हमसफर

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

राजभाषा हिंदी की बासठवीं बरसी पर


                       “भाषा पर कुछ असहज टीप
     भाषा एक सांस्कृतिक उपक्रम है, इससे कौन मुकरेगा। इतिहास इसका गवाह है कि सांस्कृतिक मूल्यों के छीजन के साथ राष्ट्रीय गौरव और चेतना मद्धिम पड़ती जाती है। फिर इससे फर्क नहीं पड़ता कि हम किसके देश हित को अपना राष्ट्रीय हित और किसके गौरव को अपना राष्ट्रीय गौरव मान रहे हैं। अपना इतिहास भूलकर उसका इतिहास पढ़ना आपको नहीं अखरता। आपको इस पर आपत्ति नहीं होती कि आपका सम्मानित विदेशी अतिथि अपने कुत्ते बिल्लियों के नाम इंडिया रखे। और यही रास्ता है गुलामी में जाने का या गुलामी को बरकरार रखने का। आज तो बाजारीकरण ने समाज का जिस तरह पूंजीकरण किया है, उसने अपनी सहूलियतों के जाल से मैकाले के भारतीय वंशजों के संकट को और भी आसान कर दिया है।

हम बहुत फख्र के साथ कहते हैं कि आज हिंदी का महत्व एक बार फिर बढ़ गया है। लेकिन क्या यह ठीक उसी तरह नहीं जैसे बुच्ची और दाई (हिंदी पट्टी में काम निकालने और दुलार जताने का तरीका) तथा नेपालियों को बहादुर कहकर काम निकालते हैं। हिंदी कहां पा रही है प्रतिष्ठा, अवसर, मान्यता ? राज्य सत्ता के प्रतिष्ठानों में, शैक्षणिक संस्थानों में या सांस्कृतिक उपक्रम में या फिर सियासत के चकलाघर में ? पता नहीं आपकी निगाह में वह कहां है ?  हिंदी किसके लिए गौरव का मसला है, हिंदी किसको रोटी देती है ? जो रोटी कमाते हैं उनका हिंदी से कैसा लगाव है ? हमने हमेशा हिंदी के सवाल को बेहद सतही ढंग से देखा है। हिंदी की गलाजत को लोग किस तरह देखते हैं पता नहीं। सितंबर माह मन-मस्तिष्क पर हिंदी पखवाड़ा की तरह छया हुआ था और अभी भारतीय परंपरा के अनुसार पितृपक्ष समाप्त हुआ है। इसी के साथ गत सितंबर माह में 22-24 को दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में नौवां विश्व हिंदी सम्मेलन भी कई ढिंढोरों के साथ संपन्न हुआ है। ऐसे में रसमी तौर पर ही सही मैं हिंदी के पितरों-देवताओं को याद करते हुए यह टिप्पणी कर रहा हूं।

किसे इस बात की फिक्र है कि सिख कटार रखें तो वह आत्मक्षार्थ कहा जाएगा और दूसरे ब्लेड भी रखें तो पाकेटमार कहे जाएंगे। यहां कानून धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता को संरक्षण देता है। क्या भाषाई मसले पर हिंदी इसी सलूक का शिकार नहीं हो रही है। भाषा के नाम पर व्यवस्था हिंदी की केंद्रीयता को स्वीकार नहीं करना चाहती। पहली बार जब राजग सरकार में लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री बने थे तो अपने कार्यकाल के पहले राजभाषा दिवस के अवसर पर उन्होंने यह कठोर सत्य कह कर कितनों की आंख खोल दी कि सिर्फ हिंदी ही राजभाषा नहीं, आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी भारतीय भाषाएं राजभाषा हैं। संघ की भाषा से उनका सरोकार न तब था और न अब है। अब यह समझने की बात है कि उनका अभिप्रेत किसे अपदस्थ करना था और किसे स्थापित करना था। क्योंकि राजनीति में वह दौर सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय अस्मिताओं और आकांक्षाओं को तरजीह देने की प्रतिस्पर्द्धा का था। उस दौर में सत्ता पर आधिपत्य के लिए क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम पर कौन सी चीजें उभार पा रही थीं, कौन सजग था इन बातों से। हम जानते हैं कि भूमंडलीकरण का स्वाभाविक वैर उसके सबसे बड़े बाधक राष्ट्रवाद से होता है और राष्ट्रवाद क्षेत्रीय अस्मिताओं और आकांक्षाओं को निगलकार ही पुष्ट-प्रबल होता है। (यह बहस का विषय हो सकता है कि पश्चिमी मुल्क में छात्रों को राष्ट्रवाद पढ़ाया जाता है, पर अपने यहां राष्ट्रवाद के प्रति एक हेय भाव पैदा कर दिया गया है। यहां राष्ट्रवाद का मतलब पुनरुत्थानवाद से लिया जाता है।) लेकिन सियासी जंग में बाजी मारने के लिए संघ (आरएसएस) पोषित धड़ा किस तरह राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करता है किसी से छिपा नहीं। लेकिन इस दौर में हो क्या रहा था ब्लैक होल की तरह वाम, मध्य, दक्षिण सभी उसमें समा रहे थे। और अपनी खतरनाक मंशाओं के साथ क्षेत्रीयता को उभरने का मौका भी मिल रहा था। करेंसी नोटों पर सभी राजभाषाओं का अंकित होना क्या दर्शाता है ? अब तो इस प्रवृत्ति का विकास तसवीर तक हो गया। आवाज उठ रही है कि सिर्फ महात्मा गांधी ही क्यों उस पर अंबेडकर की भी तसवीर होनी चाहिए। हां, आगामी दिनों में सभी क्षेत्रीय अस्मिताओं की दावेदारी को देखते हुए दर्जन भर इतनी छोटी-छोटी तसवीरें होंगी जिनका होना न होने के बराबर होगा। फिर शायद नोटों से आदर्श और मूल्य दिखानेवाली तसवीरें और लिपियां ही बिला जाएं। ऐसे में यह सवाल ही नहीं बचता है कि हिंदी की आत्मरक्षा का सवाल सरकार कैसे भूल जाती है जो हिंदी की पक्षधरता के नाम पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, विनोबा भावे, नेहरू का हवाला देकर इसकी वकालत का ढिंढोरा पीटते नहीं थकती। जिस देश में राष्ट्रीय झंडा, राष्ट्रीय फल, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पेड़, राष्ट्रीय खेल और यहां तक कि राष्ट्रीय पशु (जानवर) तक है, पर कोई राष्ट्रीय (राष्ट्र) भाषा नहीं। क्या बापू के चेलों को याद नही कि उन्होंने कहा था कि बिन राष्ट्रभाषा राष्ट्र गुंगा है। क्या बापू के ये कथित चेले देश को गुंगा बनाने की मुहिम में नहीं लगे हैं? हिंदी हैं हमवतन हैं, हिंदोस्तां हमारा लिखनेवाले पाकिस्तान के लिए तथा जनगण, मन, अधिनायक जय हे लिखनेवाले ही आमार सोनार बांग्ला भी लिख रहे थे! आखिर कभी सोचा है आपने राष्ट्रीयता के लिए कैसी-कैसी सदिच्छाएं लिए लोग सिधार गए ! !

