हमसफर

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

अब कुछ किताबों की

भारतीय समाज के व्यामोहों का द्वंद्व यानी निन्यानबे


पात्र और तिथि को छोड़ इतिहास में कुछ भी सच नहीं होता और साहित्य में इसका उलट होता है, क्योंकि इतिहासविद के पास पात्रों के अंतर्जगत में प्रवेश का अवसर नहीं होता। जो इतिहासकार का कार्य नहीं वही उपन्यासकार का धर्म होता है। इसे हम लेस्ली स्टीफन की तरह भी नहीं देख सकते जिनका मानना था कि ऐतिहासिक उपन्यास साहित्यिक वर्णसंकर हैं। 1857 के काल से शुरू होकर 20 वीं सदी के अंतिम दशक की आहटों को सुनानेवाले उपन्यास निन्यानबे को देखकर ऐसा नहीं लगत। अपने साहित्यिक कौशल की छौंक से ऐतिहासिक उपन्यासों की रूक्षता को दूर रखने में सक्षम उपन्यासकार रवींद्र वर्मा का छठा उपन्यास है। बहुत बार विराट अध्ययन, शोध, चिंतन व व्यापक जीवनानुभव से संपृप्त के कारण ऐतिहासिक उपन्यास की मूल गलतियों पर भी उंगली रखने वाले साबित होते हैं। इतिहास की भूलों के परिर्माजन का ऐसा आह्वान इतिहासकारों के लिए चुनौती है। शायद इन्हीं कारणों से पाल ग्रेप ने ऐतिहासिक उपन्यासों को इतिहास का शत्रु बताया है। ग्रेप की इस पीड़ा को बखूबी समझा जा सकता है दिनकर की कविता ‘कलम आज उनकी जय बोल’ के जरिए जिसमें एक जगह उन्होंने कहा है –

जो अगणित लघुदीप हमारे
तूफानों में एक किनारे
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।
कलम आज उनकी जय बोल।
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बिचारा
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य, चंद्र, भूगोल-खगोल
कलम आज उनकी जय बोल।

