हमसफर

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मुल्क को सर्वाधिक नुकसान आजादी और संविधान से

यह मुल्क कब आजाद हुआ ? कोई बच्चा इसका उत्तर नहीं दे तो कहेंगे कि वह अभी बड़ा नहीं हुआ। किशोर जब इसका उत्तर नहीं दे तो कहते हैं कि उसका जीके अभी कमजोर है। कोई युवक इस सवाल पर चुप रहे तो कहेंगे कि उसे देश-दुनिया की खबर ही नहीं, तो कौन सी जिम्मेवारी के प्रति वह इंसाफ करेगा। और जब एक प्रबुद्ध इसका उत्तर न दे तो आप क्या कहेंगे ? यही न कि वह पाकपरस्त है, पश्चिमी आबोहवा में रंगा है, आतंकी है-नक्सली है। कोसने के लिए आपकी झोली में ढेरों अलफाज होंगे। मैं कहूंगा कि यदि यह मुल्क 15 अगस्त 1947 को आजाद कहा जाता है तो मेरा सवाल है कि यह गुलाम ही कब हुआ था ? सनातनियों की शाश्वतता की शब्दावली में नहीं कि अजर-अमर आत्मा किसी के अधीन नहीं होती। आभासी पराधीनता तो एक चोला है जो देश-दुनिया के हिसाब से बदलता है। यह आत्मा कभी अमरीका में तो कभी अफगानिस्तान में, कभी हिंदु्स्तान में तो कभी अजरबैजान में चोला धारण करती रहती है। इसलिए इसकी कोई धरती नहीं और यह कहीं की नागरिक नहीं। हे अज्ञानी, जड़मति सुजान ! आत्मा को परिधि में खींचकर ब्रह्म को सिकोड़ते क्यों हो ? नहीं। मेरा कहना यह नहीं। मैं कहता हूं कि क्या भारत कहलानेवाली धरती यही है। और यही है तो शेष भूखंड कहां चले गए। अबतक सभी अनुष्ठानों में ‘भारतवर्षे, भरतखंडे’ का वह भूखंड कहां गया जिसकी अर्चना अनायास अभी भी घरों में होती है। कब-कब किन्होंने गुलाम बनाया और कौन गुलाम बने ? क्या वे आक्रांता अब इस भूखंड से चले गए ? कब-कब यह भूखंड आजाद हुआ और कौन आजाद हुए या कौन आजाद किए गए ? जिनके लिए आजादियां थीं क्या उन्हें नसीब हुईं ? गुलामी-आजादी की बात होगी तो पूरे संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में। आजादी को परिभाषित करने के कोई देशकाल और उसके मानक तो होंगे ?क्या आर्य हमलावर नहीं थे ? तुर्क और तातार क्या थे ? सिर्फ अंग्रेजों ने ही इसे गुलाम बनाया था? गांधी को क्या हक कि वह फिरंगी को तो भगाए और शेष हमलावरों का घर घोषित कर दे इसे ? क्या यह घर उनका था ?आखिर फिरंगी को भगाने और शेष को बसाने का हक उन्हें किसने दिया ? भगत सिंह ने अपना जीवन क्यूं कुर्बान किया ? भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाए जाने के (23 मार्च 1931 को) छह दिन बाद गांधी जी ने यंग इंडिया में अपने एक लेख से जता दिया था कि भारतीय भगत सिंह को कैसे लें। अंश है......भगत सिंह जीना नहीं चाहते थे। उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया। यहां तक कि अपील भी दाखिल नहीं की।...उन्होंने असहायता के चलते और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लिया। भगत सिंह ने लिखा था, “मुझे युद्ध करते हुए गिरफ्तार किया गया है। मेरे लिए फांसी का फंदा कोई मतलब नहीं। मुझे तोप के मुंह में रखकर उड़ा दो।” इन नायकों ने मौत के डर को जीत लिया था। आइये हम उनकी बहादुरी को शत्-शत् प्रणाम करें। लेकिन हमें उनके काम की नकल नहीं करनी चाहिए।...