संस्कृति-सभ्यता की आदि जननी का देश कहलाने का गौरव लूटनेवाले इस देश की सांस्कृतिक गैरजिम्मेदारी और राष्ट्रीय बेशरमी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि आजादी के 65 सालों और संविधान बनने के 62 सालों बाद भी भाषाई गरिमा का ख्याल किसी को नहीं हमें याद नहीं कि विश्व हिंदी सम्मेलन में शिरकत को लेकर और पुरस्कार को लेकर विरोध तो कई हुए, प्रदेश के नाम पर कुरबानी के कई आंदोलन हुए, पर छोटे से देश बांग्लादेश की तरह भाषाई अस्मिता के सवाल पर मर-मिटनेवाले  एक भी संस्कृतिकर्मी, भाषाविद, लेखक या कवि सवा  अरब वाले इस देश में नहीं हुए। जिस बांग्लादेश ने राष्ट्र की अभिव्यक्ति के लिए बंगाली को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया तो हमें जान लेना चाहिए कि बांग्लादेश में भी 38 विभिन्न भाषाएं हैं, पर भाषावाद का ऐसा विवाद उनके यहां नहीं है। यह अलग बात है कि वहां की 98 प्रतिशत आबादी बंगाली बोलती है। बांग्लादेश की दूसरी बोलियां है चटगांवी, रंगपुरी, नोआखैला, सिझेती, अटांग, चाक, आशो, बान, फालम, हाका, खूमी, हाजोंग, खासी, कोच, कोड़ा, मारमा, मिती, मिजो, म्रू, ओराओं सदरी, पंखुआ, प्नार, राखआइन, रियांग, रोहिंग्या, संताली, सौरिया पहाड़िया, तांगचांग्या, तिप्पेरा, उसोई, वार-तांतिया आदि।

यही वह देश है जिसके प्रधानमंत्री जी जी - 20 के सम्मेलन में विदेशी भाषा में सभा को संबोधित करनेवाले एकमात्र विभूति होते हैं।(यह अलग बात है कि उनके मीडिया सलाहकार पंकज पचौरी हिंदी पत्रकार हैं। यह भी सवाल है कि पचौरी के लिए हिंदी कोी मसला है भी या नहीं। यह कभी प्रकट नहीं हुआ कि लगे कि वे हिंदी को लेकर क्या बरताव चाहते हैं)। जिन्हें (प्रधानमंत्री को) पराई धरती पर विदेशी रोकता है अंग्रेजी बोलने से और कहता है कि आप हिंदी बोलें वे समझ जाएंगे। आखिर देश के इतने बडे संवैधानिक पद पर होते हुए भी हम अपने भीतर की पंजाबीयत, बिहारीपना, बंगालीपना, मराठीपना से ही संचालित रहेंगे तो फिर हम भारत के कब होंगे ! न राष्ट्रपति होकर, न प्रधानमंत्री होकर हमारे भीतर का भारत जगता है तो फिर वह कब जगेगा यूएनओ जाकर क्या ? एक मुखिया जब अपने गांव-जवार में होता है तो वह स्वाभाविक तौर पर ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है, एक विधायक होता है तो वह विधानसभा क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है और जब वही एक देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति होता है तो वह एक राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। क्या यह सोचने की बात नहीं कि अन्य विकसित व कई पिछड़े मुल्कों की तुलना में भारत में यह जातीयता कितनी दीखती है? करेंसी नोट पर रिजर्व बैंक के गवर्नर का हिंदी में हस्ताक्षर तक तो यह बात दीखती है, लेकिन उसके बाद ! चीन या जापान के प्रधानमंत्री और लाओस व मोजांबिक के राष्ट्राध्यक्ष आखिर कहां से नहीं लगते कि वे वहां के नहीं हैं। लेकिन भारतीय राष्ट्राध्यक्ष (चमड़े का रंग व उच्चारण छोड़ दें) कहां से नहीं लगते कि वे अमेरिका या इंग्लैंड के किसी उपनिवेश का प्रतिनिधित्व नहीं करते ?

