, पौराणिक आख्यानों से प्रभावित रहीं. 1915 में वे सेंट पीटर्सबर्ग चले आये, जहाँ उनका परिचय अलेक्जेंडर ब्लाक, सेर्गेई गोरोदेत्स्की, निकोलाई क्लूयेव तथा आंद्रे बेली जैसे समकालीन कवियों से हुआ. साहित्यिक हलके में यहीं पर वे एक सुपरिचित हस्ताक्षर बन गये, बतौर कवि आजीविका चलाने में शुरुआती दौर में ब्लाक की काफी मदद रही.

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अपनी आत्मकथा में एसेनिन ने कबूला भी है कि बेली से उन्हें रूप की समझ मिली, जबकि ब्लाक तथा क्लूयेव की सोहबत ने प्रगीत का संस्कार दिया. 1915 में एसेनिन का पहला काव्यसंग्रह ‘रादुनित्सा’ प्रकाशित हुआ और इसके बाद ‘मृतक के लिए संस्कार’ 1916 में आया. मार्मिक व तीखी कविताओं (जो कि प्रेम और आम जीवन सरोकारों को लेकर है) के कारण आज वह रूस के सर्वाधिक प्रिय कवियों में गिने जाने लगे हैं. एक दौर था जब इन्हीं मार्मिक और किसानी राग में डूबी कविताओं से तत्कालीन आलोचक और पार्टी नेता बुरी तरह भयभीत हो उठे थे. इस तबके का मानना था कि एसेनिनवाद कहीं युवाओं की नागरिक निष्ठा को कमजोर न कर दे. सत्ता प्रतिष्ठान में इस सुगबुगाहट ने उन्हें लंबे समय तक राजनयिक अनुग्रह से वंचित रखा. सुदर्शन और रोमांटिक व्यक्तित्व के धनी एसेनिन के एक के बाद एक कई प्रेम प्रसंग चले और बेहद कम उम्र में उन्होंने पाँच शादियाँ रचायीं. पहली शादी 1913 में प्रकाशन गृह की सहकर्मी अन्ना इज्र्याद्नोवा से हुई. इससे उन्हें यूरी नाम का बेटा हुआ (स्टालिन शासन काल में इसकी गिरफ्तारी हुई और 1937 में गुलग श्रमिक शिविर में इसकी मौत हुई.)
1915 में वे सेंट पीटर्सबर्ग चले गये, जहाँ उनकी मुलाकात क्यूयेव से हुई (बाद में दो साल दोनों में गहरी छनी, वे साथ रहे, साथ में संग्रह निकाला, क्यूयेव के नाम अज्ञात को संबोधित उनके तीन प्रेमपत्र भी पाए गये हैं.) 1916-17 में वह सैन्य कार्य में लगा दिए गये, लेकिन 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद जल्द ही रूस प्रथम विश्व युद्ध से बाहर हो गया.

