हमसफर

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

राजभाषा हिंदी की साठवीं बरसी पर

भाषा एक सांस्कृतिक उपक्रम है, इससे कौन मुकरेगा। इतिहास इसका गवाह है कि सांस्कृतिक मूल्यों के छीजन के साथ राष्ट्रीय गौरव और चेतना मद्धिम पड़ती जाती है। फिर इससे फर्क नहीं पड़ता है कि हम किसके देश हित और राष्ट्रीय गौरव को अपना गौरव मान रहे हैं। आपको इस पर आपत्ति नहीं होती कि आपका सम्मानित विदेशी अतिथि अपने कुत्ते – बिल्लियों के नाम पर इंडिया रखे। और यही रास्ता है गुलामी का। आज तो बाजारीकरण ने अपनी सहूलियतों के जाल से इसे और भी आसान कर दिया है। हम बहुत फख्र के साथ कहते हैं कि आज हिंदी का महत्व एक बार फिर बढ़ गया है। लेकिन क्या यह ठीक उसी तरह नहीं जैसे ‘बुच्ची और दाइ’ तथा नेपालियों को बहादुर कहकर काम निकालते हैं। हिंदी कहां पा रही है प्रतिष्ठा। राज्य सत्ता के प्रतिष्ठानों में, शैक्षणिक संस्थानों में या सांस्कृतिक उपक्रम में या फिर सियासत के चकलाघर में ? पता नहीं आपकी निगाह में वह कहां है। हिंदी किसके लिए गौरव का मसला है, हिंदी किसको रोटी देती है। जो रोटी कमाते हैं उनका हिंदी से कैसा लगाव है। हमने हमेशा हिंदी के सवाल को बेहद सतही ढंग से देखा है। हिंदी की गलाजत को लोग किस तरह देखते हैं पता नहीं। अभी भारतीय परंपरा के अनुसार पितृपक्ष चल रहा है और संयोग से हिंदी (राजभाषा) पखवाड़ा भी। ऐसे में रसमी तौर पर ही सही मैं हिंदी के पितरों को याद करते हुए यह टिप्पणी कर रहे हूं।
किसे इस बात की फिक्र है कि सिख कटार रखें तो वह आत्मक्षार्थ कहा जाएगा और दूसरे रखें तो पाकेटमार कहे जाएंगे। यहां कानून धार्मिक स्वतंत्रता कहकर अराजकता को संरक्षण देता है। क्या भाषाई मसले पर हिंदी इसी सलूक का शिकार नहीं हो रही है।
हिंदी की आत्मरक्षा का सवाल वह सरकार कैसे भूल जाती है जो हिंदी की पक्षधरता के नाम पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्माा गांधी, विनोबा भावे, नेहरू का हवाला देकर इसकी वकालत का ढिंढोरा पीटती नहीं थकती। जिस देश में राष्ट्रीय तिरंगा, राष्ट्रीय फल, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पेड़, राष्ट्रीय खेल और यहां तक कि राष्ट्रीय पशु (जानवर) तक है, पर कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं। संस्कृति-सभ्यता की आदि जननी का देश कहलाने का गौरव लूटनेवाले इस देश की सांस्कृतिक गैरजिम्मेदारी और राष्ट्रीय बेशरमी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है आजादी के 63 सालों और संविधान बनने के 60 सालों बाद भी भाषाई गरिमा का ख्याल किसी को नहीं। हमें याद नहीं कि विश्व हिंदी सम्मेलन में शिरकत को लेकर और पुरस्कार को लेकर तो कई विरोध हुए, प्रदेश के नाम पर कुरबानी के कई आंदोलन हुए, परछोटे से देश बांग्लादेश की तरह भाषाई अस्मिता के सवाल पर मर-मिटनेवाले एक भी संस्कृतिकर्मी, भाषाविद, लेखक या कवि सवा अरब वाले इस देश में नहीं हुए। यही वह देश है जिसके प्रधानमंत्री जी जी - 20 के सम्मेलन में विदेशी भाषा में सभा को संबोधित करनेवाले एकमात्र विभूति होते हैं।
