हमसफर

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

तहखाने से

लड़की

जैसे हम अपने तलुए देखते हैं
उसकी जांघें सहलाते हैं
नितम्बों को थपथपाते हैं खुले में
अपने स्तन के घाव का दर्द
उसकी आँखों में दिखना तो दूर
पीठ के खरोंच तक नहीं देख सकती

खुले में यह सोचकर वह सिहर उठती है वह
क्योंकि वह मल्लिका शेरावत और राखी सावन्त नहीं

अपनी पीठ की खरोंच तक देखने के लिए
खिड़की-दरवाजे बना लेती है अंगोपांग को
और आँखें चिपक जाती हैं दसों दिशाओं पर
खतों में कलेजा’ को झोंककर चूल्हे पर रसोई बनाती है
तो धुआँ और चेहरे के बीच
पिघलती बर्फ नहीं दिखती

अपनी नागरिकताओं से वंचित
वह नहीं बोल पाती अपनी जबान
अपनी हँसी नहीं हँस पाती
कब का भूल चुकी है अपना रोना
अकेले में खुद को खटखटाकर
खौफनाक गलियों से गुजरती है वह


माँ की शिक्षा

माँओं ने हमें
क ल म, क म ल और न जाने कितने शब्द
खाने को भूलकर नहाने को टालकर
इसलिए नहीं सिखाये होंगे कि
हम किसी के दिलो-दिमाग में सुराख करें कलम से
कमल से हम किसी मूरत को खरोंचें
और दूध पीकर खून बहाएँ

माँओं ने नहीं सोचा होगा
त्याग और धैर्य, कष्ट और तप से सींचे गये असंख्य शब्द
उसी के शरीर पर कोड़े की तरह पड़ेंगे

अपने खून से सींचे गये, पोसे गये शब्दों को
जब आग में झुलसते देखती होगी माँएं
तो क्या गुजरता होगा, माँएं ही जानती हैं!
पढ़े-लिखे बड़े बच्चों को यह समझ न आएगी

हमारे छुटपन में सिखाये गये शब्द ही हैं
कभी हिजड़े उन्हें ले जाते हैं अपनी गली
उनसे खेलते-ठठाते हैं
तो कभी खद्दरधारी मसखरा करते हैं
उन शब्दों का गला घोंटते हैं
जैसे मूक मजदूरों का बोनस, तनख्वाह हो

माँएं किस तरह अबूझ लगने वाले शब्दों को
हमारे स्मृतिगर्भ में डालती हैं
यह उसके आँसू, हँसी या मौन में छिपा है

चुप्पी की गहराई में तैरते
खुशी की हवा में लहराते
अबूझ शब्दों ने खोली
अपनी अर्थ पेटियाँ
माँओं के सिखाये गये असंख्य शब्द
उनके ही बदन पर कोड़े की तरह बरसते हैं

 माँएं ही हैं जो
आज भी हमें कलम, कमल, प्रेम और न जाने कितने शब्द
खाने में लगी हैं


काबुल से बगदाद

काबुल और बगदाद से खुली गाड़ी
कहाँ रुकेगी
यूएनओ के ढहते गुम्बद से आती है फुसफुसाहट

बहुत भोले हैं वे जिन्हें इस गाड़ी का
धुआँ दूसरे किसी देश के किसी प्रान्त के किसी गाँव में नहीं दिखता
कुली का काम पा जाने के लालच में उस धुएँ का प्रदूषण नहीं दिखता
नहीं जानते कि यह गाड़ी
रेडियो वेव के वेग से चलती है

शायद यह धुआँ ही इतना छा गया कि पार का नजारा
नहीं दिखता कमजोर आँखों को

वे नहीं जानते
कि यह गाड़ी पटरी पर नहीं चलती
इसलिए जितना डर बैंकों के लुट जाने का है
उतनी ही आशंका खेत-खलिहानों के रौंदें जाने की भी है
कभी भी कुचली जा सकती है पेड़ के नीचे चलती पाठशाला
और कभी भी पाँच सितारा होटल मिट्टी के ढेर में बदल सकता है
हारमोनियम और मृदंग पर हाँफते चौता और
रघुपति राघव... कभी भी गुम हो सकते हैं इक्वलाइजर में
और कभी भी जेनिफर लोपेज, ब्रिटनी स्पीयर बनती बालाएँ मिट सकती हैं

खतरा जब एक जैसा हो हर जगह
तो बचने के अलग-अलग रास्ते
और भी खतरनाक हो जाते हैं


यह वक्त


यह वक्त
गोल-मटोल बात कर निकल जाने का नहीं.

