हमसफर

बुधवार, 9 जनवरी 2013

काश आप कमीने होते !


पाठकों की आश्वस्ति के लिए मैं यह हलफनामा नहीं दे सकता कि कहानी के पात्र, घटनाक्रम, स्थान आदि काल्पनिक हैं। किसी भी तरह के मेल को मैं स्थितियों का संयोग नहीं ठहरा रहा। इसके बाद आपकी मर्जी, इसे कहानी मानें या ना मानें ! - लेखक

धूल-धूप का चोली-दामन और बारिश की याद में सना हुआ दिन था। एकदम खीझा हुआ, झल्लाया हुआ मौसम। धूप की तल्खी हवा की बेरूखी से बदन तो जला ही रही थी, उस पर धूल का छिछोरापन भी कम नहीं था। गाड़ियों के झोंके के साथ बहकर आई धूल को जो मिले उसी से जा लिपटी। उस पर कल की बारिश की थोड़ी सी याद। पसीना सूखता तो नहीं ही, धूल के लिए इससे बेहतर सहारा क्या होता ! केश लथपथ। छोटे-छोटे होटल, चाय की दुकान। इनकी भट्ठियों का ताप, बाप रे बाप ! कोढ़ पर खाज की तरह दूसरी तरफ टायर जल रही थी तो उसकी गंध और गरमी भी परवान चढ़ी हुई। जाना भले ही दस किमी हो या दो किमी, पर आटो पकड़ने के लिए इस चौराहे तक तो आना ही होगा। एक आटो के पीछे लिखा देखा  दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर। एक से एक चलताऊ डायलाग और संजीदे शेर लिखे होते हैं इन सवारी गाड़ियों या ट्रकों के पीछे। किसी के पीछे लिखा था  जलो मत बराबरी करो। अब इस तरह तो हजारों गाड़ियों के पीछे कुछ न कुछ तो लिखा मिलता ही है, पर कितनों का ध्यान इधर जाता है। इसके अटपटेपन या इसकी अर्थमयता पर तो सब चर्चा करते हैं, पर इन वाक्यों, शेरों, उक्तियों को ड्राइवर की सामाजार्थिक पृष्ठभूमि से जोड़कर उनकी मनोभूमि को पढ़ने की किसे सूझेगी! सिन्हा जी को लग रहा था कि इन उक्तियों-शेरों में जैसे ड्राइवरों के अरमान, उसकी शख्सियत लिपटी हुई है। सिन्हा जी ने एक बार गाड़ियों के पीछे लिखी इन्हीं उक्तियों को काफी जतन से संग्रह किया और ड्राइवरों से इंटरव्यू करके एक स्टोरी मारी थी  टुकड़ों में लिखी जिंदगी की इबारत। काफी चर्चा में रही थी। अभी दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर। ने इनका ध्यान खींचा और जाके उसी आटो की बीचवाली सीट में धंस कर सवारी भरने का इंतजार करने लगे

दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर। उनका पीछा छोड़ नहीं रहा। उन्हें लगा ठीक ही तो - भीड़ आग्रह, अनुनय-विनय नहीं जानती। या तो आप उसके पीछे चलें, उसमें शामिल हो जाएं या फिर उसे चीरकर निकल जाएं। दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर का कहना यही तो है। लेकिन वे कहां हैं, न तो भीड़ में हैं और न ही पीछे। भीड़ में शामिल हो नहीं पाते और भीड़ के बाहर चैन नहीं। भीड़ से बाहर हैं भी तो वह कोई जगह नही ; कोई टीला है, ढूह है। कभी भी ढह सकता है। वह उचक-उचक कर भीड़ को ही देखते रहते हैं। दिन  रात। दुनिया की निगाह में तो सिन्हा जी नौकरी कर रहे हैं, पर किन अर्थों में यह नौकरी है, वे समझ नहीं पाते। बीवी और घर के सामने जरूर वे तर्क रखते हैं। एक दौरह भी था जब लोग पूछते कि प क्या करते हैं और जवाब मिलता कि पत्रकारिता करते है तो फिर पूछते कि और क्या करते हैं तो जवाब होता था अखबार में काम करते हैं। बावजूद इसके मुआ एक सवाल था ही कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेता- और क्या करते हैं ?’ गोया पत्रकारिता कोई पेशा नहीं, एक दौर वह भी था। वे जानते हैं जैसे ही कोई नया संपादक आएगा तो उसकी अपनी टोली भी पीछे से आ जाएगी। आजकल संपादक एक सोलर सिस्टम की तरह हो गया है। पूरी की पूरी एक टोली लेकर चलता है। जहां भी जाएगा, पूरी टोली आगे-पीछे आ ही जाती है। रोड रोलर की तरह ना जाने कितनों को सड़क के किनारे करते हुए। ऐब दिखा-दिखा कर सभी पुराने किनारे कर दिए जाते हैं। अब इस शहर में कोई खोजे तो मिश्रा जी कहां हैं और विष्णु जी क्या कर रहे हैं ? कपड़ा बेचते पुरी को देखकर कौन कह सकता है कि वह एक शानदार खेल पत्रकार की कब्र पर खड़ा है।
मनोज गोयल नाम का कोई व्यक्ति पत्रकार भी था, दवा दुकान में उसे बैठा देखकर कोई नहीं जान सकता है ! कोई नहीं बता सकता कि अनल जी- राही जी और विजय सिन्हा क्यों बैठ गए या बैठा दिए गए थे ? और जितने लोग अभी काम कर रहे हैं, सबके सब बेदाग हरिश्चंद्र हैं, इसका सबूत कौन देगा ? उन्हें याद आया कि उस समय सुनील जी अभी नए-नए आए थे इस अखबार में। सुनील जी उसके पुराने संपादक रह चुके हैं। और अब जब वह इस अखबार में हैं तो सुनिल जी का कोई पता नहीं। खैर, स्टार रिपोर्टर प्रकाश और सोहित को दोपहर की मीटिंग में एक दिन सबके सामने सुनील जी ने कह दिया  आप लोग जंग लगे तमंचे हैं। अब यह सब नहीं चलेगा। गया वह जमाना।  जून की कड़ी जानलेवा दुपहरी थी। जब दरवाजे पर आया कोई नया आदमी भगाने पर भी नहीं जाना चाहता। इस दुपहरी में उन्हें रिपोर्ट के लिए फील्ड की खाक छाननी पड़ती। इसी शहर में दर्जनों पत्रकार थे, जो मीटिंग से निकलते तो फील्ड के लिए थे, पर इस धूप में कहीं जाने के बजाए यूनियन आफिस में जाकर पंखा चलाकर, शर्ट का बटन खोलकर पसर जाते। पांच बजे से पहले कोई बाहर नहीं दिखता। लेकिन शहर को हिला देनेवाली रिपोर्ट इन दोनों के नाम दर्ज है। प्रकाश की पकड़ नक्सल पर जितनी थी, उतनी ही पक्की होती थी यहां की अपराध कथाओं की भविष्यवाणी और उतनी ही साफ उसकी गुत्थियों की समझ थी। पुलिस-राजनेता-अपराध का त्रिकोण एकदम साफ था। नाभिनाल रिश्ते को काफी दूर तक देखने की दृष्टि। सोहित की पकड़ यहां के राजनेता और राजनीति की खिचड़ी पर जितनी थी, उतनी ही पैनी निगाह इसकी लिखी जा रही पटकथाओं और समीकरणों पर थी। कभी अखबार को इन पर नाज था। एक दिन प्रसाद जी के पास जाकर उन्होंने अपना दुखड़ा सुनाया  भैय्या, आपसे उनकी अच्छी पटती है। समझाइए ना, वे क्या कर रहे हैं। हमारी किस बात से नाराज हैं? ठीक बात नहीं है यह। एकदम नए बड़बोले रिपोर्टर शर्मा के कहे पर उड़ रहे हैं। प्रकाश कहता  देखिए ना सुनील जी के सामने झूठमूठ का मोबाइल पर किसी से बात करके उन्हें सुनाता रहता है  प्रधान संपादक जी का फोन था। सुनील जी भी उसे हमेशा अपने से सटाकर रखने में कल्याण समझते हैं। जबकि तथ्य था कि किसी छिछोरे संपादक के साथ वह भी निकाल दिया गया था अखबार से। वह तो एक वामपंथी विधायक की सिफारिश थी जो उसे दुबारा नौकरी पर रख लिया गया। उसे इस शर्त पर नौकरी पर रखा गया कि  मुझ से जबरन अखबार विरोधी काम लिए गए थे। का माफीनामा लिख कर दिया था। लेकिन इस बड़बोले शर्मा के कान भरने पर ही आखिरकार एक दिन इन दोनों की छुट्टी कर दी गई। सिन्हा जी सोचते हैं कि जेल में पड़े गैंग्सटर और कोयला माफिया के दलाल सुकेश को लाने के लिए ही ना यह सब नाटक किया गया था !इन सबके बीच अशोक जैसे पत्रकार थे जो अच्छे-अच्छों को भी परोक्ष में एमसी-बीसी करने से नहीं चूकते। यहां तक कि उसके निवाला का जुगाड़ करनेवालों तक को वह अपने छिछोरेपन से नहीं बख्शता। यह भी तथ्य था कि शहर की बनावट कुछ ऐसी थी कि अभी मीटिंग मे उसने किसे गाली दी, वह भी तत्काल पता चल जाता। बावजूद इसके वह झेंपता नहीं। सिन्हा जी सोचते हैं - इस तरह के पत्रकारों की नस्ल अजर-अमर होती है। ये रक्तबीज पत्रकार फलते-फूलते हैं अपने-अपने गाडफादर के सहारे। गाडफादर कहीं भी हो सकते हैं ; मीडिया में राजनीति में या ब्यूरोक्रेसी में। बाजार जिनका है वे गाडफादर हो सकते हैं।

अखबार की बारह बजे वाली मीटिंग में जाने के लिए घर से साढ़े ग्यारह बजे तक तो निकल ही जाना पड़ता है। चिलचिलाती धूप हो या घनघोर बारिश। परंपरागत डाकिए की तरह निकलना ही पड़ता है। सिद्धांत और दिनचर्या के एकदम पक्के सिन्हा जी। उनका एक ही सिद्धांत था, जो देर से आते हैं, वे समय पर आ सकते हैं। और जो समय से आते हैं चाहें तो वे पहले आ सकते हैं। इस ढर्रे पे लगभग रोज दिन के पौने बारह तक हर हाल में लंबे-दुबले सांवले सिन्हा जी बड़े-बड़े डेग धरकर दफ्तर आ जाते।

बमुश्किल 14 साल का है वहपर आटो चलाते समय उसकी जबान जिस तरह बगैर लड़खड़ाए धाराप्रवाह एमसी-बीसी करती रहती हैहम आप तो आंखें ही चुरा लेते हैं उससे। भले हमट्रेन के ट्वायलेट में कटी-मिटी गंदी लाईनें-तस्वीरें आंखें फाड़कर-गड़ाकर पढ़ने-देखने की कोशिश क्यों ना करते हों। नाटा-ठिगना, गोरा, शरीर थोड़ा भरा-भरा, मूंछ की रेख अभी कायदे से चली भी नहीं थी। गले में रूमाल लपेटे। यह तो है राजू। और टेनिया दुबला-पतला, सांवला, थोड़ा लंबोतड़ा टाईप कलाई पर रूमाल लपेटे। राजू को जब कभी शिखर-पराग या सर की पुडि़या लाकर देता तो उसे भी उसका बचा हिस्सा फांकने मिल जाता, सो हमेशा उन दोनों के मुंह चलते मिलते। और राजू जब न तब सिगरेट धूकता रहता है। मैंने अभी-अभी कहा है कि उसकी उम्र यही कोई 14 साल की होगीपर बाडी लैंग्वेज पर उसकी पकड़ किसी को भी अचंभे में डाल देती है। जैसे लगता है कि वह शरीर का मनोविज्ञान पढ़ रहा हो।- आंखों मेंतलाशपैरों में रफ्तार और शरीर में बेचैनी। बस्ससवारी की यही तो निशानी है। इसके लिए कोई गीता थोड़े ही पढ़ना है। स्साले क्या देखता हैउधर देखवह माल जाएगी कोचिंग।अरे, वह जो नकाबपोश है। सड़क पर बाईं ओर चुस्त सलवार और शमीज में खड़ी गोरी-चिट्टी लड़की की ओर इशारा करके बोलता है। अब यह कौन-सा फैशन चल पड़ा है मुंह को लपेटने का। लगता है जैसे झुलस गया मुंह छुपा रही हो या किसी से काला किया मुंह। एक समुदाय भर की बात तो समझ में आती है, पर जब से फैशन बना तब से तो सिन्हा जी को भी बड़ा ही चिढ़ाऊ अंदाज लगता है यह। जो भी हो। राजू कहता – बुला उसको।‘ लजाते टेनिया को कहता है – ‘कोई गोद में बैठाने थोड़े कहते हैं।‘ यह कहकर वह सिगरेट धूकने लगता है और उम्र मे उससे बड़ा उसका वह टेनियां सवारी की ओर लपकता है- ‘मैडम चलिएबस्स आपको लेके चलते हैं। रुकना नहीं है।  
 
क्या सोच के वह नहीं बैठतीनहीं मालूम। फिर उसकी जबान के गोला-बारूद चलने लगते हैं अपनी रौ में। - ‘स्सालाबड़ा बनता है पंडित। देखना भोंसड़ी के। वह टिक्कीधारी तब तक नहीं बैठेगा जब तक कि बीच की सीट पर कोई माल ना बैठ जाए। फिर क्यादेख उसके मजे। पैर छितरा के वह बगल में माल की ओर कोहनी टिकाके बैठ किस तिरछी निगाह से देखता है और गीत गुनगुनाता है  ओ जेओ ना, रोजोनी एखोनो बाकी, आरो किछू दिते बाकी...। इस भीषण गरमी में सिन्हा जी चिपचिपाते शरीर से पूरी तरह चिपक गए हैं। उनका ध्यान न तो मीटिंग पर जा पाता है और न ही  स्टोरी प्लान पर। अमूमन आटो में बैठे कुछ ऐसा ही उनके दिमाग में चलता रहता है। लेकिन आज तो ...सही तो कह रहा है राजू। फिर उनका सारा ध्यान राजू का डायलाग खींच लेता है- कंधाबांहजांघ का साईडवाला भागशरीर का जो ही हिस्सा कंटैक्ट में आतावही काफी होता उस जैसों के मजे के लिए। जैसे सारे अंग कंटैक्ट प्वाइंट पर काम पर लग जाते । सारी इनर्जी वहीं जुट जाती और उसी कंटैक्ट प्वाइंट से जैसे मगन हो वह सारा रस चूसने लगता है।‘ आटो में बैठे-बैठे सिन्हा जी पहले तो चुस्की लेते। फिर सोचते  जिन्हें अपनी मां-बेटी का ख्याल नहीं होता वे बीमार लोग ही ऐसी हरकत करते हैं। बक-बक करता राजू आखिर कितनी पैनी नजर रखता है सवारियों के मनोविज्ञान पर!! टेनिया को या फिर किसको संबोधित करता है वहकोई नहीं समझ पाता। असल बात है कि कोई उसके मुंह भी नहीं लगना चाहता। बातें उसकी कसैली-कड़वी नहींपर सरे आम जिस जबान में वह बातें करता हैसभी दिन-दुपहर उससे बात करते भी हिचकते हैं। लेकिन ठहरी समय पर पहुंचने की बाततो उसका लोहा सभीमानते हैं। उसका एक ही टैगलाईन है – ‘सभी आपको ठिकाने पर पहुंचाते हैंपर हम आपको वक्त पर पहुंचाएंगे। क्या बात हैइतनी फूहड़ता के बावजूद लड़कियां उसी पर सवार होना चाहती हैंसुधी पाठकोमैं नहीं कह रहा कि उस पर मर मिटतीं हैं। लेकिन सिन्हा जी जैसे ही उसे कहते – ‘क्या बेटा ? ‘ थोड़ी देर के लिए वह सकपका जाता। लेकिन अमूमन उसे टोकना उचित नहीं समझते।
सिन्हा जी सोचते हैं कि प्रेस लाईन में आई किसी भी नई लड़की के साथ आखिर क्या होता है। वहां एक पंडित की बात सुना रहा था राजू और यहां कई पंडित जी घात लगाए बैठे होते हैं। प्रेस लाईन में आई कोई भी लड़की पहले तो इकलौती होती हैं, फिर उसे एक पेड़ मिलता है। उसमें से कोई अच्छी सी डाल दिख गई तो ठीक, नहीं तो कोई डाल उसे अपने ऊपर बैठा लेता है, फिर अपने घोंसले में ले लेता है। इस तरह अपना कोटर मिलता है। अब तो लोग गिद्ध की तरह उसे लाश मानकर झपट्टा मारने को बेताब हो जाते हैं। खुद को बचाने के लिए किसी न किसी गिद्ध के झपट्टे में उसे आना ही पड़ता है। उन्हें याद आता है कि एक अखबार की सिटी आफिस में धर्म-अध्यात्म की कल्चरल रिपोर्टिंग कर रही सौम्या को कैसे वहां के सिटी इंचार्ज के धरम-करम के कारण एबार्शन तक कराना पड़ा। वैसे इससे पहले कइय़ों ने उससे चक्कर चलाने की कोशिश की थी। इंचार्ज के साथियों ने तो सौम्या के लिए भाभी तक का संबोधन शुरू कर दिया था। यह अलग बात है कि उस समय तक उसने खुद ही किसी का घर उजाड़ कर अपना घर बसा लिया था। उसे लगता है कि स्त्री विमर्श का महानगरीय ब्रांड इससे एक कदम भी आगे तो नहीं बढ़ा है। घर को फोड़कर अपना घर बसानेवालियों का विरोध तो वहां होता ही नहीं, दूसरे गांव-देहात में पिस-कुट रही औरतों के हक में कितनी है यह लड़ाई ! तो आजकल वह इंचार्ज यहां से शुरू हुए एक बहुत बड़े कारपोरेट अखबार में बड़ी सैलरी पर कार्डधारी विशेष संवाददाता बन गया है। पुराने दिनों के यानी दुर्दिन के साथियों को सबसे पहले वह अपना विजिटिंग कार्ड बढ़ाता है, फिर बातचीत शुरू करता है। अब सब कोई प्रिया तो हो नहीं सकती। कालेज के दिनों में प्रसाद जी और सुमन जी से भाषण-लेख प्रतियोगिता के टिप्स लेती रहती थी वह। प्रसाद जी से एक तरह से पूरा का पूरा लेख और भाषण ही तैयार करवाती। अब वह न तो प्रसाद जी को और ना ही सुमन जी को पहचानती है और ना ही उसे यह याद करने की कोई जरूरत महसूस ही होती है। यह सब सिन्हा जी की नजरों के सामने घटा हुआ है, इसीलिए वे यह सब सोचते हैं। उनके दिमाग में चलता है - एक बहूत-बहूत बड़े अखबार के प्रसार विभाग में बतौर सहायक ज्वाइन करनेवाली प्रिया आजकल बहूत बड़ी पदाधिकारी बनी हुई है। सिन्हा जी सोचते हैं - प्रिया में ऐसा क्या था, जो वह अपने वरीष्ठों की पहुंच से बहूत आगे निकल गई है। बहुत जोर देने पर भी उन्हें उसके  ‘लड़कीपना के अलावे कुछ नजर नहीं आता। प्रिया जिसे अपना फ्रेंड कहते फख्र करती है, वे लोग तो प्रसाद जी के प्रशंसकों में हैं। लेकिन इससे क्या। हां, आए दिन अखबार के बड़े नेशनल हेड टाईप के पांडे-दीक्षित अधिकारियों के सामने उसके परोसे जाने के एक से एक किस्से उघड़कर सामने आते रहते हैं। कभी-कभी तो वे इसे ईर्ष्या-जलन के जख्म का धुआं मानकर उस पर गौर नहीं करते हैं। अब तो वह धर्म-अध्यात्म के बड़े चैनलों पर संतों के कार्यक्रमों की एंकरिंग भी करती दिख जाती है। ऐसे में सिन्हा जी को राजू ड्राईवर के पंडित कई लिंगों में, कई जगहों का फेरा लगाते नजर आते हैं। आज प्रेस लाईन में यहां के लोगों में उससे सुखी जीव तो खोजे नहीं मिलेगा। और सिल्की का क्या हुआ था। एक कायदे के पत्रकार को लूटने के पहले वह किसी चौधरी की गिरफ्त में थी। यह तो भला हो बंगाली लड़कियों का कि वह नाकों चने चबवा देती है। एक साथ कई दड़बे का दाना चुगती है। और बसेरा कहीं और होता है। 
 
अखबार के रास्ते में सिन्हा जी का लगभग रोज उस राजू से साबका पड़ता। रोज राजू का एक नया पन्ना जैसे किसी खोह से उड़ कर सामने फड़फड़ाने लगता। और इसी फड़फड़ाहट में जाने और कितने किस्से करवट लेते मिलते। रोज वह सोचते आज उस पर एक ह्यूमन स्टोरी फाईल करूंगा। आखिर इस नादान उम्र में डिलेवरी शुरू करने की भी तो कोई न कोई दुखद कहानी होगी ही। वह डिलेवरी’ ही कहता है इसे। साथ ही व्यवस्था का मजाक भी उन्हें इसमें शामिल दिखता है। एक ट्रैजिक कंट्रैडिक्शन की तरह देखते हैं वह इस राजू को। एसपी कोठी,डीसी आफिसकोर्टअखबार सभी कुछ तो उस रूट में पड़ते हैं। माना ही नहीं जा सकता कि कोई उसे या उस जैसों को होटलस्टेशन और शहर भर की चाय दुकानगैरेज जैसे ठिकानोंमें डांट-फटकारझिड़कियां-गालियां सुनते नहीं देखता हो। कम से कम उनके कारिंदे तो जरूर देखते होंगे।