हमें कभी भी उनकी गतिविधियों का प्रतिपालन नहीं करना चाहिए। अब मैं कहता हूं कि अंग्रेज यही तो चाहते थे। फांसी से उनकी मुक्ति के लिए दो लाख नागरिकों ने अपील की थी और दूर क्यों जाएं, इसके लिए कांग्रेस का भारी अंदरूनी दबाव भी था। इस सबके बावजूद इस मसले से उदासीन रहते हुए अहिंसक गांधी का रुख उनके प्रति क्रूर-कठोर ही बना रहा। वहीं सुभाष ने फांसी के दिन शहादत को सलाम करने के लिए दिल्ली में जनसभा तक की। कहा तो जाता है कि इस सभा को रुकवाने के लिए इरविन ने गांधी को पत्र भी लिखा था। आखिर गांधी का प्रभाव और रुख देखकर ही तो पत्र लिखा होगा इरविन ने। और नेता जी सुभाष को देश निकाला क्यों झेलना पड़ा या जिस मुल्क की आजादी के लिए सबकुछ न्यौच्छावर किया उसी मुल्क के आजाद होने पर वहीं उन्हें छद्मवेशी होकर क्यों रहना पड़ा ? क्या स्वतंत्रता संग्राम इनसे परिभाषित नहीं होता ? संग्राम में ताकतवर होते गए इन सेनानियों की ऐसी उपेक्षा से ही स्वतंत्रता के मान-मूल्यों को उपर ले जाया जा सकता है क्या ? थोड़ा ठहरकर आप आजादी की भगत सिंह की परिकल्पना पहले आप देखें –हम यह स्पष्ट घोषणा करें कि लड़ाई जारी है। और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हिन्दुस्‍तान के मेहनतकश इंसानों और यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा का कुछ चुने हुए लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहेगा। ये शोषक केवल ब्रिटिश पूँजीपति भी हो सकते हैं, ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी एक साथ भी हो सकते हैं, और केवल हिन्दुस्‍तानी भी। शोषण का यह घिनौना काम ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही मिलकर भी कर सकती है, और केवल हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही भी कर सकती है। इनमें कोई फर्क नहीं है। यदि तुम्हारी सरकार हिन्दुस्‍तान के नेताओं को लालच देकर अपने में मिला लेती है, और थोड़े समय के लिए हमारे आंदोलन का उत्‍साह कम भी हो जाता है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हिन्दुस्‍तानी आंदोलन और क्रांतिकारी पार्टी लड़ाई के गहरे अँधियारे में एक बार फिर अपने-आपको अकेला पाती है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लड़ाई फिर भी जारी रहेगी। लड़ाई फिर से नये उत्‍साह के साथ, पहले से ज्यादा मुखरता और दृढ़ता के साथ लड़ी जाएगी। लड़ाई तबतक लड़ी जाएगी, जबतक सोशलिस्ट रिपब्लिक की स्थापना नहीं हो जाती। लड़ाई तब तक लड़ी जाएगी, जब तक हम इस समाज व्यवस्था को बदल कर एक नयी समाज व्यवस्था नहीं बना लेते। ऐसी समाज व्यवस्था, जिसमें सारी जनता खुशहाल होगी, और हर तरह का शोषण खत्‍म हो जाएगा। एक ऐसी समाज व्यवस्था, जहाँ हम इंसानियत को एक सच्ची और हमेशा कायम रहने वाली शांति के दौर में ले जाएँगे……… पूँजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण के दिन अब जल्द ही खत्‍म होंगे। यह लड़ाई न हमसे शुरू हुई है, न हमारे साथ खत्‍म हो जाएगी। इतिहास के इस दौर में, समाज व्यवस्था के इस विकृत परिप्रेक्ष्‍य में, इस लड़ाई को होने से कोई नहीं रोक सकता। हमारा यह छोटा सा बलिदान, बलिदानों की श्रृंखला में एक कड़ी होगा। यह श्रृंखला मि. दास