28 अक्तूबर 1923 को सवा छह सौ साल के ओटोमन साम्राज्य की सल्तनत के खात्मे के बाद मुस्तफा कमाल पाशा की ताजपोशी हो रही थी और राष्ट्रभाषा का सवाल था कि कौन सी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा हो। अधिकारियों ने इसके फैसले के लिए एक दिन की मोहलत मांगी, लेकिन अंत में पाशा ने बारह बजे रात में घोषणा कर दी कि आज से तुर्की की राष्ट्र भाषा तुर्की होगी। अरबी, बोसनियाई, कुर्दिश, सरकासियन जैसी भाषाएं वहां भी हैं, पर भाषाई केंद्रीयता के सवाल पर भारतीय ग्रंथिया वहां नहीं।
भाषा के प्रति यह प्रतिबद्धता भाषा की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका की समझदारी के बिना नहीं होती। इसकी बेहतर मिसाल फ्रांसिसी की राजकीय मान्यता को लेकर हुए वहां के संस्थागत प्रयास से मिलती है। उसका इतिहास इसकी गवाही देता है।
फ्रांस में भाषा-साहित्य को लेकर मौजूद लगाव जगजाहिर है। और जब जन का ऐसा रुख होगा तो उसके साथ व्यवस्था भी सुर में सुर मिलाती ही है। रोमन कैथोलिक चर्च के प्रभुत्व के कारण शुरू में तो वहां भी मध्य युगीन लैटिन का ही चलन था। पर बाद में आज से लगभग पौने चार सौ साल पहले 10 अगस्त 1539 को सम्राट फ्रांसिस प्रथम ने सारे राजकीय दस्तावेज फ्रांसिसी में ही लिखने का कानून बनाया था। आधुनिक फ्रांसिसी संविधान ने भी इसे अनुमोदित किया है। वहां की एकमात्र आधिकारिक भाषा फ्रांसिसी ही है। वैसे यह अलग बात है कि साल 2008 में वहां भी क्षेत्रीय भाषाओं को मान्यता दी गई है। फ्रांसिसी भाषा के बगैर वहां के व्यावसायिक विज्ञापन प्रकाशित प्रसारित ही नहीं हो सकते। यह अलग बात है कि इसके अलावे उसमें किसी भी भाषा का इस्तेमाल संभव । यही हाल वहां के कारोबारी और दफ्तरी कामकाज व संवाद का है। वैसे हम भारतीयों के लिए यह जानना बेहद रोचक है कि फ्रांसिसी क्रांति के समय वहां की आधी आबादी ही फ्रांसिसी बोलती थी। फिलहाल तो वहां की 92 फीसदी आबादी फ्रांसिसी बोलती है। भाषा की सांस्कृतिक-राजनयिक भूमिका के प्रति इस गंभीर और जिम्मेवार समझ का विस्तार वहां जारी अंग्रेजी विरोध में आप ढूंढ़ सकते हैं। किसी भाषा का विरोध तो किसी भी बिना पर जायज नहीं ठहराया जा सकता, पर जब भाषा दुश्मन प्रवृत्तियों को ठौर देने का जरिया बनाई जा रही हो या उसके जरिए दुश्मन प्रवृत्तियों को ठौर मिल रहा हो तो यह विरोध अनिवार्य हो जाता है। एक राजनीतिक उपनिवेश से बाहर आकर दूसरे बहुस्तरीय उपनिवेश में प्रविष्ट हम भारतीयों के लिए फ्रांस का उदाहरण बेहद प्रासंगिक है। फ्रांसिसी श्रमिक संघों और भाषा दबाव समूहों ने अपने सांसदों से फ्रांसिसी व्यवसायियों से कार्यस्थल, चाहे वह ईमेल हो या टेलीफोन या ली न्यूजलेटर, ली जॉब या ली वेब जैसे छोटे-मोटे शब्द उनके प्रयोग पर रोक लगाने की अपील करने को कहा है। इस दस्ता (फ्रेंच ब्रिगेड) के अगुवा सांसद जेक्स मियार अंग्रेजी भाषा को शत्रु मानते हैं। उनका कहना है कि इसने (अंग्रेजी ने) फ्रांसिसी फिल्म को अपना उपनिवेश बनाया, फ्रांसिसी संगीत में मिलावट लाया और अब यह लिंटरनेट और यहां तक कि लेस न्यूज पर ईमेल या लीमेल और सर ली वेब के जरिए फ्रांसिसी कार्यस्थल पर कब्जा जमाने लगी है। वे कहते हैं अब यह सब थम जाना चाहिए। उनकी सोच में यह बेहद खतरनाक है क्योंकि फ्रांसिसी भाषा फ्रांस की आत्मा है। यहां से मुनाफा कमानेवाले प्रतिष्ठान यहां (फ्रांस में) खुद की अपनी सांस्कृतिक प्रणाली-प्रविधि लागू करें तो यह भारी भूल होगी। आगे वे कहते हैं, आप जानते हैं कि इनसे बहुत पहले हम साम्राज्यवादी रहे हैं और हम जानते हैं कि यह (साम्राज्यवाद) कैसे काम करता है। इसलिए मेरा प्रबल भरोसा है कि यह प्रतिरोध का वक्त आ गया है और कहने का वक्त आ गया है कि अपनी मूर्खता बंद करें, नागरिक का सम्मान करें, अंग्रेजी के साथ फ्रांसिसी सीखें, जर्मन सीखें, चीनी सीखें और अरबी सीखें। वहां जारी इस अभियान को व्याकरण, शब्दकोष आदि के लिए 1635 में स्थापित नियामक संस्था फ्रेंच अकादमी का भी बल मिला हुआ है। वह आजकल के फ्रांसिसी के अंग्रेजीकरण को रोकने में लगी हुई है। फ्रांस समेत जर्मनी, न्यूजीलैंड व लगभग सभी विकसित-विकासशील दूसरे देशों की एक व्यवस्था है कि वहां किसी नौकरी या पाठ्यक्रम के सिलसिले में जाने पर कम से कम तीन माह के लिए वहां की भाषा के कार्यक्रम में शामिल होना पड़ता है। एक अमरीकी विश्वविद्यालय पेनसिल्वानिया विश्वविद्यालय में तो मैनेजमेंट के छात्रों के लिए हिंदी का पाठ्यक्रम अनिवार्य है। लेकिन इसके उलट अपने भारत में जो हो रहा है वह दूसरे मुल्कों के हिंदी के विद्वानों को तो शर्मसार करती है, पर हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अपने घर में हिंदी को लेकर मौजूद उदासीनता की फलश्रुति किस रूप में हो सकती है इसका अंदाजा इसी से लगाइए कि कुछ दिनों पहले आस्ट्रेलियाई सरकार की ओर से कहा गया था कि भारत भेजे जानेवाले राजनयिकों के लिए हिंदी जानना जरूरी नहीं। इसके पीछे उनका तर्क था कि भारत में सारा काम अंग्रेजी में हो जाता है। हालांकि चीन, जापान, इंडोनेशिया, ईरान आदि मुल्कों में जानेवाले राजनयिकों के लिए वहां की जबान जानना जरूरी है। हिंदी के प्रति राजकीय सरोकार देखना हो तो प्रसार भारती के समाचार प्रसारणों को देखें। समाचार प्रसारण के लिए अंग्रेजी में पौने चार घंटे की अवधि आवंटित है तो हिंदी के लिए सिर्फ ढाई घंटे ही। हाल की एक खबर है कि बिहार में हिंदी की दक्षता को लेकर राज्य सरकार के अधिकारियों की हुई एक परीक्षा में बेहद निराशाजनक परिणाम आए थे।