क्रांति से जीवन की बेहतरी के भरोसे पर कवि ने इसका समर्थन किया, पर जल्द ही यह भ्रम साबित हुआ तथा कहीं-कहीं उन्होंने बोल्शेविक शासन की आलोचना भी की है (निष्ठुर अक्टूबर क्रांति ने मुझे छला.) लगभग यही दौर रहा होगा जब मायकोव्स्की ने भी बोल्शेविक वालों से निराश होकर ‘बेडबग’ नामक व्यंग्य लिखा. एसेनिन द्वारा अपने मित्र अलेक्सांद्र बोरिसोविच कुसिकोव को पेरिस से लिखे एक पत्र में यह दर्द, गुस्सा, नफरत का सैलाब बनकर उभरा है: ‘जब मनमुटाव और चुगली के अलावे क्रांति में कुछ नहीं बचा, जब अपने पूर्व के दुश्मनोें (जिसे वह गोली मारा करते थे) से हाथ मिलाने लगे हों तो मेरे लिए यह साफ हो चुका है कि शिकार को निकले लोगों के लिए हम लोगों (तुम और मैं) की बिसात महज सुअर की होकर रह गयी है. मेरे दोस्त, सुनो जब हम मास्को में थे तो वे हमें बैठने को कुर्सी तक नहीं देते थे. लेकिन अब मैं बुरी तरह हताश हूँ. मैं किस क्रान्ति की पैदाइश हूँ, मैंने यह सोचना छोड़ दिया. मैं सिर्फ यह देखता हूँ कि वह न तो फरवरी क्रांति थी, न ही अक्तूबर क्रांति. वह हमारे दिल में सिर्फ छद्म नवंबर क्रांति थी और आज भी है.’ पेरिस में रहते हुए उन्हें रूस से जिस बात की अपेक्षा थी उसे उन्होंने अपना दुर्भाग्य कहा था ‘यह दुर्गति ही है कि मैं भाग्य की प्रतीक्षा करता हूँ’ बहुत पहले लिखी ‘एक औरत के नाम खत’ कविता में उन्होंने जब कहा कि ‘सच्चाई को सिर्फ फासले से देखा जा सकता है’ तो जैसे वह अपने संदर्भ में रूस को संबोधित कर रहे थे. गोया उनके गुजर जाने के बाद रूस को उनकी अहमियत का अहसास होगा. और हुआ भी.

अगस्त 1917 में अभिनेत्री जिनैदा राइख (बाद में त्सेवोलोद होल्ड की बीवी हो गयी). से दूसरी शादी रचाई. इससे उन्हें तात्याना नाम की बेटी हुई तथा कांस्टंेटिन नामक बेटा पैदा हुआ. कांस्टेंटिन आगे चलकर विख्यात फुटबालर स्कोेरर हुआ. 1918 में कवि ने खुद का प्रकाशन व्यवसाय शुरू किया. प्रकाशन गृह का नाम रखा ‘मास्को लेबर कंपनी आफ द आर्टिस्ट आफ बल्र्ड’. 1921 में चित्रकार अलेक्सेई याकोव्लेव की स्टूडियो में आवाजाही के क्रम में उनकी मुलाकात अमरीकी मूल की पेरिस में रहनेवाली नर्तकी इसाडोरा डंकन से हुई. 17 साल बड़ी इसाडोरा नाम मात्रा की रूसी जानती थी. 2 मई 1922 को शादी रचाई. नवविवाहित दंपत्ति के यूरोप तथा अमरीका प्रवास के दौरान निर्णायक मुकाम आया. यहाँ वे बुरी तरह नशे के आदी हो गये. नशे में हमेशा धुत्त रहते. इस अवस्था में उनके उत्पात से रेस्त्रां के कमरों में टूट-फूट होती रहती. रेस्त्रां के लोग भी परेशान रहने लगे थे. इससे प्रकाशन जगत में उनकी प्रतिष्ठा को भयंकर आघात पहुँचा. डंकन के साथ उनका दांपत्य थोड़े ही दिनों टिका. (60 सालों तक प्रतिबंधित रहे अनातोली मेरिंगोफ के एक संस्मरणात्मक गं्रथ ‘झूठ के बगैर एक उपन्यास’ में यह सम्बन्ध काफी विस्तार और मौलिकता के साथ प्रकट हुआ है) वे 1923 में मास्को आ गये, यहाँ आते ही उन्हें अभिनेत्री आगस्टा मिक्शीश्खेव्स्काया मिल गयी. उसके साथ भी कुछ दिनों का दांपत्य रहा. हालाँकि इसाडोरा से उन्होंने कभी तलाक नहीं लिया. इसी दौरान उनका चक्कर गैलिना बेनिस्लाव्स्काया के साथ भी चला. इसने एसेनिन की मौत के एक साल बाद उन्हीं की कब्र के पास खुदकुशी कर ली.

