हमसफर

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

हमारे दौर का जरूरी और भयावह आख्यान

पिछले दिनों जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में आयोजित प्रसिद्ध एक्टिविस्ट छायाकार रजनीकांत यादव की नर्मदा घाटी संस्कृति : छायाचित्र प्रदर्शनी एवं व्याख्यान के अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार पहल संपादक ज्ञानरंजन के दिए गए महत्वपूर्ण वक्तव्य के जरूरी अंश हम दे रहे हैं। ये वक्तव्य भर नहीं, हमारे दौर का जरूरी आख्यान प्रस्तुत करते हैं। यह तो ज्ञान दा की अप्रतिम विरल खूबी है।
जिसे आज रेड कोरिडोर कहा जाता है और जो देश के सर्वाधिक अशांत इलाके हैं, अनेक राज्यों का जीवन, जिसकी चपेट में है, वे आदिवासी बहुल्य अंचल हैं। इस देश का सर्वोच्च खनन लकडी, बिजली, औषधि और शिल्प जिन इलाकों से आ रहा है, वहीं सर्वाधिक रक्तपात, हिंसा और युद्ध है। इसलिए नर्मदा घाटी का विपुल जीवन भले आपको रसिक, सुंदर, श्रद्धालु, शांत और समृद्ध दिख रहा हो, उस पर विकास के गिद्ध मंडरा रहे हैं। गरीबी, भोलेपन और सुंदरता को यह सेलेब्रट करने का समय नहीं है। हिंसा के अंखुए कभी भी फूट सकते हैं। ज्वालामुखी जो अभी ठंडा है, कभी भी गरम हो सकता है। नर्मदा घाटी के प्रति हमारा नया आचरण एक जिम्मेदार और चिंता प्रमुख नागरिक का होना चाहिए।
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यह जो हमारी तत्कालिक दुनिया है, उसमें कब पापुलर कल्चर ने सेंध लगा दी, यह हमें भी पता नहीं चला। संभवतः भू-मण्डलीकरण के दौर में ऐसा हुआ है। बाजार संगीत और शोर के कारण यह हुआ है और इसलिए कि सिनेमा, मीडिया की चमक ने भी इस मीना बाजार को समर्थन दिया है। मुझे याद है, वह दौर हाल ही का जब अखबार ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीनी की तरफ पलटे थे, तो एक हल्की सी मुठभेड़ विचारों की हुई थी, पर फिर सब कुछ परास्त हो गया। हम उन लोगों को तो जानने लगते हैं, जो मीडिया में प्रतिदिन आते है, जाते हैं, रमते हैं, बोलते हैं, पर हर शहर के खंडहरों में कुछ खोए हुए लोग बचे हैं, जिन्हें हम स्वमेव नहीं पा लेते, उन्हें खोजना पड़ता है। अब हीरों के खोजी लोग दुर्लभ है, गायब हैं, इसलिए हीरों की तलाश भी खत्म हो गई है।
00000000000000000000000000000000विकास की अवधारणाओं पर हमारा देश बंटा हुआ है। बुनियादी तौर पर हम जिस ढांचे को निर्मित कर रहे हैं, वह हमारे देश में मिस फिट है। जिसके कारण असंखय समस्याएं पैदा हो रहीं हैं। हमारे वास्तविक सुर मंद पड़ गए हैं। हम इमारतों, बाजारों, मशीनों के विप्लव, हाईटेक जिंदगी को विकास मानते हैं। यह तेजी-मंदी की धारणा विनाशकारी है। जिस तरह से संसार के महान्‌ आदिवासियों, जन जातियों को मौत के कंसों ने निगल लिया है, हम उसके खिलाफ हैं। हम अल्पसंख्यक भी हों, पर हम उसके खिलाफ हैं।

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