वैसे उपन्यास के प्रतिपाद्य से इसका कोई खास सरोकार नहीं, फिर भी रह-रहकर नायकों से आक्रांत – अभिभूत इतिहास के शोर में डूबे चीत्कार को निन्यानबे का पाठक सुने बगैर नहीं पाता। उपन्यास के केंद्रीय पात्र रामदयाल के अपनी शादी के बाद अपनी पत्नी से बयान इसका साक्ष्य है – तु्महें मालूम है गांधी जी ने अपनी पत्नी से टट्टी साफ करवाई थी। यदि मुझे अपनी शादी और आजादी में से एक को चुनना है तो मैं आजादी चुनूंगा। और तबसे इस किशोरी को लगातार रामदयाल के अचानक गायब हो जाने का राज समझ मे आने लगा। वह बहस नहीं करती। सुंदरकांड का पाठ करती। संकटमोचन का व्रत रखती। यह एक किशोरी की कथा नहीं। यह उन सभी किशोरियों की कथा है जिसके जीवन का खाद पानी पहले तो गुलामी की बैडियों को तोड़ने-काटने में सूखा और फिर आजादी के उपभोक्ताओं का निवाला बना।
करीब डेढ़ सदी के विस्तार में फैला यह उपन्यास उन अर्थों में ऐतिहासिक नहीं जिन अर्थों में प्रसाद के उपन्यास आते हैं या फिर गढ़कुंडार, रानी लक्ष्मीबाई, दिव्या, चित्रलेखा है। जिस तरह बड़े से बड़े सच का एक स्थानीय संदर्भ होता है, उसी तरह इतिहास भी निरपेक्ष नहीं रहता, वहीं हमारी जीवनदृष्टि इतिहासबोध से रूपाकार पाती है। रानी लक्ष्मीबाई लिखते समय वृंदावन लाल वर्मा के पास जो इतिहास उपलब्ध था, आज वह वहीं नहीं अंटका है। नए साक्ष्य और नए विमर्श इतिहास को गतिशील बनाए रखते हैं। काल का उत्खनन सतत जारी है और अनावृत्त परतों से उभरनेवाला सच इतिहास को गीता या कुरान नहीं रहने देता। स्मृति की सत्ता का जीवन की तात्कालिकताओं के सदैव संवाद चलता रहता है, जिसे युवा आलोचक ज्योतिष जोशी सामाजिकता-ऐतिहासिकता का द्वंद्व कहते हैं। काल का यह द्वंद्व व्यक्ति के सरोकारों प्रकट करता है और यही वह सरोकार है जिसने निन्यानबे को उपरोक्त की श्रेणी से बाहर रखा है। 1857 से 1993-94 तक के विस्तृत काल क्षेत्र का यह उपन्यास केंद्रीय पात्र रामदयाल की पांच पीढ़ियों के इर्द-गिर्द बुना गया है।
आंदोलनों और उसके स्वप्नों में ऊंघता एक कस्बाई जीवन है जिसे मूलतः समाज-राज का रूपक कह सकते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के अवशिष्ट जो बदलती परिस्थितियों के साथ अपने आदर्शों को नहीं बदल पाते, जीवन की मुख्यधारा से उसी तरह दूर होते गए हैं जैसे तलछट, जहां कुछ भी आकर्षक व भोग्य नहीं रहता। वह पात्र है रामदयाल, जो नेहरू के स्वप्नों के भारत से इस कदर डूबता-उतरता है कि अपने निहायत निजी क्षणों में वैयक्तिक दबावों तक को नहीं समझ पाता। अपनी जरूरतों से दरकनिरा होता जाता है। पारलौकिक आसक्तियां भौतिक जीवन रुग्ण बना डालती हैं। ‘उस’ जीवन के लिए इस जीवन के लिए कुछ भी मोल नहीं समझने वालों की स्थिति हो जाती है रामदयाल की। भारत स्वप्नों के नायक के भ्रमजाल में उलझा यह पात्र अपने ही जीवन संदर्भों को वास्तविक जमीन नहीं दे पाता और स्वप्न में टहलते के रोग (सोम्नैंबुलिज्म) की स्थिति में आ जाता है। यहां राष्ट्रीय विकास के सांस्कृतिक आयाम के संदर्भ में व्यक्त प्रख्यात समाजशास्त्री पूरनचंद्र जोशी के विचारों को देखा जाना रोचक है – जिन मानसिक बेड़ियों की रचना भारतीयों को गुलाम रखने के लिए विदेशी शासकों ने की थी उनसे कहीं अधिक सशक्त वे बेड़ियां थीं जिन्हें भारतीयों ने गुलामी की कटु वास्तविकता के संदर्भ में मानसिक संतुलन और सामंजस्य बनाने के लिए सृजित किया था। (परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयाम) क्योंकि इसी धूर्तता और पाखंड से भरी वह चालबाजियां थीं, जो एक ओर लक्ष्मीबाई की वास्तविकता में डूबने नहीं देतीं और लेखक भी उसे महिमामंडित करने से नहीं चूकता। ‘सबको मालूम था कि रानी ने झांसी मांगी थी और उन्हें मौत मिली थी।‘ झांसी में डूब गया लेखक लक्ष्मीबाई की राष्ट्रीय निष्ठा को समझ नहीं पाता या समझना नहीं चाहता। विख्यात इतिहासकार विपिन चंद्र संपादित ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ की स्थापना के अनुसार विद्रोह के मौके पर उन्होंने अंग्रेजों से समझौते की पेशकश भी की
