हमसफर

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

क्या मैं माओवादी हूं ?

ग्लैड्सन डुंगडुंग


(उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चित हुए ग्लैड्सन डुंगडुंग की कहानी से जनजातीय उत्पीड़न और विस्थापन का दर्द जाना जा सकता है। आवारा राजनीति और निर्बंध विकास के गल्ले से विस्थापन की पीड़ा नहीं सुनी जा सकती है। इसे विस्थापन के खिलाफ लड़नेवालों से नहीं जाना जा सकता है। यह वही सच है जिसे निराला ने लोहे का स्वाद मे कहा है –

लोहे का स्वाद
उस लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
नीचे दिया जा रहा उनका लेख 2010 की जुलाई मे लिखा गया था और www.countercurrents.org मे छपा पा। हिंदी मे उल्था कर इसे यहां दिया जा रहा है। डुंगडुंग झारखंड ह्यूमन राइट्स मूवमेंट (जेएचआरएम) के महासचिव है। लगातार पुलिस अत्याचार तथा जनजातीय मसलों पर लिख-बोल रहे हैं।  33 वर्षीय यह आदिवासी युवा योजना आयोग की उपसमिति का सदस्य है। - मोडरेटर।)

मैं अपने मानवाधिकार संबंधी कार्यों, लेखन तथा भाषणों के जरिए सार्वजनिक जीवन मे आया। हालांकि, गत सप्ताह (03 May, 2010) सीएनएन-आईबीएन तथा एनडीटीवी 24x7 पर नक्सलवाद पर चल रही एक बहस से एक बड़े श्रोता वर्ग तक पहुंचा। इन बहसों के बाद देश भर से मुझे ढेरों सकारात्मक व नकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिलीं। नकारात्मक प्रतिक्रियाओं मे से अधिकांश उन युवाओं के थे जो अनजाने ही बाजार की ताकत के पीछे लट्टू हैं, थोड़े समय के लिए मैं इससे कुछ परेशान रहा। वे बड़े कठोर अंदाज मे पूछ रहे थे कि मुझे राज्य के खिलाफ बोलने के लिए पाकिस्तान, नेपाल या चीन किससे पैसे मिल रहे हैं। उनमे से कुछ को तो मैने विस्तृत स्पष्टीकरण दिया, लेकिन बहुतों को इसके विरोध या समर्थन मे पी चिदंबरम की थ्योरी का प्रभाव दीखता था, इसीलिए वे मेरे तर्कों को मानने के लिए तैयार नहीं थे।

