हमसफर

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

सबके अपने माफिया

हिंदी में मठाधीशी की अपनी परंपरा रही है। कभी यह परंपरा पत्रिका के कंधे पर चली तो कभी संपादक-आलोचक की उंगली पकड़ कर। इस परंपरा ने कई गुल खिलाए हैं। इसकी गंध हिंदी जमात में अब तक मौजूद है। पिछले दिनों जब एक प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका ‘आउट लुक’ ने ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव का अधूरा ख्वाब (उपन्यास !) का अंश छापा तो जैसे यह एक डान के ख्वाब को पूरा करने जैसा था। नहीं मालूम पत्रिका उसके अंडरवर्ल्ड की छवि से अवगत है या नहीं। हिंदी पट्टी ही नहीं, यह देश-दुनिया उसके इस रूप को, नेटवर्क को बखूबी जानती है। इस टिप्पणी का एकमात्र मकसद इससे पदै हुई हिंदी जमात की चिंता और आगामी खतरे की निशानदेही है।

माल इटली का हो या इंग्लैंड का, भारत में आकर बेहद सस्ता हो जाता है। भार और मात्रा में, गुण में और गण में। यह अलग मसला है कि यह जनवाद का असर है या जनतंत्र का। कुछ ऐसा ही हुआ है माफिया शब्द का। माफिया शब्द को लाच करना भर था कि माफियागीरी का बूम आ गया इस मुल्क में। जनजागरण के दौर से लेकर उत्तरआधुनिक दौर तक में। मुंबई से लेकर कोयलानगरी तक में। बनारस से लेकर दिल्ली तक। सबका अपना अर्थसंसार, सबका अपना अपराध संसार। इसलिए सबके अपने-अपने माफिया। जो जगह मुंबई ने दाऊद को दी, वही जगह कोयलानगरी में सूर्यदेव सिंह को। साहित्य के क्षेत्र में, संस्कृतिकर्म के क्षेत्र में जिन्होंने अपना आतंक संसार रचा, वे उस संसार के क्या कहे जा सकते हैं ?
बहुत कम लोग जानते होंगे कि एक दौर था जब इटली के द्वीप में यह पद डिराइव हो रहा था। तो एक और दौर था जब हिंदी के द्वीप में साहित्य के इतिहास निर्माताओं ने इस प्रवृत्ति को जन्म दिया। जाने-अनजाने जार्ज ग्रियर्सन से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र और रामचंद्र शुक्ल तक इसमें शरीक रहे। महावीर प्रसाद द्विवेदी तो इसमें एक कड़ी के रूप में रहे। बेहद सचेत रूप में। नतीजा बड़ा ही विकट रहा इस घालमेल का। एक की भूल ने निराला को महिमामंडित करवा दिया, तो दूसरे के कारण निराला के पागलपन तक की नौबत आई। दरअसल मुक्तछंद की पहली कविता लिखनेवाले महेश नारायण श्रीवास्तव को कोई जानता तक नहीं। वह जगह नियंताओं की भूल की वजहसे निराला को मिल गई, सो मिल गई। बाद में तो 20 वीं सदी के ढलान पर कान पर हाथ रखकर आलोचकों, इतिहासकारों को आवाज लगाने का डा. चंद्रेश्वर कर्ण को किसी ने सुना तक नहीं। हिंदी सदी का 20 वीं सदी का इतिहास से लेकर हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, हिंदी जाति का इतिहास, हिंदी साहित्य व संवेदना का विकास तक न जाने कितनी पोथियां स्याही से पोत दी गईं। इतिहास की आलोचना और आलोचना का इतिहास रचनेवाले आचार्यों को इस ओर झांकने की फुर्सत तक नहीं। अभी कई ऐसे गाडफादर हैं जिन्होंने हिंदी की फजीहतें देखीं और जबान पर ताला जड़े रखा। किसी ने कदाचित महेश बाबू का जिक्र तक करना मुनासिब नहीं समझा। और यह बात कौन नहीं जानता कि आचार्य द्विवेदी ने निराला की कविता जूही की कली को छापने लायक नहीं समझा। निराला ने ‘सरोज स्मृति’ में इस दंश को बेहद मार्मिकता के साथ रेखांकित किया है। उन्हीं आचार्यों के मानस पुत्रों या वंशजों के कारण मुक्तिबोध को अपनी कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ के लिए क्या नहीं देखना पड़ा। आज के दौर में यह प्रसंग नए सिरे से नया रूप ले रहा है। इसके एक नहीं कई उदाहरण मिले। एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका ने इसका ताजा उदाहरण पेश किया है। कुल मिलाकर यह मीडिया का आतंक था। पहले सीमित अर्थों में जो शब्द मीडिया का काम कर रहे थे, वह इस इलेक्ट्रानिक दौर में एक व्यापक कारोबार कर रहा है। सूचना से लेकर संचार तक की सारी व्यवस्था तक इसके किरदार हैं।