यहां तो कहने को नेताजी सुभाष चंद्र बोस से लेकर, गांधी, नेहरू और टैगोर तक को हिंदी की पक्षधरता के नाम पर कोट कर दिया जाता है, पर असलियत कौन नहीं जानता कि किसके मन में कितना हिंदी प्रेम था। डा. सुनीति कुमार चाटुर्ज्या का नाम तो हिंदी प्रेम के लिए बहुत जपा जाता है, पर उन्होंने भी हिंदी को रोमन में लिखे जाने की वकालत की थी। और हद तो तब हो गई जब हिंदी को संकटग्रस्त शब्द कहनेवाले उदय प्रकाश हिंदी के लिए रोमन लिपि की वकालत करने लगते हैं (17 सितंबर 2011 के दैनिक भास्कर के अंक के अलावे देखें उनके ही ब्लाग पर यह टिप्पणी - हिंदी एक संकटग्रस्त शब्द है )। आखिर भाषा को जब लिपि से ही काट दिया जाएगा तो ध्वनियों (फोनेटिक्स) का कोई रोल बचेगा भी? विद्वान व जीनियस कथाकार उदय प्रकाश के पास जरूर भाषा का कोई स्वप्न रहा होगा जब उन्होंने कहा था

चिंता करो मूर्धन्य " " की
किसी तरह बचा सको तो बचालो "ङ"
देखो,कौन चुरा कर लिए चला जा रहा है खड़ी पाई
और नागरी के सारे अंक
जाने कहाँ चला गया ऋषियों का " "

ऐसे उदय जी से सवाल है कि ध्वनि और लिपि का कोई मेल है या नहीं? यदि लिपि व ध्वनि में कोई मेल नहीं तो फिर phonetics क्या है ? अपनी अल्पज्ञता से तो मैं यही जानता हूं कि अंग्रेजी में आर्टिकिल के प्रयोग के पीछे ध्वनि का ही किस्सा है। हिंदी यदि भाषा है तो क्या ध्वनिकी की वहां कोई भूमिका नहीं है या नहीं होनी चाहिए। हां, यदि हम मानते हैं कि हिंदी कोई स्वतंत्र भाषा नहीं तो तब तो कोई बात नहीं। क्या यह हिंदी को हिंदी के घर में घेर कर मारने का इंतजाम नहीं कहा जा सकता है। मैं समझता हूं कि यह बहस का विषय है, श्रद्धा का नहीं। पर भाषाई मामलों में सरलीकरण कभी भी हितकारी नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि भाषाएं ऐसी भी हैं जो एक साथ कई लिपियों में लिखी जाती हैं। पंजाबी का उदाहरण लें। यह गुरुमुखी, देवनागरी व अरबी में लिखी जाती है। लेकिन यह हिंदी के लिए कोई मानक नहीं होगा। यदि हिंदी ज्ञान व तकनीक की भाषा नहीं बन सकी है तो इसमें भाषा की तकनीकी सीमा आड़े आती है या हमारी नीचताएं-तुच्छताएं-संकीर्णताएं और दुष्टताएं कि हमने उसे विविध क्षेत्रों में अंतर्क्रिया करने के अवसर ही नहीं दिए ? क्या अभिव्यक्ति की दृष्टि से जटिल चीनी को आर्थिक और तकनीकी विकास के लिए अपनी लिपि छोड़ देनी पड़ी या क्या जापान को जापानी से या फिर रूस को रूसी से किसी और भाषा की शरण में जाना पड़ा ? चीन की चित्र लिपि में तो एक ही वर्ण को ध्वनि के आधार पर चार तरीके से लिखा जाता है। क्या विकास की अंधी दौड़ में उन्होंने भी भाषा की प्रकृति-प्रवृत्ति को उपभोक्तावादी नजरिए देखना शुरू कर दिया है। विवेक की गिरवी रखकर इस तरह अंग्रेजी के प्रभुत्व को स्वीकार करना क्या एकध्रुवीय व्यवस्था को स्वीकार करना नहीं है। क्या बाजार की गोद में पूंजी केलिक्रीड़ा में रमने का इंतजाम नहीं कहा जा सकता है ? इन दिनों विदेशों में रहनेवाले भारतीय और पाकिस्तानी युवाओं में एक विचित्र तरह की इंडोपाक भाषिक चेतना जगी है। वे हिंदी और उर्दू को मिलाकर हमारी बोली नाम से एक नई भाषा को स्थापित करने के लिए सचेष्ट हैं। ये युवा शिकागो में हुए पहले अंतर्राष्ट्रीय उर्दू सम्मेलन में सैयद फसीहुद्दीन और कादर उन्नीस बेगम द्वारा पेश उद्दीन-बेगम हिंदी-उर्दू रोमनीकरण स्कीम के भी समर्थक हैं। यदि दोनों जबान मिल जाएं तो वह मंदारिन के बाद दुनिया की नंबर दो जबान बन जाएगी। चीन ने भी ऐसा ही किया। सांस्कृतिक क्रांति के पहले वहां प्रचलित तमाम भाषाओं को मिलाकर आधुनिक चीनी बना दी गई, जिसे हम मंदारिन कहते हैं। इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश भारत के पहले शिक्षण संस्थान फोर्ट विलियम कॉलेज के प्रधानाध्यापक गिलक्राइस्ट ने भी दोनों भाषाओं के लिए रोमन लिपि की वकालत की थी। लेकिन यह विदेशी प्रयास तो किस खास मकसद से किए जाने थे, अब किसी से छिपा नहीं रहा। छिपा तो तब भी नहीं था, पर तब हम असहाय थे। वैसे यह भी तथ्य है कि अब भी विदेशों में हिंदी शिक्षक बनने के लिए अरबी और देवनागरी लिपि की जनकारी जरूरी अर्हता में शामिल है। लेकिन उदय प्रकाश जी की चिंता तब सामने आ रही है जब 90 फीसदी भारतीय आबादी अंग्रेजी नहीं जानती है। अब तो कभी-कभी डर होता है सोचकर कि क्या अबूतर-कबूतर, रात में हारमोनियम, और अंत में प्रार्थना, वारेन हेस्टिंग्स का साढ़, पीली छतरीवाली लड़की, मोहनदास वाले उदय प्रकाश यही हैं, जिनका मानना है कि हम कैमरा जहां रखते हैं वहीं से फ्रेम तय हो जाता है। तो आप भी जरा देख लीजिए ना अपना फ्रेम कहां और कैसा बन रहा है।