यह वक्त
 सभी व्यवस्था में झक-झक सफेद बने रहने का नहीं.

सन्त और नादान बनकर
साहित्य अकादमी बटोरने का भी वक्त नहीं है यह.

ये बहुत नादान चतुर हैं
जो किसी का नाम लेकर बात नहीं करते
किसी पर उंगली उठाकर किसी का निशाना नहीं बनते.

हमारे अभाग्यों और कष्टों का कारण
कौन बतायेगा?

उस पर उंगली उठानी ही होगी
गाली देनी ही होगी.
कालर पकड़ना ही होगा

सिर्फ प्रधानमंत्रियों-मुख्यमंत्रियों को
गाली देना काफी नहीं

हमारे कष्ट और अभाग्यों की शुरुआत
हमारे प्रबन्धक से है, प्रशासक से है
हमारे मुखिया से है, विधायक से है, सांसद से है
हैड मास्टर से है, सम्पादक से है
डाक्टर से, इन्जीनियर से है.
इन्हें कौन कर्मचारी, मतदाता, शिक्षक, पत्रकार, मरीज
गाली देगा?
कौन पकड़ेगा इनकी कालर?
सड़क पर खदेड़ेगा इन्हें कौन?
थानेदारों को जेल में ठूसेगा कौन?
कौन सजा सुनाएगा न्यायाधीशों को?

जब राष्ट्रपति को गाली देना आसान हो जाए
इसका मतलब मुखिया का बेहद ताकतवर हो जाना है

यह वक्त है वही.

कौन सिल रहा है इनकी जबान?
कौन बोल रहा है इनकी जबान से?

हम सभी जिस वक्त के सुअरबाड़े में रहते हैं
वहाँ के गंधाते चरवाहे को ढूँढ़ना होगा.

यह वक्त
जनतंत्र को शौचालय बनानेवालों को
माला से लादने का नहीं है

जनतंत्र के इस सार्वजनिक मूत्रालय में
कोई अपने शब्द पकड़कर
कोई अपने फरमान लेकर
कोई अपनी वर्दी लेकर
तो कोई अपनी लाल बत्ती लेकर
चला आता है मूतने.

नंगे-भूखे मरनेवालों की भाषा वह नहीं
महंगाई-बेकारी से बलात्कृत सपनों
के गर्भपात की वह भाषा नहीं

जिस भाषा में लिखकर कोई
झटक ले जाता है अकादमी
और कोई शिखर सम्मान
उसकी कलम को कौन तोड़ेगा?
जो गूंगों की स्याही सोख रहा है
जो फैला रहा है स्याही उनकी रातों में
जो उनकी जबान से छेड़खानी करता है.

कुर्सी को कुर्सी और लाठी को लाठी
पैरवी को पैरवी और घूस को घूस
हत्या को हत्या और लाल को लाल
नहीं कह सकनेवाली भाषा
कवि की भाषा नहीं,
वह बलात्कारी का स्वांग है.

यह वक्त
स्वांग करने वालों का नहीं
उनके मेकअप खरोंचने का है. 

(देवेंद्र जी, ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद ! ये सभी कविताएं मेरी हैं जो कथादेश के जून 2011 वाले अंक में प्रकाशित हैं। )

3 टिप्‍पणियां:

  1. कवितायें तो बहुत अच्छी हैं लेकिन किसकी हैं? आपने कवि का नाम तो दिया ही नहीं..

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  2. वर्ड वेरिफिकेशन क्यों लगा रखा है भाई! इसे हटा देना चाहिए..

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  3. बेहतरीन कविताएं! क्या बात है !! अपने समय के प्रति सचेत करती ये कविताएँ एक पहरेदार की भूमिका निभाती सी लगती हैं।

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