हमसफर

बुधवार, 28 जनवरी 2015

अभी नहीं जाऊंगा, सिन्हा जी क्या कहेंगे!

अविभाजित बिहार में विकास विद्यालय के बाद किसी निजी स्कूल ने यदि अपना परचम लहराया था तो वह था इंपीरियल स्कूल ऑफ लर्निंग, झरिया. सातवें दशक में बना यह स्कूल बाद में इंडियन स्कूल ऑफ लर्निंग, झरिया हुआ और आइएसएल के नाम से चर्चित और लोकप्रिय हुआ. इसके संस्थापक थे डॉ जेके सिन्हा, दुनिया में सर्वाधिक समय तक किसी शैक्षणिक संस्थान के प्रमुख रहने का रिकार्ड होल्डर रहे. यह सरस्वती पुत्र सरस्वती पूजा के दिन इस दुनिया से चल बसा. और गणतंत्र दिवस के दिन इनकी अंत्येष्टि धनबाद के गोविंदपुर में टुंडी रोड के किनारे खुदिया नदी के तट पर जब हो रही थी तो मैं भी वहां था. मैं दस सालों तक इस समूह के विद्यालय में बतौर पीजीटी रहा. यह रिपोर्ट इसी लिहाज से हम जैसे शिक्षकों की ओर से एक श्रद्धांजलि स्वरूप है.........................................मॉडरेटर
      
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया, मौत आ गयी कि दोस्त का पैगाम आ गया
26 जनवरी का दिन. समय : रात्रि आठ बजे. स्थान : धनबाद के गोविंदपुर स्थित टुंडी रोड के किनारे खुदिया नदी का तट. मां सरस्वती की प्रतिमाओं का विसजर्न हो रहा था. वहीं बगल में प्रख्यात शिक्षाविद डॉ जेके सिन्हा का दाह-संस्कार चल रहा था. कुछ जा चुके थे. कुछ जाने को थे. ठंड से डरे कुछ जाने को बेताब थे. इन्हीं फुसफुसाहटों के बीच दो-चार शिक्षक-प्राचार्य डॉ सिन्हा के शुरुआती सहयोगियों में एक ‘एकेडमिक क्वेस्ट’ के उपाध्यक्ष एएल दास से बोल रहे थे : ‘सर चलेंगे नहीं?’ जलती लाश की लपटों की
 तरफ देख उन्होंने कहा : ‘नहीं. अभी नहीं जाऊंगा, सिन्हा जी क्या कहेंगे. बोलेंगे, बच्चू छोड़ कर चला गया.’ दरअसल, डॉ सिन्हा श्री दास को एकांत के क्षणों में बच्चू ही कहते थे. श्री दास के लिए स्व सिन्हा अब भी सिन्हा जी ही थे.
बनाया शिक्षा का समाज : हाउसिंग कॉलोनी स्थित मानकी मंदिर से निकली डॉ सिन्हा की शवयात्र उनकी कर्मस्थलियों से होते हुए खुदिया नदी पहुंची. स्कूल परिसरों में दहाड़ें मारकर रोतीं शिक्षिकाएं, सुबकते शिक्षक-सहकर्मियों ने करुण चादर तान दी थी. यह माहौल डॉ सिन्हा द्वारा बनाये गये समाज का अहसास करा रहे थे. आइएसएल झरिया, किड्स गार्डेन झरिया, शिशु विहार बस्ताकोला से होकर किड्स गार्डेन हीरापुर और फिर हाउसिंग कॉलोनी से आइएसएम एनेक्स के बाद खुदिया की ओर चली शवयात्र ने सैलाब का रूप ले लिया. विधायक, पूर्व विधायक व पूर्व मंत्री, अवकाश प्राप्त आइएएस अधिकारी, कॉलेज प्राचार्यो, सरकारी-गैरसरकारी स्कूलों के शिक्षक किसी को बुलाया नहीं गया था. जिसे भी जानकारी मिली सभी जुटते-जुड़ते गये. कुछ इसी तरह से डॉ जेके सिन्हा कोयलांचल के निजी विद्यालयों के बीच ताजिंदगी समन्वयक की भूमिका निभाते रहे. उन्हें जाननेवाले बताते हैं कि उन्होंने इसी तरह शिक्षा का समाज बनाया. कोयलांचल के 46 सीबीएसइ संबद्धता प्राप्त विद्यालयों के संगठन ‘सहोदय कंप्लेक्स’ तथा आइएसएल समूह के ‘एकेडमिक क्वेस्ट’ के अध्यक्ष पद पर रहे. 
शिक्षाविदों ने कहा
अद्भुत प्रशासनिक कौशल : राजकमल सरस्वती विद्या मंदिर के प्राचार्य फूल सिंह कह रहे थे : धनबाद के निजी स्कूलों के बीच जो सामंजस्य, सौहार्द सिन्हा साहब ने बनाया, वह उनके अद्भुत प्रशासनिक कौशल का नमूना था. धनबाद में आने के बाद उनके संपर्क में कब, कैसे आया, नहीं बता सकता. मुङो तो ऐसा लगता है कि मुङो उनका सर्वाधिक स्नेह मिला. 
..नजारा ही कुछ और होता : डीएवी धनबाद जोन के निदेशक तथा डीएवी कोयलानगर के प्राचार्य डॉ केसी श्रीवास्तव का बोलना था कि आठवें-नौवें दशक में सिन्हा साहब ने अविभाजित बिहार में सीबीएसइ संबद्धता प्राप्त पहले निजी स्कूल से कोयलांचल में जो मेयार बनाया था, वह बरकरार रहता तो आज धनबाद का नजारा ही कुछ और होता. डॉ सिन्हा ने कोयलांचल ही नहीं, वरन झारखंड-बिहार में एक शैक्षणिक वातावरण बनाया. 
अजब कौशल : एकेडमिक क्वेस्ट के उपाध्यक्ष एएल दास का कहना था कि डॉ सिन्हा ने अजब कौशल अर्जित किया था. उन्होंने जिस किसी भी चीज को छूआ, वह सोना हो गया. उनके विद्यालय से निकले छात्र और शिक्षक आज जहां भी हैं, वहां के गौरव व सम्मान हैं. उनके योगदान को हम शिक्षा के क्षेत्र में कोयलांचल के वैशिटय़ के रूप में रेखांकित कर सकते हैं. 
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का माहौल : आइएसएल भूली के प्राचार्य एसके सिंह का कहना है कि डॉ सिन्हा ने कोयलांचल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का ऐसा सकारात्मक माहौल कायम किया, जिससे यहां शिक्षा का एक नया समाज बना. शैक्षणिक क्षेत्र में कोयलांचल को पहचान दिलाने में उनकी महती भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता. अपने योगदानों की बदौलत वे हमारे बीच जिंदा रहेंगे.
अब कौन होगा नंबर तेरह का प्रेमी
ज्योतिषी में 13 की संख्या को अपशकुन माना जाता है. नंबर तेरह यानी शनि. लेकिन डॉ सिन्हा के पास सभी गाड़ियों के नंबर 13 से अंत होते थे. पहली गाड़ी के तौर पर उन्होंने किसी छात्र के अभिभावक से बीएचआर या बीइआर 1013 नंबर का एक सेकेंड हैंड स्कूटर लिया था. फिर एंबेसडर कार ली 1013 ही, जिस नंबर को लोग अपशकुन मानते हैं, वक्त के साथ वह डॉ सिन्हा का पसंदीदा नंबर बनता गया. फिर तो 2013, 3013, 4013 और 5013 नंबर की कारों का तांता लगता गया.
..जब हेगड़े की पैरवी पर नहीं लिया एडमिशन
कर्नाटक के सीएम रहे रामकृष्ण हेगड़े ने एक बार झरिया के विधायक रहे सूर्यदेव सिंह से आइएसएल झरिया में किसी छात्र के एडमिशन के लिए कहा था. धनबाद कोयलांचल में वह दौर सूर्यदेव सिंह का था. हेगड़े ने सोचा होगा एक तो वह सीएम हैं और ऊपर से धनबाद में एसडी सिंह का जलवा. एसडी सिंह ने इसी भरोसे डॉ जेके सिन्हा से उस छात्र के एडमिशन की बाबत बात की. डॉ सिन्हा ने साफ शब्दों में कह दिया कि सारे फॉर्म बोर्ड जा चुके हैं. कोई गुंजाइश नहीं. अब यह समझा जा सकता है कि इन हालातों में डॉ सिन्हा को इस फैसले पर पहुंचना कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा. 