एसेनिन के व्यवहार में लापरवाही बढ़ती गयी और इन्हीं सालों में कवयित्राी नादेइदा वोल्पिन से अलेक्जेंडर नामक बेटा हुआ. वैसे एसेनिन की जानकारी में यह बात कभी नहीं आ सकी, लेकिन बड़ा होकर यही अलेक्जेंडर एसेनिन वोल्पिन का विख्यात कवि हुआ था तथा सोवियत संघ में 1960 के दशक में आंद्रेई सखारोव व अन्यों के साथ असंतुष्टों के आन्दोलन का नेता बना. बाद में जाकर उसे अमरीकी उदारवादी गणितज्ञ के रूप में ख्याति मिली.

जीवन के आखिरी दो साल पूरी तरह अस्थिरता में बीते तथा इस दौर में सारा वक्त नशा सेवन में डूबा रहा. इस सबके बावजूद इसी दौरान उन्होंने अपनी कुछ विख्यात कविताएँ रचीं. 1925 में चंचल चित्त के एसेनिन की भेंट सोफिया तोल्सताया (लेव तोल्सताय की पोती) से हुई और उससे पाँचवीं शादी हुई. तोल्सताया ने हरसंभव संभालने की कोशिश की. पर पूरी तरह मानसिक रुग्णता के बाद कुछ भी नहीं किया जा सका और उन्हें अस्पताल में माह भर के लिए भर्ती होना पड़ा. अस्पताल से रिहाई के दो दिन बाद ही उन्होंने अपनी कलाई काट ली. इसी खून से उन्होने अपनी अंतिम कविता विदाई लिखी. अगले दिन एंग्लेटेरे के होटल के अपने कमरे की छत गर्म करनेवाली पाइप से टंगकर खुदकुशी कर ली. इस समय उनकी उम्र सिर्फ 30 साल की थी. वैसे कहा तो यह भी जाता है कि उनकी हत्या जीपीयू के एजेंटों ने कर दी थी और उसे खुदकुशी का रूप दे दिया. 1925 में एसेनिन से हुई आकस्मिक मुलाकात के बाद मायकोव्स्की ने लिखा था: ‘...काफी मुश्किल से मैंने एसेनिन को पहचाना. पीने की उसकी जिद बेहद मुश्किल से टाल सका. उसने जिद करते हुए नोटों की गड्डी लहराई थी. दिन भर की उसकी छवि मेरे लिए काफी निराशाजनक लगी. शाम को मैंने अपने संगी-साथियों से उसकी मुमकिन मदद पर विचार-विमर्श किया. दुर्भाग्य से इस दिशा में कोई भी बात नहीं की जा सकी.’ यही कहीं कुछ-कुछ इसी लहजे में इल्या एहरबुर्ग ने भी अपने संस्मरण (‘जनता वर्ष व जीवन’) में एक जगह लिखा है ‘वह सदैव पिछलग्गुओं से घिरे रहते थे. सबसे बुरी बात तो यह होती थी कि इनमें से शायद ही किसी की दिलचस्पी साहित्य में थी. लेकिन इनमें कोई किसी का वोदका पीना चाहता तो कोई किसी की शोहरत के मजे लूटना चाहता और दूसरों की पहचान की ओट में सब कुछ करता. हालाँकि वे तो गुजर गये, पर उन्होंने खुद में उनलोगों को डुबोया. एसेनिन को उनकी कीमत मालूम थी, लेकिन तुच्छ लोगों के साथ होकर वे सहज रहते.’ अनातोली मेरिंगोफ ने अपने विस्तृत संस्मरण में एक जगह लिखा है कि ‘यदि उसने हमलोगों को छोड़ने का फैसला किया है तो इसका मतलब है कि उसने अपनी रचनाशीलता पर से भरोसा खो दिया. उसकी मौत का और कोई कारण हो ही नहीं सकता. क्योंकि कविता को बचाने के सिवा उसके जीवन का कोई मकसद ही नहीं था.’ एसेनिन की रचनाशीलता पर यह मेरिंगोफ का अकेला भरोसा नहीं था. जनप्रतिरोध के साथ खड़े उस दौर के लगभग सभी सर्जकों का उनपर ऐसा ही भरोसा था. मायाकोव्स्की ने ‘सेर्गेई एसेनिन’ शीर्षक अपनी कविता में लिखा है: ‘काश! थोड़ी-सी स्याही उस होटल एंग्लेटेरी में/ तो कोई कारण नहीं था/ नस काट डालने का.’ इस कदर किसी की रचनाशीलता पर भरोसा उसी का हो सकता है जिसने डूबकर उसे देखा हो. ऐसा लगता है जैसे उन्होंने एसेनिन के इस अंत में अपनी नियति देखी थी...नहीं तो फिर क्या कारण था कि वह इस कविता में आगे जाकर कहते: ‘लेकिन सुनो/ क्यों चाहते हो बढ़ाना/ आत्म्हत्याओं की संख्या?’ (पतलून पहना बादल/ अनु. राजेश जोशी). विरल और दुर्भाग्यजनक संयोग है कि मायाकोव्स्की (1893) और मारीना त्स्वेतायेवा (1892) ने भी क्रमशः 1930 में तथा 1934 में आत्महत्या की. कवि ओसिप मंदेलश्ताल ने भी आत्महत्या की कोशिश की थी.