दुबारा शाम को भी सिन्हा जी उसी का प्रवचन सुनते हुए दफ्तर जाते। अखबार के दफ्तर में पांव पड़ते हीदस मौडम और पांच ब्यूरो के फोन कान को चैन ही नहीं लेने देते। मुख्यालय के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग, डे प्लानर के हिसाब से आई खबरों की पड़ताल, डेस्क पर आई खबरों की स्टोरी लाईनफिर कापी राइटिंगवैल्यू एडीशन। ओहदा बढ़ने पर भी रोज कम से दो-तीन खबरों की कापी राइटिंग वह जरूर करते। जबकि इसकी जरूरत रह नही गई थी। जिम्मेवारी काफी बढ़ गई थी। इंटरनेट संस्करण के लिए खबर देना। खबरों को पढ़ने, संपादित करने के लिए बांटना। सेंट्रल डेस्क के काल्स पर सर-सर’ करना सो अलग। इन सबके बीच खबरों को सूंघते रहना। किसी खबर के जरिए कोई खिचड़ी तो नहीं पकाई जारही बावजूद इसके रात एक-डेढ़ बजे जब सब काम से निवृत्त होने लगते ;  सभी अपनी टिफीन-बैग उठाने लगते ; कोई देखने के बहाने लिया हुआ अखबार समेटने लगता, तो वह मेज पर मगजपच्ची करने बैठ जाते। सर्वर के बंद होने से घनघनाहट मे कमी हो जाती। छपाई का भी शोर जैसे तब तक थम जाता। रात के सन्नाटे में विचार और घटनाओं की रफ्तार और आवाजाही सुगम हो जाती। इसी माहौल में दो-चार बार उसने इस स्टोरी को लिखने की जद्दोजहद भी की। यह वह समय था जब प्रेस पूरी तरह से कागज से होते हुए कंप्यूटर पर आ चुका था। डेस्क पर काम करनेवालों को अपने डेस्क पर कंप्यूटर मिल गया था। सभी की अपनी लागिंग थी। जो भी काम करते  कंप्यूटर पर करते। बड़ी से बड़ी खबर पलक झपकते बनाने के लिए सिन्हा जी मशहूर थे। हेडिंग के मास्टर और स्टोरी लाईन तय करने में तो कोई उन्हें छू भी नहीं पाता। लेकिन इस स्टोरी को बनाने जब भी बैठते, सिर्फ इंट्रो बनाने में दो-तीन कागज फाड़ने पड़ते। सर्वर बंद हो चुकने के बाद करीब-करीब कंप्यूटर डिलिंक हो गया होता है तब तक। इसलिए सिन्हा जी इस वक्त कागज पर ही लिखने बैठते। उनके हिसाब से बेहद रोमांचक इंट्रो की मांग थी इस स्टोरी में। फिर स्टोरी की बाडी में आते और बेहद मानवीय और करुण शक्ल अख्तियार करती खबर बढ़ती जाती। शराब, व्यसन, तानाशाही, शोषण। सीलन भरे कमरे का जीवन। टूटते घर, मां की असहायता। छिनते बचपन, आदि-आदि। स्कूल के बजाए खेतों, बगानों में घूमना। धीरे-धीरे सवालों की बौछार और चीत्कार करती रिपोर्ट की लाईनेंधड़ाम-धड़ाम एक दूसरे पर गिरने लगतीं। लगता कि आसमान की चौकी पर बैठे जमीन की छत को निहार रहे हैं। और तारों की तरह सारे अक्षर बिखर जाते। चश्मे का कोई पावर काम न आता। पता नहीं चलता कि कागज उलटा है या वे ही उलट कर बैठ गए हैं। चश्मा निकाल कर बार-बार रूमाल से साफ करते, पर सब कुछ तब तक धुंधला-धुंधला हो चुका था। उनका सर चकरा जाता। और फिर कितने पन्ने फटते नहीं मालूम माथा ठनक जाता यह सोचकर कि स्टोरी तो मान  लो छप जाएगी।कितने दिनों टालेंगे ? वे नहीं लिखते तो कोई ना कोई तो लिख ही सकता है। और स्टोरी की सफलता के तौर पर मान लो कि कार्रवाई भी हो गई। आजकल तो जबरन छोटी-मोटीखबर सेखबरहीन खबर से दबाव बनाकर कर्मी को दंडित कराकर ही नए पत्रकार दम लेते हैं। बार-बार बास को फोन कर फालो अप लेते। हां तोसर क्या हुआ उस औचक निरीक्षण के मामले में ?’ ‘कल वाली खबर में आपने क्या कार्रवाई की, थोड़ा बताइए ना ?’ रिपोर्टर के कान तो सिर्फ कार्रवाई सुनने के लिए बने हैं। अब अधिकारी भी क्या करे। कार्रवाई न करे तो कल के अखबार में हेडिंग छपती है – ‘किरानी कानून से ऊपरबास भी भरते हैं पानी’, ‘एक किरानी ऐसा जिसके सामने घिघियाते हैं बास। न जाने कैसी-कैसी खबरेंकैसे तो कैसे छपजाती है।

मसला लंबा खिचा तो डीसी की निगाह का उस पर जाने का डर। राजधानी से रोज किसी न किसी मंत्री का पदार्पण यहां के लिए आम बात थी। कभी किसी नाली-शौचालय या किसी चापाकल या पार्लर का उदघाटन करने या फिर हत्या के किसी खूंखार अभियुक्त के यहां आयोजित महामृत्युंजय यज्ञनवाह पारायण आदि निजी आयोजनों में शिरकत करने। नही हुआ तो लूट-मार के किसी चहेते आरोपी के घर ही मुंहझुट्ठी में आ टपकते। इस छोटे से राज्य में सत्ता के समीकरण में अपनी गोटी फिट करना किसी के लिए बड़ी बात नहीं रही अब। ऐसा लगता कि जिसकी इच्छा नहीं थी वही एमएलए नहीं बना है। सन दो हजार के आसपास तो बारह बजेएक बजे रात में हाजिर देखा है उसने मेज दा नामधारी नेता को। देर रात तक चले कार्यक्रम से संबंधित फ्लापी और रिलीज लेकर मेज दा सिटी आफिस पधारे रहते। उनका खस्सी-भात का सालाना जलसा किसी पत्रकार को भूलता नहीं। साथ में सूट का कपड़ा भी होता। यह जैसे रस्म हो चुका था यहां के पत्रकारों के लिए। जो नहीं पहुंच पाते, उनका सूट घर पहुंच जाता। सभी प्रमुखता से छापते उनकी खबरों को। कहते हैं कि वे भी मंत्री बन गए हैं। मंत्री बनने से पहले मेज दा के लिए जन समागम आम बात थी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी पार्टी के खाते में दो एमएलए हैं या बीस। 80 एमएलए के प्रांत में बीस एमएलए वाली पार्टी विपक्ष में बैठ सकती है और दो एमएलए वाली पार्टी सत्ता में हो सकती है। अब प्रदेश की सरकार का ही ढांचा देखिए ना। सत्ता के लिए राज्य में झामुमो एनडीए नीत सरकार में भाजपा के साथ शामिल है, पर केंद्र में वह यूपीए (कांग्रेस) के साथ है। झामुमो का यह निर्णय किसी ऐरे-गैरे का निर्णय नहीं है, झामुमो सुप्रीमो और आदिवासियों के सर्वमान्य सबसे बड़े नेता शिबू सोरेन यानी दिशोम गुरू का है। यानी शादी (राज्य में) किसी से हनीमून (केंद्र में) किसी से। जाने और आने के सारे रास्ते खुले रहें।कुछ भी संभव हो जाता है यहां। बीस एमएलए वाली पार्टी के लोग आलाकमान को कोसते-गालियां देते रहतेकाश हम भी सरकार में होते अपने तो किसी न किसी बोर्ड या समिति में होगे हीपर हम जैसों को कौन पूछता है ! जनता ने भले ही अपने स्तर से पार्टी के प्रति खीझ उतारी होउसे किनारे करने की कोशिश की होपर पार्टी और सियासी आका इसे मानें तब तोमाजसू की ही बात लीजिएएमएलए दो हों या पांचसरकार किसी की भी होउप-मुख्यमंत्री तो इसके आलाकमान स्वदेश मंडल को होना ही है। अच्छे लोगअच्छा समाजअच्छीसोच’ यह टैग लाईन है पार्टी की। सही बात, इससे अच्छी सोच क्या हो सकती है कि आप हमेशा सत्ता में बने रहने की सोचते हैं। चाहे जिस किसी की सरकार हो। जिला में किसी भी पार्टी का कोई राजनीतिक कार्यक्रम होतो देख लीजिए गली-नुक्कड़ों पर लौंडियाबाजी करते चेंगड़ा टाईप लोगों की पहुंच। और ऐसे मौकों के बाद प्रशासनिक हलके में उनकी तूतीबोलने लग जाती। यही रास्ता था जिससे होकर गोविंदपुर-बलियापुर के एक यादव नामधारी युवक ने एक आला प्रशासनिक अधिकारी तक अपनी पहुंच आसान बना ली थी। ठेकेदार हो या अधिकारी, नेता हो या व्यापारी उस अधिकारी तक पहुंचने के लिए सबसे आसान रास्ता था वह। उन दिनों सुर, सुरा और सुंदरी पहुंचाने का सबसे शार्टकट और सेफेस्ट रास्ता माना जाता था वह।

एक बार आईएएस श्रेणी के उस अधिकारी की बीवी तक किसी दूसरे चालबाज भेदिए ने समांतर पहुंच बना ली थी। उसका कोई काम उस यादव युवक के कारण अटक गया था। उस दिन से वह भेदिया उससे खार खाए बैठा था। मौके की ताक तो थी ही उसे। एक बार की बात है। साहब की पत्नी को जानकारी थी कि पति महोदय क्षेत्र में दौरे पर हैं, फिर वहीं से राजधानी चले जाना है। लेकिन भेदिया का तोता कुछ और ही बांच रहा था। मोंछ पिजाए भेदिया एक अच्छी फिल्म के बहाने मैडम को शहर के सबसे अच्छी सिनेमा हाल की सैर कराने ले गया।

घुप्प अंधकार। फुल एसी। फिल्म शुरू हो चुकी थी। परदे पर बारिश में रोमांस का सीन चल रहा था  शायद राजा हिंदुस्तानी जैसी कोई फिल्म थी। बालकोनी में वे धप्प से सोफानुमा सीट पर बैठ गए थे। भेदिया बैठेगा क्या, वह न तो बैठा था और न ही खड़ा था। जी-हुजूरी की मुद्रा लगातार बनी थी। पूरी तैयारी थी मैडम की खातिरदारी के लिए। पहले से बोल दिया गया था। मिनरल वाटर की कुछ ठंडी बोतलें। चिप्स के कुछ पाऊच, फ्राई काजू के कुछ पैकेट, मधुलिका की ब्रांडेड मिठाई। सभी कुछ बगल में हाजिर। बार-बार आकर कभी मैनेजर तो कभी मालिक का बेटा, कोई न कोई हाल-चाल ले रहा था। मैडम, कोई दिक्कत तो नहीं?‘ सबकुछ ठीक है ना ?’ तब तक वाकी-टाकी टाईप मोटरोला का मोबाईल आ चुका था। मैडम से मोबाईल लेकर साहब का नंबर डायल कर मैडम को देने लगा। फोन का स्पीकर दाबकर बोला  देखिए ना, कैसे-कैसे तो साहब का फोन लग गया है। अब, कुछ तो बात कर लीजिए।
उधर से आवाज आई – हां, बोलो। क्या बात है? 
मैडम क्या बोले कि मैं हाल से बोल रही हूं! बोली – अभी कहां हैं आप ? ड्राइवर को थोड़ा भेज देते गाडी लेकर। आज टामी को इंजेक्शन दिलाने का डेट था। टामी उनके प्यारे कुत्ते का नाम था। ऐसे जिन घरों में कुत्ते होते हैं वे बाल-बच्चे की तरह होते हैं और कारींदे तो बस्स उन कुत्तों के सेवक।
साहब – अर्रर्रेर्रे..., स्सारी-स्सारी। मैं तो टामी को भूल ही गया था। चिंपू, सुनो अभी तो मै रांची के रास्ते मे हूं। बोकारो पार कर रहा हूं।... अच्छा ठीक है, किसी को गाड़ी के लिए कहकर देखता हूं।
मैडम – ठीक है देखिए। नहीं हो तो, परेशान होने की जरूरत नहीं। छोड़ दीजिएगा। मै किसी को कहकर देखूंगी। डेट तो फेल नहीं होने देना है ना।
भेदिया सबकुछ सुन रहा था। कहा – मैडम हो गई ना आपकी बात ? अब जाइए, सबसे अगली पांत वाली सीट पर जाकर देखिए तो कोई आपका इंतजार कर रहे हैं। यह कहकर वह थोड़ी दूरी बना लेता है।
अंधेरे में टटोलते हुए आगे जाती है। पहुंचते ही मैडम की आंखें फटी रह गईं। मैडम की आंखें देखकर लगा कि इतने अच्छे मंजर में जाने कहां से बिजली ठनक गई– अच्छा तो यह है रांची का रास्ता !’
बगल की कुर्सी पर एक तरफ यादव तो दूसरी तरफ एक सुंदरी। उसके बाद की अगल-बगल की तीन-तीन कुर्सियां खाली। अंग रक्षक पीछे की सीट पर। मैडम को लगा - इन्हें क्यों नहीं पहले ही देख सका। लेकिन देखती कैसे ! एक तो अंधकार, ऊपर से पीछे बैठी थी।
अब साहब को काटो तो खून नहीं। ठीक है कि हाल में अंधेरा है, पर साथ के लोग तो सब कुछ देख-सुन रहे हैं। अब बोलें तो क्या बोलें, क्या सुनें! सोचा आज तो मिट्टी पलीद हो गई। सकपका गए-‘---खी-खी-खी-खी, बहुत अच्छी फिल्म लगी थी। सोचा देखकर जाऊं।
जिधर से गुजर जाएं पूरा इलाका उनसे सकपकाने लगता था, आईएएस जो थे। लेकिन अभी तो वही मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगे। सोचा, अभी चखा भी नहीं, बगल में बैठी सुंदरी का क्या करें! मैडम तो लगी वहीं झोंटा खींचने - हरामजादी की बच्ची। कमीनी। तुम्हें और कोई घर नहीं मिला था रंडी। उसी रौ में यादव की ओर बढ़ती है  तो चले आए ना, आखिर अपनी औकात पर। अरे लड़ाई थी तुम लोगों की तो मेरा घर क्यों उजाड़ने लगे?’ और यह कहकर कालर पकड़ने दौड़ पड़ी। इतने पर वह यादव चिरौरी करने लगा।नही-नहीं, मैडम सो बात नहीं.....आप गलत समझ रही हैं। वह औरत कौन है, सर को क्या क्या मालूम। हम भी तो नहीं जानते इसे। ‘
उस औरत की ओर मुंह करके अरे मांग ले माफी, बोल दे गलती हो गई। नहीं देख सकी थी अंधकार में। साहब को क्या मालूम !‘ वह औरत तो हक्का-बक्का देखती रह गई। कुछ समझती तब तक तो भू चाल ही आ गया।
मै़डम का गुस्सा तो सातवें आसमान पर। कुर्सी उठाकर लगी फेंकने। लगा कि यादव को कच्चा चबा जाएगी। बोली - ओSह्हो, तो अब अनजान स्त्री के पास आपके साहब जी बैठने लगे हैं। इत्ती ही औकात है आपके सर की। है नाSS ?  
किसी तरह बीच-बचाव करके लोग घर आए। और तबसे किचन कैबिनेट के उस दलाल की वह पहुंच आज तक बरकरार है। अभी प्रांत के किसी बड़े घपले के सरताज बने निलंबित बैठे हैं जेल में वह आईएएस अधिकारी। वह यादव तो कब का मारा गया। सबै दिन रहत न एक समाना...

अब भला कौन रिस्क ले ऐसे राज्य के किसी रिपोर्टर को जवाब दर जवाब देने का। हाल तो यह है कि अब कोई प्रशासनिक अधिकारी छुटभैये नेता से मुंह तक नहीं लगाते। नहीं मालूम किस की पहुंच कहां तक है, ना जाने किस मीटिंग में उनका मसला उठा या उठवा दिया जाए। क्योंकि रिपोर्टर-नेता का चोली दामन का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है। आखिरकार विभाग के अधिकारी सोचते और खबर से बनाए गए अभियुक्त से समझौता  कर ही लेते – ‘चलो दो दिन के लिए बैठ जाओक्या जाता है। लो ये शो-काज। रख लेना अपनी फाईल या पेटी में, जहां मन करे। इससे कुछ होता-जाता थोड़े ही है। यदि हमने अभी कुछ नहीं किया, तो ना जाने कल किस मामले में कहां तक घसीट देंगे-लपेंटेंगे ये, कोई ठीक नहींऔर फिर तब अपने हाथ में कुछ भी नहीं बचेगा।‘ एक ही साथ धमकी भीसमझौता भी। सिरी गुरु चरन सरोज रज से लेकर गीता प्रेस गोरखपुर तक एक सांस में। राहतका अदभुत हनुमान चालीसा कल को खबर छपती खबर का इंपैक्ट के साथ। फिर तो रिपोर्टर शहर भर में जीत की दुंदुभी पीटता फिरता। दो दिनों तक सीना का बटन खुला मिले, कालर और बांह उठी हुई हो तो समझ जाइए कि वह शहर का स्टार रिपोर्टर है। अभी-अभी उसकी किसी न किसी खबर ने तहलका मचाई है। और तहलका मत पूछिए उसतहलका की ! पावर सेक्टर के 25 हजार करोड़ रु के किसी घपले-घोटाले की खबर लेकर गुप्ता साहब करीब छह माह तक पीछे पड़े रहे। पटना-रांची से लेकर दिल्ली तक का चक्कर काट लिया। पहले तो उन लोगों ने छापने की बात कहकर सारे जरूरी दस्तावेज ले लिए। बाद में छापने के नाम पर टें बोल गए। हो सकता है खबर में कोई तकनीकी कमी हो। - इस पर गु्ता साहब कहते हैं  आखिर स्टिंग आपरेशन में जो माहिर हैं वे इतना तो कर ही सकते हैं कि तकनीकी कमी को पूरा कर लें। और पत्रकारिता करते हैं तो सारी खबर पूरी करके ही दे दें तो कौन सा तिसमार खां का काम कर लिया! और इस तरह अंत में जाकर किसी नंदीग्राम डायरी वाले पुष्पराज ने परदाफाश ब्लागस्पाट डाट काम बनाया और पूरी खबर उस पर पोस्ट कर दी। फिर कुलदीप नैयर और दूसरे दिग्गज लोगों ने उसके हवाले खबर की खबर सुनाई दुनिया को।

एक दिन रात को ढाई-तीन बजे सिन्हा जी स्टेशन पर थे। अलग राज्य के आंदोलन के अगुआ नेता सनोद बाबू की प्रतिमा के पास। इस प्रांत में यदि किसी एक व्यक्ति की सर्वाधिक प्रतिमा लगी है तो वह सनोद बाबू की प्रतिमा है। सैकड़ों स्कूलों-कालेजों में या तो सीधे इनका जुड़ाव है या फिर मददगार के रूप में। लोग ना जाने क्यों प्रतिमा प्रेम के लिए मायावती को इतना बदनाम कर रहे हैं। सिन्हा जी रात या दिन में कई बार सनोद बाबू की इन प्रतिमाओं के माथे की उस चोट के निशान को खोजते जो उन्हें कभी किसी के लाठी प्रहार से लगी थी। दरअसल एक बार एक आदमी बोकारो से किसी केस के सिलसिले में यहां आया था। उसकी कोई बात पहले हो चुकी थी और उसी मामले में वह नाराज चल रहा था। उन दिनों सनोद बाबू की वकालत की चांदी थी। सनोद बाबू की सदाशयता कहिए कि उन्होंने उस आदिवासी पर कोई केस नहीं किया। किसी से कुछ बताया तक नहीं। कितने सदाशयी-सहिष्णु नेताआज के सबसे बड़े आदिवासी नेता तब उनके गुमाश्ता हुआ करते थे। उनके कई कामों में बोकारो में स्टील कारखाना से विस्थापित हुए लोगों के केस लाने का काम भी शामिल था। प्रदेश के किसी भी लिक्खाड़ लेखक-पत्रकार ने इस प्रसंग को नहीं छुआ है। बाद में जाकर हो सकता है यह निराधार लगे। सो उन्हें आज तक सनोद बाबू की किसी भी प्रतिमा के माथे से उस दाग का गायब रहना समझ से परे लग रहा था। स्टेशन पर सिन्हा जी उसी मोड़ पर एक मोटर साईकिल को टेककर खड़े थे। एक पैर बाईक के स्टैंड पर और हाथ से हैंडल हिलाते-डुलाते खड़े थे। अगल- बगल में कुछ साथी पत्रकार थे। यह वक्त होता है पत्रकारों के घर लौटने का। लगभग पत्रकार रात के डेढ़ से ढाई बजे तक स्टेशन से निकल जाते हैं। फिर भी किसी न किसी को वहां ढाई-तीन बजे देखा जा सकता है। सिन्हा जी जहां होते वहीं जुनियर पत्रकारों की टोली आ जाती। टोली की ओर से नमस्ते-पाती के बाद सभी वहीं जुटने लगते। कोई कहता  भैया, तो चाय हो जाए। सिन्हा जी इन पत्रकारों की नई टोली को क्या कहते। पिंड छुड़ाने के लिए छोटू को कह देते छोटू तीन का पांच ले आना। इस बीच छोटू ठंडे की बोतल में पानी ला चुका था। रिपोर्टरों के जमावड़े के बीच सिन्हा जी ने यूं ही पूछ डाला था  अच्छा भाई, आज क्या खास रहा अपने अखबार में? ..बात बढ़ाते हुए कहते - .’ एक बात बताओ, भाई अपनी छोटी-बड़ी खबरों के इंपैक्ट के लिए तो फालो अप की चिंता में विभाग को नाकों चने चबवा देते हो। लेकिन आज तक कभी कोशिश की है यह जानने की कि सीबीआई या इनकम टैक्स वाले जो रेड करने के बाद लंबी फेहरिश्त सुनाते हैं, दारू की भट्ठी में धमकते हैं, फैक्ट्री में धमकते हैं, कल को उस विभाग या अधिकारी का क्या होता है, भट्ठी का क्या होता है, फैक्ट्री का क्या होता है? कितनों में मामले दर्ज होते हैं और कितना यूं ही रफा-दफा हो जाता है?‘ कोई पत्रकार कह पड़ता  आप भी तो भैय्या लगे एकदम्मे बनाने। कोई चाय की खाली ग्लास नीचे फेंकते हुए कह पड़ता  भैय्या को आफिस में आज कोई नहीं मिला होगा चाटने के लिए। आप भी तो जानते हैं वह फालो अप अपना मीटर बढ़ाने के लिए जरूरी है। अब तो हमारे यहां स्टोरी इंपैक्ट को लेकर प्राईज दिए जाने लगे हैं। भले ही इसका इंक्रीमेंट से कोई लेना-देना नहीं, पर कभी तो यह काम जरूर करेगा।
लोगों को क्या मालूम कि सिन्हा जी चाट रहे हैं या झेल रहे हैं कोई फोड़ा जो फूटने का नाम नहीं ले रहा। यह कोफ्त भी तो हो सकती है उनकी, मवाद के नहीं बहने की।

कामयाबी की पैमाइश इसी से होती है कि किस खबर का क्या इंपैक्ट रहा।  ऐसे में उनकी राजूवाली ह्यूमन स्टोरी पर कहीं कार्रवाई. हो गई..तो स्साला ऐसे मे रोजी-रोटी के लिए तोमारा-मारा ही फिरेगा ना। कार्रवाई हो गई तो फिर तो राजू आईएसएम गेट के पासवाले गैरेज में न तो पंचर टायर बना सकता है और न ही स्टेशन की मोंछू चाय दुकान में कप-प्लेट ही धो सकता है। आटो हैंडल संभालनेवाले हाथ से यह सब कैसे होगा, भोंसड़ी’ के जी भर के गाली देगा। उसी की जबान में एक पंच लाईन चल पड़ती है उसके दिमाग की स्क्रीनपर। गाड़ी मालिक पर कार्रवाई होगी सो अलग। वैसे तो इस शहर में कानून की मुश्तैदी चार दिन की चांदनी है।

