हमसफर

गुरुवार, 31 मार्च 2011

वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता में जन की हैसियत

पुष्पराज

(एक हैं पुष्पराज। जेएनयू में प्रो. रह चुके प्रो. ईश्वरी प्रसाद की उधारी से कहें तो घुमंतू पत्रकार। कुलदीप नैयर उन्हें प्रतिबद्धता और साहस से भरा मानते हैं तो प्रभाष जोशी उन्हें पत्रकारिता को सामाजिक बदलाव की दुधारी तलवार माननेवाले पत्रकारों की खत्म हो रही प्रजाति मानते थे। नामवर उन्हें खबरों के संसार का अपना संजय घोषित कर चुके हैं। हां, भारतीय पत्रकारिता में तेवर और तमीज, धार और धारा को जिंदा रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं पुष्पराज। कहना नहीं होगा कि पत्रकारिता की जिस मिशनरी धार को मठाधीशी सरोकारों या सत्ताओं को साधने में खत्म किया जा रहा है, पुष्पराज उसके झंडाबरदार हैं। सिंगुर-नंदीग्राम को जीने-भोगने के बाद नंदीग्राम डायरी नाम से एक किताब भी पेगुइन बुक्स से आ चुकी है। काफी चर्चा में रही। दंडकारण्य से लेकर नंदीग्राम और सिंगूर से लेकर मड़वन (मुजफ्फपुर का वह गांव जहां एस्बेस्टस कारखाने के विरोध में आंदोलन उठा) तक में उन्हें आप पा सकते हैं। वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता की सीमाएं हैं, पर सहुलियतें और खूबियां भी हैं। हमें सरोकारों को ऊपर रखकर माध्यम की सहुलियतों व खूबियों से ही वास्ता रखना (रणनीतिक तौर पर) चाहिए। कई बार गरमागरम बहस हो चुकी है उनसे। किसी सिलसिलें में साल 2009 में कुछ दिनों के लिए हम जमिंदोज थे, तब भी। इत्तफाक क्या कहिए कि डीवीसी घोटाला का कंटेंट भी हमारी बहसों-मुबाहसों के जिक्र में था। और देखता हूं कि इसके कुछ ही दिन बाद मियां खरामां-खरामां हाजिर हैं परदफाश डाट काम लेकर। मेरे लिए चकित और खुश होने के अवसर से ज्यादा यह सोचने का मौका है। मैं चाहूंगा कि हमारे साथी उनकी इस नई पेशकश को देखें और टिप्पणी दें- )

सवाल यह है कि पैदल भारत की पत्रकारिता करनेवाले एक कलम मजदूर को वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता जैसे चमत्कृत (चमत्कारी) विषय पर किस तरह सोचना चाहिए। जिस इलाके से आप दूर रहते हैं, उसके बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। हमने वर्चुअल माध्यम को कल तक इंटरनेट की धमनियों से होकर प्रकट होनेवाली वेबपत्रकारिता की तरह देखा है। हिंदी में ‘वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता’ के कई अर्थ सामने आए हैं। काल्पनिक यथार्थ की पत्रकारिता, करीब-करीब लगभग वैसा ही जैसा वर्णित, परंतु पूर्णतः नहीं की पत्रकारिता। एक युवा पत्रकार ने आभासी दुनिया की पत्रकारिता कहा। आग का एक गोला देखने में अग्निपुंज, हाथ में लिया तो कुछ भी नहीं। खुशबू का एक टुकड़ा, उठाया तो कुछ भी नहीं। पानी से भरा घड़ा, प्यास बढ़ी तो न ही घड़ा, न ही पानी। इस विषय के वास्तविक अर्थ के अनुकूल ही मैंने इसे शुरू से देखा है।

