हमसफर

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

फेसबुक के कोने से

समकालीन ज्वलंत मसलों को लेकर किये गये कुछ पोस्ट जिस पर हुई गर्मागर्म बहस या चर्चा ने एक वातावरण रचा, उसे अपने ब्लॉग में प्रतिक्रियाओं के साथ पेश कर रहा हूं


 19 अक्तूबर 2015 का पोस्ट:::

सवालों से घिरा विरोध और तसलीमा का सवाललेखकों द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार का लौटाना लगातार जारी है. एक नाम छूटगया था. उर्दू शायर मुनव्वर राणा का. वह भी शामिल हो गये चर्चास्पद नामों में.पर इस अभियान में भयंकर बिखराव है. विरोध करनेवालों की भले ही बड़ी जमात-फौजबनती जा रही हो, पर सत्ता पक्ष (वर्ग शत्रु) लेखकीय अस्मिता का मजाक बनाता जारहा है. इसकी वजह बिखराव भरे विरोध में निहित है. पुरस्कार वापसी एक ऐसीभेंड़चाल हो गयी जिसमें पुराने-प्रगाढ़ रूपवादी और प्रगतिशील एक जगह खड़े हैं.हो सकता है इन सबका मेल नया रंग पैदा करे.बिखराव भरे विरोध का मतलब क्या है. क्या पुरस्कार वापसी मूल्यों कीप्रतिबद्धता से उपजा विरोध है या राजनीति प्रेरित विरोध. सवालों से घिरे इसविरोध को असहमति माना जाये या खास वैचारिक प्रपंच-कर्मकांड का पिछलग्गूपन. जिसतरह दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा लगानेवाली पार्टियां आपस में बिखरी हुईहैं और अपना मकसद साधने में वर्गशत्रु को आसानी देती है. लगभग यही रुख है विकटहो रहे सांप्रदायिक सरोकारों के दौर में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध का. असहमतिकी आजादी जनतंत्र की प्राणवायु है और इसकी रक्षा करना लेखक से बढ़िया कोई नहींजानता. लेकिन इन महान लेखकों को देखना चाहिए कि जिस संस्थान का वे जैसा विरोधजता रहे हैं, वह विरोध असहमति की सीमा को लांघ कर कहीं असहिष्णुता की जद मेंतो नहीं जा रहा. उन्हें बताना चाहिए कि आखिर यह संस्थान इस नृशंस परिस्थिति कादोषी कैसे है. क्योंकि अवार्ड के अपमान की ध्वनि यही है. जहां तक अकादमी केस्टैंड का सवाल है तो संस्थान के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने साहित्यअकादमी की वेबसाइट पर इस संदर्भ में बतौर अपना पक्ष एक टिप्पणी पोस्ट कर दीहै. साइट के मुख्य पृष्ठ पर ही अध्यक्ष, साहित्य अकादेमी की लेखकों सेअपील-प्रो. एम. एम. कलबुर्गी के सम्मान में श्रद्धांजलि- नाम से एक पोस्ट है.पाठकों की सुविधा के लिए यहां लिंक दिया जा रहा है -http://sahitya-akademi.gov.in/sahit…/…/appeal_h-12-10-15.pdf. येविरोध करनेवाले लेखक एक लेखक (अध्यक्ष) से और क्या चाहते हैं, वह पद त्यागदें. इनमें किस लेखक ने असहमतिस्वरूप सरकारी सेवा के दौरान अपनी नौकरी छोड़ीथी. वह कहेंगे ऐसी स्थिति ही कहां आयी थी. हां, न तो बाबरी मसजिद का कांड हुआ,न भोपाल गैस त्रासदी, न निर्भया कांड और न ही कोई बड़ा हादसा, जिससेलेखक समुदाय की नाक या दिल जुड़ सके. लेकिन शैलेश मटियानी, नागार्जुन,त्रिलोचन जैसे बड़े लेखकों का दुःखद अंत. उनके अंत में लेखकीय समुदाय कीबेदिली बेतरह सामने आयी थी. लेकिन यह तो घर की बात है. इस बार पुरस्कार वापिसीकी भीड़ में यह जरूर हुआ कि इनमें वैसे जीनियस लेखक भी शामिल हैं जिन्हेंविजिटिंग प्रोफेसर होकर एक भी लेक्चर एटेंड करना ठीक नहीं लगा. अंत मेंविश्वविद्यालय से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.विरोध के इन पैरोकारों को तसलीमा नसरीन के टके से सवाल का जवाब देना चाहिए. इनलेखकों के सामने उनका सवाल है कि जब वे प्रताड़ित थे, तो भारत के तमाम लेखककहां थे.अकादमी पुरस्कार लौटानेवालों की जमात तब भी थी जब दकियानूसी इसलामी संगठनों कोमनाने के लिए पश्चिम बंगाल से तसलीमा को निकाला जा रहा था. सिंगूर पर समर्थनपाने के लिए एक महिला, लेखक को दरबदर किया जाना भी उन्हें मंजूर था. भारतीयलेखकों से मिले असहयोग पर वह तब चुप थीं, पर लेखकों द्वारा अकादमी के मुखरविरोध ने उनके जख्म को हरा कर दिया है. व्यथित तसलीमा यदि भारतीय लेखकों कोदोहरे मानदंड का कहती हैं तो इन लेखकों को बगलें झांकने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए. प्रगतिशील भारतीय लेखकों का वाम खतरनाक मैनरिज्म का शिकार है.इन सेकुलरों का सीधा फार्मूला है हिंदू सांप्रदायिकता का विरोध जघन्यअल्पसंख्यक कट्टरता की रक्षा करते हुए. ये ही लोग हैं जो अल्पसंख्यक उग्रकट्टरता की रक्षा में मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं. वामपंथ की चालाकियांप्रगतिशीलों-सेकुलरों की धूर्तता की ढाल बन जाती है. पाकिस्तान की उग्र इसलामीकट्टरपंथ और भारत का प्रगतिशील बौद्धिक तबका करीब-क