दीपकशशि और अशोक की तरह स्टोरी पेलने में उन्हें य़कीन नहीं। आखिर खबर के इन पहलुओं को भी तो देखा जाना चाहिए। इतने सारे सवालों के बीच जब वह खुद को बंधुआ मजदूर की तरह, एक सवाल की तरह पाते तो उसकी सारी स्टोरी लाईन धरी की धरी रह जाती। सुमन जी और सिन्हा जी खुश हो गए तो आपस में कहते  का हाल है बंधुआ पत्रकार! हांकोलफील्ड में बेहद जहीन पत्रकार की तरह लोग सिन्हा जी को देखते हैं। पटना के नवेंदु जी की भाषा में खालिस एक पत्रकार। उनका कहना है आजकल सभी तो जर्नलिस्ट बने-बने आ जाते हैंकोई पत्रकार नहीं होता। आज के नए लड़के किसी न किसी संस्थान से जर्नलिज्म या मास काम का कोर्स करके आते हैंऔर वे  है कि मानने को तैयार नहीं कि पढ़ाई करके कोई पत्रकार बन जाए। वह जर्नलिस्ट बन सकता हैपर पत्रकार नहीं। जिन बुनियादी बातों के परिस्थिति के मेल से कौशल का विकास होता है वह पढ़ाई में कहां से आएगीप्रोफेशन मे तटस्थता और व्यक्तित्व मे ईमानदारी अपने आप में कोई मूल्य नहीं। इनके साथ पेशागत सरोकार और व्यक्ति के साहस का होना बेहद जरूरी है। वे इससे ताकीद करते हैं, पर सोचते  फिर तो पत्रकार के लिए चरित्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

दो हजार हो या दो लाखविज्ञापन के लिए किसी की भी जी हुजूरी करने में कोई हिचक नहीं। विज्ञापन एक तो सामान्य दिनचर्या का है सो अलग। मरण तो तब होता है जब संपादकीय विभाग को विज्ञापन के टार्गेट दे दिए जाते हैं। सिन्हा जी जैसों की हालत तो देखने लायक होती है दुर्गा पूजा, दीवाली, पंद्रह अगस्त, 26 जनवरी के मौकों पर। सभी को टार्गेट दे दिए जाते हैं। बीस हजार से कम तो किसी को नहीं लाना होता है। सिन्हा जी, प्रसाद जी ऐसे सभी मौकों पर फेल हो जाते। लेकिन अंतिम दिन तक रोज जान सांसत मे रहती। चुनाव के समय तो और भी हालत पतली। रोज शाम को मुख्यालय जब हिसाब मांगता तो सिन्हा जी, प्रसाद जी के नाम के आगे लिखा होता – प्रयास जारी है। बीस, उन्नीस, अट्ठारह, सत्रह, सोलह, पंद्रह दिन होते-होते जब तीन, दो.. होता तो बहुच झेंपते। लगता कि ब्लड प्रेसर नपवा लेना चाहिए। प्रेस में सीढ़ियां चढ़ते हुए हांफ जाते। नए से नए पत्रकार भी ना जाने तीस-चालीस हजार कहां से ला के दे देते। इन दोनों से कुछ भी नहीं होता। इसी तरह एक बार जब सभी संपादकीय सदस्यों को अखबार बेचने का टार्गेट दिया गया तो लगा कि अब अखबार की नौकरी अपने बस का रोग नहीं। यह तो भला हो मुख्यालय का जिसे अपने फैसले सिमट देने पड़े कस्बे के रिपोर्टरों तक। सबसे अधिक बलि होती कस्बे के रिपोर्टरों की ही। इन्हें पैसे के नाम पर दो सौ से डेढ़ हजार रु तक ही नसीब होते। लेकिन बाजार के सारे तामझाम इन्हीं की बदौलत होते। एक बार तो ऐसा हुआ कि यूनिट में एक बैठक कर रिपोर्टरों को फरमान दे दिया गया कि सभी तीन महीनें मे लैपटाप ले लें। रियायत दी गई कि दो साल तक पांच सौ रुपए की सब्सिडी सबको दी जाएगी। दो साल मे पांच सौ रुपए प्रति माह यानी 12 हजार रुपए। तीस हजार में 12 हजार रुपए की रियायत। लेकिन यह कौन सी रियायत। उन्हीं को मिलनेवाली रकम से ये पैसे दिए जाएंगे। लेकिन बास कहते है सब्सिडी, तो सब्सिडी है यह। स्टेशन पर राजगंज और टुंडी के पत्रकार सिन्हा जी से यह वाकया सुना रहे थे। सिन्हा जी जिज्ञासा करते  और जो नहीं ले पाएंगे, वे पत्रकार कहते  तो उनके लिए रास्ता साफ है। एक जाएगा तो दस आएगा। दरअसल संपादक के इस भरोसा की वाजिब वजह थी। सभी जानते थे रिपोर्टरों की कमी नहीं। मुफ्त सेवा देने को भी तैयार बैठे हैं लोग। रिपोर्टिंग के लिए सिर्फ कार्ड मिल जाए, देखिए भीड़ टूट पड़ेगी। वे सभी शर्तें झेलने को भी तैयार बैठे हैं। ऐसे मे सिन्हाजी, प्रसाद जी क्या करें। बस कहते  झेलो। जहां तक झेल पाओ, झेलो। इसीमें कल्याण है।

सिन्हा जी का माथा ठनक रहा था यह सोचकर कि कहीं अखबार डिजिटल हो गया और कैलेंडर शेप में बाजार में आ गया तब तो न तो हाकर की इतनी जरूरत होगी और न ही फुटपाथ पर इतनी भीड़ अखबारों की। डेस्क का ढांचा भी तो ऐसा नहीं रहेगा। घरों में उस कलैंडरनुमा अखबार के ही नीचे कई बटन होंगे, जिसमें से एक बटन दाबकर अपनी ग्राहकी आगे के लिए बढ़ा लेंगे या खत्म कर लेंगे। बाजार के लटके-झटके अखबार के पेशे को पूरी तरह बदल देंगे। इवेंट की अहमियत बनी रहेगी। लेकिन मल्टीमीडिया न्यूजरूम तब तो कमाल दिखाने लगेगा। खबर विशेष हुई तो खबर के अंत में रीड मोर या व्यू मोर बटम क्लिक करके उसका वीडियो फार्मेट भी मिल जाएगा। तब तो केवल लिक्खाड़ों से काम न चलेगा। डेस्क पर काम करनेवालों में मल्टीमीडिया एक्सपर्ट ही चलेंगे। विशेषज्ञों का जमाना तो उदारीकरण के बाद से ही खत्म होने लगा। बाजार के विस्तारीकरण और स्पर्द्धा की धार ने औद्योगिक घरानों को विविधीकरण की ओर मोड़ दिया। विल्स और कैप्सटन के लिए मशहूर आईटीसी अब तेल से लेकर बिस्कुट, क्लासमेट की कापियां तक बेच रही हैं। कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के नाम पर बजट का एक पर्सेंट पैसा सोशल सेक्टर में कंपनियों को लगाना होता है। इस पैसे का बाहर फ्लो रोकने के लिए टाटा जैसी कंपनी तक ने टीएसआरडीएस नाम से अपनी एनजीओ कर रखा है। सभी बड़े अखबारों ने एक-एक एनजीओ इसी मकसद से बना रखी है। सिन्हा जी का माथा ठनक रहा है कि जितनी जल्द हो, मल्टीमीडिया का कोर्स कर लेना होगा। और सारे नए काम भी तो पत्रकारों में ही बंटेंगे। अभी जब उपसंपादकों और प्रभारियों को लैपटाप दे दिया गया है तो काम के घंटों का कोई मतलब नहीं रहा। जहां हैं वहीं से ड्यूटी बजाइए। लैपटांप किसी को सुविधा दिखी हो तो वह देख ले - किसकी सुविधा है और कितनी सुविधा है! ऐसे सिन्हा जी राजगंज या टुंडी के रिपोर्टर को क्या रास्ता सुझाएंगे !

शहर में फैलते प्रदूषण के खिलाफ फीचर सप्लीमेंट की लीड स्टोरी होती और दूसरी ओर पर्यावरण दिवस पर उन जैसे हार्डकोक भट्ठों से दस लाख का विज्ञापन। परिशिष्ट में उनकेसामाजिक सरोकारों को लेकर राइट-अप। आखिर वही कलम यह भी लिखतीं तो उन्हें खलनायक सिद्ध करती। जंगल से लकड़ी ले जाते अखबार मालिक के ट्रक को छुड़वाना हो या मालिक की फैक्ट्री में मजदूर की मौत पर बवाल की लीपापोती करवाना , पत्रकारों की सिद्धि और कौशल को सिद्ध करने का सबसे बेहतर पैरामीटर माने जाते। गेटिंग-सेटिंग में महारत का पैरामीटर। वैसे तो ऐसे दिनों में माडम से लेकर ब्यूरोरिपोर्टर से लेकर संपादक तक सबके कान खड़े रहते और आंखें चौकस। अखबार की सारी इंद्रियां इस खबर को सूंघने में लग जाती कि कहीं इससे संबंधित कोई खबर न चल जाए। सिद्धि का पैमाना यह कि  तो थाने में एक धेला लगे और न ही मजदूर के आश्रित को कोई मुआवजा देना पड़े। भूल से किसी भी अखबार के डाक संस्करण में (यानी कस्बे के पन्नों में भीथाने में पड़े ट्रक के सकुशल छूट जाने की या फैक्ट्री में मजदूर की मौत की छोटी भी खबर कहीं छप जाती तो एक साथ सबकी क्लास लग जाती। प्रभारी लाईन हाजिररिपोर्टर की छुट्टी। डेस्क के उप संपादक का ट्रांसफर। कोई चूं भी नहीं कर सकता। अखबार का स्टैंड गलत नहीं होता। नौकरी देने के वक्त जितने कागजों पर हस्ताक्षर लिए गए थेउस समय कोई देखता भी नहीं कि इन्हीं कागजो के बीच इस्तीफे पर भी हस्ताक्षर लिया जा रहा है। पत्रकार से चौबीस घंटे की चाकरीलेनेवाला अखबार यह भी हलफनामा ले लेता कि आपका मुख्य पेशा पत्रकारिता नहींकि संस्थान को जरूरत पड़ने पर आप कहीं भी काम करने को तैयार हैंकि आप अमुक रकम परस्वेच्छया काम करने को राजी हैं आदि-आदि। अब ऐसी स्थिति में संस्थान के हाथ तो ऊपर ही रहते। उसे जो इच्छा होती वैसी ट्रांसफर-पोस्टिंग करता।
 ऐसे दौर में वह भी इसे एक हद तक सही मानने लगे। वह तो मानते हैं कि आपके सिद्धांत और विचारधारा के लिए थोड़े ही किसी ने अपनी पूंजी झोंकी है। सुमन जी का साफ कहना था  आप अपने पैसे से एक अखबार लगाकर दस पत्रकारों को यदि नौकरी नहीं दे सकते हैं तो बुरी बातों से उनका दिमाग खराब करने का आपको कोई हक नहीं।
सो ढलना तो होगा हीपर किस हद तकयह सवाल तो है उनके लिए भी। क्या अखबार को यल्लो पेज बन जाने दिया जाए एक दिन मैनेजर ने सुमन जी और सिन्हा जी की बहस सुन ली थी   जानते हैं बास। चाहे जितने भी टोटके कर लिए जाएं, पर अखबार तो अखबार बनकर ही बचेगा। अब देखिए, विज्ञापनों की इस मारामारी में सत्यनारायण कथा एक न्यूज इवेंट तो है, पर जनतंत्र का पर्व कहे जानेवाले चुनाव की खबर के तौर पर इसकी कोई अहमियत नहीं रही। उनकी खबर तो तभी छपेगी जब आप उनसे सौदे कर लें।
आप सो कहते हैं सुमन जी! छुटभैये नेताओं की फर्जी रिलीज को दो कालम मे पसारने में धन्य-धन्य होनेवाले अखबारों में एक सिंगल कालम खबर के लिए तरसना पड़ता है चुनाव के दिनों में।
सुमन जी कहते  बास, जानते हैं बाहर छुटभैया नेता भी बड़ा ही भद्दा मजाक करते हैं। चुनाव के दिनों में वे लोग हमलोगों को किसी भंड़ुए से कम नहीं समझते। और कभी-कभी तो दबी जबान से बोल भी देते हैं। अब पांडे जी को लीजिए। कभी पार्टी प्रवक्ता थे। अब पत्रकारिता और साहित्य-वाहित्य करने लगे हैं। ऐसे लोग तो घुट्टी-घुट्टी से परिचित हैं। पब्लिक प्लेस में वे तो और भी भद्द कर देते हैं। बस खून का ही घूंट पीकर रह जाना पड़ता है।
मैनेजर का यह सुनना था कि बस यह खबर नमक-मीर्च के साथ बहती  उड़ती चली गई राजधानी मुख्यालय तक। जीएम चटर्जी साहब से प्रबंधक ने फोन पर कहा  सर। इस बार के चुनाव में टार्गेट हासिल करना थोड़ा टफ लगता है।
गौर, यह बात तुम कैसे कह सकते हो? कितना अच्छा तो पेस है अभी।
सो तो है सर, पर यहां कुछ खिचड़ी पकने जैसा गंध मिल रहा है।    
मतलब नहीं समझा!’
क्या बोलें सर। सर, मेरा नाम बाहर नहीं आने दें तो कुछ बताएं?’
ऐसा कभी हुआ है तुम्हारे साथ जो आज यह कहने लगे।
अपने ही कुछ प्रबुद्ध लोग पत्रकारों को भड़काने के काम में लगे हुए हैं।
फिर क्या था, उन दोनों के नाम से नोटिस ही आ गई। क्रांतिकारी बननेवाले दोनों की सिट्टीपिट्टी गुम। संपादक की सलाह पर दोनों ने लिखित माफी मांग ली। चाहते तो दो-दो हाथ कर सकते थे। एक हद तक जाकर नौकरी बच भी जाती। लेकिन सवाल था कि पानी में रहकर मगर से बैर कौन मोल ले। मामला रफा-दफा हो गया और इस तरह नौकरी बची। अब ऐसे में संपादक के प्रति वफादारी तो रहेगी ही।

सुबह के दो-तीन घंटे तो लोग डूबकर रुचि और जरूरी की खबरों के लिए अखबार में आंख गड़ाए मिलते हैं। बाद के घंटों में दुकानों में, चौक-चौराहों पर गुमटियों पर अखबारों में छपी प्रांत में मंत्री रह चुके एक्का, राय आदि के ठिकानों पर सीबीआई की छापेमारी की खबर को लेकर चर्चा होती। पान खाने के नाम पर किनारे चुपचाप इनकी बहस को सुन रहे थे सिन्हा जी और गुन रहे थे कि किस तरह भीड़ में खबर को ढूंढती आंखों को बहुत आसानी से खबर के अदृश्य पहलू दिख जाते हैंपर अखबार तो यह मानने से रहा कि पाठक के पास भी एक चश्मा है। उन्हें याद आ रहा था कि कैसे उन्हें और प्रसाद जी को एक छोटी-सी बातचीत के लिए सस्पेंसन का मूंह देखना पड़ा। अब इसका टेप ले जाकर सुनाए तभी ना मानेंगे लोग।
जानते हो बुच्चन यह खबर जो हैं ना इसके पीछे कोई अखबार ही लगा हुआ है। नहीं तो फिर क्या बात है कि यही मंत्री लोग तो इनका हीरो हुआ करता था। पान मूंह में चभर-चभर करते हुए बड़ा बाबू बोल रहे थे।
ऐसा आप कैसे कह सकते हैं ?’
हां बुच्चन, तुम भी तो यहां का सारा अखबार देख रहे हो। आखिर क्या बात है कि सभी इसको इस तरह नहीं छाप रहा है?’
सो तो मानेंगे। आप सही उचार रहे हैं बड़ा बाबू। लेकिन इसका मतलब थोड़े है कि अखबार ने ही खबर लांच किया है सीबीआई को टास्क पर लगाकर।
अरे भाई, ऐसे थोड़े ई सब काम होता है। पहले आशंका जाहिर करते हुए बड़ी-बड़ी खबर प्लांट करता है। फिर तरह-तरह की स्टोरी का सिरियल चलाता है। अब आप ही कहिए, आप कहीं ई सब देखे हैं, सिवाए ई वाला अखबार छो़ड़कर। इसके बाद तो अपने आप विभाग सक्रिय हो जाता है।
जब ऐसा बात है ना, तब तो देखना जरूर भंडाफोड़ होब्बे करेगा कि कैसे कोई डील लटक जाने के कारण अखबार इन लोग को बलि का बकरा बनाया है। पूरे राज्य में खाली ईहे लोग बेईमान है का?’
इस बीच तीसरा पत्रकार टाईप युवा उसी बातचीत में मुंह घुसेड़कर लटक जाता है। भीड़भरी चलती बस में जगह नहीं रहने पर कंडक्टर के मना करने पर भी इसी तरह जिद्दी लोग गेट पर लटक जाते हैं। वह मुंहाने पर ही फटफट बोलने लगता है  सो तो है ही। और ई सबका किस्सा जानना है, पढ़ना है तो इंटरनेट पर जाकर सड़ास और गली-मोहल्ला को देखिए। पूरे देश में अखबार में जो भी मां-बेटी होता है, या कोई इधऱ से उधर होता है, सब के पेशाब-पाखाना की खबर उसमें देखिएगा।
अच्छा तो सो है !!’

2004-05 की बात होगी। सिंदरी के प्रसिद्ध पब्लिक स्कूल में एक शिक्षिका या छात्रा के शारीरिक शोषण के मामले में वहां के प्राचार्य थाना-पुलिस के फेरे में पड़ गए। रोज एक किस्सा छपता। किसी में पीडि़ता के पक्ष में तो किसी में स्कूल की साख बचाने को लेकर स्टोरी। और कोई चालबाजी करके शिक्षामंदिरों में बढ़ते पेशेवराना रुख’ पर परिचर्चा आयोजितकरता। इसी स्कूल में यहां के जनधर्मी अखबार ने एक इवेंट किया। शाम को इवेंट मैनेजर संपादकीय केबिन में हांफते-हांफते आकर समाचार प्रभारी से बोलता है – ‘सार जी, इस खोबोर को थोड़ा ठीक जगह दिला दीजिएगा। सर्कुलेशन प्रोमोशन का इवेंट था। पीसीसी वालों ने किया है।‘ प्रभारी बोलता  हड़बड़ाने की क्या बात। आराम से बैठिए। चाय पीजिए। गोकुल चाय लाओ, साहब को चाय पिलाओ।
खी-खी-खी करते इवेंट मैनेजर कहता  सर, इसकी क्या जरूरत ?
पुड़िया खोलकर मुंह में पान की गिलौरी लेते हुए टेबल के नीचे पड़ी डस्टबिन को पैर से खीचकर बाहर लाया और उसमें पुड़िया डालकर उसे टेबल के नीचे ठेल दिया। समाचार प्रभारी ने फुले गाल से कहा  हौं., तो मुहूर्त निकौलकर तो औप हमौरे मौहल्ले में औए हैं। ओइसे कोइसे चलेगा!
अब आग्रह का दबाव था या पिक पड़ जाने का डर। बड़े सधे अंदाज में बैठ गया वह। लगता कि सामने वाले पर पिक पड़ जाएगा। पर सधे अंदाज में मुंह को ऊपर उठाकर कहा हौं, हौं तो कौsहिएss, क्यौs कौह रोहे थे। इवौंट-विवौंट, क्यौss तो...
मैनेजर ने फिर दुहराई अपनी बात।
लहजा था तो अनुरोध कापर प्रभारी को लगा कि पोस्ट की हायरआर्कीआफिस का प्रोटोकालन्यूज मेकेनिज्म सबकी चिंदी उड़ रही है- संपादकीय विभाग से जुड़ा हुआ मामला और तय करेंगे मार्केट के लोग !  उसने मुंह को गोल-गोल करके थुथुन ऊपर कर पिक को संभालते हुए पूछा – ‘औपको इवौंट करनौ ही थौ तौ पौहले संपौदकीय से बौत तौss कौर लेते। रिपौटर दे दियौ जौताफौटौग्रौफर चलौ जौता।‘ उस मैनेजर ने कहा – ‘सार हम लोगों ने आपको इस परेशानी से बचाने के लिए ही अपने स्तर से सबकुछ मैनेज कर लिया। बस्सदेखलीजिए।‘ अब क्या था। माथा तो भिन्ना गया।
अब तक पान का कचूमर निकल चुका था। फिर डस्टबिन पैर से खीचा और फिच्च से मार दी मुंह की पिचकारी। अब दोनों ओर थोड़ी राहत थी। मैनेजर थोड़ी अधिक राहत में था। समाचार प्रभारी ने मैनेजर से कहा – ‘दादाऐसा है कि उस स्कूल की जिला भर में भद्द पिट रही है। आप भी देख रहे हैं कि अखबारों में वह इन दिनों रंग गया है। बेहद बदनाम हुए उस स्कूल को  इवेंट के लिए चुनने से पहले पूछ तो लेते। एक से एक जगह मिल जाती। आप वहां इवेंट करते। एक पन्ने पर स्कूल में जलसा करें और उसी पन्ने में या बगल के पन्ने में उसे खलनायक बनाकर खबर छापें तो पाठकों के पास क्या मैसेज जाएगा।‘ आखिरकार उसने यह खबर नहीं छापी तो नहीं छापी। उसने संपादक से सारा माजरा फोन पर बताया। संपादक ने कहा  हां, ठीक किया आपने। स्साले लोग को दिमाग है? होटल की खाता-बही करते-करते कहां से तो अखबार की मैनेजरी मिल गई। अब उसी दिमाग से काम करेंगे ना। ठीक है प्रसाद जी। कोई और परेशानी नहीं न ? हेड आफिस से फोन आए तो कह दीजिएगा, तबियत ठीक नहीं चल रही है। बाहर गए हैं इलाज में। बहुत बढ़िया चला रहे हैं आप अखबार। बेफिकर रहिए।
अपने हिसाब से उसने जो किया और जिन कारणों से कियाकल को यहां से लेकर मुख्यालय तक के किसी ने उससे जवाब तलब नहीं किया। लगा कि सचमुच संपादक तो बहुत बड़ी पूंछ वाला है। पहले से ही बड़ी उसकी नाक और दो इंच ऊपर हो गई। बात आई-गई हो गई। वह इन सबसे बेहैफ अपनी रौ में काम करता रहा। इस बीच एक आईटीआई के फर्जीबाड़े की खबर शहर के अखबारों में लहराई हुई थी। छात्रों की परीक्षा नहीं ली जा सकी थी। प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए थे। सभी अखबारों ने प्रमुखता से इसे अपने-अपने अखबारों में जगह दी और इस अखबार ने भी। और इस बीच उसके संपादक ने अपने संरक्षण की किसी मैगजीन को उस संस्थान से एक लाख का विज्ञापन दिलवा दिया। इसके बदले में अपने अखबार में उसके पाप धो डालनेवाली एक मोटिवेशनल खबर प्राचार्य से इंटरव्यू की शक्ल में छापी गई। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करनेवाले उसी संस्थान के बारे में बड़ी-बड़ी बातें। बड़े-बड़े दावे किए गए थे। प्रसाद जी के जिन हाथों ने इवेंट की खबर रोकी थीउन्हीं हाथों ने अखबार के पन्ने पर उस खबर को संवारकर छापा। यहां कौन सा व्याकरण काम कर रहा था ? वह बेखबर था इन सब चीजों से !!