सारी बातें बेसिर पैर की लगती हों, पर बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी। एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका (आउट लुक) ने अभी पिछले दिनों अंडरवर्ल्ड डान बबलू श्रीवास्तव का उपन्यास अंश छापा है। विचित्र यह नहीं कि पत्रिका ने इस अंडरवर्ल्ड को छापा है। विचित्र यह है कि उसके प्रलाप को उपन्यासा कहकर छापा गया है। इतना ही नहीं इसी पत्रिका ने हाल में हिंदी कहानी का विशेषांक निकाला है जिसमें हिंदी कहानी में स्त्री उसकी चिंता थी। मीडिया का वश चले तो वह प्रेमचंद का माडल खड़ा कर दे। किसी को लेखक और कवि करार दे। क्या एक कवि-कलाकार बनना मजाक है ? मजाक तो पहले भी हो रहा था। करनेवाले कोई और थे। फर्क यह हो गया कि अब हमीं में से निकल कर कोई हमें खलनायक करार दे रहा है और खलनायक को समाज के शीर्ष पर बैठा दे रहा है। कमोबेश हो भी यही रहा है। यह माडल किसी कुख्यात अपराधी से लेकर बलात्कारी तक कोई भी हो सकता है। कुछ दिनों पहले श्रीलंका में बलात्कार के एक सजायाफ्ता मुजरिम को वहां का श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। क्या इससे यही साबित करने की चेष्टा हुई न कि कला का संवेदना से कोई सरोकार नहीं, इस नाते कलाकार की कोई सामाजिक उपस्थिति नहीं बनती और कला का कोई सामाजिक हस्तक्षेप नहीं होता ? अगर हस्तक्षेप ही होता तो इसे नामांकन तक नहीं मिलता। खैर। ऐसा नहीं कि दलितों-वंचितों-दमितों को रचना के संसार में प्रवेश का हक नहीं, इजाजत नहीं। पहले भी हीरा डोम से लेकर शैलेश मटियानी जैसे उदाहरण हमारे सामने आ चुके हैं। पंजाबी विश्वविद्यालय के पंजाबी व अंग्रेजी के मानद प्रोफेसर रहे किरपाल कज्जाक से लेकर इस दौर में लक्ष्मण चायवाला और रामलखन यादव इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। कज्जाक का अतीत असामाजिक कृत्यों में लिप्तता का रहा तो रामलखन रात्रिप्रहरी रह चुके हैं। दोनों ही साहित्य में परिचय के मोहताज नहीं।
अभिव्यक्ति को विधाओं का नाम देना और वाचक को लेखक का दर्जा देने का कोई निकष न हो तो आम जीवन की धांधली से वह अलग कहां। माफिया किसी निकष पर नहीं चलता। उसका अपना संसार होता है। इसलिए उसके अपने निकष होते हैं। हां, ये निकष सामान्य व्यवस्था को उलट-पुलट कर देनेवाले होते हैं। पत्रकारिता जैसे गंभीर व जिम्मेवार कर्म में जिस गरिमा का निर्वाह इस पत्रिका ने किया है, इतने कम समय में यह बेहद मुश्किल है। खासकर तब, जब बाजार की लगातारा गलाकाट स्पर्द्धा अनाप-शनाप करवा रही है। सेक्स सर्वे के नाम पर लगातार जो गलीज चीजें परोसी जा रही हैं, उसे किस मानक के सहारे उचित ठहराएंगे आप ? कल को दाऊद यदि तहलका डाट काम को अपनी लंबी चिट्ठी भेजे तो यह उसकी प्राथमिकता और आजादी हो जाएगी कि वह उसे नए अंदाज की कहानी कहकर पेश करे। करीब डेढ़ दशक पहले इसी तरह साहित्य अकादमी ने अंडरवर्ल्ड से रिश्ता रखनेवाले किसी उर्दू लेखक के ‘आई कार्ड’ नामक उपन्यास को पुरस्कार से नवाजा था। यह भी एक माफियागीरी ही थी। लेकिन ऐसी माफियागीरी को जस्टीफाईड होने के लिए साहित्यिक जमात के आलोचना संसार से गुजरना पड़ता है। आखिर रचना को परखने का निकष क्या है। क्या यह कसौटी रचनाओं से स्वायत्त होती है या फिर पाठ के बाहर खड़े आलोचक के संसार से ? ये हादसे तब से घटित होने लगे जब से संपादक-प्रबंधक के काम में अदला-बदली हो गई। बाजार की दादागीरी से दरअसल संपादक का काम अब चीजों को बाजार के साथ मैनेज करना रह गया है। और मैनेजर का काम घराने के मकसदों को उसके बाजार को संपादित करना है। यहीं से परख की कसौटी पाठ के संसार से निकल कर बाजार की कोख से निकलने लगी। बाजार में सनसनीखेज मालों को लानेवालों, पहले लानेवालों में विचित्र होड़ मच गई है। परखनेवाले परखें, उसके शास्त्र की खींचतान करें। अपन तो पहले माल ला दिया है।

(एक समाचार पत्रिका 'माइंड' के साहित्य संपादन के क्रम में अक्तूबर 2005 में लिखी टिप्पणी)

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