कि अगर उसकी मांगें मंजूर कर ली जाएं (राज्य वापस कर दिया जाए यानी डाक्ट्राईन आफ लैप्स खत्म कर दिये जाने की स्थिति में) वह अंग्रेजों का साथ देंगी और इस तरह झांसी की तरफ से अंग्रेजों को कोई खतरा नहीं रहेगा। वैसे राष्ट्रीय परिदृश्य में विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के पीछे स्वराज्य की गुलाम लालसा-समझ काम कर रही थी। एक गुलामी की बजाए दूसरी गुलामी का चुनाव ही तो था यह। यही लालसा लक्ष्मीबाई के पास राष्ट्रविरोधी (अ-राष्ट्रीय) फार्मेट में थी। यदि नाजियों का त्रिगुट मानवविरोधी था तो अंग्रेजों का आधिपत्य कहां से मानवीय कहा जा सकता था। यही अमानवीय लालसा लक्ष्मीबाई के यहां राष्ट्रविरोधी (अराष्ट्रीय) के फार्मेट में थी या राष्ट्र के प्रति उदासीनता के रूप में थी। लेकिन नेहरू का इंद्रजाल था जिसकी वास्तविकता को संग्राम में शामिल पीढ़ी शायद देखना नहीं चाहती थी। रामदयाल की मनोदशा का ब्यौरा (लेखक के शब्दों में) इसका उदाहरण है – घर की क्या हालत थी? नेहरू जी नहीं रहे थे, बड़ा लड़का शराब पीने लगा था, छोटा सौर में था। बिलू मां जितनी लंबी हो गई थी। नेहरू के न रहने से कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक शून्य छा गया। अब आवडी स्वप्न का क्या होगा ? दरअसल इसके ठीक निचली सतह पर देखना होगा कि कहीं यह किसी को रिझाने का अंदाज तो नहीं।
ऐसे संजय की तरह तो अतीत जीवी था, एक सामंती समाज सृजन की पीड़ा और प्रफुल्लता से आधुनिक समाज में बदलता हुआ नजर आता है। अपनी सारी भीषण विफलताओं और विडंबनाओं के बाद भी, नई पीढ़ी फटती हुई आवाजों में अपनी माली हालत की प्रतिध्वनि तक नहीं सुन पाते। और आंखें ऐसी कि जिसमें विराट स्वप्न तो होते हैं, पर उसमें बेटे का पट्टीदार जांघिया होता है और न ही बेटी की कमर के नीचे वही जांघिया। 22 जनवरी 1955 के अखबार में ‘भारत समाजवाद की ओर’ शीर्षक से छपी कांग्रेस की आवडी सम्मेलन की रपट में खोए रामदयाल को पता भी नहीं चलता कि उसका बेटा बलराम दयाल कब आया और बैठक के दूसरी ओर बैठे-बैठे उकता रहा था। अपनी उकताहट में वह बाबू कहकर चिल्लाता है। पूरा संवाद लेखक के उपरोक्त आशय को प्रतिध्वनित करता है –
बाबा
हां उन्होंने अखबार से सिर ऊपर उठाया, लेकिन शायद अखबार की कोई पंक्ति अधूरी छूटी थी। उन्होंने तुरंत अपनी आंखें अखबार में गड़ा दीं।
बाबू
हां, बोलो, रामदयाल ने अखबार में आंखें गड़ाए पूछा।
मुझे रुपए चाहिए
कितने
पचास।
पचास रुपए का क्या होगा
डाक्टरी का फार्म भरना है।
ऐसा लगा जैसे अखबार के बहुत मसले हैं और रामदयाल के लिए सबसे जरूरी है कि वे चुपचाप अखबार पढ़ते रहें जैसे पहले पढ़ रहे थे। रामदयाल अखबार ऐसे पढ़ रहे थे जैसे बल्लों बैठक में न हो और न ही उसने कुछ बोला हो। यह स्थिति उस पिता की है जो अब भी स्वतंत्रता संग्राम में खोए अपने भाई की बलि को नहीं भूल पाया है। जबकि यह पुत्र आजादी के बाद के जीवन संघर्षों और उसके व्यामोहों में भटक रहा है। इसके भी तो खोने का भय है। यह व्यामोह हैं पराधीन व स्वातंत्र्योत्तर भारत का और व्यामोहों का द्वंद्व है जो उन्हें अपनी लालसाओं से मुक्त नहीं होने देता और अपनी जमीन को भी बंजर कर दे रहा है। यह एक उदाहरण भर है। ऐसी स्थितियां बारहा है उपन्यास में।