याद कीजिए 28 अक्तूबर 1923 को सवा छह सौ साल के ओटोमन साम्राज्य की सल्तनत के खात्मे के बाद मुस्तफा कमाल पाशा की ताजपोशाी हो रही थी और राष्ट्रभाषा का सवाल था कि कौन सी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा हो। अधिकारियों ने इसके फैसले के लिए एक दिन की मोहलत मांगी, लेकिन अंत में पाशा ने बारह बजे रात में घोषणा कर दी कि आज से तुर्की की राष्ट्र भाषा तुर्की होगी।
अरबी, बोसनियाई, कुर्दिश, सरकासियन जैसी भाषाएं वहां भी हैं, पर भाषाई केंद्रीयता के सवाल पर भारतीय ग्रंथिया वहां नहीं। यहां तो कहने को नेताजी सुभाष चंद्र बोस से लेकर, गांधी, नेहरू और टैगोर तक को हिंदी की पक्षधरता के नाम पर कोट कर दिया जाता है, पर असलियत कौन नहीं जानता कि किसके मन में कितना हिंदी प्रेम था। डा. सुनीति कुमार चाटुर्ज्या का नाम तो बहुत लिया जाता है, पर उन्होंने भी हिंदी को रोमन में लिखे जाने की वकालत की थी। आखिर भाषा को जब लिपि से ही काट दिया जाएगा तो ध्वनियों (फोनेटिक्स) का कोई राल बचेगा भी? क्या यह हिंदी को हिंदी के घर में घेर कर मारने का इंतजाम नहीं कहा जा सकता है। मैं समझता हूं कि यह बहस का विषय है, श्रद्धा का नहीं। पर भाषाई मामलों में सरलीकरण कभी भी हितकारी नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि भाषाएं ऐसी भी हैं जो कई लिपियों में लिखी जाती हैं। पंजाबी का उदाहरण लें। इसे गुरुमुखी, देवनागरी व अरबी में लिखी जाती है। लेकिन यह हिंदी का कोई मानक नहीं होगा। यदि हिंदी ज्ञान व तकनीक की भाषा नहीं बन सकी है तो इसमें भाषा की तकनीकी सीमा आड़े आती है या हमारी नीचताएं-तुच्छताएं। भाषाविद तो इसकी लिपि और भाषा को वैज्ञानिक कहते नहीं अघाते। आखिर ऐसा क्यों हुआ है कि चीन ने चीनी भाषा में और रूस ने रूसी भाषा में वह सबकुछ अर्जित कर लिया है जिस पर किसी मुल्क का ज्ञान-विज्ञान गौरव कर सकता है। मैं फिर कहूंगा कि सभ्यता-संस्कृति की आदि जननी कहलाने का गौरव लूटनेवाले इस मुल्क को अपनी भाषा में नवजात और पिछड़े मुल्कों को देखना चाहिए कि वह कैसे वह सब अर्जित कर लिया है। भाषा की सीमा बताकर उसे आधुनिक दौर के लिए पिछड़ी भाषा करार देनेवाले निर्णायक भूमिका में बैठे लोगों का भाषा-साहित्य से कोई वास्ता नहीं। यह ठीक उसी तरह का मजाक है जैसे ढेरों रियलिटी शो में जुरी में बैठे लोगों को उस संबंधित विधा से दूर-दूर का वास्ता नहीं। आप क्या कहेंगे कि उड़ीसा के मानस साहू की टीम रेत की जिस सहकारी विधा में अनूठा प्रयोग कर रही है और वे लोग जो अद्भूत प्रभाव छोड़ रहे हैं वह दुर्लभ है, लेकिन इंडियाज खोज टैलेंट खोज -2 के फाईनल में जाने से उसे रोक लिया गया था। बाद में वाईल्ड कार्ड इंट्री से उन्हें मौका मिला। ऐसे कितने ही टेलेंट हंट रियलिटी शो चलते हैं जिनके जूरी को संबंधित विधाओं की एबीसी नहीं आती, बस सेलिब्रिटी हैं यही उनकी योग्यता है। कुछ इसी तरह का हैौ कि हिंदी के भाग्य विधाता जो बन बैठे हैं या जिन्हें बनाया गया है उनका भाषा-संस्कृति कर्म से कोई सरोकार नहीं। इसके लिए जो संसदीय समिति है उसके सदस्य इसके उदाहरण हैं।