के अतुलनीय बलिदान, कॉमरेड भगवतीचरण की मर्मांतक कुर्बानी और चंद्रशेखर आजाद के भव्य मृत्युवरण से सुशोभित है। (फांसी पर चढ़ने के दिन 20 मार्च 1931 से तीन दिन पहले भगत सिंह द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र का अंश)भगत सिंह ने क्यों कहा था कि कांग्रेस का आंदोलन आख़िर में एक समझौते में तब्दील हो जाएगा। और कि कांग्रेस की लड़ाई 16 आने में एक आने की लड़ाई है और वह भी उसे नसीब नहीं होगी। क्या वह कांग्रेस ऐसे भगत सिंह व सुभाष की आजादी की अवधारणा को पुख्ता करने की भूल करेगी ? गांधी के चेलों ने उन्हें अजर-अमर रखने को इन जैसे सेनानियों को फेल साबित करने के लिए कई मोर्चे खोल रखे हैं।साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल... क्या है ।याजन गण मन अधिनायक जय हो भारत भाग्य विधाता... के माध्यम से ब्रिटिश आक्रांता को आक्रांता ही न रहने देना चाह रहे हों तो फिर किसकी गुलामी, किसकी आजादी !ऐसा लगता है कि आजादी की लड़ाई का केंद्र प्रवृत्ति से लड़ने की बजाए रंग और लोग से लड़ना तक नहीं रह गया था। प्रवृत्ति से लड़ाई होती तो अंग्रेज भी जाते और अंग्रेजियत भी। इसीलिए गुलाम करने और रखने की प्रवृत्तियां नित सशक्त होती गईं। इसीलिए गुलामी का बैक्टीरिया हर बार रंग-भेस-भेद बदलकर और ताकतवर होकर अजेय अंदाज में अवतरित होता रहा और हमें मुरीद बनाता रहा। आईआईएम के स्नातक और अंग्रेजी उपन्यास जगत में तहलका की तरह प्रवेश करनेवाले चेतन भगत की मानें तो अंग्रेजी भाषा नहीं एक कौशल है। (धनबाद के आईएसएम में मैनेजमेंट फेयर में अतिथि वक्ता के रूप में अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा था।) आखिर किसने कहा कि हिंदी या बांग्ला या उर्दू भषा कौशल नहीं है। बढ़ईगीरी भी कौशल है और अभिव्यक्ति कला भी कौशल है। लेकिन भगत जी के भीतर का वह संक्रमण बोल रहा है जो गुलामी का बैक्टीरिया ही है। और अंत में इसका समाहार ‘दुनिया के पूंजीपति एक हो’ (भूमंडलीकरण) में हो जाता है। जब ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा बुलंद हुआ था, तब तो हम छद्मवेषी हो गए थे। सोवियत रूस सा समाज चाहते थे और अमरीका सी अर्थव्यवस्था। दोनों ही धारा साम्राज्य के विस्तार की अलग धारा थी। व्यक्ति स्वातंत्र्य की तुष्टि जिसमें होगी, अंततः वही काम होगा। व्यक्ति आजादी चाहता है और अपने अस्तित्व और भविष्य के लिए समाज को संगठन की जरूरत होती है। आखिर राष्ट्र से छिटका हुआ समाज और समाज से दूर होते परिवार ही जब विघटित हो रहे तो अब तो सिर्फ व्यक्ति के विघटन की बारी है, जो कि शुरू हो चुकी है। हम अपने मताधिकार का प्रयोग जैसे करते हैं, वह तो यही दर्शाता है। ऐसा लगता है गुलाम रहने की प्रवृत्ति यहां की मूल और सहज वृत्ति है। स्वाभाविक संवेग-वृत्तियों के खिलाफ चलकर किसी अभियान को अधिक देर और दूर तक नहीं ले जाया जा सकता है। जर्मनी का एकीकरण, सोवियत संघ का विघटन, थ्येनआनमन चौक से होते हुए चीन का रूपांतरण, मिस्र में होस्नी मुबारक का तख्तापलट, लिबिया में गद्दाफी के खिलाफ बगावत आदि-आदि इसी के तो उदाहरण हैं। लेकिन भारत का उदाहरण अलग है। हर लड़ाई के बाद बाद वह एक गुलामी से दूसरी गुलामी में प्रवेश करता रहा है। या कहें कि नई (नाजुक, कमसीन, हसीन) गुलामियों के लिए वह लड़ाइयां लड़ता रहा है। सोवियत संघ का विघटन हुआ, पर यहां पश्चिम बंगाल में बोडोलैंड की मांग अनसुनी रह गई। और अब तो वहां के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने खुलेआम कह डाला है कि उनकी मांग कभी नहीं पूरी होनेवाली। दूसरी ओर भारत में नक्सलवाद (माओवाद) को राज्य विरोधी – व्यवस्था विरोधी कहनेवाले मार्क्सवादी नेपाल में माओवाद की चरणवंदना करते हैं।इस देश में संग्रामियों का दमन करनेवालों और स्वतंत्रता संग्राम के विरोधियों का सम्मान हुआ तो क्या हुआ। आजादी के बाद से गठित सभी मंत्रिमंडल में कौन पूजे गए ? क्या सबके सब स्वतंत्रता की आत्मा की रक्षा करनेवाले थे ? अब जरा भारतीय संघ के सेकुलर ढांचे में दलितों के मसीहा कहे जानेवाले बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के उच्चाशयों को देखें : -हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं । साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है । मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते । (डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१)गुलाम देश में रियासतों के रहमोकरम पर पढ़ाई, अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी और दलितों के उद्धार (कदाचित एक पृथक दलितिस्तान) के लिए नित नई लड़ाई छेड़नेवाले भीमराव अंबेदकर को भारतीय संघ के सेकुलर ढांचे पर इस तरह का प्रहार करने के बावजूद कैसे और किन अर्थों में सेनानी माना जाए, जिसने कभी भी हथकड़ी में जकड़े किसी बंदी तक से भेंट भी नहीं की ? राजा भोज के वंशज साहबजादा सिंह के पुत्र बाबू वीर कुंवर सिंह जिनके सभी नाते-रिश्तेदार नामी जागीरदार रहे और जिनके नामों से ही सामंतवाद की बू दीखती है, आखिर कैसे संग्रामी हो गए। यह बात पल्ले नहीं पड़ती कि 80 साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम की कमान ले लड़ाई में कैसे कूदे। 80 साल की उम्र तक ऐसा उग्र सेनानी फिरंगियों की नजर से कैसे बचा रहा ? क्या किसी भी गुलाम देश में लड़ाकू योद्धा को इतनी लंबी उम्र मिल सकती है ? हां, मिलती है नेल्सन मंडेला की तरह जेल में सड़ते रहकर या फिर एक सिद्धांत के तहत आंदोलन को नर्म – नाजुक स्तर पर रखने के लिए बड़ी आबादी को अपने पीछे पागल बना रखने के लिए महात्मा गांधी जैसों को बाहर रखकर। या फिर दलाई लामा की तरह दर ब बदर रहने की नियति झेलकर।विलय के सिद्धांत के खात्मे के लक्ष्मीबाई के आग्रह के साथ अंग्रेज हुकूमत को यह प्रस्ताव कि वे ऐसा करते हैं तो 1857 के संग्राम में वह (झांसी की रानी) उनके साथ होगी। यदि ये लोग संग्रामी थे तो एक पल के लिए ठहरकर सोचना होगा कि फिर नेताजी सुभाष और भगत सिंह क्या कर रहे थे। आजादी और शहादत की इसी सोशल मैपिंग का नतीजा है कि आज गली-चौराहे ऐसे ‘शहीदों’ के नाम सुपुर्द कर दिए गए हैं जो या तो गैंगवार में या किसी सियासी रंजिश में मारे गए या फिर मुठभेड़ में मारे गए माफिया सरगना थे। होना तो यह चाहिए था कि स्वतंत्रता संग्राम से अर्जित मान-मूल्यों की गरिमा या मर्यादा से खिलवाड़ करते इस शहीद-शहीद खेल को प्रतिबंधित करते हुए शहीद शब्द का दुरुपयोग राष्ट्रीय मर्यादा और गरिमा के विरुद्ध अपराध घोषित किया जाता। एक वाकया है कि एक बार औरंगाबाद के नगर भवन में अंग्रेजों की गोली से छलनी हुए शहीद की प्रतिमा प्रमुखता के साथ लगाए जाने के प्रस्ताव आया था। औरंगाबाद इस शहीद का गृह जिला था। बाद में नगर भवन में बिहार के मुख्यमंत्री रहे अनुग्रह नारायण सिंह की प्रतिमा केंद्रीय स्थल पर लगाई गई और शहीद की प्रतिमा एक कोने में लगा दी गई। शहीद की एक प्रतिमा शहर के रमेश चौक पर लगी है। दोनों ही स्थानों पर प्रतिमाएं धूल-धूसरित है। जिला के ओबरा के खरांटी में सालों पहले बना स्मारक अब उपेक्षित है। गोह प्रखंड में चौक पर स्थापित इनकी एक प्रतिमा गाड़ियों के धक्के से क्षतिग्रस्त हो गई है। यह शहीद और कोई नहीं बिहार सचिवालय पर स्थापित जिन सात शहीदों की प्रतिमा है, उन्हीं में सबसे छोटे जगतपति सिन्हा हैं। गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रभाव में पटना में 11 अगस्त 1942 की सुबह सचिवालय पर सात सेनानियों की जो टोली तिरंगा फहराते हुए जिलाधीश डब्ल्यू जी आर्थर के हुक्म पर हुई फायरिंग में शहीद हुई थी, उसी टोली के सबसे छोटे सदस्य ये थे। यह तो है शहीदों को हमारे समय-समाज का नमन !
यह आजादी ही है जिसने हमें गैर जिम्मेवार होकर गौरव हासिल करना सिखाया। किसी भी चीज की वास्तविक कीमत अदा किए बिना उसे हासिल करने की जिद पूरी होने लगे तो आप गैरजिम्मेवार नहीं तो क्या बनेंगे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने बखूबी इसका ख्याल किया ! आखिर यह भी गौर करना होगा कि संविधान सभा उन प्रान्तीय विधानमण्डल के सदस्यों से बनी थी, जिनका चुनाव देश की कुल वयस्क आबादी के मात्र 11.5 प्रतिशत हिस्से से बने निर्वाचक मण्डल से हुआ मुट्ठी भर चुने गये प्रतिनिधियों को छोड़ बाकी सम्पत्तिशाली कुलीनों के प्रतिनिधि थे। इनमें चुने गये प्रतिनिधियों के अतिरिक्त उसमें राजाओं-नवाबों के मनोनीत प्रतिनिधि थे। ऐसे संविधान से हम क्यों यह अपेक्षा कर लेते हैं कि वह भगत सिंह के सपनों के अनुसार सोशलिस्ट रिपब्लिक यानी 42 वें संशोधन के मुताबिक समाजवादी गणतंत्र हो। क्या संविधान सभा की प्रकृति ऐसी थी कि संविधान की आत्मा में यह समाहित हो सके। 2004 के चुनावों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 128 लोग सांसद चुने गए थे जबकि 2009 में यह संख्या 150 हो गई। इसी तरह 2009 की लोकसभा में 300 करोड़पति सांसद आए हैं, जबकि 2004 की लोकसभा में ऐसे 154 सांसद थे। क्या यह एकबारगी हो गया।
जिम्मेवारी के बोध से कटे भारतीयों में कर्तव्य की रही-सही चेतना को कुंद करने का सार्थक प्रयास हुआ इसके माध्यम से। संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख तो हुआ, पर यह अधिकार कुछ कर्तव्यों के निर्वाह से हासिल होते हैं यह बताने की जरूरत नहीं। पाबंदी नहीं। अधिकार के लिए याचिकाएं असंख्य पड़ीं। नए-नए अधिकारों का सृजन हुआ। आरटीआई, काम का अधिकार, आरटीई। लेकिन कर्तव्य ? सिर्फ आप इस धऱती पर जनम गए हों। बस्स। संविधान बनने के 26 