मैं अपने विषय से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए यदा-कदा इंटरनेट का उपयोग जरूर कर रहा हूं, पर मेरे पास 15 वर्षों की पत्रकारिता से इतनी कमाई संचित नहीं हो पाई कि मैं एक कंप्यूटर खरीद सकूं। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि मेरे पास कंप्यूटर उपलब्ध हो जाए तब भी मैं इस माध्यम से अपने देश के सबसे कमजोर के हक में कुछ भी नहीं कर पाऊंगा। बाजार में उपलब्ध साइबर कैफे के भरोसे काम करना बहुत खर्चीला है। एक घंटा इंटरनेट उपयोग करने का खर्च एक वक्त का भोजन या आधा लीटर दूध के बराबर है। बहुत ही मुश्किल से अपने लिए छपने की जगह ले पाना, बहुत कम पैसे में जीवन जीने की जतन करने वाला हिंदी का एक कलम मजदूर अपना पेट काटकर इंटरनेट सेवा तो प्राप्त नहीं करेगा ना। जो मेरे लिए युक्तिसंगत नहीं है, उस माध्यम से आप देश के आम जन की पत्रकारिता का दावा किस तरह कर सकते हैं। इस माध्यम से एक खास वर्ग का इंटरटेनमेंट हो सकता है, जनहित की पत्रकारिता कतई नहीं।
2009 के मई माह में मैंने केंद्र सरकार के एक प्रतिष्ठित मंत्रालय की देखरेख में, देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने की शिरकत से हुए घोटाले के विरुद्ध ‘परदाफाश डाट ब्लागस्पाट’ नामक एक ब्लाग मित्रों की मदद से बनाया। हमारी समझ थी कि देश की मुख्यधारा की मीडिया जिस मुद्दे को अछूत मान रही है, एक ब्लाग के रूप में प्रकट होने से मुद्दा अपना रास्ता ले लेगा। इस ब्लाग का अंग्रेजी रूपांतरण स्कैम डाट काम के नाम से आया। हिंदी ब्लाग पर मुश्किल से 20 पाठकों की प्रतिक्रिया आई। भारतीय ब्लागरों की दुनिया में लगभग सभी बड़े सरताजों के पास ईमेल लिक मेल भेजे गए थे। इनमें कई मीडिया प्रतिष्ठानों के रायबहादुर भी थे। परदाफाश ब्लाग के सामने आने से परदा नहीं उठा। 5 हजार करोड़ की भ्रष्टाचारिणी दुल्हन परदे के भीतर ही रह गई। हमने हार नहीं मान ली। यह एक अनुभव था। भारतीय ब्लागरों के मुद्दे अलग हैं। वे सब बुद्धिजीवी हैं, पर अपनी सुविधा के विवेक से अपने किस्म की बहसें छेड़ते हैं। हम मानते हैं, जितना समय, शक्ति, भरोसा हमने ब्लाग पर खर्च किया, इतने में हम हजार पुस्तिका तो जरूर छापकर बांट सकते थे। हम पर्चा बांटकर भी हजारों लोगों से संवाद कर सकते थे।
जिस माध्यम से अपनी बात रखते हुए आप मूल्य, नीति-नैतिकता और जन की उपेक्षा करते हैं, उस माध्यम के बारे में मगजमारी का नतीजा क्या होगा। पहली बार एक अंग्रेजी अखबार के वेबसाईट पर अपनी तस्वीर, अपनी लिखाई को देखकर मैं भी चकित हुआ था। लेकिन अपने लिखे को सीसे पर चमकते हुए रंगीन छटाओं में देखने का लुत्फ किस तरह की आत्ममुग्धता है। इस माध्यम ने लिखने वालों को लिखने के लिए कागज, कलम-स्याही के मूल रिश्ते से अलग करने की कोशिश की है। हम यंत्र के साथ एकाकार होकर यांत्रिक हो सकते हैं, मानवीय कदापि नहीं। यांत्रिक मानस का विवेक साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता के एक-एक आइकान को खारिज करने में लगे तो क्या यंत्र अपनी सुविधा के नए आइकान तैयार कर लेगा।