जले-भुने प्रसाद जी एक दिन सिन्हा जी से कहते हैं – जानते हैं बास, अब बहुत जल्द हम सभी संपादक शब्द सुनने को तरस जाएंगे। जब विज्ञापन संपादक, प्रसार संपादक, व्यवसाय संपादक जैसे पद चल गए हैं तो संपादक शब्द की अर्थवत्ता कहां रही ! फिर वैसे पद को रखने का क्या मतलब जिसका कोई अर्थ न होअब आप ही कहिए सही, मालिक अखबार के जरिए अपने व्यवसाय (हित) का संपादन करता हुआ बिजनेस एडीटर बना हुआ है और संपादक नाम का जीव अब खबरों को कारपोरेट इंटरेस्ट के हिसाब से मैनेज कर रहा है  यानी संपादक मालिक के हित के हिसाब से खबरों का प्रबंधक यानी न्यूज मैनेजर बन बैठा है।
याद कीजिए प्रसाद जी, एक बार कोयला के काले कारोबारियों के खिलाफ अखबार में अभियान छिड़ा था। मैं तबतक पहला अखबार छोड़ दूसरे में आ चुका था। लगभग रोज ही शाम को कई अनाम फोन यह सूचना देने के लिए आते कि आज शाम सात बजे गोविंदपुर के इस्ट इंडिया रोड होकर तो, रात आठ बजे कतरास से फलां नंबर की गाड़ी से माल ले जाया जा रहा है। प्रसाद जी, एक रूटिन ही हो गई थी कि शाम को एक साथी सूचना नोट करने को तत्पर रहते और बीट वाला रिपोर्टर वक्त निकालकर उस खबर की पुष्टि में कभी क्षेत्र का दौरा करता तो कभी किसी संवाददाता से भेदिया का काम लेता। एक दम्म से, ऐसे कोयला व्यवसायियों में तो जैसे भगदड़ मच गई थी। इसी बीच क्या हुआ कि खबर का फंदा एसपी-डीसी तक पसरने लगा। लेकिन यह सब होता ही कि तब तक एक दिन मुख्यालय से फोन आया कि अब कोयला व्यवसाय के अभियान को थोड़ा सा विराम देकर स्वास्थ्य को लेकर ऐसा ही काम कराने की जरूरत है। जानते हैं प्रसाद जी, वह दिन फिर नहीं आया जब बोला जाता कि कोयला व्यवसाय के अभियान को जारी कीजिए। अब आप ही कहिए, क्या मतलब लिया जाए, इसका। एक गीत है ना  जितनी चाबी भरी राम ने, उतना चले खिलौना....

प्रसाद जी लगभग भुनभुनाते कहते - हां जब प्रसार प्रबंधक, विज्ञापन प्रबंधक को संपादक प्रत्यय से रिप्लेस कर दिया गया है तब तो यही होगा ना। मालिक तो सबसे बड़ा संपादक होगा ना। तो स्टोरी लाईन उसीकी चलेगी। वीणा के तार को कितना कसना है कितना ढील देना है। संगीत पैदा होने के लिए यह ढील-खींच तो जरूरी है ना। और आपको तो दी हुई स्वरलिपि पर साज बजाना है। साज दे दिया गया है तो इसका मतलब थोड़े ही है कि साज को बाप की मान कर दीपक या मल्हार राग छेड़ दें। संपादक की नौकरी बस मालिक की चाकरी भर थी। दलाली करना, गोटियां फिट करना आदि। ग्लास की केबिन में बैठकर चारों तरफ निगाह रखना भर काम है। बहुत शक हुआ तो बुलाकर पूछ लिए क्या हो रहा था? उनके मुख्य एसाइनमेट हैं दलाली करना, गोटियां फिट करना आदि। सुमन जी कहते- यह बाजारवादी दौर कई भ्रांतियों के खत्म होने का भी दौर है सिन्हा जी।

सिन्हा जी कहते  प्रसाद जी, यह गलतफहमी कभी मत पालें कि आप पत्रकार हैं और संपादक हैं। पीआरबी एक्ट तक ने संपादक को जैसे परिभाषित किया है  the person who controls the selection of news। तो बस संपादक इतना भर तो काम कर ही रहे हैं। यह जो बाबाओं ने जंतर-मंतर का अदभुत संसार रचा है, इसमे भी तो चैनल वालों का कम हाथ नहीं। श्रद्धा और अध्यात्म के नाम पर जो कुछ अनाप-शनाप प्रदर्शित हो रहा है चैनलों पर, जानते हैं यह पूरी तरह से केबल एक्ट का उल्लंघन है। उल्लंघन है तो है। इसके एवज में चैनल को जो मिलता है वह खास बात है ना। किसे पड़ी है जो इधर देखे। देखिएगा पत्रकारिता की गंध जहां-जहां से भी आएगी उसे धो-पोंछकर साफ कर दिया जाएगा।प्रसाद जी कहते है – यही कारण है ना बास, कि हम अपना मनचाहा इस्तेमाल होने दे रहे हैं, तो अंततः प्रतिरोध की स्थितियां ही नहीं बचेंगी।
टूटती-बिखरती एक आवाज कहीं से आई  जानते हैं एक बात सिन्हा जी-प्रसाद जी, सोचिए कि कभी ऐसा हो कि मीडिया का सोशल आडिट हो। कहिए तो फिर क्या होगा ?
प्रसाद जी लगभग तमतमाए अंदाज में कहते  वही होगा जो नरेगा का हो रहा है। और क्या, उससे भी बुरा होगा। किन सामाजिक अपेक्षाओं और जिम्मेवारियों के बरक्स आपने यह हैसियत पाई है। और आपने जो हैसियत पाई है वह क्या गंवाकर, कितना चुकाकर। होना ही है सोशल आडिट तो, अखबारों समेत दिग्गज पत्रकारों का भी हो।

हां तो, अखबार से संपादक के निकलने के बाद अलग-थलग पड़ते हुए जहां से भी सलाह आती, आशीर्वचन मानकर ग्रहण करते समाचार प्रभारी प्रसाद जी। जिस दिन कहीं से कोई फटकारमूलक निर्देश या सुझाव नहीं आते, लगता कि दाल में कुछ काला है। खून के घूंट पीने की मजबूरी थी। सबकी सलाह सर-आंखों पर। हांसही कह रहे हैं आप।‘ ‘हांअखबार को चलना है तो यह सब तो करना ही होगा।‘ आदि-आदि और इसी बीच में कोई कह देताथोड़ा सप्लीमेंट में सेठों के बच्चेउनके घरों में मनाए जा रहे त्यौहारजन्मदिन आदि को भीजगह दीजिए। कोई एक पेज ही क्यों नहीं कर दिया जाता, जहां ऐसी गतिविधियों को लें। यह साहित्य-वाहित्य क्या कोई पढ़ता है। अब उसे तो यह पल्ले ही नहीं पड़ता कि इस सबके बीच असहायनिरीह साहित्य कहां से टपक गया। साहित्य तो वह अखबार में भूले से भी नहीं जाने देता। हां, इतना जरूर करता है कि अवसर विशेष पर पढ़ने-लिखनेवाले जागरूक लेखकों-प्रबुद्धों से वह लिखवाता। अखबार में आने के बाद से तो जैसे साहित्य को वह भूल ही बैठा था। बाहरी पत्रिकाओं तक ही उसने इसे सीमित रखा हुआ था। फिर भी उसने कहाठीक है सप्लीमेंट को रिच करने की कोशिश करनी होगी। और इन्हीं कोशिशों के बीच उसे एडिशन इंचार्ज से सप्लीमेंट इंचार्ज बना दिया गया। स्थानीय संस्करण से लेकर मुख्यालय तक कहीं कोई पत्ता तक नहीं खड़का। नौकरी छोड़ने का विचार धमकते कि चार छोटे-छोटे बच्चेउनके स्कूल की फीसबूढ़े मां-बाप सब दस्तक देने लगे। पत्रकारिता में तो उसके जो भी कौशल होंपर शहर भर में जहीन माने जानेवाले सिन्हा जी की हालत उसे बार-बार प्रेरित करती या समझौते को तैयार करतीनहीं मालूम। पर सिन्हा जी की हालत प्रसाद जी की जबान को कड़वी और तल्ख होने से रोकती रही जरूर। एक छोटे से अखबार से बड़े अखबार में सन 2002 में सिन्हा जी को पांच हजार रु की पगार पर आने का आफर मिला। कौन नहीं जातासो खुश-खुश वह भी चले गये।.पहले माह की पगार थोड़ी देर से क्या पांच माह देर से मिली। जिला मुख्यालय, राजधानीफिर पटना और सबसे अंत में नोएडा का चक्कर लगाना पड़ता है प्रोपोजल को। और मंजूर होकर आने में भी इतनी ही गलियों की सैर करनी होती है। कहा जाता था कि यहां यदि संपादक को गाली भी दे दें या चप्पल मार दें तो कार्रवाई होते-होते कम से कम एक साल लग जाएंगे। और पहले माह की पगार मिली तो धड़ाम से गिर गए! अरे उस छोटे से अखबार में वेतनतेलअखबार-मैगजीन के भत्ते आदिकुल मिलाकर लगभग चार हजार तो मिल ही जातेपर यहां तो तीन हजार ही मिले। अब उसे लें तो कैसे लेंयह क्या हुआ, कैसे हुआ! माथा हाथ लिए सिन्हा जी को देखकर प्रभारी संपादक ने समझाया  कोई बात नहीं। घबराने की कोई बात नहीं। ठीक हो जाएगा। कहीं कोई भूल हो गई होगी। मैं देख लूंगा।

जिस आसानी से प्रभारी ने कह दिया, उतना आसान नहीं था सिन्हा जी के लिए इसे झेल पाना। आखिर पांच माह से इसी दिन को देखने का इंताजर कर रहे थे क्या कहना भी मुश्किल था कि आपने ही यह प्रोपोजल दिया होगा। आखिर उन्हीं के प्रोपोजल पर तो कोई स्ट्रींगर से स्टाफर बन रहे थे। यह कैसे हो सकता है कि सीनियर स्ट्रींगर के रूप में आपने प्रोपोजल दिया हो और आ गया हो स्ट्रींगर की सैलरी।
सिन्हा जी समझ नहीं पा रहे थे-यह प्रसाद है या विष। आखिरी बात हुई थीछह हजार की और होते-होते पांच हजार पर टूटी थी। विचारवर्द्धन जैसा कोई नामधारी प्रभारी था। उसने सिन्हा जी को राजी कर लिया था पांच हजार पर। वह आश्वस्त था। बड़े अखबार में होने का सुख इस संतोष को बड़ा कर दे रहा था। लेकिन यह तो तब की बात है जब पगार हाथ नहीं आई थी। अब इस हाल में क्या करे।
पाठक बाबा ने सलाह दी – ‘क्या देखते हैं सिन्हा जी, वापस हो जाइए। देखिएगा पैर पकडे़गा यह। नहीं तो मेरा नाम पाठक नहीं।
सुरंग कहता कि - ‘एक चिट्ठी दे डालिए। दवाब का काम करेगा।‘ ‘सुरंग हां, लोगों ने एक अच्छे-खासे पत्रकार को यह नाम दे डाला था। बड़े सियासी घराने से ताल्लुकात थे उसके। बड़े ही प्यार से जब जूनियर पत्रकार उसे कहते  सुरंग भैया, तो नहीं मालूम उसे खुशी होती होती या कोफ्त--- तो सिन्हा जी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे कि उसी पुराने अखबार में फिर जाएं या...। इन पांच-छह माह में बहुत सारे तर्क और बहुत सारी बातें उस अखबार के विरोध मेंउसके संपादक के खिलाफ मन में क्रमशः बस गई थीं। अपने पुराने अखबार में नहीं होने के पक्ष में ढेरों बातें गढ़ ली थीं जो सुखद थीं। लौट के बुद्धू घर को आए की जो बात होगी सो अलग। पहले ही बीवी का आतंक कुछ कम नहीं था। एक हद तक वहजायज भी मानता था। वह मानने लगा था कि जरूरत और जिम्मेवारी को आप जुनून से बहुत देर और दूर तक नहीं ठेल सकते। जुनून का अंधापन वास्तविकताओं को झुठला नहीं सकता। जुनून जो है ना, वह जज्बात से चलता है। पत्रकारिता जवानी का नशा हो सकती है, पर जिम्मेवार परिवारशुदा तो इसे नौकरी की तरह लेता है। इस सबसे हटकर प्रमुख और एकमात्र सवाल था कि सिन्हा जी पगार की बात घर में कैसे बताएं। जब पांच माह टाल दिया तोएक-दो माह और खींचा जा सकता है। घर पिता के पेंशन से चलना मुश्किल था। पहले ही बहुत बोझ डाल दिया था उन्होंने। उसके अलावे भी तो भाई-बहन थे। उनकी इच्छाएं और जिम्मेवारियां इसी पेंशन की बैलगाड़ी पर हिचकोले खा रही थीं।
सिन्हा जी सब्जी के लिए या खरीदारी के लिए घर से सूची लेकर जाते। लोगों की नजरें बचाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। भूखा नंगे का कौन सा कपड़ा नोंचेगा। सब्जी बाजार में आते ही टूटी-फूटी, बची-खुची सब्जी वाले को सिन्हा जी की निगाह तलाशती। ऐसी सब्जीवाली जहां दीखती, आंखें रौशन हो जातीं। कदम उधर खुद ब खुद बढ़ जाते। चुन-चुनकर आलू पांच की जगह चार किलो लेते। परवल थोड़ा पका हुआ लेते तो सस्ता मिलता। इसी तरह छंटनी का बाजार करके घर पहुंचते। घर की ओर जाना हमेशा ही उनके लिए पर्वतारोहण था। ड्यूटी से वापस जाओ या तनखाह के दिन या फिर बाजार से। घर जाना उसके लिए आसान नहीं था। बहुत कोफ्त होती शादी पर। किस फितुर में घिर गया था कि शादी कर ली। एक साथ कई जीवन दांव पर लग गए हैं। कई अरमान अलगनी पर धूप में सूख कर टटा रहे हैं। कोई उन्हें उलटने-पलटने वाला भी नहीं। इच्छाओं-जरूरतों के गर्भपात तो आम बात हैं। 

यही सोचते बाजार से आते। थैला हाथ में आते ही बीवी सारा कुछ जमीन पसार देती है। और देखते ही खीझती  अजी, मैंने दो किलो परवल कहा था और यह क्या ले लिया आपने कुंदरी? क्या कटहल नहीं था बाजार में। और यह कौन सा साग हैमर्दों को खाना बनाकर, परोस कर दो। खाने और काम के अलावे तो इन लोगों कुछ आता ही नहीं। अच्छा बोलिए तो जी, इस दाल से महीना चला लेंगे। मुझे नहीं संभालना घर। आप ही चलाइए।

अब सिन्हा जी इसकी व्याख्या करते  देखो परवल इस गरमी में खाकर क्या होगा। दाल भी पतली बनाओगी तो बीमारी तो नहीं हो जाएगी। इस मौसम में कुंदरी से बेहतर सेहतमंद कोई सब्जी नहीं। बच्चों को आदत डलवाओ। कटहल अभी बाजार में आया ही है, अभी सिर्फ दर्शन कराने के लिए बाजार में कटहल महाराज अवतरित हुए हैं। 
कुछ सब्जी तो कम वजन ही है। कैसे समझाते कि तुम्हारी फेहरिश्त जितनी गदराई और लंबी जेब नहीं। - बस कुछ दिन ही चलाना है। फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह कहकर तो पांच माह खेप गए। अब क्या दिलासा देना बचा है। एक तो तीन बजे रात में सोओ, ऊपर से साढ़े छह बजे बच्चे को स्कूल पहुंचाओ, सात बजे मार्केटिंग को बाजार जाओ। लेकिन यह खीझ कभी बाहर नहीं आने दी। सोचा कि इस रहम से कभी बीवी बरसेगी नहीं। 
घर में हमेशा किसी न किसी बात को लेकर खिच -खिच मची ही रहती। बाहर में सिन्हा जी को नए-नए जर्नलिस्ट टाईप के लड़के कलमघिस्सू पत्रकार मानते। पत्रकारों की नई टोलीजिस रास्ते पर चल पड़ी हैं वहां ईमानदारीभाषाअध्ययन तो कोई पड़ाव ही नहीं। हर खबर में दस ऐब। भाषा बोध से लेकर समाचार संरचना तक विकलांग। लेकिन उन पत्रकारों और खबर को सजाकर परोसनेवाले डेस्क इंचार्जों का वेतन था कि मत कहिए! पंद्रह-बीस हजार से कम तो कोई नहीं। घर में भीगी बिल्ली बने रहनेवाले सिन्हा जी घर से बाहर सर उठाकर चलनेवाले। सबको उनपर नाज था। वे भी खुशमिजाज। लेकिन अखबार में आते ही लगता जैसे किसी ने हंसी छीन ली हो। आखिर जो डेस्क इंचार्ज होतावही कहता – भैया,थोड़ा इस समाचार को देख लीजिए न। प्रभारी कहता – सिन्हा जी फुर्सत मिले तो थोड़ा देख लीजिएगा। मैंने कुछ लिखा है। कोआर्डिनेटर कोई होतापर कोआर्डिनेशन का काम सिन्हा जी ही देखते। शहर के सभी पत्रकार यह जानते। मृणाल पांडेय की सैलरी का पचासवां हिस्सा भी सिन्हा जी का वेतन नहीं था। धीर-धीरे करके रास्ता निकला। परिशिष्ट में उनसे कुछ-कुछ लिखवाया जाने लगा। बारह-तेरह सौ इससे  मिल जाते। उसके बाद सिन्हा जी वेतन घर ले जाने लगे।
सिन्हा जी की एक बहन की उम्र 27 साल हो गई थी। शादी का कोई रास्ता नहीं निकलता। कोई कायदे का लड़का भी नहीं दिखता कि उसीसे बात आगे बढ़ाई जाए। लेकिन उन्हीं के अखबार के शर्मा की बहन भी उदाहरण थी। वह शिक्षा की बीट देखता था। बहन ने कस्तूरबा गांधी विद्यालय मे शिक्षिका के लिए आवेदन भी दिया था। युद्धिष्ठीर नाम के किसी डीपीओ से जातिगत सांठगांठ बैठा ली थी। लिखित परीक्षा तक मे नहीं बैठी। शर्मा जैसे नए पत्रकार ने अपनी इस बहन को नौकरी दिला दी। पूरा शहर इसे जानता थापर खबर नहीं बना यह मामला। बात-बात पर विभागों को पानी पिलानेवाले पत्रकारों की फौज को जैसे सांप सूघ गया। पांच साल मे छह घराने की सैर करनेवाले पत्रकारों की इस जमात के लिए ईमानदारी और निष्ठा क्या चीज है। वे मानते हैं बाजार मे निष्ठा का कोई मोल नहीं। सही भी तोयदि मौका चूक जाएं तो कौन अखबार किसी को पूछने जाता है सिर्फ योग्यता के बल पर। उसकी निगाह मे तो जिला से लेकर राजधानी तक मे भगोड़े पत्रकार संपादक बना दिए गए हैं। इनमे से एक के बारे मे तो एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका तक मे प्रधान संपादक के नाम खुला पत्र में एक पूरा चिट्ठा ही छप चुका है। और यह चिट्ठा किसी भगोड़े पत्रकार ने ही लिखा था। बाद मे वही भगोड़ा पत्रकार अपनी वेबसाईट मे उसी प्रधान संपादक की कई तरह से चिरौरी करने लगा।
सारा कुछ तो उसकी नजरों के सामने हुआ है। माथा भिन्ना जाता है ऐसी कारगुजारियों को देखकर। क्या करे। इतने दिनों जिस क्षेत्र में उम्र खपा दी कि अब कहीं जा नहीं सकते। औरयहां के उसूल को कबूल नहीं सकते। वह सोचता आखिर अपनी नियति हम खुद ही तय करते हैं। जो दिखेगावही बिकेगा। यह टैग लाईन उसे अपने ऊपर फिट लगती। आखिर वह लाईन बदलने की सोचे तो किस आधार पर कोई उसे जगह देगा। जिन क्षेत्रों में वह दिख नहीं रहा, वहां किस तरह कोई नौकरी उसका इंतजार कर रही होगी! वह सिर्फ अखबारों में ही दिख रहा। और अखबारी दुनिया से तो रोजी-रोटी चलने से रही। इतने दिनों अखबार में चप्पलें घिसने के बाद वह किस मुंह से किसी और क्षेत्र में नौकरी के लिए प्रयास करे। वह किसी परिचित के पास इसके लिए जाना भी नहीं चाहता। अनुभव में सिफर होने के कारण दूसरे क्षेत्र मे नए सिरे से शुरू करने की नौबत होगी सो अलग। जो दिखेगावही बिकेगाके जवाब में भले वह तर्क दे देता कि जो बिकेगा वह नहीं टिकेगा पर वह जानता है कि यह सिर्फ कहने की बात है। एक लेखक-कवि भले मान ले कि वह जो लिखता है और अखबार-पत्रिकाओं में छपता हैवह रचना हैसर्जना हैउत्पाद नहींमाल नहीं। लेकिन किस लेखक-कवि के पास इसका जवाब है कि जब अखबार प्रोडक्ट हो गया तो उसमें छपनेवाली चीजें कैसे माल नहीं होंगी। और माल नहीं होंगीतो लीजिए आपकी चीजें बिकेंगी नहीं। किताब छपाइए तो पैसे लगेंगे ही। चाहे प्रकाशक बयां’ ही क्यों न हो। आखिर रूपलाल बेदिया की कहानियों का संकलन छापने के लिए बया ने पैसे मांगे ही तो। यहां तक कि लेखक संगठनों के कार्यक्रमों मे उनके राष्ट्रीय पदाधिकारी तक को लिफाफा चाहिए था। उसने तो अपनी आंखों से यह सब देखा है। यह कौन सी प्रतिबद्धता और बाजारवाद का संकट है यह, उसके भेजे मे कभी नहीं आय़ा। बाजार में टिकना हैरहना है तो उसकी लड़ाइयों के बीच रहनी होगी। और उसीके हिसाब से रणनीति बनानी होगी। यह मानता है यह।