उदय प्रकाश जी हिंदी की संकटग्रस्तता से इतने ही हारे हैं, इतनी ही ग्लानि है तो आप अंग्रेजी में उतर जाएं। आपकी अंग्रेजी भी तो कमाल की है। क्या आप हिंदी में सिर्फ इसलिए हैं कि यहां के लटके-झटके व तामझाम अंग्रेजी समुदाय जैसे समृद्ध नहीं। अपनी कहानियों के अंग्रेजी अनुवाद की बजाए आप खुद ही इसे अंग्रेजी में भी लिखे। कहीं अधिक प्रभावकारी नतीजे आएंगे। प्रेमचंद दोनों भाषाओं में अपनी कहानियों को लिखने के बजाए इनका अनुवाद किसी और से करवाते तो वही परिदृश्य नहीं होता जो आज देखने में आता है। भाषाविद तो हिंदी की लिपि देवनागरी और भाषा को वैज्ञानिक कहते नहीं अघाते। आखिर ऐसा क्यों हुआ है कि चीन ने चीनी भाषा में, जापान ने जपानी भाषा में और रूस ने रूसी भाषा में वह सब कुछ अर्जित कर लिया है जिस पर किसी मुल्क का ज्ञान-विज्ञान गौरव कर सकता है। मैं फिर कहूंगा कि सभ्यता-संस्कृति की आदि जननी कहलाने का गौरव लूटनेवाले इस मुल्क को अपनी भाषा में नवजात और पिछड़े मुल्कों से सीखना चाहिए कि उसने कैसे वह सब अर्जित कर लिया है जो एक सभ्यता भाषा में अर्जित करती है। भाषा की सीमा बताकर उसे आधुनिक दौर के लिए पिछड़ी भाषा करार देनेवाले निर्णायक भूमिका में बैठेंगे तो यही सब होगा जो कुछ यहां हो रहा है। यहां तक तो ठीक है, पर उदय प्रकाश जैसों की आवाज जब बाजारवादी सुर में शामिल होकर नया सुर रचती है, तब यह बड़ा सवाल एक संकट और चुनौती बन जाता है। गैरजरूरी या अवांछित लोगों का भाषा संस्कृति से सरोकार ठीक उसी तरह का मजाक है जैसे ढेरों रियलिटी शोज की ज्यूरी में बैठे लोगों को उस संबंधित विधा से दूर-दूर का वास्ता नहीं। आप क्या कहेंगे कि उड़ीसा के मानस साहू की टीम रेत की जिस कला विधा में अनूठा प्रयोग कर रही है और वे लोग जो अद्भूत प्रभाव छोड़ रहे हैं वह दुर्लभ है, लेकिन इंडियाज खोज टैलेंट -2 के फाईनल में जाने से उसे रोक लिया गया था। बाद में वाईल्ड कार्ड इंट्री से उन्हें मौका मिला। ऐसे कितने ही टेलेंट हंट रियलिटी शो चलते हैं जिनके ज्यूरी सदस्य को संबंधित विधाओं की एबीसी नहीं आती, बस सेलिब्रिटी होना ही ज्यूरी में शामिल होने की उनकी योग्यता है। कुछ इसी तरह का है कि हिंदी के भाग्य विधाता जो बन बैठे हैं या जिन्हें बनाया गया है उनका भाषा-संस्कृति कर्म से कोई सरोकार नहीं। इसके लिए जो संसदीय समिति है उसके अधिकांश सदस्य इसके उदाहरण हैं।

खतरा हिंदी वालों से है

विदेशियों ने जिस गौरव और सम्मान के साथ हिंदी से जुड़ाव महसूस किया है और उसे अपनाया है, कहीं न कहीं उसका ही फल है कि 176 विदेशी विश्वविद्यालयों में उसकी पढ़ाई चल रही है। हिंदी के प्रचार-प्रसार में जिस तरह केरल ने मिसाल कायम की है, वह हिंदी प्रदेश में नहीं दिखती। अंतराष्ट्रीय प्रकाशकों की दिलचस्पी हिंदी में होने से लेकर से लेकर विश्व सिनेमा बाजार तक में हिंदी सिनेमा की पूछ और एमएनसीज के लिए हिंदी का महत्व इस बात का सबूत है कि हिंदी का बाजार व्यापक हुआ है। हिंदी को बाजार इसलिए नहीं मिला है कि इसमें सरकार का कोई हाथ है। बाजार उसे मिलता है जिसका मास होता है। और बाजार में पैठ किसी संरक्षण के जरिए नहीं बनती। भारत का चीनी उद्योग इसीलिए कभी प्रभावित हुआ था क्योंकि इसे सरकारी संरक्षण मिला हुआ था। जिस किसी भी उद्योग को सरकारी (जड़) संरक्षण मिला होता है वह उन सहुलियतों और रियायतों के कारण खुली प्रतियोगिता का सामना नहीं कर पाता जिन्हें कंपीट कर बाजार में टिकना होता है। सरकार को करना ही होता तो पहले विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर आज तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में इसे स्थान दिलाने के नाम पर कोई भी पहल क्यों नहीं की, सिवाय इसके कि अपने विदेशमंत्रित्व के कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी में संबोधित किया। यह प्रयास इसलिए प्रचारात्मक कहा जा सकता है क्योंकि यह सदिच्छा से प्रेरित कम था और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरित अधिक। अन्यथा क्या कारण है कि इसकी कोई निरंतरता बाद में राजग के दुबारा कार्यकाल में नहीं दीखी। हां, मारीशस में हिंदी सचिवालय व वर्द्धा में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गए। नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन में लिए गए प्रस्ताव के अनुसार हिंदी को यूएनओ में जगह दिलाने के लिए लॉबिंग की जाएगी। इस पर होने वाले खर्च भी तय कर लिए गए। लेकिन होनेवाले प्रयास कैसे होंगे, यह देखने की बात है। नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन में सम्मानित होनेवाले ऐसे विदेशी विद्वान को मैं जानता हूं जिसे यह सम्मान कोई विशिष्ट नहीं लगता। उनके रूख से ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके दरवाजे पर जाकर जबरन उनके हाथ में कोई बोझ दे दिया हो।