ब्लाग-वेबसाइट की दुनिया के कर्ताधर्ता इस माध्यम को प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के समानांतर वैकल्पिक मीडिया की तरह पेश कर रहे हैं। दावों के अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन जिस माध्यम को समूह नहीं व्यक्ति संचालित करता है, उसमें व्यक्ति के निजी स्वार्थ, व्यक्तिगत कुंठा, अपनी आकाक्षाएं ज्यादा प्रबल हो जाती हैं। मानवीय गरिमा की छाती पर प्रोफेशनल यश का भूत सवार होना घातक है। हिंदी के ज्यादातर ब्लाग यशोकामियों के, यशाखेट के अड्डे साबित हो रहे हैं। कुछ ब्लागों ने भारतीय पत्रकारिता के आईकान प्रभाष जोशी के खिलाफ हजार-हजार बार ब्राह्मण-ब्राह्मण का शोर मचाया। ब्राह्मण की कोख से पैदा होना अगर अपराध था तो क्या उन्हें इस अपराधबोध में आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी। किसी भी भारतीय नागरिक को जाति सूचक संज्ञा से संबोधित करना सभ्य भारतीय समाज की परंपरा नहीं नहीं हो सकती तो भारतीय अपराध संहिता में संवैधानिक अपराध है। दरअसल वर्चुअल स्पेस में इतनी सहूलियत है कि आप झांककर देख लीजिये कोई बीमार तड़प रहा है और उसकी असहाय स्थिति में हाथ लगाये बिना, उन्ही हाथो से कोई मेल चस्पां कर दीजिए। .ऐसे में वर्चुअल स्पेस से फैलते अमानुषिक संस्कृति पर बहस भी ठीकाने नहीं लग सकती। नामवर सिंह महान या घंटा... की वोटिंग कराई गई। घंटा का देशज मतलब घंटी नहीं, शरीर का खास हिस्सा है, जिसे हूबहू लिखना इस समय असंगत होगा। एक ब्लागर ने एक विद्रोही कवि को नीचा दिखाने के लिए लिखा - वे पहले गोली दागते थे, अब मूत रहे हैं। ब्लागरों ने पत्रकारिता और साहित्य के आईकानों को गालियां देकर चर्चा में आने की खूब कोशिशें कीं। नामे-नाम कि कुनामे नाम, ऐसे ब्लागरों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई नहीं होने से वे ज्यादा ताकत से गंदगी फैलाते रहे।
ब्लागरों की भीड़ में कुछ ब्लाग ऐसे भी हैं, जिनसे पत्रकारिता की दुनिया की अंतर्कथाएं बाहर आ रही हैं। भड़ास4मीडिया मीडिया महकमे की खबर के लिए लोकप्रिय हुआ है। ब्वाइस आफ जर्नलिस्ट की भूमिका सकारात्मक है। स्टार पत्रकार पुण्यप्रकाश वाजपेयी और जाने-माने कथाकार उदय प्रकाश का ब्लाग सम्मान के साथ पढ़ा जा रहा है। पूंजी घरानों की पूंजी से नियंत्रित मीडिया ने जिस सत्य को दबाने की कोशिश की है, उसे इस वर्चुअल स्पेस से कहने की कोशिश तब सार्थक हो सकती है, जब भारत का हर आदमी साक्षर हो जाए। हर साक्षर गरीबी रेखा से ऊपर उठ चुका हो। हर भारतीय नागरिक के पास अपने हिस्से का स्पेस, वर्चुअल दुनिया में उतना ही उपलब्ध हो, जितना कि मीडिया घोषित किसी महानायक अमिताभ बच्चन के लिए। क्या इस मायावी लोक में सबसे अंतिम आदमी और सबसे अगले आदमी के कद को एक तरह देखने की कोशिश कभी की जाएगी ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. इससे सहमत हूं कि साइबर पत्रकारिता आम लोगों से जुड़ नहीं सकी है। इस विषय पर लेखक के साथ निजी तौर पर अक्सर बहस होती रहती है। लेकिन साइबर मीडिया ने परंपरागत मीडिया के एकाधिकार को विकेंद्रीकृत किया है, जो सकारात्मक है। इसे सही दिशा देने की जरूरत है। निस्वार्थ और निर्लिप्त भाव से जनता का काम करने वालों का ख्याल कौन रखेगा ? वे भैंस चराते हुए कविता पढ़े, चौराहे पर नुक्कड़ नाटक करे या पेट काटकर ब्लॉग लिखे, हमारे लिए सरहानीय होना ही चाहिए।