एक बार इसी तरह स्टेशन पर रात में सिन्हा जी और सुमन जी में मीडिया में वर्गीय चेतना को लेकर बात शुरू हुई थी। धीरे-धीरे यह बहस का रूप लेता गया और वहां उपस्थित पत्रकार उसके सहभागियों में शामिल होते गए। सुमन जी का कहना था  बाजार है अवसर को भुनाने का नाम। बाजार है निष्ठाप्रतिबद्धता को माल बनाने का नाम। कोई मानव संसाधन जबतक अपनी माकेर्टिंग की संभावना नहीं दिखा दे तब तक उसे कहीं ठिकाना नहीं मिलता।
इस पर सिन्हा जी कहते  मान लिया कि आपकी ही बात ठीक है। पर इससे कोई वर्गीय चेतना तो पैदा नहीं होती।
सुमन जी कहते  ऐसा इसलिए है ना सिन्हा जी कि उत्पादन के औजार में हम-आप जैसे कलमघिस्सू पत्रकार से लेकर मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव और मशीनमैन तक शामिल हैं। मशीनमैन की सैलरी हमसे-आपसे चौगुनी है। तो वे लोग कहां से हमारी जमात में अपने को मानेंगे। ऐसे में कहां से विकसित हो पाएगी कोई वर्गीय चेतना ?’ 
सिन्हा जी  बाजार में अपने स्पेस को लोकेट किए बिना आप कहीं नहीं रह सकते। अखबार अपने ढंग से पत्रकार के कौशल को खरीदता है और पत्रकार अपने कौशल से उस अवसर को खरीदता है। दोनों समझते हैं कि हमने उसे उल्लू बना दिया। हां, पूरी की पूरी खेप इसी दुनिया में रहती है। एक दूसरे को उल्लू ही तो बनाते रहते हैं। खरीद-बिक्री के इस रिश्ते में खुद को रखे बगैर कोई एक कदम नहीं चल सकता।

सिन्हा जी जब यह कह रहे थे तो कहीं न कहीं इसके पीछे एक पीड़ा थी - सालों-साल अपने उस पुराने पहलेवाले अखबार से जुड़े रहने की कोई कीमत नहीं मिली। बसदुर्गापूजा आते ही दस फीसदी बोनस और बढ़ोतरी। लेकिन तब तक जिम्मेवारियां आसमान छू जातीं। भले अभी उसका वेतन बीस हजार हो गयापर वे दिन उसे नहीं भूलते। यह भी तब हुआ जब उसने तीन अखबार बदले। दुर्गापूजा को डेढ़-दो माह भर रहते तभी से आफिस जाने पर डेस्क पर अखबार की फाईलें खुली मिलतीं। जगह-जगह दाग लगाए रहते। चिह्नित जगह गोले मे घिरी रहती। मतलब साफ होता कि इतनी सारी गड़बड़ियां हैं तो अखबार मे जगह का दुरुपयोग है यह। ले-आउट मे भी खामियों पर दाग लगे होते। खाली जगहहेडिंग के फांट,टीसी-डीसीसिंगलया फिर पेज का विभाजन। आफिस का माहौल जैसे भारी-भारी होता। सभी सर झुकाए अपनी-अपनी फाईल में आंखें गड़ाए रहते या कोई योजना पकती रहती उनमें,कहना मुश्किल। इतनी खामियों के होते किस मुंह से वेतन बढ़ोतरी की मांग होगीएक बार तो खीस मे बोनस और अपेक्षित बढ़ोतरी न होने पर विरोध जताने के लिए लोगों ने न तो वेतन लिए और न ही बोनस। दो माह हो गयेपर सेठ की तंद्रा नहीं टूटी। फिर लोगों को लगावह खीस किस काम की जो शत्रुवर्ग को मुफीद पड़ जाए। और घर का तगादा था सो अलग। नामुरादलोगों ने सेठ द्वारा स्वीकृत बोनस और वेतन लेकर अध्याय का पटाक्षेप कर दिया। एक बार भी सेठ की ओर से मान-मनौव्वल जैसी कोई बात नहीं।
वाम मिजाज के सुमन जी कहते  सरकारी महकमों में ही तो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का पालन नहीं हो पा रहा। किसी विभाग का हवाला देते हुए कहते  गत तीस सालों से वेतन संशोधन नहीं हुआ।
सिन्हा जी कहते  दूर क्यों जाएं। क्या आपके अखबार में ही इसका पालन हो रहा है। आपको मिलता है तीन-चार हजार के बीच और एक राजमिस्त्री 180 रुपए रोजाना पर काम करता है। यानी छह हजार के आसपास ठहरा उसका वेतन।
सुमन जी  हां भई, तो इसमें क्या अचरज। हम जो रोज मानवाधिकार, बाल अधिकार व श्रम कानून की वकालत करते हैं, क्या आप नहीं जानते कि इस मुल्क में श्रम कानून की सर्वाधिक धज्जी प्रेस में ही उड़ती है। पर इस पर हम आप...
सिन्हा जी  सुमन जी भले आपकी छुट्टी नौ बजे हो जाती है, पर पिछले रविवार को जब मार्केट कंप्लेक्स में आग लगी थी, तो आपको ट्रेन नहीं छोड़नी पड़ी क्या ? फोटोग्राफर को साथ लेकर आपको जाना पड़ा था ना। याद है कि नहीं ?’
सुमन जी  शोषण की किस हद पर हम काम कर रहे हैं। लेकिन कोई चूं भी तो नहीं कर सकता है। अनुबंध पत्र में खुद ही तो हमने हस्ताक्षर किए हैं। आपने पढ़ा भी था, क्या लिखा था उनमें - पत्रकारिता आपका मुख्य पेशा नहीं। आपने स्वेच्छया मानदेय के रूप में इस रकम को लेना मंजूर किया। लेकिन सच क्या है चौबीस घंटे हाजिर रहें। आप दस बजे दिन से दस बजे रात तक अखबार की सेवा में तो रहें ही। घर जाने पर किसी अपराध या हादसा की स्थिति में फोटोग्राफर के साथ घटनास्थल पर जाने के लिए तैयार रहना पड़ता।
सुमन जी  वहीं मैं कह रहा हूं कि आप तो अपनी ही कलम से बंधे हुए हैं। शारीरिक श्रम करनेवाले तो शरीर से सताए जाते हैं, पैसे से शोषित किए जाते हैं। लेकिन पढ़े-लिखे, प्रबुद्ध तो अपनी बेडि़यां खुद ही तैयार करते हैं। ये बेड़ियां दूसरों को नहीं दीखतीं। मजदूरों की तुलना में प्रबु्द्ध को गुलाम बनाना हितकर और आसान है। एक बार वह गुलाम बन गया तो फिर देखिए वह गुलामों की फौज खड़ी कर देगा।
सो तो है  सिन्हा जी ने कहा  जर्मन कथाकार काफ्का ने कभी कहा था It is often safer to be in chains than to be free’ यानी सुरक्षित रहने के लिए स्वतंत्रता से बेहतर गुलामी है। अब आप ही देखिए, किसी जेल में पड़े कैदी की सेहत की निगरानी जितनी की जाती है, वैसा सामान्य अवस्था में नागरिकों को नसीब है क्या ? तो संतोष इस बात का करें कि यहां इतना तो है कि जितना हमें मिलता है उतने के लिए हम निश्चिंत हैं। इसी शहर में कई ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें हमसे अधिक खटने पर भी इसका आधा नसीब नहीं होता। कह सकते हैं कि उनके पास कायदे का रोजगार नहीं।
सुमन जी  लेकिन जानते हैं सिन्हा जी, ये ही सारी बातें हमको-आपको मारने के लिए औजार का काम करती हैं। और हम अपने लिए, अपने लोगों या अपने जैसे लोगों के लिए कुछ नहीं सोचते, कुछ नहीं कर पाते। संगठन तो हमारा रहा नहीं। श्रमजीवी पत्रकार संघ है या शर्मजीवी पत्रकार संघ, पता नहीं चलता। हम अपनी शर्म को, हया को बेचकर रोजी-रोटी कमा रहे हैं तो हुए न शर्मजीवी। एक बार लेनिन ने क्रुप्सकाया से कहा था कि "If one cannot work for the Party any longer, one must be able to look truth in the face and die like the Lafargues." यानी जीवन की सार्थकता आपके पार्टी सरोकारों से तय होती है। और ऐसा नहीं होने पर लाफार्ज की तरह मौत को गले लगा लेना चाहिए। हम-आप अपने लोगों या संगठन के काम लायक नहीं बचे, इसलिए हम अपने को टुकड़े-टुकड़े में मार रहे हैं। लाफार्ज ने तो खुदकुशी की थी, हम टुकड़ों में यहां-वहां क्या कर रहे हैं? यह ऐसे हो रहा है कि इस पर कोई चिल्ल पों भी नहीं मचा सकता।
अब सिन्हा जी अकबका गए, सोचे क्या जरूरत थी यहां लाफार्ज-मार्क्स की फिर वामपंथियों की कमजोरी समझ में आ गई कि वे इसी तरह अपनी स्टडीरूम और आंकड़ेबाजी का रौब गांठते हैं। कम पढ़े लिखों के बीच हवाला देकर यह काम करते हैं वे। सिन्हा जी  अब लगे आप मार्क्स-लेनिन कोंचने। इस प्रसंग में आप कहां से मार्क्स को घुसेड़ रहे हैं। मैं तो नहीं जानता इस लाफार्ज को। कितने लोग जानते होंगे कि पाल लाफार्ज नाम का यह शख्स मार्क्स का दामाद था और राईट टु बी लेजी का विख्यात सिद्धांतकार। मार्क्स की बेटी लौरा और इस लाफार्ज ने एक साथ खुदकुशी की थी। सुमन जी इस मार्क्स की कौन सी शिक्षा थी और कौन सा पारिवारिक संस्कार कि उसकी दूसरी पुत्री इलीनौर मार्क्स ने भी खुदकुशी कर ली थी! मैं तो यही जानता हूं कि लोग सीमेंट का एक ब्रांड ही समझते हैं लाफार्ज को।
सुमन जी  अरे आप तो लगता है छुपा रुश्तम हैं। बात तो करते हैं पोंगापंथी समाजवादियों की तरह, पर मार्क्सवाद की जानकारी तो कहीं से भी कम नहीं।
सिन्हा जी  अरे सुमन जी, आप वामपंथियों की सबसे मुश्किल तो यही है कि छोटी सी बहस को भी जीवंत नहीं रहने देते। सिद्धांत-विचारधारा, आंकड़ा-सूचना का कोई फर्क नहीं रहने देते। अप्रासंगिक आंकड़ों व रेफरेंसेज से पहले तो बातचीत को तकनीकी करते हैं फिर सिद्धांतों की शब्दावलियों से माहौल को बोझिल करके विषय को उबाऊ बना देते हैं। सुमन जी जनता से उसकी संवेदना-समझ के धरातल पर जाकर मिलिए। आप लोगों ने जाति को स्वीकारा तो, पर उससे लड़ने की चेतना पैदा करने की जरूरत नहीं समझी। समाजवादियों की रौ में बहकर आप लोगों ने उसकी खामियों, हदों का कूड़ाघर बना दिया मुल्क को। बंटाढार कर दिया मुल्क का।
सिन्हा जी कड़ी को आगे बढ़ाते  सुमन जी वामपंथियों के घरों में मार्क्स कैसे चिह्नित किए जाते हैं यह जानकर आपको जमीन दिख जाएगी कि आपके कामरेड कौन सा माहौल बना रहे हैं। वैसे यह अलग बात है कि लाफार्ज ने जब देखा कि वह कुछ भी सार्थक नहीं कर रहा। और जीवन बोझ हो गया। तब जाकर दोनों ने जान दी। लेकिन फिर भी यह सवाल है कि मार्क्स ने भी अपने घर में कैसा माहौल दिया था ? कामरेड एके राय के बेहद करीबी एक ट्रेड यूनियनिस्ट हैं एनएन सिंह। और जाने दीजिए एनएन सिंह को। खुद एके राय के कामरेडों ने एमसीसी (मार्क्सिस्ट कोआर्डिनेशन कमेटी, मार्क्सवादी समन्वय समिति ) को कहां लाकर छोड़ा है। एके राय ने अपने मार्क्सवादी अहं के सामने इसकी चिंता नहीं की कि उनके बाद यह एमसीसी (मासस) कैसे चलेगी, कैसे आगे बढ़ेगी। हां तो मैं कहां कामरेड एके राय के एक पक्के अनुयायी एनएन सिंह की बात कर रहा था। उनके एक साले हैं डीबी सिंह, जो उन्हीं के घर के आसपास रहते हैं। किसी कोलियरी में एक स्कूल में प्राचार्य हैं। जानते हैं एक दिन उन्होंने एक वामपंथी छात्र की क्लास कैसे ली ? वह छात्र एमए कर रहा था। यही कोई 1993 की बात है। यानी दस साल साल पहले की बात है। डीबी जी ने कहा  ठीक है आप मार्क्स को पढ़ते हैं और हिंदी से एम ए कर रहे हैं। उनके कार्यक्रमों की जोरशोर से तैयारी करते हैं। जरा बताइए तो कार्ल मार्क्स का मतलब क्या है?‘ छात्र क्या कहता, बोला  यह सिर्फ एक व्यक्तिवाचक संज्ञा है, जिसका अर्थ से कोई लेना देना नहीं। अब डीबी जी मानें तब तो  ! मानने को तैयार ही नहीं। - इतने बड़े नेता हों और उनके नाम का हिंदी में कोई मतलब नहीं, ऐसा कैसे होगा !‘ छात्र ने समझाया मतलब तो जरूर होगा, पर उसे क्या मतलब हमारी बहस के परिप्रेक्ष्य से। इस पर डीबी जी जी ने कहा  तो सुनिए। हमेशा के लिए गांठ बांध लीजिए। अब संधि विच्छेद से या सामासिक विग्रह की व्युत्पत्ति से अर्थ निकालिए तो समझ जाएंगे। ऐसा थोड़े होता है कि महापुरुष हो गए और नाम का मतलब ही न हो। कार्ल मार्क्स का मतलब हुआ जो काल को मार्क करनेवाला हो। और कार्ल मार्क्स ने काल को चिह्नित करने का काम ही किया अपने सिद्धांतों और संघर्षों से। क्या आप यह नहीं मानते?‘
तो सुमन जी काली दिब्बी (मां काली की कसम) खानेवाले, बांह में जंतर बांधनेवाले वामपंथियों की यह जमात भारतीय समाज को जब डिकास्ट करने का काम न कर जातियों को उसकी बुराइयों और सीमा के साथ अपने अभियान में शामिल कर लेता है, उसे और प्रगाढ़ करता है तो आप क्या उम्मीद करेंगे इनसे ! यही न माहौल बनेगा ?’
लेकिन सिन्हा जी की यह बात कोई सुने तब तो। अब तो पूरा माहौल ठहाका मारते-मारते बेदम हुआ जा रहा था। और सुमन जी कह रहे थे  सब बकवास है। बकवास। आखिर एक झटके में आप भारतीय वामपंथ को किसी लतीफे से दरकिनार नहीं कर सकते। 
सिन्हा जी ने हामी भरते हुए एक बात कही  सुमन जी, आपकी बातों में दर्द है, पर चिंता नहीं। आप कहिए कि जर्मनी से इंग्लैंड आए मार्क्स को फ्रेडरिख एंगेल्स मिल जाता है, रूस जाने पर लेनिन मिल जाता है, क्यूबा जाने पर फीदेल कास्त्रो और चीन जाने पर माओ। और छोड़िए बगल में छोटे से नेपाल में मार्क्र्स की अगली कड़ी माओ को भले-बुरे पुष्पदहल कमल उर्फ प्रचंड मिल जाते हैं। क्या आप जैसे वामपंथियों के पास इसका जवाब है कि भारत में आने पर इस मार्क्स को कौन मिलता है? मार्क्सवाद ऐतिहासिक-सामाजिक स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में लागू करने से नतीजा देता है। भारत में ऐसा कहां हुआ?’
सुमन जी ने कहा  अब आप बहस पर उतर रहे हैं। इसके जवाब दिए जा सकते हैं, पर इसके लिए न तो यह उपयुक्त समय है और न ही ठीक जगह।
वामपंथी थोथी दलीलों से चिढ़े से सिन्हा जी कहते  नहीं सुमन जी, इस तरह पल्ला झाड़ने से काम नहीं चलेगा। पहले तो आपने ही मुद्दा उठाया, श्रम कानून और मानवाधिकार और न जाने क्या-क्या। मैं तो सिर्फ कान बना हुआ था। आप वामपंथी बने फिरते हैं, आप आईपीएफ के युवा दस्ते के एक सक्रिय साथी रहे हैं। लेकिन आप ही कहिए कि किस बड़ी वामपंथी पार्टी ने पत्रकारों को हक दिलाने के लिए उनके ट्रेड यूनियन से नाता जोड़ा या ट्रेड यूनियन बनाकर हमारी किसी लड़ाई को बल दे रहे हैं। किस संगठन ने जनसत्ता व नवभारत टाईम्स के संस्करणों और पत्रिकाओं की बंदी का विरोध जताया ? और जिन्होंने जताया भी तो हस्र क्या हुआ। जबकि सब के सब अखबारी क्रियाकलाप किसी न किसी एक्ट के दायरे में आता है। हां, यह अलग बात है कि इन एक्ट्स की मीडिया में कोई परवाह नहीं करता! ऐसा नहीं कि हम वामपंथियों का साथ नहीं दे रहे हैं। पूंजीपति घराने से निकलनेवाले अखबारों में आपको वाम विचार के ढेरों पत्रकार मिल जाएंगे और मीडिया में वाम सिंपेथाइजर ने तो उनके लिए बहुत बड़ा काम किया है वातावरण निर्माण का। हम बदला नहीं चाहते, पर क्या यह उनका धर्म नहीं होता था।
सुमन जी तपाक से छूटते ही कहते  नहीं सिन्हा जी ऐसे अतिवाद से काम नहीं चलेगा। पटना चले जाइए देखिए अरुण जी ने झंडा बुलंद किया हुआ है कि नहीं?’
लपकते ही सिन्हा जी ने मुंहतोड़ जवाब दिया  क्या कहते हैं आप! वह एक व्यक्ति का संघर्ष है। उनके साथ किसी वाम संगठन का बल नहीं। मैं वाम संगठन से उसके धर्म की बात और अपेक्षा कर रहा था। वैसे यह अलग बात है कि अरुण जी ऐसे गिने-चुने पत्रकारों में हैं जो आज भी माओवादी संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच विधिवत क्लास लेते हैं।

भरे बैठे प्रसाद जी को मौका मिल जाता है  और सुमन जी इस मुगालते में नहीं रहें कि हमारे-आपके माहौल बनाने से वामपंथी आकाओं का हित होता है। सीताराम येचुरी हों या हों प्रकाश करात या वर्द्धन, उन्हें जब इसकी जरूरत भी यदि पड़ गई तो वे आपके पास नहीं आकर आपके मालिक से सट लेंगे। उन्हें मालूम है कि झंडा ढोनेवाले नारा ही लगा सकते हैं, नारे लिख नहीं सकते। हो सकता है हम-आप जो उनके लिए वातावरण निर्माण का काम करते हैं, हम या आप इनमें से अपने फायदे के लिए रास्ते ही निकाल लें।दुनिया के मालिक एक हों के तर्ज पर वामपंथी आका और मीडिया मुगल सभी एक हैं। क्या आपको याद है कि रामदेव जी और वृंदा करात वाले मामले में चैनल का जितना और जैसा इस्तेमाल हुआ, वह हमारे-आपके जैसे लोग नहीं उपलब्ध करा सकते थे। और आप ये भी जानते हैं कि ये वो चैनल हैं जिनके दुलारे बड़े-बड़े घपले-घोटालों के रैकेट्स में कहीं न कहीं आते हैं। ये येचुरी और करात इस सच को भी जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि हमारे बस का रोग क्या है। सोचिए ना पत्रकारों के लिए बछावत और मणिसाना आयोग, मजीठिया आयोग के फैसले को लागू करवाने में इनमें से किसने मदद की?’
क्या कहिएगा प्रसाद जी  सैयद जी कहते  क्या आपने नहीं देखा किस तरह अखबार मालिकों ने इसपर अपना-अपना मरसिया अपने अखबारों में पढ़ा। वेतन बोर्ड की सिफारिश लागू होने से मालिकों का रोना था कि अखबार पर असह्य बोझ आ जाएगा। वेतनमानों को मान लें तो अखबार ही बैठ जाता। ड्राइवर को, चपरासी को इतना वेतन मिल जाए कि वह भी थोड़ा सीधा खड़ा हो सके, यह उन्हें कत्तई बर्दाश्त नहीं।

सुमन जी आपने बहुत भुका लिया। प्यास भी लगी है और चाय की तलब भी।‘ – सिन्हा जी कहते हैं।