इसी बीच, भारत के अंतिम कतार के लोगों से जुड़े वाजिब मुद्दों को उठाने का काम मैने जारी रखा। बीच मे माओवादियों के साफए के नाम पर झारखंड मे आपरेशन ग्रीन हंट लाया गया। पूरे आवेग के साथ मैने आपरेशन ग्रीन हंट की सचाई, इसके पीछे निहित राज्य के मंसूबे तथा आपरेशन से पैदा ग्रामीणों की पीड़ा को सामने लाने की कोशिश की। नतीजतन तथाकथित शिक्षित लोगों ने मेरे खिलाफ अधिक व्यक्तिगत हमलों को तीव्र किया। कुछ ई-ग्रूप हैं, जहां माओवाद के हमदर्द और समर्थक के रूप मे मुझे उछाला गया। अंततः उन्होंने मुझे माओवादी विचारक के रूप मे चित्रित किया। मै सिर्फ हंसकर रह जाता हूं। संक्षेप मे यही कि कैसे कोई माओवाद का गहन अध्ययन किए बगैर अचानक माओवादी विचारक बन जाता है ? मैने माओवाद का कभी कोई अध्ययन नहीं किया।
मैने इरादतन किसी विचारधारा का अध्ययन नहीं किया, क्योंकि मै जानता हूं कि माओवादी आदिवासियों को माओवाद का पाठ पढ़ाते हैं, गांधीवादी गांधीवाद का उपदेश देते हैं और मार्क्सवादी मार्क्स के बताए रास्ते पर चलने को प्रेरित करते हैं ; लेकिन किसी को आदिवासीवाद की चिंता नहीं, जो कि इनमे सर्वोत्कृष्ट है, शायद वही न्यायपूर्ण समतामूलक समाज तक ले जाता है। भारतीय समाज ने किस तरह आदिवासीवाद को नष्ट किया है, इस पर मै लगातार सवाल उठाता रहा हूं। जनजातीय धर्म को भारतीय संविधान की मान्यता नहीं मिली थी, परंपरागत स्थानीय स्वशासन उपेक्षित थे, संस्कृति नष्ट कर दी गई, जमीन हड़प ली गई और विकास के नाम पर हमारे संसाधन छीन लिए गए। लेकिन हम इस सबसे क्या पाते हैं ? क्या हमे चुप रहना चाहिए ? क्या हम इस देश के नागरिक नहीं है जिन्हें समान बर्ताव की जरूरत है ? क्या उन्हें हमारी पीड़ा का ख्याल है ?
मैं उन अभागे लोगों मे से एक हूं, जिसने देश के तथाकथित विकास के नाम पर सब कुछ खोया है और आज भी बचे रहने की लड़ाई लड़ रहा हूं। मै जब सिर्फ एक साल का था, मेरा परिवार विस्थापित हो गया था। विकास के नाम पर हमारी 20 एकड़ उपजाऊ जमीन ले ली गई। हमारी पुश्तैनी एक बांध मे डूब गई, जो 1980 मे सिमडेगा शहर के निकट चिंदा नदी पर आया। हमने अपना घर, खेती की जमीन तथा बागान खोया और मुआवजे के रूप मे सिर्फ 11 हजार रुपए मिले। जब पूरे गांव ने इसका विरोध किया तो उन्हें हजारीबाग जेल भेज दिया गया। क्या छह लोगों का कुनबा इस 11 हजार रुपए से अपना खाना, कपड़ा, आशियाना, पढ़ाई तथा सेहत की भरपाई कर सकता है ?
विस्थापन के बाद जीवन निर्वाह के लिए हमारे पास घने जंगल मे जाने के सिवा और कोई चारा नहीं था। जमीन का एक छोटा टुकड़ा खरीद कर जंगल मे हम व्यवस्थित हो गए। फल-फूल, जलावन चुनकर हम परिवार को सहारा दे रहे थे। हमारे पास पर्याप्त पशुधन भी थे, जिससे घर की अर्थव्यवस्था को सहारा मिला। कहने की जरूरत नहीं कि राज्य का उत्पीड़न फिर भी जारी रहा। जंगल मे रहते हुए ही मेरे पिता को वन विभाग (मुल्क का सबसे बड़ा जमींदार) ने अतिक्रमणकारी और लकड़ी काटनेवाले के रूप मे आरोपित कर कई केस में जेल मे डाल दिया। हमारे गांव मे कोई विद्यालय भवन नहीं था, इसलिए हम पेड़ के नीचे पढ़ा करते थे और बारिश होने पर हमारे विद्यालय बंद हो जाते। लेकिन मेरे पिता ने हमेशा हमें न्याय के लिए लड़ना सिखाया। हालांकि वे घर को संभालने के लिए संघर्षरत थे, पर समुदाय के लिए अपनी लड़ाई उन्होंने कभी नहीं छोड़ी।