सालों बाद शासकीय गरज से संविधान के 42 वें संशोधन में एक अध्याय के रूप में मूल कर्तव्य जोड़े गए। पहली बार अधिकारों से छेड़छाड़ हुई। इतने और ऐसे संशोधन के पैकेज लाया गया कि यह संशोधन मिनी संविधान कहा जाने लगा। यह अलग बात है कि 1978 में 44 वें संशोधन से बहुत कुछ निरस्त कर दिए गए। पहली बार संविधान को खिलौने की औकात में लाने की कोशिश हुई। क्या सेनानियों ने आजादी का जो हक दिया उसे यूं ही कुर्बानियों को भूल जाने के लिए। सामान्य बातचीत में और अपने करीब डेढ़ दशक की पत्रकारिता और अध्यापन के अनुभव में राजनीति शास्त्र का एक भी व्याख्याता, सामाजिक अध्ययन का एक भी शिक्षक, एक भी सामाजिक कार्यकता, कोई अधिकारी या नेता नहीं मिला जिसे बखूबी इसका पता हो या दस कर्तव्यों को सिलसिलेवार गिना दें। ऐसा एकबारगी नहीं हुआ। अधिकारवाद कहीं न कहीं भोगवाद में उत्स पाता है और जिसकी जड़ बर्बरता में होती है, वह हमारे जीन में है। कोई भी गलत रास्ता सही जगह नहीं जाता। और यही कारण है कि कर्तव्यबोध की इस क्षति ने देश में नागरिक बोध को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। राज्य का कर्तव्य नागरिक का अधिकार और नागरिक का कर्तव्य राज्य का अधिकार। लेकिन व्यवस्था की उदासीनताओं और कुछ हमारे भीतर की जीन ने संगिठत लड़ाई को कभी परिवर्तनकारी आंदोलन (छात्र आंदोलन) या समांतर व्यवस्था के लिए (नक्सलवाद) सक्रिय किया है। भद्रजन की भाषा में एक रिएक्टर के रूप में प्रकट होता है तो दूसरा एटम बम के रूप में। दरअसल जो क्षेत्र विकास से दूर या अछूते रहे या रखे गए वहां शोषण की चक्की फ्रिक्शनलेस हो आसानी से चली। जंगलों या सुदूर पिछड़े इलाकों में इस आंदोलन के जाने का कारण एक तो यह था, दूसरे माओ की थियरी भी गांव से शहर की ओर बढ़ने की थी। शोषण व अन्याय को नियति न मानकर जिन्होंने सामाजिक व्यवस्था में उसकी वजह देखी, उनकी लड़ाई तो व्यवस्था के खिलाफ होगी ही। विकास से लगातार उपेक्षित रखे गए या रखे जा रहे ऐसे उपेक्षितों का दंश संताप, क्षोभ, पीड़ा के गह्वर में जाकर क्या उन्हें संत रहने देगा। ऐसी अपेक्षा है तो फिर ...भारत में होनेवाली कुल मौतों में 8.1 प्रतिशत मौत डायरिया से होती है। डायरिया का एकमात्र कारण जलप्रदूषण है। इस डायरिया से वही तबका आक्रांत होता है जो कामगार-दिहाड़ी है। एक बार डायरिया हुआ तो कम से कम सप्ताह भर की छुट्टी। अब इसे बीपीएल के मानव दिवस से गुणा करके देखें कि जीडीपी का कितना नुकसान है। स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति व्यय 119 डालर जो कि दुनिया में सबसे कम है। और संयुक्त राष्ट्र संघ का आकलन है कि स्वास्थ्य पर खर्च की वजह से हर साल 2 प्रतिशत यानी 24 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। आखिर कष्ट का यह कंडेसेशन समाज को कहां ले जाएगा। क्या यह शोक-संताप क्षोभ का हिस्सा से बचा रह जाता होगा।