हिंदी को जो जगह मिलनी है, अपने भरोसे वह तो मिल ही रही है, पर व्यवस्था का सहकार जहां चाहिए, वहां हम बेहद कमजोर पड़ जाते हैं। अपने मुल्क में ही इसे राष्ट्रभाषा बनाने के नाम पर विरोधियों की अपेक्षा हिंदीवाले (हिंदी जनपद अधिक) ही अधिक बिखरे नजर आते हैं। चीन. जापान. रूस, चेक, हंगरी में विदेशी हिंदी विद्वानों ने हिंदी शिक्षण की एक सुदृढ़ परंपरा कायम की है, पर उन्हें भी पीड़ा होती है हिंदी के घर में हिंदी को उपेक्षित देखकर। ऐसा लगता है जैसे भारत हिंदी का स्वाभाविक घर नहीं। गुलाम भारत में शक्ति (सत्ता) की केंद्रीयता के सवाल को लेकर रजवाड़ों में मनमुटाव, ईर्ष्या व संघर्ष का छिड़ा रहना आम बात थी, पर विदेशी ताकत के समक्ष झुकने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। आखिर अपने बीच का कोई शिखर पर तो नहीं है, यह देखकर उन्हें तसल्ली होती थी। विदेशी के बजाए किसी देशी शासक की केंद्रीयता बर्दाश्त नहीं थी। उनके सत्व-स्वत्व के विकास के लिए कहीं बेहतर स्थिति यह होती। कुछ-कुछ आज उसी तरह भारत एक भाषायी गुलामी के उत्तर औपनिवेशिक दौर में जी रहा है और हिंदी के मामले में भी वही हो रहा है। अंग्रेजी राज कर रही है तो कर रही है, पर कोई भारतीय भाषा तो नहीं है शीर्ष पर। बस यही स्थिति सुकूनदायक है विरोधियों के लिए। वे नहीं जानते कि उनका भाषागत विद्वेष अंग्रेजी के प्रभुत्व को कैसे मौका देकर उनके लिए भी कभी खतरनाक हो उठेगा।          
                                                                                                              जिस बंबइया फिल्मों को हिंदी के प्रचार-प्रसार का श्रेय दिया जाता है, उसकी पटकथा से लेकर संवाद तक सभी कुछ रोमन में लिखे होते हैं। अमिताभ, प्रियंका, मनोज वाजपेयी, आशुतोष राणा जैसे उंगली पर गिने जानेवाले हैं जो अपने संवाद हिंदी में मांगते हैं। लेकिन इससे होता क्या है। साल 2010 में (14 सितंबर 2010 के आसपास ) संसदीय राजभाषा समिति की बैठक का विरोध करनेवाले महानुभाव हलफनामा लेकर बता सकते हैं कि उन्होंने निजी स्तर पर इस हिंदी का कितना भला किया है। हिंदी माध्यम के विद्यालयों में कितनों के बच्चे व आश्रितों की शिक्षा-दीक्षा हो रही है। मैं तो कहता हूं कि सर्वशिक्षा अभियान के बाद से किसी भी जिला में विद्यालयों को आधारभूत संरचना की कमी नहीं रह जाएगी। किसी भी जिला का बजट एक अरब से कम नहीं होता। कोई भी ऐसा ब्रांडेड निजी विद्यालय नहीं जिसके शिक्षकों ने शिक्षक चयन प्रतियोगिता की परीक्षा न दी हो। इसका मतलब है कि सरकारी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की योग्यता पर आप सवाल नहीं उठा सकते हैं। जहां भ्रष्टाचार है, उसकी बात अलग है। ऐसे में आकाओं को सिर्फ एक बार सोच लेना है। वे सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चे पढ़ाने लगें तो देखिए जिम्मेवारी को लेकर सतर्कता उनके प्रदर्शन को कितना श्रेष्ठ कर देती है। यह तो सरकारी प्रतिष्ठानों में कामकाज की संस्कृति है जिसने विद्यालयों के वातावरण को दूषित कर रखा है और शिक्षक लचर दीखते हैं। यथार्थ वही नहीं जो दीखता है। 
      आप विपक्ष में हों या सत्ता में, इससे सत्ता पर प्रभाव कम नहीं हो जाता। क्योंकि विपक्ष भी तो एक सत्ता ही है। सत्ता से हमेशा मतलब सरकार से नहीं लिया जाना चाहिए। विपक्ष में रहकर भी आप रसूखवाले रहे हों तो आपका कोई काम नहीं रुकता। भाषा, देश, समाज की बात हो तो कन्नी काटने के लिए विपक्ष में बैठे होने के कारण व्यवस्थागत कई सीमाएं दिखाने लग जाते हैं। यही सीमा तब आड़े नहीं आती जब आपके निजी मसले होते हैं। सार्वजनिक जीवन से अर्जित निजी रसूख का इस्तेमाल भाषा-संस्कृति के मसले में क्यों नहीं होता। क्या सिर्फ इसका हलफनामा आप ले सकते हैं कि हिंदी से संबंधित जिम्मेदारियों या ओहदों पर होते हुए आपने निजी स्तर पर हिंदी के लिए क्या किया है। और इसके लिए जिम्मेदार क्षेत्रीय भाषा के लोग नहीं, हिंदी वाले ही है। पर हिंदी की रोटी खानेवाले और हिंदी पट्टी से आनेवाली विभूतियों ने क्या किया है यह एक सोशल आडिट का विषय है। आज क्षेत्रीय बोलियों के लिए आंदोलनरत लोगों में लगभग लोग हिंदी के ही होते हैं। मेरा विरोध बोलियों के आंदोलन से नहीं है। आप ऐसा करें, पर हिंदी के प्रति वैर ऱखकर नहीं। जो हिंदी वाले हैं वे तो जनपद की बोली के लिए हिंदी को खतरा मानते हैं। उनकी यह मान्यता शत्रुता तक चली जाती है। भोजपुरी के मंच पर, मैथिली के मंच पर, अंगिका के मंच पर जो हिंदी लेखक या हिंदी सेवी होते हैं क्या वे भी बालीवुड और मीडिया के हिंदीचूषक की तरह नहीं ? सुनिल गंगोपाध्यायों की बात मैं नहीं कर रहा। महाश्वेता देवी का हिंदी प्रेम जगजाहिर है, पर साहित्य अकादेमी में अध्यक्ष पद के चुनाव में उनके साथ क्या हुआ यह हिंदीवाले भूले नहीं होंगे। पर हिंदी से कट्टर शत्रुता जाहिर करने के लिए शोहरत हासिल करनेवाले सुनिल गंगोपाध्याय यदि अकादमी में जगह बना लेते हैं तो किसकी ताकत और कमजोरियों की वजह से ऐसा होता है, समझने की जरूरत है। मैं कोई भाषा आंदोलन करने की बात नहीं कर रहा और हिंदी वैरियों की शिनाख्ती नहीं कर रहा। मैं तो कहूंगा कि सुनिल गंगोपाध्याय का किलर स्टिंक्ट की एक हद तक जरूरत हिंदी वालों को भी है। बेडरूम से लेकर ड्राइंग रूम तक अलग-अलग रूपोंवाले ये कुलीन किसका भला करेंगे। हम क्यों नहीं इसे समझना चाहते कि बोलियों का भविष्य और हिंदी के संकट को अलग-अलग करके देखकर संकट को और हम भी गहरा कर रहे हैं। एक तरफ बोलियों ने हिंदी को सौंदर्य संपन्न और समृद्ध बनाया है तो हिंदी से उसे ढांचा और प्रौढ़त्व मिला है। यह मत भूलिए कि आपकी (आंदोलन में शामिल हिंदी लेखक) जिस ताकत और प्रभाव ने आंदोलकारियों को खींचा है, वह हिंदी में आपकी सक्रियता के कारण ही। हमें यह जानना चाहिए कि हिंदी यदि सशक्त होगी तो बोलियों का नुकसान नहीं होगा। क्योंकि हिंदी की प्रकृति और प्रवृत्ति बोलियों के अस्तित्व पर ही टिका है। बोलियों से दूरी ही उसे अंग्रेजी से बलात्कृत कर रही है। हिंदी की समृद्धि और सौंदर्य, उसकी ताकत खालिस हिंदी से निस्सृत नहीं, वह बोलियों की ताकत और खजाना है, जिससे हिंदी ने अपनी यात्रा जारी रखी है।

