हमसफर

रविवार, 31 अक्तूबर 2010

बाजार से फार्मूलाबाजी नहीं बचा सकती

मार्क्स, हीगेल, लोहिया, सुकरात, गांधी, काफ्का
सबपे भारी पड़ रहा है, फलसफा बाजार का।
- उर्दू शायर देवेंद्र गौतम
यह शेर अपने परिप्रेक्ष्य में बाजार की दिशा और उसकी सरपरस्ती की मंजूरी का आतंक बुनता है। अर्थ के विस्तार ने और फिर उसके दबाव ने चेतना को संकीर्ण किया। भोगवाद को बढ़ावा देनेवाले तंत्रों ने अपना हसीन जाल बुना। हम सिमटते गए उन जालों में। खोते गए खुद को। और इस तरह सांस्कृतिक तत्वों के लिए दुर्वह परिस्थितियों को हमने और हमारी उदासीनता ने मजबूत होने, हावी हो जाने दिया। सभी पढ़े-लिखे संवेदनशीलों ने इसे करीब से शब्दजगत में इस हलचल की रेकार्डिंग देखी-सुनी। सूचना के विस्फोट में संवेदनाएं बह गईं। आकस्मिक नहीं कि अखबार की तादाद बढ़ती गई और किताब सिमटती गई। गणित की भाषा में मस्तिष्क और हृदय, सूचना और संवेदना व्युत्क्रमानुपाती कही जाएंगी। इस दौरान संस्कृति के समक्ष भविष्य का संकट, अस्तित्व रक्षा का प्रश्न विकट वैताल बनकर खड़ा है। और एक फार्मूला विकसित हुआ कि बाजार में जगह बनाकर ही बचा जा सकता है। सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट के दर्शन में फिटनेस की यह शर्त चस्पां कर दी गई। जितनी सहूलियतों के साथ बाजार की महाठगिनी अपने नखदंत लेकर प्रकट हुई है उसके मुकाबले दोगले मीडिया और सत्ता के दलाल मठाधीशों की नपुंसकता किसी काम की नहीं। यह तो बाजार के बेडरूम में सज-धजकर पहुंची हुई कालगर्ल है। और राजनीति हरपल किसी भी बोलीपर नीलाम को तैयार...और जिस साहित्य के पास पाठकों का रोना हो भला वह किस फौज को लेगा अपने साथ। साम्राज्यवादी ताकत जब कभी संकट में पड़ती है तो वह किसी न अबूझ से लगते मोहक-दुरूह-पहेलीनुमा दर्शन लेकर प्रकट होती है। इतिहास का अंत, नई विश्वव्यवस्था, उत्तरआधुनिकता... क्या इस पर लट्टू होनेवाले विमर्श कार? या कारपोरेट वामपंथी या सजावट के लिए ड्राइंगरूम में विचार रखनेवाली गाड आफ स्माल थिंग्स ? क्या किसी राष्ट्रीय समझ के बगैर भी आपका काम चल जाएगा। आखिर किस राष्ट्रीय समझ और इस समझ के किस सातत्य का परिचय वह दे रही है ?

(प्रभात खबर की ओर से ‘संस्कृति और बाजारवाद’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी (2004-5) के संचालन के क्रम में संबोधन पर आधारित। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रामजी राय व विशिष्ट अतिथि संजीव थे। )

1 टिप्पणी:

  1. sabhee survival of the fitest ka hee palan kar rahe hain, isse bacha hua kaun hai ? shayad wah jiske hone ya na hone k bare me kisi ko kuch nahin pata...

    jo bhediya se ladkar lahulahuan hai,log use pagal kah rahe hain.

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