दुर्भाग्यवश, 20 जून 1990 को एक केस की सुनवाई के लिए सिमडेगा सिविल कोर्ट जाते समय मेरे माता-पिता की क्रूर हत्या कर दी गई और चार बच्चे अनाथ कर दिए गए। कोई कल्पना नहीं कर सकता है कि उसके बाद हम पर क्या गुजरी ? सबसे बुरी बात यह है कि दोषियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। कोई बता सकता है कि भारतीय राज्य ने हमें न्याय क्यों नहीं दिया, जिसने विकास के नाम हमारी जमीन छीन ली ? आज तक हमारे गांव मे बिजली क्यों नहीं है ? मेरे लोगों के खेत को सिंचाई के लिए पानी क्यों नहीं मिलता जिनकी जमीन सिंचाई परियोजना के लिए ली गई थी ? उन घरों मे बिजली नहीं पहुंची है जिन्होंने अपनी जमीन बिजली परियोजना के लिए दी थी ? और अब भी वे मिट्टी के घरों मे क्यों रहते हैं जिनकी जमीन इस्पात संयंत्र के लिए ली गई थी ? इसका मतलब कि आदिवासियों का जन्म सिर्फ तकलीफ उठाने के लिए हुआ है और दूसरे हमारी कब्र पर मस्ती करें।
एक लंबी जद्दोजहद के बाद हम सभी को जीवन तो मिला, पर मेरे दुख और पीड़ा यहां खत्म नहीं हुए। एक बार जब मै यूरोपीय आयोग द्वारा वित्तपोषित एक परियोजना मे राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी के रूप में काम कर रहा था तो राज्य के एक वरीष्ठ पदाधिकारी और एक अखबार के संपादक (दोनों ही उच्च जाति के) ने मेरी पात्रता पर सवाल उठाया कि एक आदिवासी होकर मै इस बड़े ओहदे पर कैसे पहुंचा ? इसी तरह एक बार मेरा एक दोस्त उच्च जाति के एक नवविवाहित जोड़े से मिलाने मुझे रांची ले गया। मुझे यह कहते हुए दंपती से मिलने नहीं दिया गया कि मै आदिवासी हूं और मैं यदि उनसे मिल लूं तो वे अशुभ हो जाएंगे और उनका समस्त जीवन दांव पर लग जाएगा। क्या में उनके लिए शैतान था ?
फिर भी, दूसरे प्रतिष्ठान मे जाने पर मुझे पूरी तरह प्रभावशून्य रखा गया और मुझे वह जगह नहीं दी गई, जिसका मै प्रबल दहकदार था। नस्लीय आधार पर मेरे साथ पक्षपात किया गया, आर्थिक रूप से मेरा शोषण हुआ और मानसिक रूप से परेशान रहा। क्या कोई मुझे बताएगा कि मुझे न्याय के लिए क्यों नहीं लड़ना चाहिए ? क्या अन्यायपूर्ण विकास प्रक्रिया के समर्थकों मे से कोई भी, जिन्होंने देश के तथाकथित राष्ट्रीय हित के नाम पर अपनी एक इंच जमीन तक नहीं दी, बता सकता है कि माओवादी विचारक, हमदर्द और समर्थक के रूप मे मेरा नाम क्यों उछाला गया : अन्याय, असमानता और भेदभाव के खिलाफ क्यों मुझे क्यों चुप रहना और लेखन बंद रखना चाहिए ?  
विकास के नाम पर मैने अपना सब कुछ खो दिया और अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है इसलिए मैंने अपने लोगों के लिए लड़ना तय कर लिया है, क्योंकि मै नहीं चाहता कि वे भी मेरी तरह विकास के नाम छले जाएं। मैने संघर्ष के लिए जनतांत्रिक रास्ता अख्तियार किया है, संविधान के अनुच्छेद 19 मे इसका प्रावधान है। कलम, मुंह और मन मेरे हथियार हैं। मैं न तो माओवादी हूं और न ही गांधीवादी, लेकिन मै एक आदिवासी हूं, जो कि अपने लोगों के लिए लड़ने को कटिबद्ध है, जिसे भारतीय राज्य ने अलग-थलग, विस्थापित और संसाधनों से बेदखल कर दिया है। और आज भी रह-रहकर विकास के नाम पर, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के नाम पर जारी है।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. थोड़े विस्तार में बोलें तो विमर्श का माहौल बने। कोई सूत्र पकड़ में आए। ब्लाग पर आने के लिए धन्यवाद। लेकिन बहुत खेद है कि हिंदी मे ब्लागिंग परिप्रेक्ष्य नहीं बना पा रही है। इधर कबीर बंधु के कबीर गायन पर एक रिपोर्ट पोस्ट की है। देखकर बताइए।

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