हालाँकि वे अत्यधिक लोकप्रिय रूसी कवियों में शुमार रहे तथा शासन की ओर से राजकीय सम्मान के साथ उन्हें दफनाया गया. लेकिन जोसेफ स्टालिन तथा निकिता खु्रश्चेव के शासनकाल में उनकी अधिकांश रचनाएँ प्रतिबंधित रहीं. इस प्रतिबंध में निकोलाएव बुखारिन की आलोचना का अहम रोल रहा. आसिप मंदेलश्ताम, बोरिस पास्तरनाक, मायाकोव्स्की, मारीना की तरह ही स्टालिन शासन के बाद ही उनकी रचनाओं का पुर्नप्रकाशन संभव हुआ. 1966 में उनकी अधिकांश रचनाएँ प्रकाश में आयीं.

आज एसेनिन की कविताएँ बच्चों की जुबान पर हैं, इनमें से कई तो संगीतबद्ध हैं और लोकप्रिय हो चुकी हैं. असमय मृत्यु, अभिजातों-साहित्यिकों की संवेदनशून्यता, आज जनता का सम्मान, संवेदनशील व्यवहार, इन सबने मिलकर इस रूसी कवि को एक शाश्वत तथा करीब-करीब मिथकीय छवि प्रदान की. जहाँ तक साहित्यिकों की संवेदनशून्यता की बात है तो उसे ओसिप मंदेलस्ताम के उस बयान के आईने में देखना दिलचस्प होगा जिसमें उन्होंने युवा कवियों की रचनाओं को अथक रुदन कहते हुए मायाकोव्स्की की कविता को बचपना तथा मारीना त्स्वेतायेवा की कविता को बेस्वाद हुआ कहा था. ऐसे में उनकी निगाह में एसेनिन की कविता के लिए कौन-सी जगह बचती है. लेकिन एसेनिन अपनी कविताओं के किसानी भावतंत्र को अपनी रचनाशीलता का संस्कार देकर राष्ट्र के भविष्य का सार गढ़ रहे थे. उनके भाष्य में गाँव का चरित्रा पैतृक भूमि के चरित्रा में ढल गया. 1920 में आया उनके एक संग्रह का नाम ‘मैं गाँव का आखिरी कवि हूँ’. इसमें कवि का बड़बोलापन लग सकता है, लेकिन कवियों की प्रौढ़ व सत्ताश्रयी जमात पर नयी पीढ़ी द्वारा फेंके गये हथगोले के रूप में देखना मौजूं होगा. उनके दौर के नये कवि एक तरफ जहाँ अक्मेइज्म व भविष्यवाद में अपने को ढालने को बेताब थे, वहाँ एक कवि का गाँव की ओर रुख करना निश्चय ही उपेक्षा के दंश को आमंत्रित करने की तरह था.

एसेनिन की नयी कविताएँ तो रूसी लोकगीतों की परंपरा में शामिल हो गयी है.
(कथादेश, जुलाई 2010)

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