हमसफर

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

....और आदमी को मार डाला

(हंस-राष्ट्रीय सहारा के ज्ञानरंजन के खिलाफ विषवमन वाले प्रकरण पर 25 मई-2003 को लिखा गया था)
संस्कृति (मीडिया समेत) और बाजार ये सत्ता के दो उत्तरआधुनिक खंभे हैं और ये खंभे जिनके पास हों तो वह अपनी सत्ता का दुर्ग बना ही लेता है। इन दिनों पहल पर आक्षेपों, आरोपों की जो बौछार हो रही है इन्हीं दुर्गों से। लेकिन ये बेहद सशंकित भी होते हैं और भयभीत भी अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं के कारण। पूंजी के पोषक सत्ता प्रतिष्ठानों की इन्हीं मनोरचना के लिए बादल राग में बहुत पहले निराला ने कहा था – ‘अट्टालिका नहीं है रे, आतंक भवन’ में व्यापारियों के दाम और संस्कृति विभाग के खजाने के दम पर निकल रहे पत्र-पत्रिका व अलभ्य आयोजनों के प्रभुओं को अपना पीएफ झोंक कर कर्ज से लद कर तीन दशक से निकल रही पत्रिका पहल का मर्म समझ में न आए तो ताज्जुब क्या। वामपंथी आंदोलनों की जो ट्रेजेडी रही है, कुछ-कुछ वही वजह रही है ज्ञानरंजन पर इस हमले की पहल। हमलों के पीछे निहित मकसद तथा उसके संयोग से ही यह संगठित और सुनियोजित हो जाते हैं। पहल ने यदि राजेंद्र यादव घराने को छापा है तो मुद्राराक्षस को भी और समीक्षा पुरुष नामवर के लिए सदैव विशेष सम्मान भाव रखा। एक भारी-भरकम विशेषांक तक निकाला। प्रमुखता के साथ उनके व्याख्यान छापे। शायद ही किसी पत्रिका ने नामवर सिंह को केंद्रित कर ऐसा कोई आयोजन किया। यह अलग बात है कि उन्हें हिंदी का अंतिम आलोचक साबित करने वाले सिवाए उपाधि वितरण के और कुछ न किया। इसका मतलब यह नहीं कि पहल ने ऋणशोध की अपेक्षा करते हुए ऐसा किया है। हीन तो पहल ही रही। प्रगतिशील आकल्प में छपे जिस साक्षात्कार को बवाल का मूल बताया जा रहा है उसमें कहीं भी साथी पत्रिकाओं पर समझौतापरस्ती का आरोप नहीं। एक सहज अपेक्षाभाव के तहत ही वैसा कहा गया था कि उनसे अपेक्षा थी कि वे ऐसे नहीं करते। वैसे कथादेश का मंसूबा साफ था तो उसे पूरा साक्षात्कार साभार छाप देना था। परिप्रेक्ष्य से काटकर किसी के भी कथन के निहितार्थ विकृत किए जा सकते हैं। डालर में अपना शुल्क मांगना गुनाह है तो महामहिम अशोक वाजपेयी अपने बहुवचन और राजेंद्र यादव अपने हंस की कीमत डालर में क्यों छापते हैं। क्या बदनाम राकेश मंजुल की सोहबत से पहल या पहल संपादक की भूमिका या अवदान का अन्यथाकरण हो जाता है ? फिर तो जनाब मजदूरों के लिए समर्पित उस मार्क्स का क्या होगा जिनकी सोहबत अपने पूंजीपति फ्रेडरिख एंगेल्स से रही। कई कृतियों के तो वह सहलेखक रहे हैं। पिछड़ों के मसीहा लालू यादव का वंशवाद और मसखरेपन में निहित तानाशाही कहां छूट जाती है शिखर सम्मान लेते समय। अमूर्त लड़ाइयां लड़नेवालों के लिए ये पेचीदगियां बनी रहेंगी। बेहतर होता कि जिन हितैषियों को बदनामी का इलहाम रहता है वे साथियों को सतर्क किया करें बजाए कि छीछालेदर की स्थिति तैयार करने में हाथ बंटाएं। यदि सचमुच उनकी चिंता पहल को लेकर वाजिब होती तो वे आरोप-प्रत्यारोप से क्षोभ को घनीभूत नहीं होने देते। बेहतर होता कि दुश्मन ताकतों को हावी होने से रोकें संगठित होकर। अच्छा होता कि एक बार प्रायश्चित कर लेते। संस्कृति के सत्ता प्रतिष्ठानों पर काबिज ऐसे महाप्रभुओं के लिए राजेश जोशी की कविता ‘इन्होंने रंग उठाए’ के इस अर्थपूर्ण अंश को बार-बार गुनें-समझें –
उन्होंने रंग उठाए,
और आदमी को मार डाला
उन्होंने संगीत उठाया
और आदमी को मार डाला
उन्होंने शब्द उठाए
और आदमी को मार डाला।

बेहतर होता कि यह विवाद और कड़वाहट के पहले ही खत्म हो जाती।
(अगले पोस्ट में ज्ञानरंजन का पक्ष - सांस्कृतिक उपद्रव के उस्तादों का वितंडा)

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गंभीरता से रख रहे हैं आप पानी बात.. आखिरकार पहल बंद ही हो गया.. सोवियत संघ के विखरने के समान.. एक ध्रुवीय हो गया हिंदी साहित्य.. खैर...

    मैं भी धनबाद से हूँ.. अपना ईमेल का पता दें.. या फ़ोन नंबर दे ताकि आप से बात हो सके.. सादर अरुण चन्द्र राय...

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  2. पहला सुझाव तो यह है कि इस ब्‍लाग का टेम्‍पलैट आसान बनाएं। यह पढ़ने में बहुत समस्‍या करता है। दूसरा सुझाव यह है कि आत्‍महंता से कुछ भी पता नहीं चलता । आखिर आप हैं कौन यह रहस्‍य जरा खोलिए। कम से कम आप जैसे लोगों से तो यह उम्‍मीद नहीं है कि परदे के पीछे रहकर बात करें।
    और अरूण जी आपकी जानकारी के लिए कि पहल के बंद होने और सोवियत संघ के बिखरने के बीच कोई संबंध नहीं है। पहल का बंद होना ज्ञानजी का बिलकुल निजी कारण है।

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  3. उत्साही जी,
    आप जिज्ञासु हैं, कई संदर्भ हैं जहां आप जान सकते हैं मेरे बारे में। पत्रिकाओं के अंकों का उल्लेख भी है।
    रही बात टैंपलेट बदलने की तो वह मैं जरूर करुंगा। शुक्रिया।
    मठाधीशी के खिलाफ सारे जोखिम शिद्दत से उठाने की कोशिश है, यह जानकर कि इसके कई नुकसान संभव हैं। लेकिन इसकी परवाह वह करे जो कवि, लेखक, कलाकार, नेता हों। जिन्हें सत्ता प्रतिष्ठानों से कुछ पाना हो।

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