डॉ जितेंद्र कुमार सिन्हा : एक नजर में
जन्म : 5 फरवरी, 1942. गया (अब जहानाबाद) के नेहालपुर नामक ग्राम.
पिता : श्री देवनंदन प्रसाद. पेशे से प्रधानाध्यापक थे. माता मानकी देवी की अकाल मृत्यु ने जितेंद्र का बचपन व कैशोर्य छीन लिया. दिवंगत माता की स्मृति में ही डॉ़  सिन्हा ने, धनबाद की हाउसिंग कॉलोनी स्थित अपने आवास का नाम ‘मानकी मंदिर’.
शिक्षा : एम़ ए (हिंदी) प्रथम श्रेणी, मगध विश्वविद्यालय, गया.
शोध : राजा राधिका रमण और उनके उपन्यास. प्रख्यात हिंदी विद्वान स्व डॉ धर्मेंद्र ब्रह्मचारी शास्त्री के मार्गदर्शन में शोध पूरा किया.
सांगठनिक यात्र : सन् 1965 के उत्तरार्ध में, धनबाद आने के बाद यहां के हीरापुर में संचालित बीएन गिरि नामक शिक्षा शास्त्री के ‘कोलफील्ड स्कूल ऑफ एजुकेशन’ में डॉ सिन्हा को नौकरी मिल गयी. वह स्कूल अब भी संचालित है, पर आइएसएल की अपेक्षा बेहद छोटा. यहां उन्हें जगदंबा सिंह, डॉ देवेन्द्र सिंह, सुरेश मिश्र, हलधर प्रसाद चौबे, डिक्रूज फ्रांसिस जैसे मित्र मिल गये. यहीं से प्रेरित होकर डॉ सिन्हा ने झरिया के कतरास मोड़ में ‘इंपीरियल स्कूल ऑफ लर्निंग’ नामक विद्यालय की स्थापना की. अब तो आइएसएल नाम के स्कूलों का ग्रुप ‘एकेडमिक क्वेस्ट’ बन गया
 
 
 

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