मैं सोशल ऑडिट की बात कई संदर्भों में कर हा हूं। राजकोषीय व्यय पर पलनेवाले विभाग और उनके अधिकारियों ने अपनी कुर्सीगत जिम्मेवारियों को निबाहते हुए हिंदी की अपेक्षाओं-आकांक्षाओं को कितना पूरा किया है, इसके आकलन का समय आ गया है। कहा जा सकता है कि हिंदी को खतरा हिंदीवालों से है, हिंदी प्रेमियों से नहीं। जिन्होंने हिंदी को जीवन दे दिया है उनसे भी नहीं। हिंदी प्रेमी हिंदीवाले नहीं। ऊंचे सरकारी गैर भाषिक सरोकार के ओहदे पर रहते हुए हिंदी के लिए जैसी चिंता और सरोकार प्रेमपाल शर्मा के हैं, हिंदी की रोटी खानेवाले राजकोषीय व्यय पर पलनेनावाले विभाग के शायद ही कोई अधिकारी वैसे हों। मैं दर्जन भर महामहिमों के नाम गिना सकता हूं जिन्होंने हिंदी अधिकारी, राजभाषा जीएम, अनुवाद ब्यूरो में निदेशकादि, अध्ययन केंद्रों में आरूढ़ होकर भाषा से इतर सक्रियता के कारण पहचान बनाई। किसी ने अलग राज्य के आंदोलन के लिए तो किसी ने सभा-सेमीनोरों के आयोजनों के कौशल से, किसी ने पुरस्कार के लिए लॉबिंग करके, तो किसी ने सैद्धांतिक अनुवाद की ऐसी पुस्तक लिखकर जिसकी कोई उपादेयता नहीं।