क्या इसका जवाब किसी के पास है कि अपराध/भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी का कारण सिर्फ राजनीति और कानून की पोंगापंथी या आम नागरिक की भी उतनी ही भागीदारी भी है ? नागरिक उदासीनता से बननेवाले वैक्यूम आखिर कुछ तो लेकर आएगा। राजनीति का अपराधीकरण और नैतिक मूल्यों में गिरावट को जीवन व्यवहार का हिस्सा बना लेने के कारण अपराध का समाजीकरण (पुण्यप्रकाश वाजपेयी का टर्म) जिस तरह हुआ है, उस सबकी जड़ में कहीं न कहीं नागरिक बोध की क्षति प्रमुख है। इसे क्या कहेंगे कि संसद के दोनों सदनों में आजादी के बाद से अब तक लगातार आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। 1952 में संपन्न पहले आम चुनाव से लेकर अब तक के 15 आम चुनावों में भ्रष्टाचार एक मुद्दा रहा, पर 1989 को छोड़ कभी भी यह मुद्दा चुनाव प्रभावशाली नहीं रहा। इसका मतलब ही यह है कि जनमानस को इस मसले पर कोई भी पार्टी मोटिवेट नहीं कर सकी तो इसलिए कि जनतांत्रिक संस्थाओं व जनमानस दोनों ही ओर आग बराबर लगी हुई है। क्या ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान अपने मुकाम तक पहुंचेगा ? जिस संविधान प्रदत्त तंत्र की अधीनता के कारण 74 का आंदोलन, शेषण द्वारा छेड़ा गया चुनाव सुधार का अभियान आदि-आदि फिस्स कर गए लगभग वही हस्र इनके अभियान का होगा। अरुणाचल प्रदेश से कांग्रेस के सांसद निनाग ईरिंग ने जिस तरह बाबा रामदेव के साथ अभद्राचरण किया वह हस्र का छोटा नमूना है। आखिर रिफ्लेक्स एक्शन की तरह कांग्रेस के दिग्विजय सिंह का जो रुख रहा वह कहीं न कहीं रामदेव के अभियान के प्रति नाराजगी भी दर्शाता है। जिस गरीब जनता के मुल्क के 70 लाख करोड़ रुपए विदेशी बैंकों में जमा हों वह क्यों नहीं यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन अंगेस्ट करप्शन (यूएनसीएसी) का अनुमोदन करता है। इस आशय से संबंधित
संयुक्त राष्ट्र के संकल्प पर एक दस्तखत के सिवा 2005 के बाद सरकार ने इस मामले में कोई पहल नहीं की। यही तो वह मनोरचना है जो इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
कहीं न कहीं नागरिक बोध का नुकसान हमारी जीवनशैली को प्रभावित करती है, फिर व्यवहार का पैटर्न उस गिरफ्त में आता है और फिर पूरी की पूरी व्यवस्था इसका निवाला बन जाती है। कई व्यवहार से रिवाज तथा रिवाजों से विधि और फिर विधि के तानेबाने से संविधान फिर पूरी व्यवस्था बनती है। थूक फेकने से लेकर ट्रैफिक नियम व दफ्तरों में अपनी सुविधा के लिए बाबुओं के साथ डीलिंग। यह सब क्या है। एक समांतर व्यवस्था ही तो। ...

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपका पोस्ट पढ़कर सरदार अली जाफरी की नज़्म के कुछ मिसरे याद आ गए-
    "कौन आज़ाद हुआ
    किसके माथे से गुलामी की स्याही छूटी
    मेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी का
    मादरे-हिंद के चेहरे पे उदासी है वही.

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  2. इस देश में स्वाधीनता एक गलतफहमी है और संविधान बुढ़िया के टांग पर लगे प्लस्तर से ज्यादा कुछ नहीं। देशज अंग्रेजों 70 लाख करोड़ रुपये भारत से बाहर कर दिये और हम रोते हुए कहते हैं कि अंग्रेज वेल्थ का ड्रेन कर रहे थे। बहुत विचारोत्तेजक है यह आलेख, लेकिन इस दौर को हजम नहीं होगा। लेकिन पीढ़ियां इससे जरूर इत्तफाक करेंगी। ।

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