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  2. ब्लाग अभिव्यक्ति का सिर्फ एक माध्यम है और इस नाते उसकी हदें और सहूलियतें होंगी, हमें यह मान लेना चाहिए। हर दौर में जब कोई डिवाइस आती है तो पहले वह सीमाएं उजागर नहीं करतीं क्योंकि वह जरूरतों की प्रेरणा और दबाव में ईजाद होती है। और यह तुरत-तुरत की बात होती है। इस्तेमाल के क्रम में और विकास क्रम में वह प्रेरणा और दबाव डाइल्यूट होते जाते हैं। उपयोक्ताओं का दायरा भी बढ़ता जाता है और डिवाइस का वैविध्य भी सामने आता है। उसी क्रम से गैरजिम्मेवारी भी बढ़ती जाती है और तब माध्यम की सीमाएं संकटों को उजागर करती हैं। सोचिए जब पहली बार कलम या कागज का ईजाद हुआ होगा तो क्या वह कवि-कलाकारों के लिए तो नहीं लाया गया होगा। आइंस्टाइन ने जिस सापेक्षता सिद्धांत पर शुरुआती काम किया वह एक किरानी थे और उनके पास कोई संसाधन समृद्ध लैब नहीं था। वह रद्दी कागजों के पीछे ही सारी गणनाएं कर रहे थे। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं डाक्टरों ने जिस स्टीफन हावकिंग को जीवन का संकट दीखाकर बेकार कह दिया था उनकी संतानें हैं और विज्ञान के लिए एक ब्रीफ हिस्टरी आफ टाईम में सबक सामने लाते हैं। अब उन्होंने ईश्वर को चुनौती देते हुए किताब लिखी है। वह कि लैब में काम करते हैं। वह तो कोई काम नही कर सकते।
    किसी भी बंदी से होनेवाला नुकसान या होली में पानी की बर्बादी के बजाए क्रिकेट के बुखार से जीडीपी का अधिक नुकसान हो रहा है। जितनी दवाओं का ईजाद होता है तो क्या सारे शोध उपभोक्ताओं की जेब में झांकते हुए होता है क्या। बाईबल जब भी लिखी गई और अब भी हिब्रू को समझने वाले लोग बहुत नहीं थे न हैं। लेकिन इससे उसके प्रसार पर कोई फर्क नहीं पड़ा। इसलिए किसी माध्यम की आलोचना इस आधार पर नहीं होनी चाहिए कि वह माध्यम आम जन के बस में है या नहीं। देखना यह चाहिए कि माध्यम से आम जन के हित और सरोकार की बात की जा सकती है या नहीं।
    हमें 26 वर्ष की आसमां महफूज के फेसबुक पर उस पोस्ट को नहीं भूलना चाहिए जो उसने 19 मार्च को किया था जिसमें उसने कहा था – लोगों मैं आज तहरीर चौक जा रही हूं। इस एक संदेश से 71.4 प्रतिशत की साक्षरता वाले आठ करोड़ के मिस्र में 50 लाख फेसबुक यूजर से 36 हजार समूह बने तथा 14 हजार नए पेज बने। हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी चौक पर। और नतीजा हमारे सामने है।

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