खतरा हिंदी वालों से है
विदेशियों ने जिस गौरव और सम्मान के साथ जुड़ाव महसूस किया है और उसे अपनाया है, कहीं न कहीं उसका ही फल है कि 173 विदेशी विश्वविद्यालयों में उसकी पढ़ाई चल रही है। एक अमरीकी विश्वविद्यालय पेनसिल्वानिया विश्वविद्यालय में तो मैनेजमेंट के छात्रों के लिए हिंदी का पाठ्यक्रम अनिवार्य है। हिंदी का प्रचार-प्रसार में जिस तरह केरल ने मिसाल कायम की है, वह हिंदी प्रदेश में नहीं दिखती। अंतराष्ट्रीय प्रकाशकों की दिलचस्पी हिंदी में होने से लेकर से लेकर विश्व सिनेमा बाजार में हिंदी सिनेमा की पूछ और एमएनसी के लिए हिंदी का महत्व इस बात का सबूत है कि हिंदी का बाजार व्यापक हुआ है। बाजार इसलिए नहीं मिला है कि इसमें सरकार का कोई हाथ है। बाजार उसे मिलता है जिसका ‘मास’ होता है। और बाजार में पैठ किसी संरक्षण के जरिए नहीं बनती। भारत का चीनी उद्योग इसीलिए प्रभावित हुआ क्योंकि इसे सरकारी संरक्षण मिला हुआ था। जिस किसी भी उद्योग को सरकारी संरक्षण मिला होता है वह उन सहुलियतों और रियायतों के कारण खुली प्रतियोगिता का सामना नहीं कर पाता जिन्हें कंपीट कर बाजार में टिकना संभव है। सरकार को करना ही होता तो पहले विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर आज तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में इसे स्थान दिलाने के नाम कोई भी पहल नहीं हुई, सिवाय इसके कि अपने कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी में संबोधित किया। दुबारा कार्यकाल में राजग का कोआ प्रयास नहीं दीखा। हां मारीशस में हिंदी सचिवालय व वर्द्धा में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया। हिंदी को जो जगह मिलनी है अपने भरोसे वह तो मिल ही रही है, पर व्यवस्था का सहकार जहां चाहिए वहां हम बेहद कमजोर पड़ जाते हैं। अपने मुल्क में ही इसे राष्ट्रभाषा बनाने के नाम पर विरोधियों की अपेक्षा हिंदीवाले ही अधिक बिखरे नजर आते हैं। चीन. जापान. रूस, चेक, हंगरी में विदेशी हिंदी विद्वानों ने हिंदी शिक्षण की एक सुदृढ़ परंपरा कायम कर दी है, पर उन्हें भी पीड़ा होती है घर में हिंदी को उपेक्षित देखकर। गुलाम भारत में केंद्रीयता के सवाल को लेकर रजवाड़ों में मनमुटाव व संघर्ष छिड़े रहते थे, पर विदेशी ताकत के समक्ष झुकने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। आखिर अपने बीच का कोई शिखर पर तो नहीं है, यह देखकर उन्हें तसल्ली होती थी। कुछ-कुछ आज उसी तरह भारत एक भाषायी गुलामी के उत्तर औपनिवेशिक दौर में है और हिंदी के मामले में भी वही हो रहा है। जिस बंबइया फिल्मों को हिंदी के प्रचार-प्रसार का श्रेय दिया जाता है, उसकी पटकथा से लेकर संवाद तक सभी कुछ रोमन में लिखे होते हैं। अमिताभ, प्रियंका, मनोज वाजपेयी, आशुतोष राणा जैसे उंगली पर गिने जानेवाले हैं जो अपने संवाद हिंदी में मांगते हैं। लेकिन इससे होता क्या है। इस बार (14 सितंबर 2010 के आसपास ) संसदीय राजभाषा समिति की बैठक का विरोध करनेवाले महानुभाव हलफनामा लेकर बता सकते हैं कि उन्होंने निजी स्तर पर इसका कितना भला किया है। हिंदी माध्यम के विद्यालयों में कितनों के बच्चे व आश्रितों की शिक्षा-दीक्षा हो रही है। आप विपक्ष में हों या सत्ता में, सत्ता पर प्रभाव कम नहीं हो जाता। आप रसूखवाले रहे हों तो आपका कोई काम नहीं रुकता। भाषा, देश, समाज की बात हो तो कन्नी काटने के लिए व्यवस्थागत कई सीमाएं दीखाने लग जाते हैं, लेकिन यही सीमा तब आड़े नहीं आती जब आपके निजी मसले होते हैं। सार्वजनिक जीवन से अर्जित निजी रसूख का इस्तेमाल तब क्यों नहीं होता। क्या सिर्फ इसका हलफनामा आप ले सकते हैं कि हिंदी संबंधित जिम्मेदारियों या ओहदों पर होते हुए आपने निजी स्तर पर हिंदी के लिए क्या किया है। और इसके जिम्मेदार क्षेत्रीय भाषा के लोग नहीं हिंदी वाले ही है। पर हिंदी की रोटी खानेवाले और हिंदी पट्टी से आनेवाली विभूतियों ने क्या किया है यह एक सोशल आडिट का विषय है। राजकोषीय व्यय पर पलनेवाले विभाग और उनके अधिकारियों ने अपनी कुर्सीगत जिम्मेवारियों को निबाहते हुए अपेक्षाओं-आकांक्षाओं को पूरा किया है इसके आकलन का समय आ गया है। कहा जा सकता है कि हिंदी को खतरा हिंदीवालों से है, हिंदी प्रेमियों से नहीं। जिन्होंने हिंदी को जीवन दे दिया है उनसे भी नहीं। यह एक खतरा है जिसके सामने अभी चुप हो गए, तो फिर यह भी हो सकता है कि हम गुंगे कर दिए जाएं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. Rashtra rahega tab to rashtrabhasha hogi. Bharat rashtra nahin hai. Yah bahurashtriya rashtra hai.

    - Ramdeo Vishwabandhu, activist, state coordinator, Gram Swaraj

    Regionalism badhta ja raha hai. Sab chup hain. Law & order enforce nahin kiya jata. Sab achhe bane rahte hain. Mumbai ho ya Karnataka, shaitan lahan nahin hain?
    Hindi desh ko jodta hai, but regional uprising ko koi check nahin karta. Neta, administration, police sab chup hain. Apna kam karne men darte hain.

    - Sandip Bhattacharya, AGM, ISPAT ALLOYS, Blasore, Orissa.

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