ज्ञान, संचार, संस्कृति के बाजार में बने रहने के लिए या लीड करने के लिए विकृति की जिस अनिवार्यता को स्वीकार्य मान कर चल रहे हैं, उसमें भाषा के लिए तो इतनी ही जगह बचेगी जिसमें हम अपनी मर्यादाओं (मां, मौसी, दीदी) को संबोधित भर कर लें तो बड़ी बात होगीमां, बाप, भैया, दीदी जैसे संबोधन बचे हुए हैं, बहुत बड़ी अचरजकारी खुशी की बात है यह। ज्ञान, संचार, संस्कृति के नायक चाहते तो एक दबाव और स्थिति बनती जिसमें हिंदी भी सर उठाती और बोलियां भी ताकत पातीं दरअसल भाषा के संकट को बोली के भविष्य से जोड़कर न देखने से जटिलता और भी बढ़ती गई। भाई, बेटे मरते रहें तो पिता कैसा विकास कर सकता है और बेटे या भाई से विच्छिन्न पिता जो विकास करेगा वह विकास भी होगा इसकी क्या गारंटी ? पिता का विकास बेटे की अस्तित्व रक्षा और भविष्य की चिंता से परे होकर संभव नहीं। क्योंकि बेटों के अस्तित्व पर ही पिता का भविष्य निर्भर करता है। बोलियां संकटग्रस्त रहेंगी तो भाषा का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा। बोलियां धमनियां हैं भाषा की। रक्त का प्रवाह उधर से ही होना है। किसी भी भाषा (या कम से कम हिंदी के मामले में) को प्रवाह, सौंदर्य बोलियों से ही मिलता है। जीवंतता बोलियों से ही मिलती है। राही मासूम राजा का आधा गांव, श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी, फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आंचल, भैरव प्रसाद गुप्त का गंगा मैया जैसे उपन्यास न होते तो हिंदी की समृद्धि और गौरव क्या वही होता, यह सोचने की बात है। एक तरफ विद्यापति को तो हिंदी में पढ़ाएं, कबीर को तो हिंदी में पढ़ाए, मीर और सूर को तो पढ़ाएं, रैदास को हिंदी में पढ़ाएं और इन सब पर हिंदी फख्र करे, पर जिन बोलियों मैथिली, भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी आदि में वे ग्रंथ हैं उनके अस्तित्व मात्र से घृणा करें तो यह कैसी बात होगी। और मुझे लगता है कि उनके न होने से बोलियों की लोच, लालित्य, मुहावरे, लोकतत्व, व्यंजनाएं भाषा को कहां से मिलेंगी। क्योंकि शायद ही कोई हिंदी भाषी हों जिनकी मातृभाषा हिंदी हो। आपने बंटवारा तो कर लिया लौकिक व वैदिक संस्कृत का, पर जिसे आप लौकिक संस्कृत कहते हैं क्या वह उतनी भी जीवंत बची है जितना वह उज्जैन में कभी थी। पुत्रहंता मां हो ही नहीं सकती। भाषा को अपने गौरव, शक्ति व भविष्य के लिए बोली की चिंता करनी ही होगी। अब बात आती है, तो फिर यह वैर मिटे कैसे। याद कीजिए आजादी की लड़ाई के दिनों में जब लोग अंग्रेजों से लोहा लेने में लगे थे, दलितों के मसीहा को चिंता थी कि दलितों की स्थिति में बदलाव के बिना मुल्क आजाद होता है तो दलितों की स्थिति और भी नारकीय हो जाएगी। इसलिए समाज का वह खेमा स्वतंत्रता संग्राम के बरक्स सामाजिक स्वतंत्रता के संघर्ष में अधिक जुता था। क्योंकि बड़े महापुरुष टाईप नेताओं को दलितों की स्थिति की कोई फिक्र नहीं थी। डा. अंबेडकर जैसों का विश्वास गैरवाजिब नहीं था कि सामाजिक मुक्ति के बिना राजनीतिक लड़ाई की जीत उन्हें आगामी समाजार्थिक लड़ाई में और भी पंगु कर देगी। यदि फिरंगी हुकूमत से लड़ाई में भिड़े प्रभुवर्ग के महापुरुषों को तभी यह फिक्र सताती तो आज सामाजिक न्याय का स्वरूप यह नहीं होता। क्या हिंदी की लड़ाई या हिंदी के भविष्य की चिंता में दुबले होनेवाले समय रहते बोलियों के संकट से रियलाइज कर जाएं तो यह दोनों के लिए हितकर नहीं होगा क्या ? संकट के दौर में बड़प्पन का परिचय नहीं देंगे तो फिर कानूनी हक आपको बहुत दिनों तक बड़े पद पर नहीं रख सकते यह भी तय है।

इसके लिए भाषा और संवेदना, भाषा और समाज जैसे रिश्तों की पड़ताल करनी होगी। स्थानीय बोलियों और भाषाओं में शिक्षा की सुविधा भर उपलब्ध करा देने से काम नहीं चलेगा रोजगार के अवसर समान करने होंगे। ऐसा नहीं है कि सारी प्रतिभाओं का ठेका अंग्रेजी या हिंदी ने ले लिया है, लेकिन सारे अवसर तो इन्हें ही मिल रहे हैं। एक कदम आगे बढ़कर कहें तो उस अंग्रेजी के पास सारे अवसर सिमट रहे हैं जिसे बोलनेवाले ब्रिटेन तक में भारत से भी कम हैं। यह आंकड़ा है कि भारत अकेला ऐसा देश है जहां अंग्रेजी बोलनेवाले सर्वाधिक हैं। स्वाभाविक है कि बोलियां खतरे में पड़ी हैं।
करीब 6000 भाषाओं में से एक-चौथाई को बोलने वाले सिर्फ एक ही हजार लोग बचे हैं। इनमें से भी सिर्फ 600 भाषाएं ही फिलहाल सुरक्षित होने की श्रेणी में आती हैं। इस बीच कोई नई भाषा के जन्म हो ऐसा कोई उदाहरण हम नहीं जानते। हां, इसके बजाए यह तथ्य जरूर उजागर हुआ है कि हर पखवारे एक भाषा मर रही है। भारत में भी कई भाषाएं हैं जिनपर खतरे की घंटी बज रही है। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में 196 भाषाएं ऐसी हैं जिन पर उन विलुप्ति की घंटी बज रही है और विलुप्ति की य दर दुनिया में सबसे ज़्यादा भारत में ही है। इसके बाद नंबर आता है अमेरिका का, जहां 192 ऐसी भाषाएं हैं जो संकटग्रस्त हैं। 1962 के एक सर्वे में भारत में 1,600 भाषाओं का अस्तित्व बताया गया था और 2002 के आंकड़े बताते हैं कि 122 भाषाएं ही सक्रिय रह पाईं। दुनिया भर में इस वक्त चीनी, अंगरेजी, स्पेनिश, बांग्ला, हिंदी, पुर्तगाली, रूसी और जापानी कुल जमा आठ भाषाओं का राज है। दो अरब 40 करोड़ लोग ये भाषाएं बोलते हैं। किसी भी देश में भाषा के विकास को देखना हो तो आप वहां के विकास में स्थानीयों की शिरकत क बैरोमीटर से इसे देखें। विकास के सहभागी तबकों को देखें। औद्योगीकृत केंद्रों में रोजगार के ढांचे को देखें। विकास के साझीदार जब विजातीय होंगे तो उनका संवेदनात्मक लगाव कितना होगा वहां के समाज से। विचित्र है कि बोलियां छीजेंगी और भाषा समृद्ध होगी, ऐसा कैसे होगा। (कथादेश, नवंबर 2012 में प्रकाशित)

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