उपन्यास का नायक रामदयाल अपने एक पुत्र का नाम संग्राम में शहीद भाई के नाम पर हरि रखता है। यही हरि है जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अर्जित जीवन के उच्चतर मूल्यों को ध्वस्त करते हुए सपने की सौदागीरी तक करने लगता है। आपातकाल में संजय गांधी की अराजक टोलियों में शामिल होने से लेकर ठेकेदार बनने तक यह बेटा रामदयाल के आदर्श को तिलतिलकर मिट्टी में मिला देता है और रामदयाल को लगने लगता है कि इस सदी में हरि दो बार पेदा हुआ। पहली बार उसने आजादी के लिए घर छोड़ा। दूसरी बार उसने मारूति के लिए और तब रामदयाल का क्षोभ उसका व्यक्तिगत नहीं रह जाता। पहले हरि को देश की आजादी ढूंढ़ते हुए खो गया। अब हरि अपनी आजादी ढूंढ़ते हुए खो रहा है। अपनी आजादी आजादी नहीं होती, अपनी उठाईगीरी होती है। यह उन रामदयालों की मनःस्थिति है जो मोहभंग से गुजर चुका है ऐसा नहीं। इस दिग्भ्रमित बेटे के बारे में यह रामदयाल का ही मंतव्य नहीं हो सकता कि इसके पास नंगईका विकल्प खादी का कुर्ता पाजामा है। ऐसा नहीं कि आवडी पर रामदयाल को पूरा भरोसा था – भरोसा – भरोसा होता तो रामदयाल आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी छोड़ते ही क्यों।
निहायत निजी सुख-सुविधाओं के आपदग्रस्त होते गए मध्यवर्ग मध्यवर्ग में अपनी जमीन, सरकार के साथ एक उपभोक्तावादी सलूक शेष रह जाता है। रामदयाल का छोटा पुत्र कृष्णकुमार कला के बाजारू सरोकारों से जुड़कर ही एक दिन अजनबी निष्ठुर हो जाता। यह है हमारे समय की कला और उसका संवेदना से सरोकार। बहन की चिंता में डूबा परिवार उसे अपनी ओर नहीं खींचता और वह पेरिस जाने के लिए इसी घर से पैसे तक की अपेक्षा करने लग जाता है। अपने भाई के स्वप्न को बेटे (हरि) में जीवित करने की जिद/हसरत पाले रामदयाल बेबस, लाचार व ठूंठ से बने रह जाते हैं। निन्यानबे लाख तक पहुंचकर करोड़पति बनने का स्वप्न हरि में हहरा रहा है और दूसरी ओर रामदयाल जीवनृ-मृत्यु से जूझ रहे हैं। उनका सोचना कितना वाजिब लगता है – क्या करोड़पति होने के लिए दुनिया को भोग का चारागाह बना देना जरूरी है ? इस तरह रामदयाल के घात-प्रतिघात पर खड़ा जिन त्रासदियों का शिकार आज भारत है, उसी के अक्स यहां हैं।
अब जब कविता में गद्य का प्रवेश हो रहा है, वहीं गद्य में भी उसकी ही शर्तों पर कविता की आवाजाही भी दिखती है, जिसे निन्यानबे में प्रचुरता से देखा जा सकता है। गद्य में कविता की यह आवाजाही ही सूक्ष्मता, अर्थमयता, बिंबात्मकता व सारगर्भितता के धरातल पर जारी है। कविता में गद्य के प्रवेश के साथ सपाटबयानी के खतरे से बचने के लिए जिस सतर्क काव्य विवेक की जरूरत है, यहां भी यह प्रासंगिक है। भाषा के साथ जो क्रीड़ा वृत्ति कुरु कुरु स्वाहा, अठारह सूरज के पौधे, रागदरबारी में है, वह यहां नहीं। इन उपन्यासों में अपनी शैली से मुग्ध हो जाने के कारण वहां फार्मूलाबद्धता का खतरा (संकट) पैदा नहीं हुआ है। भले वह उनकी अन्विति को ग्रसता नहीं। वर्णन की फार्मूलाबद्धता के कारण बहुधा परिवेश की यथार्थता के साथ लेखक के संबंध विच्छिन्न से हो जाते हैं। वह विच्छिन्नता एक हद तक यहां भी दीखती है, पर इतर कारणों से।
डा सुरेश सिन्हा को अपनी रचना प्रक्रिया बताते हुए वृंदावन लाल वर्मा का लिखा पत्र यहां देखने योग्य है – ‘ऐतिहासिक उपन्यास लिखना एक दुःसाध्य कार्य है। जिस काल का उपन्यास लिखा जाता है, जब तक उस काल की राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थिति, मानवजीवन और इतिहास का स्पष्ट चित्र सामने न हो, तब तक यह कार्य सरल नहीं होता।‘ शायद इन्हीं कारणों से 200 पृष्ठों के इस उपन्यास का तीन चौथाई हिस्सा बीसवीं सदी के पांचवें-छठे दशक के बाद से जुड़ा हुआ है तो पिछले सौ साल को एक चौथाई में समेट लिया गया है।
( उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित)
(पहल-61,1999)

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