सुमन जी बहादुर को हांक लगाते  बहादुर सर, थोड़ा मेरे सिन्हा साहब को पानी पिलाइए। और चाय पिला सकते हैं क्या ?’
स्प्राइट की बड़ी बड़ी दो बोतलों में पानी लेकर बहादुर हाजिर। कहता  सर पानी तो पिला देते हैं। पर चाय में देर होगा। अभी पी लीजिएगा तो फिर तो एक्के बार शामे में मिलेगा। लेकिन एक ठो बात है कि संपादक सर के आने का भी टैम हो रहा है।
सुमन जी कहते  अरे नहीं सर, आप तो हमनी के एकदम्मे बोक्का ही मानते हैं। आज एतवार है ना। थोड़ा देर से आएंगे।
बड़ी मेज पर पसरी हुई फाईलों को समेटते हुए बहादुर कहता  तब तो कोई बात नहीं। बस्स मिश्रा जी को आ जाने दीजिए। हम चाय ला देते हैं।
पानी पीते-पीते में तब तक मिश्रा जी भी आ गए और देखते-देखते चाय भी आ गई। प्याली में दो घूंट से अधिक चाय क्या चलती।
इस भरी दुपहरी में कहां से संपादक जी भी खरामां-खरामां धमक गए। ठक-ठक-ठक की आहट के साथ दाढ़ी भरे चेहरे में संपादक की रौबीली हाजिरी से जैसे वहां पूरा कर्फ्यू ही छा गया। इस स्थिति के लिए कोई तैयार नहीं था, जैसे अचानक धारा 144 का ऐलान हो गया हो। सबकी कलम किसी न किसी कागज पर चलने लग जाती है। संपादक पूछते  किस बात की संगोष्ठी हो रही थी?’
सभी कहते  नहीं सर-नहीं सर। एक स्टोरी को लेकर चर्चा हो रही थी। उसे फ्लैट रूप में पेश किया जाए या ह्यूमन एंगल दिया जाए। और एशियन एज में एक खबर छपी है झारखंड के सबसे बड़े किसी लोकप्रिय नेता के बारे में। वह सत्ता में है। कलकत्ते के किसी होटल में किसी औरत के साथ थे। लोगों के जाने पर वह पिछले दरवाजे से फरार हो गए। इसे रोचक बनाया जा सकता है।
समझता तो वह भी था कि जीवन इससे चलनेवाला नहींलेकिन  यह समझदारी किसी काम की नहीं थी। वह उस रास्ते पर चल नहीं सकता थाजहां रिलीज  से पैसे झड़ते और स्टोरी सेरुपए। एक्सक्लूसिव का मतलब अब वैसी खबर से था जिससे किसी विभाग या प्रतिष्ठान का कोई वित्तीय नुकसान न हो रहा हो। विभागों व अधिकारियों की उपलब्धियों का ढिंढोरा ही एक्सक्लूसिव रह गए थे। हां किसी एजेंडा के तहत जरूर कभी-कभी खबर नुमा खबर छपती रहती। वह जानता था कि उसके नीचे काम करनेवाले सोहन के घर में ऐशो आराम के सारे सामान कहां से बरस रहे  हे। पहले सिन्हा जी ने इस पर गौर नहीं किया था। जबसे बीवी ने झिड़की दी है तब से वह इस पर सोचने लगे। जिसे दो लाईन हिंदी  या अंग्रेजी लिखने नहीं आतीविधि संवाददाता बनकर तो वह किसी रईस से कम नहीं। कार से आता है प्रेस। बीवी के सामने भीगी बिल्ली बनकर कोई यूं ही नहीं रहता। मार्च आते-आते घर मे शीतयुद्ध का माहौल रहता था। घर में बच्चों को डीएवीडीपीएस टाईप के स्कूल मे भरती करने की बात उठती। इस पर वह सरकारी स्कूल में पढ़ाने की बात करते। क्वालिटी एजुकेशन की बात करके बहस मे यह साबित करने की कोशिश करते कि घर मे परवरिश कायदे की हो तो बच्चा मां-बाप के संघर्ष को करीब से देखकर ही बहुत कुछ सीख जाता है। मिसाल मे वे ठाकुर जी का नाम लेते। ननमैट्रिक ठाकुर जी को कोई इज्जतवाली नौकरी मिल नहीं सकती थी। ऐसे मे पंडिताई का सहज रास्ता निकल जाता। साधु के भेस में दूर-दूर का सफर करते। बेटिकट ट्रेन में लोगों से मांगते भी हिचक नहीं होती।  नई जगहों मे फिर हो जाते शुरू कथावाचक के रूप मे। पंडिताईन दूर-दूर के इलाकों में घरों मे दाई का काम करती। मोहल्ले में प्रचारित रहता कि अस्पताल में काम करने जाती है। सिर्फ जिद के बल पर थर्ड डिविजनर बेटे को इंजीनियर बनाकर ही माना। मंगनी का ट्यूशन जहां भी मिलता उसकी ताक मे रहते। प्रसाद जी के बड़े भाई कभी आईएसएम के प्रोफेसर से तो कभी बीआईटी सिंदरी या आरएसपी के प्रोफेसर डीएल दास से फ्री ट्यूशन ठीक कर देते। बेटा भी था कि दस-दस किमी, बीस-बीस किमी दूर साइकिल की सवारी करके ट्यूशन पढ़ने जाता। आज उसी पंडिज्जी का बेटा दिल्ली मेट्रो मे इंजीनियर बन गया। दूर-दूर के इलाकों में यह किस्सा लोगों की जुबान पर बस गया है। कहीं दूर नहींइसी बरमसिया की तो यह बात है। दास जी का भी तो दो-दो बेटा इसी तरह इंजीनियर बन गया। कहां डीएवी और राजकमल का मुंह इन लड़कों ने देखा। डीपीएस तो फिर भी बहुत दूर की बात है। लेकिन औरत तो ठहरी औरत ही। उसका दीमाग तो बस किलोमीटर दो किलोमीटर से आगे जाता नहीं। घर मे चख-चख मची रहती। बेटा जब स्कूल को तैयार होकर निकलता तो सिन्हाजी सोये रहते और दफ्तर से दो-तीन बजे रात जब घर लौटते तो बेटा सोया रहता। महीना – महीना हो जाता दोनों को भेंट हुए। लेकिन बीवी तो चौबीसों घंटे तैयार मिलती। रात तीन बजे हो या एक बजे। घर जब भी पहुंचते खाना गरम करके खिलाने को जगी बैठी मिलती। हर आहट पर आंख खुल जाती। लगता कि अब आएअब आए। सोफा पर बैठे-बैठे आधी रात कट जाती और फिर शेष रात बहस मे। इतने मे तो फिर सुबह हो जाती। बच्चों को तैयार करने का वक्त आ जाता। आखिर ऐसी बीवी का हक तो बनता ही है सपना देखने का। बच्चों को बनाने के लिए उन्हें वक्त देने का हक तथा एक अच्छा स्कूल देने के नाम पर बहस करने का हक। इसी चक्कर मे कभी-कभी महीनों तक दोनों की बातचीत बंद हो जाती।

साथियों के बीच बहुत मशहूर डायलाग था – journalist lives like god & dies like a dog. मस्ती करते हैं फाईव स्टार होटलों मे और मरते हैं फुटपाथ पर। आखिर उमेश श्रीवास्तवमदनसागर को मौत इसी रास्ते ने अपना निवाला बनाया। छह माह से पैसे के बिना चल रहे पत्रकार उमेश श्रीवास्तव की शिकस्ती को कौन नहीं जानता। जवान बेटी घर मे शादी के लिए थी। वेतन का नामो निशान नहीं था। मौत हुई तो पता चला कि भूख से मर गए। मदन सागर को इसी शराब की लत ने कहीं का नहीं छोड़ा। पहले तो होनहार शायरी अंधेरी गुफा मे गईफिर गुमनाम मौत हुई। और अभी क्या हो रहा है। सच में शायद ही कोई रात हो जब सिन्हा जी को शराब नसीब न होती हो। हर दो-तीन दिन पर शानदार होटल मे प्रेस कांफ्रेंस। तोशानदार पार्टी तो ऐसे ही मिल जाती। एक दिन तो क्या हुआ कि उसी विचारवर्द्धन के पीछे  पीछे एक हाथ में बोतल और दूसरे हाथ में लिट्टी, चोखा प्याज। शहर की हृदयस्थली में चौक पर रात के दो बजे घुप्प अंधकार में जो बाईक की रोशनी पड़ी तो सिन्हा जी का निस्तेज चेहरा चमक उठा। चौंधियाती रौशनी से आंख बचाने की कोशिश थी या झेंप, पर वे इधर-उधर कन्नी काटने लगे थे। ये सब तो तब था जब कि वह डेस्क पर थे। वसूली संस्कृति के पत्रकारों को तो किसी बात की कमी नहीं होती। लेकिन इस सबसे बाहर कीदुनिया मे एक बेहतर संबोधन मिल जाता- पत्रकार जी और बहुत हुआ तो रिपोर्टर साहब। पर जैसे ही चलते-चलते मनईटांड़ पहुंचतेपथराकुल्ही, बरमसिया, गोविंदपुर  पहुंचतेलोगों को यह समझाना बड़ा मुश्किल होता कि रात में प्रेस में छपाई के सिवा और कौन सा काम होता है। लोग यही मानते कि प्रेस बाबू छपाई का काम करते हैं यानी मशीन का काम करते हैं।  

और बीवी के पास अपनी जरूरत और इच्छा का तराजू रहता तौलने के लिए। दिन के भागमभाग और रात्रि जागरण के बाद नसों मे कितनी ताकत होती बेड टाईम के लिए! पीठ करके सोने के सिवा कोई चारा न बचता। एक ऐसा परास्त पति अपने को बेहतर पिता की विफल भूमिका मे पाकर और भी ग्लानि मे डूबा रहतापर करता क्या! सिन्हा जी सोचते - बगैर थोड़ा-थोड़ा कमीनापन बचाए कोई खुशहाल नहीं हो सकता यहां। सिन्हा जी को लगने लगा है कि हमारी खुशहाली का पैमाना हमारे कमीनेपन से तय होती है। वे खुद को गिराने के लिए जैसे तैयार कर रहे हों और धिक्कराते हुए कह रहे हों  बंदा, आखिर कितनी मिसाल दें सुखी जीवन की। इसी के साथ वह ये भी मानते हैं कि मैं जहां तक देखता हूं वहीं तक दुनिया सिमटी नहीं। सवाल है कि इस सिमटी दूरी में ही मैं क्या-क्या देख पाता हूं। कम से कम इतनी तो कमीनगी चाहिए ही कि आप सवालों से घिरें नहीं। आपका जमीर सवालनहीं पैदा करें। व्यवस्था के घाट  मे फिट बैठेंगे तो आपका भी कल्याण होगा और संस्था का भी हित होगा। वे सोचते कि - काश वे भी धड़ल्ले से वह सब कुछ कर पाते जो आज के छिछोरे करते हैं। कम से कम जिन चार जीवों की जिंदगी मेरे ऊपर हैवे तो नहीं कोसेंगे। उनकी इच्छा-आकांक्षासपने मेरे संघर्ष और मेरे नजरिया से तय नहीं हो रहे हैं। उनके साथी,पड़ोस जिनके बीच 24 घंटं उन्हें (परिवार को) रहना पड़ता हैआखिर उनसे हटकर-लड़कर वे कैसे मेरी दुनिया की नागरिकता ले सकते हैं। इसके जवाब तो सिन्हा जी के पास भी नहीं।

करीब 1991-92 की बात होगी जब देश मे ढांचागत पुनर्रचना  और मुद्रा के अवमूल्यन की बात  खूब सुनाई पड़ती थी।  ठीक इसके पहले रूस से दुनिया भर में ग्लासनोस्त और प्रेस्त्रोइका  कीखूब धूम मची थी। उस दौर मे भी जीना इतना दुभर नहीं था। तब तीन हजार में  जैसा जीवन संभव थाअब तो वह बीस हजार मे भी नसीब नहीं।  अब तो ढांचागत पुनर्रचना ही नहीं,मुल्क की सेहत में सुधार के लिए बड़े पैमाने पर निजीकरण की आंधी चली। निजीकरण के मसले पर यूपीए का विरोध करनेवाली भाजपा जब एनडीए के साथ सरकार में आई तो उसने विनिवेश का मंत्रालय ही बना डाला अरुण शौरी की अगुआई मे। इसी सैयद जी का कहना है कि टू-जी स्पेक्ट्रम की तुलना में कई खरीद-फरोख्त के मामले मिल जाएगेजब विनिवेश के खेल की पड़ताल होगी। आखिर इस्पात व रसायन मंत्रालय में रहते देश भर में रामविलास पासवान की सैर में बंद पड़े खाद कारखानों के खोले जाने के बड़े-बड़े विज्ञापन का कोई तो मतलब होगा। सभी ब्यूरो-माडमों में कभी-कभी तो सेल के स्वास्थ्य शिविर की खबर को लेकर प्रेस चौकस रहता। खबरों के साथ कभी-कभी बड़े-बड़े महंगे विज्ञापन भी होते।आखिर करोड़ों क्यों बहाए गए विज्ञापन परदौरों पर। क्या रामविलास पासवान को यह पता नहीं था कि जर्जर बंद पड़े इन खाद कारखानों को खोलना अब मुमकिन नहीं। लेकिन सैयद जी जब यह बात करते तो उनके पास कोई नहीं होता यह बकवास सुनने को। वे कहते जनता चुतिया और कमीना नहींजितना समझा जाता है।   जिस टू जी को लेकर इतना बवाल मचा है, उसकी सूत्रधार नीरा राडिया के तार जिन पत्रकारों से जुड़े थे, सब के सब नाम बाहर आ चुके हैं। किस चैनल और अखबार ने उन पत्रकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई की ?और मुझे विज्ञापन के हिसाब में गड़बड़ी के नाम पर बिठा दिया गया। क्या गड़बड़ी, कोई बतानेवाला नहीं ! नेताओं का भंडाफोड़ करनेवाले अखबार अपने उन भाई-पत्रकारों के खिलाफ कहां कोई कार्रवाई कर रहे हैं जिनके नाम पर खेल संघों से लेकर न जाने कितने घोटालों में शिरकत के आरोप जगजाहिर हो चुके हैं।

जले-भुने सैयद कहते हैं - प्रेस से कोई दस किमी की दूरी पर ही तो है बनियाहीर। संपादक वहां की खबर बनाते और डेटलाईन में लिखते हैं- बनियाहीर से लौटकर। जैसे लंदन से लौटकर या दिल्ली-मुंबई से लौटकर रिपोर्टिंग कर रहे हों ! यह सुनकर एक बार प्रसाद जी ने कहा था  सैयद जी बास की इच्छा और जरूरत ही अखबार के नियम हैं। अब इस पर बहस का कोई तुक नहीं। इन कमीनेपन में जब आप दीक्षित हो जाएं तो यही होगा आपका प्रोफेशनलिज्म।

सिन्हा जी तब झुंझला जाते जब घोर बाजारवादी दौर में पत्रकारों को चरित्र की सीख दी जाती। पत्रकारों को प्रोफेशनलिज्म का पाठ दिया जाता। जब-तब अखबार के गड़बड़झालों का मडगार्ड बनाया जाता। दूसरी ओर उनके लिए आचार संहिता तक बना दी गई थी। तरह-तरह के लगाम लगा दिए गए थे। जैसे किसी अखबार में नियम होता कि जब तक सारे संस्करण छूट नहीं जाएं डेस्क से लेकर फील्ड के रिपोर्टर तक दफ्तर से बाहर नहीं सकता। एक अखबार ने बंदिश लगा रखी थी कि किसी प्रेस कांफ्रेंस में कोई पत्रकार किसी उपहार को हाथ नहीं लगा सकता है। इसपर एक दिन स्टेशन पर मुंहफट सुमन जी ने कहा - सोचिए सिन्हा जी, बाप के लिए बिड़ी सुलगाकर लाते-लाते एक बार तो बच्चा जरूर धूक लगाएगा। दारू की बोतल लाते-लाते कभी तो उसमें पानी मिलाएगा। क्या फिर आगे जाकर छोटे पैमाने पर ही सही, वह अपने लिए भी यही कुछ नहीं करेगा ? इसकी क्या गारंटी ?

अब लगा सुमन जी का प्रवचन अविचल झड़ने - अब जब कारपोरेट घराना अपने मकसद के लिए मशीनरी के हाथों पत्रकार को एक टूल की तरह इस्तेमाल करेगा तो इसकी गारंटी मानिए कि वह सिर्फ और सिर्फ उसीका टूल नहीं बना रह जाएगा, वह अपनी भी सोचेगा, अपना भी साधेगा। वह मशीन नहीं कि आप जितना और जैसा काम लेना चाहें, उतने काम के बाद उसे ठप कर दें। सिन्हा जी, आपने ठीक मिसाल दी थी उस दिन। बाप के लिए बीड़ी-ताड़ी-दारू लानेवाला बेटा सिर्फ छिपकर बीड़ी का एक सूंट लगाकर रह जाए ऐसा कैसे होगा। कभी तो वह भी चखेगा। लत लगेगी और फिर दारू में मिलावट और फिर खरीद में उलटफेर करके वह भी अपने पीने का जुगाड़ कर तो लेगा ही। क्या टू जी स्पेक्ट्रम के घोटाले से संबंधित आलोक तोमर का मेल आपको नहीं आया था। सुना तो था कि उन्होंने अपनी वह रिपोर्ट कइयों को मेल की थी। उसमें एकदम साफ-साफ कहा गया है कि कैसे-कैसे मीडिया के सरताजों ने भ्रष्टाचार को पनाह दी। ए राजा को संचार मंत्री बनाने के वास्ते बिजनेस घरानों के लिए लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया की दलाली करनेवाले दिग्गज और पूज्य पत्रकारों के नाम जिस तरह सामने आए, वह इसी की फलश्रुति है। और जो बिका हुआ हो, उसे खरीदनेवाला कोई नहीं होता। आज पत्रकारों का कद गिरता जा रहा है तो उसमें छुटभैये पत्रकारों का जो भी हाथ हो, बड़े और नामी-गिरामी लोगों ने गिरावट को जिस तरह इंस्टीच्यूशनलाइज कर दिया, वही उन्हें अंततः गिरा रहा है।
प्रसाद जी जैसे अपनी थकान मिटाते हुए कहने लगे - हम जानते हैं कि भ्रष्टाचार की शक्ल पिरामिड की होती है। ऊपर की एक बुंद नीचे कितनी बुंदों में तब्दिल हो जाएगी तय नहीं। और इसके लिए पत्रकारीय पेशे में तरह-तरह के सुधार के नाम पर विचारशून्य करके उन्हें बांधने की कोशिश हो रही है। पत्रकार की आलोचकीय धार व मेधा को कुंद करके सारा काम किया जा रहा है। यही कारण है कि जिस बाजारवाद के खिलाफ मीडिया को मोर्चा संभालना चाहिए था, वह उसका चारण-भाट बना फिर रहा है। सड़कछाप कालगर्ल हो गया है यह। भाटों की खुली स्पर्द्धा में वह नंबर एक के लिए भिड़ा हुआ है। कारपोरेट संस्कृति ने अपने प्रोफेशनलिज्म की जबान में इसे टेकनिकल स्किल का नाम दे रखा है। एलपीजी (उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण) के द्वार से जो सामाजिक अनुदारता प्रवेश कर गई, मीडिया घरानों ने भी उसे कम प्रश्रय नहीं दिया है। श्रमिक अधिकार और सूचनाधिकार के लिए भोंपू लगाकर चीखनेवाले अखबारों में ही श्रम कानूनों का सर्वाधिक उल्लंघन हो रहा है। अखबारों को निजी जागीर बनाने के लिए तानाशाही का ढांचा खड़ा किया जा रहा है। सूचनाओं की गोपनीयता भी वहीं बरती जा रही है। किस मकसद से किसी मसले को लेकर अखबार आक्रामक तेवर अपना रहा है और किस मकसद से अभियान की टें बोल जाती है, पत्रकार को इन वजहों (स्पष्टीकरण) से दूर ही रखा जाता है। मुंह की खाता है पत्रकार तो खाए, उसकी मिट्टी पलीद होती है तो हो। खबरों के बाजार में न तो संपादक या मालिक को कसरत करने पड़ते हैं। इसलिए मजे से स्विच आन-आफ करते रहते हैं ये बंदे।
लगता है कि सिन्हा जी अपना भड़ास मिटाने के लिए फुलझड़ी की तरह कुछ छोड़ देते हैं - एक चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, खिलाड़ी आदि अपने पेशे के धुंरधर हों यह तो अपेक्षा होती ही है और वाजिब भी है, पर उनके अपने सामाजिक दायित्व हैं इसे वे नहीं भूलते। जब तक यह होता है, तब तक तो वह क्षेत्र अपनी मर्यादा निभा लेता है। ऐसा इसलिए कि मनुष्य बेसिकली एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन कोई बताए कि आज मीडिया का कोई सामाजिक दायित्व रह गया क्या? वैसे ही राजनीति भी सामाजिक दायित्व से कट गई है। किन सामाजिक अपेक्षाओं  जिम्मेवारियों से मीडिया को बंधा होना चाहिए और आज जिस किसी भी स्थिति में वह पहुंचा है (या उसके सेवक पहुंचे हैं) वह किन अपेक्षाओं और जिम्मेवारियों को पूरा करते हुए। और यह सब करते हुए इस क्रम में उनके यहां काम करनेवाले धुरंधर पत्रकारों के ईश्वरों ने कितने बनाए यह जानना भी बेहद जरूरी है।
सुमन जी कड़ी को आगे बढ़ाते - आखिर जब आप इस समाज से कुछ लेते हैं तो समाज को क्या दे रहे हैं और जो दे रहे हैं, क्या वही समाज का प्राप्य भी है। यह जानना भी जरूरी है पब्लिक के लिए। यह सब तब तक नहीं जाना जा सकता जब तक कि मीडिया का सोशल आडिट नहीं हो। सवाल यह हो सकता है कि व्यवस्था उसे देती क्या है, जो सोशल आडिट की बात हो। तो व्यवस्था न दे, पर समाज उससे कहीं अधिक दे रहा है। और व्यवस्था कैसे नहीं दे रही है आखिर मंदी के दौर की रियायत इसी व्यवस्था ने दी थी। और जो भी वह पा रहा है वह इस तंत्र से सहूलियत पाने के ही कारण है न। यदि मीडिया का सोशल आडिट नहीं होता है तो छुट्टा सांढ़ हो जाएगा यह। आज वह पत्रकारीय मानक को तोड़ रहा है, भाषा को गंदी कर रहा है। आगे जाकर स्लैंग जबान में अखबार निकालने की बात करेगा। कल को वह नए सांस्कृतिक संकट खड़े करेगा। बच्चों, बहु बेटियों को अखबार से दूर रखने की नौबत आ जाए तो क्या अचरज!


इस पर सिन्हा जी हाल का एक वाकया सुनाने लगे  आप भी तो गए थे उस सांस्कृतिक कार्यक्रम में। परसों ही तो हुआ था। अब आप ही बताइए कि उस सांस्कृतिक कार्यक्रम में शहर भर को आतंकित रखनेवाला वह नेता भी तो पहुंचे थे। आपसे क्या छिपा है, नेता न तो मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि थे। कंपनी के अधिकारियों को ही मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि बनाया गया था। आमंत्रित अतिथि में एक पत्रकार और दूसरे नंबर पर थे ये नेता। क्या उस कार्यक्रम के कवरेज की हेडिंग आपने देखी थी शहर के नंबर वन अखबार में हेडिंग लगी थी नेता के बयान से  युवा पीढ़ी भूलने लगी अब आचार। जबकि उनका बयान समाचार में तीन पैरा बाद था। तो यह हाल है शहर के नंबर वन अखबार का। ये ऐसे कारपोरेट घराने के अखबार हैं जो समाचारों के चलन तय करते हैं। आखिर किस नियम या चलन से या कारपोरेट मजबूरी से यह हेडिंग लगाई गई, कौन पूछेगा ! अब तो अखबार उनकी निजी जायदाद है। यह कोई भंड़ुआ नाच या जागरण नहीं था, मुशायरा था या लाफ्टर शो भी नहीं कि जहां से चाहो वहीं से हेडिंग उठा ली।
प्रसाद जी ने कहा - विचित्र तो यह कि उसी खबर के बगल में उसी नेता के भाई की कुर्की जब्ती से संबंधित खबर भी छापी गई थी। संपादक किसी का गरिमामंडन कर रहे थे या अपने को अशक्त? खुद उन्हें नहीं पता। जबकि आप जानते हैं कि संपादक जी समाजवादी पृष्ठभूमि से आते हैं।

प्रसाद जी ने एक विद्यालय संचालक शकर सर की दबंगई का राज खोलते हुए कहा- जानते हैं शंकर सर को इतना बड़ा छोकड़ीबाज बनाने में इन्हीं संपादक जी का हाथ है ! आपमें से बहुत कम लोग जानते हैं कि संपादक जी और शंकर सर लंगोटिया यार रह चुके हैं। सभी अवाक्। इतने दिनों यहां की पत्रकारिता में माथा खपा दी, पर राजधानी में बैठे संपादक जी के साथ यहां के शंकर सर के इस रिश्ते को कोई नहीं जान सका। प्रसाद जी ने कहा, यह तो शंकर सर की साफगोई है कि उन्होंने यह सारा प्रकरण खुद मुझसे सुनाया है।लड़कियों को बतौर स्टाफ टापने का यह नशा उसे अपने इसी संपादक साथी के पास उठने-बैठने से लगा। उन दिनों वह संपादक राजधानी स्थित मुख्यालय में बतौर कार्यकारी संपादक तैनात थे। एक दिन शंकर सर उनके कक्ष में थे, तभी की यह बात है। दोनों चाय पी रहे थे। जवानी के दिनों की याद से छेड़खानी चल रही थी। सन 74 के मजाकिया साल भी उसमें शामिल थे। एक पत्रकार जिसका चयन वह टाल नहीं पा रहे थे, उसे सामने बैठाकर फोन पर इधर  उधर की बात कर रहे थे। संकेत यह था कि चयन उसका भले हुआ हो तो हुआ हो, पर फाईनल करना तो उसे ही है। सो वह जब चाहेंगे तभी चयन होगा। प्रधान संपादक के एकदम चहेते थे वह। सो उस दिन उसे किसी और तारीख को आने की बात कहकर विदा कर दी। अब शंकर सर के सामने लगे वह अपने तामझाम के झिलमिल परदे उठाने  क्या कहें यार। साली एक मालदार लड़की है। काफी अमीर घर की है। उसमें मैंने पत्रकारिता की ललक तो पैदा कर दी है, पर साली ज्वाइन ही नहीं कर रही। तुम भी स्साले उसे देखते ही सनसना जाओगे। दाना ही नहीं डाल रही। तभी किसी फोन पर उसने इधर-उधर की बात की  वो जो सर्वे आया है ना, उसपर केंद्रित करते हुए संडे सप्लीमेंट की मेन स्टोरी करवाओ। और प्रिंट में जाने से पहले एक बार खुद ही ले आऊट जरूर देख लेना। और सुन, अरे उस लड़किया को पटाओ ना। नहीं ज्वाइन करती है तो ना करे। उसे बस्स एक बार मुलाकात करने तो भेज ही सकते हो। थोड़ा इसमें जोर-शोर से लगना।... शंकर सर हक्का-बक्का ! प्रांत के सबसे प्रमुख अखबार के मुख्य संस्करण के आलीशान दफ्तर में यह बात हो रही थी। उसे अपने कानों पर जैसे भरोसा ही नहीं हो रहा था। एक आंदोलनकारी अखबार के रूप में देश भर में इसकी ख्याति थी। यहीं से वह निडर होने लगे। जैसे लगा कि साथी ने कहा  जा स्साले, जो इच्छा हो कायदे से करो। मैं हूं ना।  प्रसाद जी कहते  पता है आज भी राजधानी से कोई भी धुऱंधर और लिक्खाड़ पत्रकार यहां आ जाए तो अपने इस आदर्श सपादक गुरु से मिलना नहीं भूलता। उस अखबार के वह एकमात्र कार्यकारी संपादक हुए। दूसरे अखबार में उनके जाने के साथ पद भी खत्म। दूसरा तो उस लायक फिर मिला ही नहीं। यह वही संपादक जी हैं जो रहे कहीं भी पर उनकी आत्मा का एक हिस्सा यहीं चक्कर काटता रहा। जिस किसी भी राजधानी में रहे दीपक, प्रदीप जैसे डीलरों-कोयला व्यापारियों के दलाल पत्रकारों से यहां का हाल-चाल लेते रहते।

सिन्हा जी कहते - पत्रकारों से शुचिता की अपेक्षा करने से पहले अखबार के संपादकों को एक लकीर खीचनी होगी। क्या आप नहीं जानते कि एक संपादक के दिन भर का वास तो बाकायदा एक कर्मचारी के रनिवास में था। एक बार दोपहर की मीटिंग से संपादक जी नदारद थे। वहां से निकल कर साथीगण उस पत्रकार के यहां गए तो रनिवास से संपादक महोदय की हंसी-ठिठोली सुनाई पड़ी और वह पत्रकार महोदय घर में नहीं थे। कामरेड पत्रकारों के लिए यह दांतों तले उंगली चबाने की बात नहीं रह गई थी अब। बनारस में सनबीम कालेज में पढ़ा रहे जगदीश राव हों या जीएन कालेज में पढ़ा रहे संजय जी, इनके लिए यह सब पहेली नहीं रह गया था। लेकिन सैयद जी, अखबारों को लगता है कि शहर में कौन है जो भांपेगा हमारी चतुराई !

कई अखबारों में काम कर चुके ये जो सैयद खान हैं, इसी शहर में एक केबल न्यूज में 2012 की मई में चार हजार की पगार पर काम कर रहे हैं।  तिल-तिल कर मरते इस साठ साला सैयद खान से कोई किसी खबर को लेकरखबर के मैकेनिज्म को लेकरराजनीति को लेकरबाजारवाद को लेकर, दीन-दुनिया को लेकरशेरो-शायरी-अदब की बात कर ले। सिन्हा जी और प्रसाद जी की सैलरी अब भले ठीक हो गई, पर सुकून के लिए सैयद जी का चक्कर जरूर लगा लेते हैं सप्ताह में एक-दो बार। सिन्हा जी सोचते हैं  अभी उन्हें जब बीस हजार मिलते हैं, तब तो महीना खत्म होने से पहले घर में कंगाली छा जाती है। हजार का नोट एक बार जेब से निकला नहीं कि अंगभंग के बाद कब वह खत्म हो जाता है, पता भी नहीं चलता। फोन पर सूचना नोट करने के बाद खबर का एंकर पार्ट तैयार करते हुए नीम अंधेरे कमरे में मेज की दूसरी ओर बैठे सिन्हा जी से सैयद जी कहते - जिसबाजारवाद के खिलाफ मीडिया को लड़ने की जिम्मेवारी निभानी थीउसने तो अपने दांत को पूरी तरह भोथरा कर डाला हैबाजार द्वारा छोड़ी गई हड्डी को चबाने में। रखैल बने इस मीडिया ने ऐसे  छिछोरे संपादकों को वजीफे पर रखा है जिनके कारण पत्रकारों की कई टोलियां आज सड़क पर हैं।  मेरा तो मानना है कि झारखंड-बिहार में किसी मीडिया घराने की बंदी से जितने लोग नहीं बेकार हुए उससे कहीं अधिक घर तबाह हुए एक नई मैगजीन के शुरू होने से।  

सिन्हा जी को जब आज बीस हजार मिल रहे हैं तो भी राजू जैसा कोई न कोई कमसीन दुखियारा उन्हें  नींद में भी स्टोरी के लिए आटो से पीछा करते हुए परेशान कर रहा है। राजू तो बड़ा हो गया। और अब तो बात ही बदल गई। आटो चालकों के लिए ड्रेस कोड लागू हो गया, सभी को लाइसेंस साथ में लेकर चलना जरूरी हो गया, सभी आटो पर सामने रूट लिखा होता है। पहले जहां राजू की जगह सिन्हा जी को अपनी तस्वीर परेशान करने लग जाती, अब वहां उनके सामने सैयद खान की स्टोरी नाचने लगती हैपर सवाल है कि इसे छापेगा कौन! पत्रकारिता के कुछ खंडहर तो अभी दिल्ली, बनारस में मीनार बने हुए हैं। सिन्हा जी बोलते - काश थोड़ा कमीना हो जाते तो क्या होता सैयद जी थोड़ा कमीना रमेंद्र जी को भी होना चाहिए था। कमलेश्वर की पत्रिका  गंगा’ में अंधविश्वास के खिलाफ गंगास्नान’ का कालम रंगनेवाले इस रमेंद्र जी को जाननेवाला कौन है अब! दो दशक की नौकरी एक चुटकी मे चली गई, बहकावे में आने से। फिर तो आरापटनारांची कहां-कहां की खाक नहीं छानी। नवल बिहार और 8-डेज ना जाने कैसे-कैसे अखबारों में नौकरी करनी पड़ी। पैसे के अभाव मे किडनी की मरीज बीवी का इलाज कायदे से नहीं करवा पाने के कारण उसे बचा नहीं सके। दयाल जी की बीवी इलाज के बिना कैंसर से मर गई। और सबसे बड़ी बात कि कब उनकी पत्नी कैंसर से ग्रस्त हो गई, पता भी नहीं चला। वह तो कहिए कि मरने का क्षण नहीं आता तो यह पता भी नहीं चलता। अंतिम क्षण में अस्पताल में भरती किए जाने पर न जाने क्या  क्या टेस्ट हुए। और मुंहफट, लेकिन ईमानदार पी चौबे की मौत भी भारी अखबारी अनदेखी का नतीजा ही थी। क्या आपने नहीं देखा कि किन हालातों में व्यापारी वंशज पत्रकार ने चौबे जी को किस तरह नौकरी से बैठा दिया था। रमेंद्र जी और दयाल जी की यह कहानी सैयद जी को सुना रहे सिन्हा जी अचरज में थे कि एक साथ न जाने कितनी हहराती हुई नदियां कब ठूंठ में तब्दिल हो सामने खड़ी हो गई थीं। अब उस बियाबान में ठूंट से बात नहीं की जा सकती थी, सिर्फ टकटकी लगाकर देखा जा सकता था। उसकी तपिश में जला जा सकता था। सिन्हा जी भी टकटकी लगाए झुलस रहे थे।

पत्रकारिता के पेशे मे अपनी व्यर्थता के अहसास से तिक्त हो चुके सैयद जी के पास यहां के मीडिया व राजनीति से जुड़े एक से एक अनुभव थे। प्रसाद जी को लगता कि यह जो सैयद हैं वह खबरों की कैसी कब्र हैं नहीं पता! इस शहर में और भी न जाने मीडिया के कितने खंडहर हैं जिनमें राजनीति-पत्रकारिता के कितने किस्से दफन हैं। इन्हीं सैयद जी से प्रसाद जी, सिन्हा जी को कई गूढ़ बातों-प्रसंगों का पता चला। वैसे सिन्हा जी और सुमन जी ने खुद ही देखा कि किस तरह इस नए राज्य में आज जो विधायक बनने लायक नहीं थे वे शिक्षा मंत्री बन गए तो कोई स्वास्थ्य मंत्री बन गया। शिक्षा मंत्री शिक्षक को ही लगा खुले मैदान में  रगेदकर पीटने और स्वास्थ्य मंत्री अपने सगे संबंधी को सुविधा दिलाने के नाम पर मेडिकल कालेज व राज्य के सबसे बड़े अस्पताल के बड़े अधिकारियों की एमसी-बीसी करने। मन तो इतना बढ़ गया था कि एक बार स्वास्थ्य सचिव के कार्यालय में उन्हीं की कुर्सी पर बैठकर लगे उनकी क्लास लेने। इसी पर सैयद जी ने कहा था  जहां मीडिया में ऐसे लोगों के पूजक बैठे हों, भला वहां इस नए प्रदेश के लिए जिन लोगों ने वातावरण निर्माण का काम किया उसे कैसे जानेंगे! कितने लोगों को मालूम है कि रामदयाल मुंडा, बीपी केसरी का नाम एक साथ क्यूं लिया जाना चाहिए ? इनके साथ वीरभारत तलवार का नाम क्यों जुड़ता है ? सैयद जी खीझकर कहते - नई जमात के इन पत्रकारों को गरियाने वाले बताएं कि आखिर जिन तलवार साहब का नाम इन विचारकों में लिया जाता है उन्होंने ही कौन सा भला काम किया है अपनी बिरादरी के लोगों को इरादतन उपेक्षित कर। एक एक्टिविस्ट के नोट जैसी मोटी किताब में पत्राचार जो दिखाते हैं मनमोहन पाठक व सीताराम शास्त्री के साथ, पर वही तलवार साहब इस राज्य के विचारक टाईप के लोगों का नाम जब गिनाते हैं कथाक्रम के आदिवासी अंक में तो इन दोनों का नाम छोड़ देते हैं। अब यह संयोग पर कैसे छो़ड़ दिया जाए कि यह अनजाने में हुआ और उनकी नियत पर भी छोड़ने का मसला नहीं है यह। कुछ लोग तो सर्वाधिक जेनुइन नाम में सीताराम शास्त्री का नाम गिनते हैं।

एक बार इन्हीं सैयद जी ने सिन्हा जी व प्रसाद जी को किसी चंदन नामधारी पत्रकार के दुखद अंत का किस्सा सुना रहे थे। किस्सा क्या था मीडिया पर कालेधन के साए के हावी होने से आई विकृति का त्रासद और भयावह चेहरा था। कभी-कभी तो अचरज होता कि क्या ऐसा भी होता है ! किसी जमाने में चंदन जी बोकारो से रश्मि नामक साप्ताहिक अखबार निकालते थे। कांख में अखबार दबाए विभाग-विभाग भटकते रहते। कर्मचारी कभी सौ, कभी पचास रु निकाल कर दे देते कहते – बाबा जाइए निकालिए अपना अखबार। कचहरी में भी लोग मदद करते। इस तरह अपना अखबार निकाल रहे थे बाबा। कहां से एक कोयला व्यवसायी का साया उनपर मंडराने लगा। एक दिन वह व्यापारी उनपर डोरे डालने में कामयाब हो ही गया। उस कोयला व्यवसायी ने चंदन जी को अखबार मे हिस्सेदारी व प्रधान संपादक का पद देने का ख्वाब दिखाकर एक दैनिक निकालना शुरू किया। आदर से लोग उन्हें बाबा भी कहते। बाबा का मन मिजाज कुछ दिन तो प्रसन्न रहने लगा। लेकिन महीना भर भी नहीं बीता होगा कि वह कोयला व्यवसायी कहता – बाबा आपके लिए यहां अधिक परेशान होने की बात नहीं। गौतम जी, विनय जी, झा जी, राकेश जैसे लोग हैं, ये लोग सब कुछ देख लेंगे। आप तो मालिक हैं, बस हमारे साथ बैठा कीजिए।अब धीरे-धीरे रूटिन बदल गया। व्यवसायी कहते – अच्छा बाबा, तनी देखाईं ना फ्रेंच डांसं कैसन होखेला ?’ यह लालू के दौर से बहुत पहले की बात है जब कहा जाता है कि सांस्कृतिक कार्यक्रम की भरी सभा में लालू सेक्रेटरी से खैनी चुनवाते और अपनी पसंद की डांस करने को बाध्य करते। सो बाबा उस बुढ़ौती में एक हाथ कमर पर तथा दूसरा हाथ माथे पर ले लगते डांस करने। उनका ठुमकना शुरू होता कि बस प्रेस मे सारा कामकाज छोड़ कर लगता ठहाका। पेट पकड़कर झा जी, विनय जी, राकेश लगते लोटपोट होने। लेकिन किसी को रुलाई नहीं छूटती। कोई बाबा की आंखें नहीं देख पाता, उन आंखों मे उनके लिए कितनी हिकारत है, अपने लिए कितना आंसू है। और धीरे-धीरे बाबा संपादकीय लिखने से मुक्त कर दिए गए, फिर संपादक की कुर्सी से और फिर तो पता ही नहीं चला कि कब वह अखबार से बाहर हो गए। नाम जरूर बाबा का जाता रहा। सैयद ने कहाजानते हैं सिन्हा जी उस चंदन जी का अंत कैसे हुआ। हम लोगों ने अपनी आंखों से देखा है - कपड़ा उतारकर बाबा कभी कुत्ते से लिपटते मिलते या कभी पोल से या कभी पुल की रेलिंग से लिपटे रहते। फिर एक समय आया जब बोकारो के रुद्रा, पांडेय जी ने बीएसएल के अधिकारियों की चिरौरी की कि बाबा किसी जमाने के नामचीन पत्रकार रहे हैं और उन्हें मदद की सख्त जरूरत है। किसी तरह उन्होंने बीजीएच मे उन्हें भरती करवाने का रास्ता निकाला। फिर आईना मे त्राहिमाम छापा गया ‘ ‘चंदन जी बेहद अस्वस्थ हालत में बीजीएच में भरती हैं। उन्हें अभी नियमित देखरेख की सख्त जरूरत है। उनके कोई भी रिश्तेदार हों तो उनसे अनुरोध है कि वे बीजीएच जाकर उन्हें देखें। बाद में उनके बेटों को जाकर उनसे चंदन जी को अपने यहां ले आने को कहा गया तो उन्होंने साफ कह दिया कि अब कोई उनकी जिम्मेवारी लेने की स्थिति में नहीं। बाद में भोजपुर स्थित अपने गांव में उनकी अनाम मौत हुई।

कहते हैं कि प्रेस में ही सोने का इंतजाम भी था। इन्हीं बाबा जी का एक किस्सा यह भी है कि एक बार उन्होंने किसी चाची टाईप के पत्रकार पर हाथ साफ करने की कोशिश की थी। बड़े ही रोचक किस्से हैं इस चाची के भी दिग्गज पत्रकार बनने के। एक बड़े दबंग कोयला व्यवसायी से महंगी गाड़ी, विदेशी कैमरा हथियाया फिर रिपोर्टिंग के लिए बड़े राष्ट्रीय चैनल में सेंधमारी की। सिन्हा  जी बोल उठे  सैयद जी आपने तो फिर भी लाज रख ली कोयला व्यवसायी कहकर। यहां तो पूरा मीडिया ही इस तरह कोल किंग’ लिखता-बोलता है जेसे भाषा उसकी जागीर है। यह इलाका उसकी रियासत है, जिसे जो मन में आए पदवी-ओहदा दे दो। असल बात, देखिए लगता है कोल माफिया कहते-लिखते नानी मरती है इनकी। थोड़ा सा मान-मोल रखना ही है तो कोयला व्यवसायी कहते, इतने भर से चलता। अब कोल किंग कहते हैं जैसे उन्होंने ही राज्याभिषेक कराया है उनका।
सैयद जी कथा के सूत्र को आगे बढ़ाते हुए कहने लगे- उस कोल माफिया से चैनल के लोग भी उपकृत। धीरे-धीरे बड़े और बदनाम नेताओं के साथ बेतकल्लुफी रिश्ते बने। और यहीं से बना पूंजी का सुरंग। खोजते रहे सीबीआई और इनकम टैक्स कहां से क्या आया ! वही पत्रकार अब एक बड़े चैनल का कर्ताधर्ता बन बैठा और मशहूर हो गया यहां की चाची, वहां का चाचाके रूप में। उसने भी किसी का बुरा नहीं किया, सिर्फ एक सुनील नामधारी संपादक की नौकरी भर ले ली। उसके बहकावे में आकर इस सुनील जी ने बड़े और प्रतिष्ठित अखबार की अच्छी-भली संपादकी की नौकरी की तिलांजलि दे दी। सोचा बड़े चैनल में बड़ा ओहदा, यह क्या होता है संपादक-वंपादक। साथियों में विशेषकर प्रसाद जी जैसे चोट खाए लोगों ने काफी समझाया भी, पर तब तक बीवी का साया बुरी तरह ग्रस चुका था उन्हें। अब सुनील जी को लगने लगा है कि किसी की भी सलाह उनकी समझदारी की सीमा तक ही ग्रहण करना उचित है। कोई हमारे पिता हों या माता, पर समझदारी की जहां तक बात हो तो वहां श्रद्धा-प्रेम कुछ नहीं करता। वही हुआ इन संपादक जी का भी। न घर के रहे ना घाट के। ऐसी लड़ाइयों में वे ही टिकते हैं जो ऐसी लड़ाइयों में सूत्रधार की भूमिका में हों या फिर जिनके गाडफादर हों।

सिन्हा जी इस प्रकरण को याद करते ही सिहर जाते। ऐसे ही किसी अंतरंग क्षणों में मुंहफट सुमन जी ने सैयद जी से कहा  कामरेड, हमारे पिछड़ने का सारा दोष व्यवस्था पर नहीं। देखिए लोग आपको मौका देना भी चाहते हैं तो एक मुसीबत आ जाती है कि कंप्यूटर आप जानते हैं नहीं। आज तो अखबारों में कुछ मामलों को छोड़ कंपोजीटर की कोई जगह बची नहीं। सिर्फ टुक-टुकाकर कंपोज करने के लिए दस-पंद्रह हजार क्यों बर्बाद किया जाए। अब हमीं लोगों को देखिए, पेज लगाने से लेकर ग्राफिक्स तक सभी कुछ बनाते हैं। अब ब्यूरो में रहकर खबरों की रिराइटिंग से लेकर उनका संपादन कंप्यूटर पर नहीं करने से कैसे काम चलेगा !’  सुमन जी केबल न्यूज के दफ्तर से निकलते हुए सिन्हा जी से कहते  बास जानते हैं, सैयद जी का कंप्यूटर नहीं जानना उनके सभी कौशल पर भारी पड़ जाता है। इसमें हम-आप कोई क्या मदद कर सकते हैं। अब यदि उन्होंने सीखा भी तो वह बस इतना ही कि एक ऊंगली से इधर टुक उधर टुक करते हुए कंप्यूटर पर जितना वे कंपोज करेंगे या एडीट करेंगे उतनी देर में तो दस खबर की कंपोजिंग और पांच-छह खबरों की एडीटिंग हो जाएगी। वैसे भी साठ साल में हम-आप उनसे और कितने बदलाव की अपेक्षा कर सकते हैंबास, हमीं जैसे कोई हों तो उनका कुछ हो सकता है, वरना नहीं लगता कि इस तरफ कोई देखे भी!’ सुमन जी कहते  औपचारिक शिक्षा के अभाव में उन्हें हमेशा छोटे-मोटे अखबार में शोषण की चक्की में पिसते रहने पड़ा। यह तो ट्रेजडी है। जिस अखबार को अपने खून-पसीने से सींचा, उसके आदशर्वादी संपादक के बेटा ने पूंजी खड़ा करके अपना काम निकाल लिया। सप्लाई का धंधा कर लिया। सैयद जी और उमेश जी जैसे पत्रकारों को बगैर पैसे के सालों-साल उसमें काम करने को मजबूर होना पड़ा। उस अखबार से कई बड़े पत्रकार निकले तो प्रभाष जोशी के कृपापात्र देश के नामी छली पत्रकार भी यहीं से निकले। अब आप ही कहिए सिन्हा जी हम लोग तो साथे ना काम करते थे उस अखबार में जब प्रसाद जी के पास सैयद जी का चिट्ठा आता था कि-साथी पोते के लिए हार्लिक्स खरीदनी है तो कल ईद है और चार माह से वेतन नहीं। कुछ कीजिए साथी। कोई पत्रकार वह किताब लाकर देता प्रसाद जी को। और वे उसे पलटकर देखते कि क्या संदेश है। जब जो हो पाता करते। लेकिन यह निदान का रास्ता तो नहीं है। कभी सिंह जी कुछ कर देते हैं। कभी कृपा का सहयोग मिलता है। क्या बोलें, गुस्सा तो सैयद जी पर भी आता है कि वैसी जगह से चिपके क्यों रहे! उससे कम ही जो दे और नियमित दे, वहीं काम क्यों नहीं करते हैं। कभी-कभी तो लगता है यह कम्यूनिस्ट-वम्यूनिस्ट कुछ नहीं। पूरे भाग्यवादी हैं। कभी अपने संपादक को लेकर कोई क्षोभ या असंतोष नहीं दिखा उनमें। आखिर ऐसे थोड़े ना चलेगा।

और इधर शहर के पत्रकारों रमेंद्र जी, दयाल जी, पी चौबे आदि की सारी रामकहानी सुमन जी से सुनकर - जानकर तो असहाय से हो गए सैयद जी के रगों मे ज्वार आ गया था उस दिन। लगता था कि उनका बस चले तो अभी उन छिछोरों को गोली मार दें। गोली उनके जहन में यूं ही नहीं कौंधती है। उन्हें याद है कि जवानी के दिनों में लघु पत्रिका ‘वाममें छपी आलोकधन्वा की कविता गोली दागो पोस्टर को प्रदीप मुखर्जी के साथ मिलकर झरिया की दीवारों पर किश्तों में लिखा था, यहां-वहां। प्रसाद जी, सुमन जी, सिन्हा जी को उन्होंने इस कामरेड प्रदीप की ट्रेजेडी सुनाई थी कि कैसे 20-22 साल का वह युवा दास कैपीटल, घोषणापत्र, एंटी ड्यूहरिंग... आदि को छान कर पी गया था। कैसे अभी शहर में उपन्यासकार बने फिरनेवाले रिटायर्ड प्रशानिक अधिकारी ने उसके घर में पहुंच बना ली थी। उसकी बहनों से हंसी-मजाक चलने लगा। घर में आता और चाय-पान होता। युवा प्रदीप यह सब देखता तो उसके भीतर का भाई उबाल खाता। और एक समय तो उसकी ज्यादतियों के खिलाफ उबाल को दाबते-दाबते वह नशेड़ी हो गया। नशा में भी उसने सिर्फ भांग का ही सेवन किया। सैयद जी कह रहे थे  प्रसाद जी आप विश्वास नहीं करेंगे प्रदीप की मूंछें भी तब नहीं आई थीं तब वह मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में का ऐसा विश्लेषण करता कि लोग दंग रह जाते। मार्क्सवादी चिंतन के क्षेत्र में जिस राय दा का रुतबा और लोहा देश भर में लोग मानते हैं, उसी दौर में वह उन्हें व्यक्तिवादी मार्क्सवादी कहने लगा था। उसी समय उसका कहना था कि इस क्षेत्र के लोगों के दबे आक्रोष को राय दा मार्क्सवाद की चादर से तोप करके मंद कर रहे हैं। वह जो कुछ कहता उसका तथ्यों के साथ पूरा तार्किक विश्लेषण उसके पास होता था। जो लोग उस दौर के होंगे और जिनका उससे संपर्क रहा होगा, वे इस बात को जानते होंगे। जीते जी जो लोग रामविलास शर्मा को पूजते रहे आज वही लोग उन पर केंद्रित करके आलोचना का इतिहास की शवसाधना का अंक निकालते हैं। कितनी विचित्र बात है कि यह प्रदीप उसी दौर में, नहीं कुछ तो कम से कम 30 साल पहले, इन्हीं रामविलास शर्मा को अपरिपक्व मार्क्सवादी कहता था। गीली आंखें लिए भावुक हो उठे सैयद जी कहते  क्या कहें प्रसाद जी, एक बार तो मेरे यहीं बनियाहीर के घर में विनोद मिश्र के सामने बहुत बुरी स्थिति ला दी थी उसने। वह जो बोलता, बड़े ही बेलाग अंदाज में मुंह पर बोलता था। तो उसने उस दिन विनोद मिश्र से क्या कहा था जानते हैं ?  कामरेड, आप उसी रास्ते पर चल रहे हैं जो रास्ता ख्रुश्चेव का था। और कामरेड समझौतावादी और संशोधनवादी रास्ता पूंजीवाद की ओर जाता है। आज न कल उसकी परिणति वही होती है। कुछ लोगों से कामरेड विनोद मिश्र ने कहा कि कामरेड प्रदीप अभी जहां पहुंच गया है, वह बहुत खतरनाक जगह है। और ऐसी जगहों से वापिस आना बहुत मुश्किल होता है। जैसे लगता है विनोद मिश्र को मनोविज्ञान की गहरी जानकारी थी। इसीलिए कामरेड विनोद मिश्र ने किसी और प्रसंग में प्रदीप से एक बार कहा भी था - प्रदीप तुम घर के कामकाज में थोड़ा हाथ बटाओ। बागान में पानी पटा दो। सब्जी ला दो, घर में कभी बिछावन कर दो। कभी पानी भर दो। अब क्या देखा था कामरेड ने क्या नहीं, नहीं मालूम! पर इसी के कुछ दिनों बाद उसने खुदकुशी कर ली थी। उम्र यही कोई 25 वर्ष की रही होगी।

उसी सैयद को यदि लग रहा है कि वह छिछोरे संपादकों को गोली मार दें तो अचरज क्या! सामने होने पर गाली-गुप्ता तो जरूर करते। अभी-अभी सैयद जी कह रहे थे - जीने का कोई मकसद नहीं दिखता प्रसाद जी। लगता है कि जंगल चले जाएं या फिर खुदकुशी कर लें। बेटा बेकार बैठा है। फेरी लगाने को पूंजी नहीं। पूंजी जुटती भी है तो चली जाती है;कभी बीमारी में तो कभी घर में। कभी मेहमानवाजी में घुस जाती है। पूंजी है कि बिल्ली, पता नहीं! थोड़ी-सी भी जगह मिली नहीं कि चट से कड़ाही चाटकर भाग जाती है। पोती स्कूल जाती है, उसे किताब अभी तक नहीं मिली है। एक ही फ्राक पहनती है। रोज रात को धोकर सुखाती है, फिर दूसरे दिन पहनती है। इन पोता-पोती की निश्छल और पवित्र आंखें, पुतोहू की निष्काम सेवा, बहन का अनन्य स्नेह, बेटा की अथक भक्ति देखकर लगता है जीवन अभी बाकी है। अभी इनके लिए जीना बाकी है। अपने हिस्से का जीवन तो कब खत्म हुआ पता नहीं। जीवन अपना था भी, इसका भी पता कहां चला सैयद जी को। और अभी जब प्रसाद जी से यह सब सुनकर उनकी आंखों में खून तैरने लगा तो बोल उठे - कहिए सालों ने हमारे साथियों को मार डाला। क्या हम इतने गए बीते हो गए कि उनकी खबर नहीं ले सकते। तपती दुपहरी में आग बनी धूप से बचने जब लोग ठौर खोजते तो किसी जमाने में सैयद अपने पागल साथियों के साथ कम्यूनिस्ट प्रत्याशी के समर्थन में झरिया की दीवारों पर नारे लिखते मिलते। आज तो इतने भर से तैश में आ गए इसी सैयद जी के सर में चक्कर आने लगा। आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा। माथा धरते ही लोगों को लग गया कि वे अब गश खाकर गिर जाएंगे। लोगों ने उन्हें संभाला। पास में बैठे साथियों ने कहा  सैयद जी प्रेशर के मरीज को खामखाह तनाव में आने से बचना चाहिए। डाक्टरों ने कहा है कि तनाव का थोड़ा भी पल उन्हें बहुत पीछे ले जाएगा। अरे आप भी तो यह सब जानते हैं। कोई आपके पीछे थोड़े ना डाक्टरों ने किसी को सलाह दी थी। सैयद जी का कहना तो था कि काम के चक्कर में टिफिन करना भूल गए, लेकिन टिफिन घर से लाए ही नहीं हों, यह भी तो हो सकता है।

सिर्फ बर्फ ही पिघलकर पानी नहीं बनता है, आग भी बर्फ में ढल जाती है। यह सैयद जी को देखकर सिन्हा जी-प्रसाद जी आपस में बुदबुदाते। और बुदबुदाते वक्त लगता कि उनके भीतर लय से भटका हुआ कोई मरसिया जैसे ठौर पाना चाहता हो अपने राग-धुन में। लेकिन वह टूट-टूट कर ध्वनियों में, हवा में विलीन हो रहा है। हवा में उड़ते उस बेराग मरसिया को पकड़ने के पीछे सिन्हा जी, सुमन जी, प्रसाद जी पागल हो जाते कि क्या होता, पता नहीं चलता! ऐसे कई मौकों पर ये सभी माथा थामे रहते।

इस जिले में एसयूसीआई की जमीन बनाने में सैयद खान की बड़ी भूमिका रही है। लेखक संगठन की एक इकाई का सारा दारोमदार रहा है इनके कंधे पर। इसे कौन नहीं जानता है। सियासी नजरिया तो इतना साफ कि कभी-कभी लगता है कि सैयद जी ने अपने साथअपने परिवारवालों के साथअपने साथियों के साथ अन्याय किया। उन्हें राजनीति में होनी चाहिए थी। लेकिन फिर सवाल होता है कि क्या वहां यही हरकत नहीं होती उनके साथ। होती क्याहो रही है! उनके पार्टी वाले तो मीडिया से भी गए-बीते गरजमंद निकले। वे जिसमार्क्सवादी पार्टी से संबद्ध संगठन से जुड़े रहे उसने भी तो इंसाफ नहीं किया, जो कहा जाए कि राजनीति में वे होते तो उनका भला होता। बहुत कुरेदने पर प्रसाद जी को बताया कि अब पार्टी ने उन्हें होल टाईमर नहीं रखा है। अब बुद्धिजीवियों के किसी कोषांग में हैं वह। इसीलिए अब पार्टी ने कुछ भी देना बंद कर दिया है। उनका कहना है कि जनवादी विचारधारा की बात करते हैं तो चरित्र भी तो जन का होना चाहिए। जनता के बीच आप काम करते हैं तो कम से कम यह होना ही चाहिए कि जनता को आपका चरित्र भरोसे का लगे। नहीं तो शेष पार्टियों और वामपंथी पार्टियों के बीच क्या फर्क। उनका इशारा कामरेड बंधुओं की आलीशान जीवनशैली की ओर था शायद। लोग पचा नहीं पाते उनकी बातें। राजनीति की भेड़चाल में शामिल पार्टी वालों को पार्टी लाईन से वे भटके दीखते। इन्हीं मतभेदों को देखकर पार्टीवालों ने भटक गए सैयद से किनारा कर लिया है। लेकिन नहीं, कह सकते हैं कि पार्टी वालों ने सैयद जी को अकेला कर दिया है। कमाल की बात, कि जिस वामपंथी पार्टी को यहां बमुश्किल 10 हजार वोट नही मिलते, उसका ही एक नेता सिर्फ और सिर्फ ट्रेड यूनियन की बदौलत पार्टी की केंद्रीय कमेटी का मेंबर बना दिया गया है। प्रसाद जी कन्फर्म होना चाहते है सैयद जी से कि क्या यह वही दादा हैं जिन्होंने किसी शिक्षिका से शादी रचाई है। क्योंकि् बचपन में उन्होंने कोलियरी स्कूल में दीदीमुनी (बंगाली में शिक्षिका को यही संबोधन देते हैं) के साथ दादा को प्रेम की पेंग बढ़ाते देखा था। प्रसाद जी को अब पता चला कि दीदीमुनी तब विवाहिता थीं। क्योंकि जैसी गतिविधियां उनके जहन में ताजा हो रही हैं वह किसी नेता की हो ही नहीं सकती। एक मजदूर नेता विद्यालय में बच्चों को पढ़ाती शिक्षिका का चक्कर क्यों लगाएगा। प्रसाद जी के जेहन में दीदीमुनी की जो छवि अंकित है वह क्लास में स्वेटर बुनती मास्टरनी की है। सैयद जी कहते हैं  हां, प्रसाद जी, आप सही हैं। यह दादा की पहली और मास्टरनी की दूसरी शादी है। पार्टीवाले बखूबी इसे जानते हैं। लेकिन कहते हैं ना, दुधार गाय की लताड़ भली, सो ही हुआ, इस मामले में। 

साल 1999 में बीवी जब मरी तो इस पार्टी ने खबर तक नहीं ली। और 2009 में मां जब मरी तो संपादक दीपक जी का सहारा काम आया। जिसको कहते हैं एक टांग पर खड़े होना, सो उनके लोग पूरे इंतजाम में लगे रहे। तीन साल पहले खून की उल्टी होने पर आनन-फानन में एक नर्सिंग होम में भरती कराया गया इन्हीं सैयद खान को। दौड़े-दौड़े बहन कामरेड दा के यहां फरियाद लेकर गई थी। परछाई की तरह हमेशा रहनेवाली बहन। सुध-बुध खोई बहन को न तो केश का खयाल था और न ही कपड़े का होश। बदहवास सी लगी रामकहानी सुनाने। कुर्सी पर बैठे-बैठे सबकुछ स्थिर से सुनकर कामरेड दा ने दो टुक कहा  त्तो-त्तो, हम इसमें क्या करेगा ?’ अब वह तो हक्का-बक्का रह गई। लगा कि टूटे-फूटे ढह रहे घर में दिनदहाड़े कोई सेंध मार गया। विश्वास की बची हुई अमानत जाती देख भोकार पार कर लगी रोने। लगा जैसे कुछ लुट गया। हां, उसे बहुत भरोसा था कि वहां से कुछ मदद होगी ही। सुनकर उल्टे पैर दोड़ पड़ेंगे। दवा-दारू के लिए हाथ में कुछ थमा देंगे और कहेंगे चलो तुम, हम आता है। तब तक इंतजाम करो। घबराने का कोई बात नहीं। अपना सैयद कामरेड है। हिम्मतवाला है। संभल जाएगा मामला। चल पड़ेंगे दादा अपने कामरेड का दुख हरने। लेकिन यह क्या, यह तो सरेशाम डाका है, डाका ! उसके सामने नाचने लगा वह नजारा जब सैयद भाईजान ने झरिया की जनवादी नारी समिति बनाने मे दिन रात एक कर दिया था। एंड़ी-चोटी एक कर दी थी इसी सैयद ने। क्या तो बोलते हैंसमारिका, उसमें दादा की ओर से संपादकीय लिखना हो या अखबारों में खबरें छपानी हो, लगता था कि जैसे बाल-बच्चे का कोई काम हो। आज वे ही लोग, इस तरह मुंह मोड़ लेंगे, उसे अब भी अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था। वह जकथक वहीं खड़ी रही रोते-रोते अवाक्! शायद उसी से सुनने में कुछ भूल हुई हो। देख लें थोड़ी देर और। लेकिन दादा ने जब कहा  देखता क्या है, हमारे पास कुछ नहीं। हम कुछ नहीं कर सकता है। देखो उधर। लगा जैसे दरवाजे पर आए भिखारी को टरकाया जा रहा है। सोचती है - देखा जाए स्साले को, छाती पर तो चढ़ ही सकती हूं। दे धुरमुस-दे धुरमुस, स्साले बंगाली, लगा भाव दिखाने। मन तो हुआ कि सारी ऊंच-नीच यहीं कर दें, पर अभी इसका वक्त नहीं। देखा जाएगा फिर कभी। उसे लगता है कि सुहाग लुटने पर भी तो इतना बड़ा सदमा नहीं पहुंचा था उसे। दादा के विश्वासघात के ताप ने जैसे सारी संवेदना सोख ली। जिस पीड़ा से वह दादा के पास गई थी, अब भाई सैयद पर खालिस गुस्सा ही आ रहा था। जिस वेग से गई थी फरियाद करने, उससे भी तेज गति से उल्टे पांव भाई को उलाहना देने लौट गई। बिछावन पर पड़े भाई जान सैयद को एक तरफ सेलाइन की बोतल चढ़ रही थी और दूसरी तरफ से लगी खरीखोटी सुनाने  और जाओ, लाल झंडा ढोओ। सुनोगे, तुम्हारे उस दादा ने क्या कहा? –‘ कालीमाई बनी उस चंडी-सी बहन को यह भी होश नहीं रहा कि अपने नेता के प्रति यह खीझ सुनकर भाई पर क्या बीतेगी- ऐसे ही लोगों के पीछे भूत बने थे ना। और जाओ, ढोओ झंडा। देखो वे किसको देते हैं। तुम्हें क्यों देंगे ? ‘ और यही शहर है जहां से इस वामपंथी पार्टी की केंद्रीय कमेटी का मेंबर भी मिला। आखिर क्या 19-20 हजार वोट की बदौलत या ट्रेड यूनियन की मालदार राजनीति है इसके पीछे। आखिर कहीं तो इतनी बड़ी हासिल का कोई रिफ्लेक्शन होगा ना? पूरे बिहार-झारखंड से इकलौते ... आखिर कोई तो आधार होगा ना.. फिर भी सैयद नेता की वकालत करने से बाज नहीं आते। सैयद कहते हैं  प्रसाद जी, वोट देखकर थोड़े ही यह हस्ती दी जाती है। पूरे प्रदेश में माले का सिर्फ एक विधायक है बगोदर (गिरिडीह) से, तो ऐसे में राज्य कमेटी में माले के सारे नेता गिरिडीह के ही होंगे ना ? प्रसाद जी ऐसी बात नहीं। कामरेड दा ने पार्टी के कार्यक्रमों को जनता के बीच ले जाने का जो काम किया है, उसका कोई सानी नहीं। सैयद खान की इस बात में पार्टी के प्रति कहीं कोई तीखापन या उपेक्षा का दर्द नहीं झलकता। 
प्रसाद जी कहते  हां, सैयद जी, लेकिन जिन श्रमिक संघों की राजनीति की बात आप या आपके लोग कर रहे हैं ना, आखिर उस ट्रेड यूनियन के मेंबर को वोटर कहां बना सकेआपके दादा लोग कोलियरी से, खदानों से गैंता-कुदाल- हंसुआ-हथौड़ा लेकर निकला वह मजदूर बूथ तक आते-आते किसी और ही रंग का हो जाता है! हंसुआ-हथौड़ा कौन छीन लेता है उसके हाथ से ? क्या केंद्रीय कमेटी को यह सब नहीं चाहिए ?’

अभी जब शूगरप्रेशर ने अपने पूरे औजारों के साथ हमले किए हैं सैयद जी पर तो भी इस पागल की कोई फिक्र किसी को कहांबाजार की आवारगी में पली बाईक पर उड़ते पत्रकारों और कार पर उधियाते (हवा के प्रवाह में बहे जा रहे) नेताओं की नई पौध जब सैयद को देखती है तो उन्हें लगता है कि कोई उन्हें लाठी से कोंच रहा है।  झरिया के उस छोर से शहर में केबल न्यूज के दफ्तर आने-जाने मे रोज भाड़े के तीस रुपए निकल जाते हैं। चार हजार में से एक हजार तो ऐसे निकल जा रहे हैं जैसे बिछावन पर सेलाईन लगे मरीज से सिरींज लगाकर रोज कोई एक बोतल खून निकाल ले रहा हो। सैयद कराहते हैं - न सेलाईन छुड़ा रहा है कोई और न ही कोई सिरींज निकाल रहा है। रोज वह चुपचाप जैसे बिछावन पर पड़े देखते रहते हैं उस दैत्याकार होती जा रही सिरींज को। रोज और पैनी होती सिरिंज उनकी बांह पर जबड़े गड़ाती हैपथराई आंखें अवश देखती रहती हैं। आफिस में या चौराहों पर अपने चारों ओर ठहाका लगाती आंखें जैसे बिल में धकिया रही हो उन्हें। वे नहीं निकाल पा रहे जीने का कोई रास्ता और न ही बांह में लगी दैत्याकार पैनी सिरींज। एक तरफ खून निकाला जा रहा है तो दूसरी तरफ खून का घूंट गटक रहे हैं! लहूलुहान सैयद जी खून ही तो पी भी रहे हैं!

उपाख्यान में क्षेपक 
दिल्ली से पढ़-लिखकर व देश विदेश से कई उपाधियों को लादकर कोलकाता आए प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा, परंजय गुहा ठाकुरता व चंदन मित्रा तब कोलकाता में अपनी-अपनी रोजी रोटी कमा रहे थे। गुहा पढ़ा रहे थे, परंजय गुहा ठाकुरता बिजनेस इंडिया में शायद काम कर रहे थे और चंदन मित्रा तब दि स्टेट्समैन में थे। (इस सूचना की पुख्ता गारंटी मैं नहीं दे सकता।) सन 85 के आसपास की बात है। वे चित्तरंजन एवेन्यू के पास चुंगवा रेस्टोरेंट में खाना खा रहे थे। ठाकुरता अपनी परेशानी का जिक्र कर रहे थे कि वे शहर से बाहर स्थित एक बड़े औद्योगिक घराने के कारखाने से हो रहे प्रदूषण पर रिपोर्टिंग करना चाहते हैं। चंदन मित्रा का कहना था कि जब हम दोनों के मीडिया घराने ऐसी कंपनियों के विज्ञापन से चलते हैं तो ऐसे में अपने संपादक को नाराज करने का क्या फायदा ? रामचंद्र गुहा अब भी अपने प्रतिरोधी विचारों और सक्रियताओं के लिए जाने जाते हैं। ठाकुरता नें पेड न्यूज को लेकर प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के लिए रिपोर्ट तैयार की तथा कर्नाटक में खनन माफिया को लेकर बनी डाक्यूमेंट्री से जुड़े। और चंदन मित्रा रिलायंस के अखबार से होते हुए फिलहाल दि पायोनीयर के सर्वेसर्वा बने बैठे हैं। हिंदी पायोनीयर के शानदार परिशिष्ट को सिमटकर उसके पिछले पन्ने पर एक महिला के ज्योतिषीय ज्ञान को समर्पित कर दिया गया है। अच्छा आप भूल तो नहीं रहे हैं। शशि थरूर के परम मित्र तथा कभी उनके प्रचार प्रबंधक रहे मित्रा अब दुबारा भाजपा के कोटे से मध्यप्रदेश से राज्य सभा सदस्य हैं। पाठको, पिछले मई माह में एक बड़े औद्योगिक घराने के अखबार में श्री गुहा ने प्रेस की आजादी को लेकर जो लेख लिखा था, उसी पर ये आधारित है। हां, उस लेख में कहीं भी उन दोनों मित्रों के नाम का जिक्र नहीं किया था, जिसका खुलासा मैंने अपने रिस्क पर किया है। चाहे तो तीनों इसे नकार दें। और आप चाहें तो उक्त कहानी में इन आत्माओं को ढूंढ सकते हैं।

प्रिय पाठको,
यह कहानी अभी अधूरी है। इस कहानी की कोशिका, ऊतक, अस्थि-पंजर तैयब खान, बनियाहीर, धनबाद;  देवेंद्र गौतम, अशोक नगर, रांची; धनबाद; जयप्रकाश मिश्रा, गोविंदपुर, धनबाद; महेंद्र दयाल, रांची में पसरे हुए है। आपको कहीं भी, किसी भी शहर में ये मिल जाएं तो मानो कहानी पूरी हुई।
(थादेश के जनरी  में )

3 टिप्‍पणियां:

  1. भाई उमा जी!
    इस कहानी को कथादेश में देख चुका हूँ. इसमें एक युग की दास्तान है. मेरे विचार में या तो इसका संक्षेपीकरण करके कहानी बना दें या फिर पूरा विस्तार देकर उपन्यास का रूप दें. मुझे तो यह किसी उपन्यास का सिनोप्सिस प्रतीत हो रहा है.

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  2. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  3. उमानाथ जी ,कथादेश के लगभग चौबीस पृष्ठों पर कब्जा जमाए आपकी इस कहानी को मैं अभी तक पूरी पढ नही पाई हूँ । पूरा लघुउपन्यास है । पत्रकारिता के जटिल रहस्यों का प्रभावशाली व संग्दरहणीय दस्तावेज । मैं कोई बडी लेखिका नही हूँ । कथादेश में पहली बार मेरी लघुकथा आई है हालांकि लिखती रहती हूँ । आपकी कहानी के/साथ । वही आपके ब्लाग का पता मिला । हो सके तो मेरे ब्लागों पर मेरी रचनाएं पढें । http://katha-kahaani.blogspot.com तथा http://yehmerajahaan.blogspot.in/

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