प्रतिक्रिया-

Marutrin Sahitya Patrika सुक्ष्मता और निषपक्क्षता से आपने विष्लेशण किया. हम आहत हो रहे है.
आहत पुरस्कार


अब हम किसे ध्रुव तारा मानकर आगे बढ़ेंगे !
कई ध्रुव तारें * एक एक कर टूट -टूट विखरते जा रहे हैं
तारों को टुटने पर मजबुर करने वाले हत्यारों
के खिलाफ हम रोष से भरे जा रहे हैं.
सरकार की चुप्पी भी हमें सता रही है.
मगर हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं.
आसमान को सितारों से विहीन होता देख
हम छटपटा रहे हैं.
उन्हें रोकने की कोशिश में हम
हाथ पैर , न तैरना जानने वालों सा
बहती तेज धार में मार रहे हैं.
और पानी से निकले भींगे पंछी-सा
आसमान में उड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
डूबते- उतरते चट्टानों की मार खाते
न जाने हम कितने घायल होते जा रहे हैं
वे लोग हमें राजनीति का पिछल्लगू बता रहे हैं
जो स्वयं राजनीति के पीछे- पीछे चल रहे हैं.
मगर हमें घायल होने की चिंता नहीं है
हम तो यही सोच -सोच कर आहत हुए जा रहे हैं कि
हमारे बच्चे अब कभी नहीं कहेंगे कि
मैं भी एक दिन साहित्य अकाडेमी
पाने वाला लेखक बनुँगा . और
पुरस्कार स्वयं आहत हो कहता है-
अब मैं अपने पैरों पर खड़ा कैसे हो पाऊँगा?
(*ध्रुव तारा को बहुवचन बनाना पड़ा क्यों कि सारे पुरस्कार पाप्त लेखक ध्रुव तारा ही हैं)
- सत्य प्रकाश (१९-१०-२०१५)



 
 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें