हमसफर

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

समाजविरोधी विकास की नींव में है राजनीतिक संस्कार

       पल रहा है विकास का कीटनाशक सिद्धांत


सन दो हजार के नवंबर में जब तीन नए राज्य बने तो उनमें से झारखंड शायद एकमात्र राज्य था जहां किसी मुल्क से आजाद होने जैसा उल्लास था और उम्मीदों के पुल कुछ उसी तरह बांधे जा रहे थे जैसे कि भारत में सुराज से बांधे गए थे। उन तीनों मे से उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ का लगभग कायाकल्प हो चुका है। विकास के लिए भारतीय राज्य मे संभव माहौल वहां खड़ा हुआ। और दूसरी तरफ झारखंड में  जनजातीय उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। यदि बिहार मे 900 करोड़ रु का चारा घोटाला था तो झारखंड में मधु कोड़ा का चार हजार करोड़ रु का घोटाला। यहां कोड़ा जैसे दर्जनों नेता पैदा हो गए। यह सब कुछ हो रहा है मांदर की थाप पर। हां, एक विशेष बात यह हुई कि यूपी और मध्य प्रदेश बीमारू प्रदेश में आज भी आदर्श बने हैं, तो बिहार राष्ट्रीय फलक पर विकास और सुशासन के मानक गढ़ रहा है। उसकी प्रशंसा मे विरोधी पार्टियों के नेता भी जी नहीं चुराते। छत्तीसगढ़ भी तो आदिवासी बहुल राज्य था, लेकिन क्या विकास के लिए उसने सामाजिक सौहार्द्र का ताना-बाना छिन्न-भिन्न किया। क्या वहां भी बाहरी-भीतरी का कोई कुरुक्षेक्ष बना ?  इसे कौन नहीं जानता कि असंतोष और वैमनस्य की राजनीति में आसानी तो है, पर यह विकास का कोई रास्ता नहीं दे सकती। झारखंड अलग राज्य बन जाने से किसका कल्याण हुआ ? दलितों को रामराज का ख्वाब दिखानेवाली माया जिस तरह 87 करोड़ रु की निजी संपत्ति की मालकिन हो गई, पर दलितों को दलित नेताओं की प्रतिमा देखने के अलावा क्या हासिल हुआ। झारखंड मे भी निरीह आदिवासियों को अपने संपत्तिशाली सीएम व नेताओं को देखने के अलावे क्या हासिल हुआ। सारे सीएम आदिवासी हुए, पर विकास का जखीरा किनके पास हैं। हमे समझना चाहिए कि जन्म की प्रक्रिया मे ही जीवन के विकास सूत्र निहित होते हैं। बेहद कृत्रिम परिस्थिति मे, एक राजनीतिकि प्रतिशोध के माहौल मे इस झारखंड का जन्म हुआ। कौन नहीं जानता है कि झारखंड पार्टी (जयपाल सिंह) एक जमाने मे कांग्रेस के हाथों बिक गई थी। झारखंड स्वायत्त परिषद (जैक) की सुविधाओं के लिए झारखंड के धुर विरोधी लालू यादव के पीछे शिबू सोरेन और सूरज मंडल (झामुमो) लट्टू हो गए थे, आखिर इसे कौन नहीं जानता ? हम सभी उसके नतीजे को भोग रहे हैं। यहां कोई भी आंदोलन कुछ दिनों तक चलता जरूर है, पर शीघ्र ही शीर्ष पर पहुंचा नेता खरीद-फरोख्त मे शामिल हो जाता है। या तो उसे ही बेच दिया जाता है या फिर वही आंदोलन को बेच डालता है। यहां हमेशा ही एक विजनरी नेता की कमी रही। रामदयाल मुंडा का अध्ययन गहरा हो सकता है, पर मूलवृत्ति तो उनकी भी सूरज मंडल जैसी ही थी। 1992 में एक बार दुमका के ललमटिया में श्री मंडल ने खुलेआम अपने भाषण मे बाहरी लोगों को मारकर भगाने की बात कही थी। लगभग झारखंडी नेता के सुर मिलते रहे हैं। इधर अपनी मौत से कुछ पहले डा. रामदयाल मुंडा की यह मान्यता प्रबल और प्रखर रूप मे सामने आ रही थी कि प्रदेश के विकास के लिए जमीन को बाहरी लोगों के हाथों मे जाने से रोकना होगा। दुर्गा उरांव द्वारा छेड़े गए सीएनटी के इस उफान की पृष्ठभूमि मे इसे देखा जा सकता है। सर्वाधिक विचित्र बात यह है कि जिस बिहारी के विरोध मे सारी मान्यताएं, विचार और आंदोलन पनप रहे हैं, उसी झारखंड को बिहारी सलाहकारों (सुरक्षा-डीएन गौतम, विकास-आरसी सिन्हा) की जरूरत पड़ रही है। हां, यह अलग बात है कि सरकार मे मौजूद अंतर्विरोध से कार्यबल को बल मिलता है और नतीजतन असहयोग का माहौल तैयार होता है। इसी माहौल से आजीज आकर दोनों ही सलाहकार प्रदेश को अलविदा कर दें तो ताज्जुब नहीं। इस मुल्क को जितनी मुश्किल अल्पसंख्यकों को स्वीकार करने मे नहीं हुई, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल झारखंडी नेताओं-मंत्रियों को बाहरियों को स्वीकारने मे हो रही है। नतीजा सारा प्रदेश भुगत रहा है। महाराष्ट्र में बाहरियों पर जब गाज गिरती है तो इसी झारखंड के लोग पानी पी-पीकर राज ठाकरे को कोसते रहते हैं। और जब राजनीति की बारी आती है तो राज उनके रालमाडल बन जाते हैं। राज ठाकरे के कई रूप हैं।

समझौतों के रास्ते चलकर विकसित आंदोलन के नेता आखिर क्या दे सकते हैं सिवाए डोमिसाइल या सीएनटी के ? साठ के दशक में जब विनोद बिहारी महतो की धनबाद कचहरी में वकालत चमक रही थी तो उनका गुमाश्ता कौन था ? बोकारो स्टील प्लांट लगने से विस्थापित हुए लोगों पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था। इन विस्थापितों के मामले (केस) वकील साहब को लाकर कौन दे रहा था ? इसी लेन-देन में अविश्वास के सवाल पर बोकारो से आया एक आदिवासी धनबाद के हीरापुर मे लाठी लेकर उनपर टूट पड़ा था। लहूलुहान वकील साहब के माथे पर वह दाग अमिट रहा, पर झारखंड के चप्पे-चप्पे पर लगी प्रतिमाओं में किसी भी प्रतिमा पर यह दाग नहीं। कोई बता सकता है ऐसा क्यों हुआ। वकील साहब के इस गुमाश्ते को रोज के हिसाब से खाना-खोराकी दी जाती थी, इसका भी हिसाब दर्ज है। कहा जाता है कि वकील साहब के किसी नवाब के पास आज भी वह रिकार्ड है। वकील साहब का वह गुमाश्ता झारखंड ही नहीं देश की आदिवासी राजनीति का हीरो बना हुआ है। विनोद कुमार के उपन्यास समर शेषऔर मनमोहन पाठक के  “गगन घटा घहरानी में इसका कोई जिक्र नहीं। एक मूर्ति गढ़ी गई है, निष्प्राण-सी। जिन विनोद कुमार को पत्रकार हरिवंश की आंखों मे भूरापन दीखता है, उन्हे किन कारणों से यह सब नहीं दीखा। ताज्जुब। यह समझने की बात है। निजी असंतोष-क्षोभ के बुखार से पीड़ित हो उन्होंने एक कहानी ही लिख दी – भूरी आंखें। चर्चित हिंदी पत्रिका 'कथादेश' के 2011 के मीडिया विशेषांक  में यह कहानी छपी थी। सर्जना साधारणीकरण जरूर है, लेकिन दृश्य पर व्यक्तिगत का आरोप नहीं। सर्जना तो व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठाती है। झारखंड बनने पर विजनरी नेताओं की घोर कमी रही। जो नेता थे, उन्हें या तो चाटुकार चाहिए थे या फिर कमजोर दिल-दिमाग वाले भोले नेताओं को घेरने के लिए दलाल स्ट्रीट तैयार थी। यही कारण है कि जिन्हें पूरे राज्य के लिए पूज्य, सम्माननीय, होना चाहिए था, उन्हें एक विधानसभा क्षेत्र मे बेजमीन कर दिया जाता है। कौन नहीं जानता कि इसके पीछे कई विद्रूपताएं, विकृतियां हैं। गुरुजी की यह गलाजत भले एक दिन की नहीं है, पर कीटाणु जो रहता है वही प्रबल होकर आक्रांत करता है।

विकास के लिए विस्थापन और विस्थापन से उठे पुनर्वास के सवालों के साए मे इसकी दूरगामी चिंताएं यदि धूमिल कर दी जाती है तो इसका कारण समझा जा सकता है। कारपोरेट दबाव व प्रलोभन के अपने सियासी समीकरण हैं। तात्कालिक राहत के लिए मुआवजे, नियोजन और पुनर्वास की जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, वह उस दूरगामी चिंता और संकट का हल नहीं हो सकती। विस्थापन से जब एक पूरी नस्ल उजड़ जाती है, भाषा-संस्कृति का तानाबाना गुम हो जाता है, एक पराएपन के आश्रय मे जीवन का हक दिखाया जाता है। सवाल है कि ऐसे में उस समाज को वापस लाया जा सकता है क्या जो अपनी भली-बुरी, छोटी-बड़ी पहचान की रोशनी मे सतत संघर्ष का आधार खोजकर सपने को सच करने मे जुटा रहता है। जिस जंगल से मानव अस्तित्व का सवाल जुड़ा है, क्या उसके रखवाले को उजाड़कर उस जंगल को बचाया जा सकता है। और नहीं तो फिर हरियाली के बिना किस जीवन का ख्वाब है नशीली आंखों मे ? -- क्या झारखंड मे बंजर व गैर-कृषियोग्य भूमि खत्म हो गई जो जंगल काटे जा रहे हैं और बस्तियां उजाड़ी जा रही है ? 38 लाख हेक्टेयर कुल सिंचाई योग्य भूमि होने के बावजूद 1.57 लाख हेक्टेयर यानी 8 प्रतिशत ही भूमि सिंचित है। यहां किस सीएनटी की मेड़ ने पानी को रोक रखा है ? आखिर पलायन कर चुके हजारों-लाखों झारखंडियों को महानगर के जाल में उलझकर कबतक रहने दिया जाएगा। किस सीएनटी के उल्लंघन ने रास्ता रोककर रखा है। जिस दुमका की जमीन पर दिशोम गुरु और बाबूलाल मरांडी अपनी सियासी बिसात बिछाते रहे हैं, आखिर उन्हें उसी प्रमंडल के पाकुड़ और साहिबगंज में वनाधिकार का उल्लंघन क्यों नहीं दीखता। वन माफियाओं ने पहाड़-जंगल काटकर जिस तरह ऐतिहासिक विरासतों को संकट में डाल दिया है वह बड़ा सवाल है, लेकिन इस पर किस का ध्यान है। क्या वन माफिया जब जंगल और पहाड़ काटते हैं तो कोई आदिवासी संकटग्रस्त नहीं हो रहा। आखिर माफिया की गलबांही कौन कर रहा है। वहां जिंदगी बहाल करने के लिएकिस सीएऩटी की जरूरत है।

आप आरएंडआर की पालिसी से एक पीढ़ी के प्रतिरोध को खत्म कर देंगे, पर अस्तित्व की चिंता से जब आगामी पीढ़ियां व्याकुल होंगी, प्रश्नाकुल होंगी और उनकी छटपटाहट किसी सामाजिक-राजनीतिक हिलोर को पैदा करेगी तो क्या राज्य-व्यवस्था उसे संभाल पाएगी। विकास के ये औजार ऐसे है जिनके दुष्प्रभाव तत्काल नहीं दीखते, पर कीटनाशक की तरह आगामी पीढ़ी को निगलते हैं और क्रमशः पूरा समाज इसकी चपेट मे आ जाता है। जिस तरह कीटनाशकों से अस्थमा, जन्मजात विकृतियां, कैंसर, हार्मोन जन्य विकृतियां, तंत्रिका संबंधी गड़बड़िया आदि उत्पन्न होती हैं, उसी तरह विकास के कीटनाशकों का भी अपना असर होता है। झारखंड के मर्म से जुड़े नेताओं का हाल देखिए। राज्य बनने के आठ साल बाद एक आरएंडआर पालिसी बनी भी तो बाद मे आई शिबू सोरेन की सरकार मे शिबू सोरेन ने खुद ही इस पर दुबारा विचार करने के नाम पर इसे ठंडे बस्ते मे डाल दिया।

अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए प्रशासन अमानवीय रुख तो अख्तियार कर सकता है, पर विकास के नाम पर भऱी-पूरी आबादी का विस्थापन भी तो एक अतिक्रमण है। आखिर यहां मानवाधिकार को कौन बहाल कराएगा। कौन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका है जो समाज को सरकारी अतिक्रमण से मुक्ति दिलाएगी। सिमडेगा के ग्लैड्सन डुंगडुंग के खाते-पीते घर के पास तीस एकड़ जमीन थी। बांध के नाम पर गई उसकी सारी जमीन के एवज मे उनके घर को कुल 11 हजार रुपए मिले। यह बस दो दशक पहले की बात है। वन-विभाग की ज्यादतियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई के चक्कर मे उनके माता-पिता की निर्मम हत्या कर दी गई। यदि ग्लैड्सन डुंगडुंग आज खुद के बूते पढ़े-लिखे नहीं होते तो कितनों को राज्य सत्ता का यह सच पता होता ? क्या किसी सरकार के पास या सत्तापोषित किसी संस्था के पास ऐसे ग्लैड्सन डुंगडुंगों का कोई आंकड़ा है ? किस सीएनटी एक्ट ने उन्हे उजड़ने से रोका। उनके अधिकारों की कितनी रक्षा हुई ? यह 33 वर्षीय नामी मानवाधिकार कायकर्ता ग्लैड्सन डुंगडुंग यदि आज झारखंड इंडिजेनस पिपुल्स फोरम का संयोजक, नवजीवन का संस्थापक सचिव, झारखंड ह्यूमन राइट मूवमेंट का महासचिव तथा योजना आयोग की एक उपसमिति का सदस्य है तो यह किसी की कृपा से नहीं। लेकिन सवाल है कि कितनों में ऐसा प्रतिरोध है जो जीवन-मरण के संकट के बीच से अपने को इस रास्ते पर ले चलने का माद्दा पैदा कर पाता है। क्या इतने के बाद भी राज्य का यह विकास किसी समाज के हित में दीखता है या मुट्ठी भर लोगों ने इसे अपनी लुगाई मान रखा है। जिस विकास ने जनहित से मुंह मोड़ रखा है, जिसने जीवन को और भी दुरूह किया है उसे समाजविरोधी ही तो कहा जा सकता है। 

जिन्हें (अखड़ा जैसी संस्थाओं को) झारखंडी भाषाओं को राजकीय दर्जा मिल जाने की खुशी है और यदि उसे वे किसी संघर्ष का परिणाम मान रहे हैं तो यह उनकी भयंकर भूल होगी। राज्य सत्ता की बेहद आसान कुटिल चाल को वे यदि नहीं पढ़ पा रहे हैं तो यह उनका भोलापन है या फिर...जब इस देश में 198 आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के खतरे से जूझ रही हैं तो क्या यह खुशी अपने प्रति प्रतिकूल माहौल (व्यापक तौर पर) बनने देने की स्थिति को छूट देना नहीं है ? अपनी लड़ाई सभी जनजातीय भाषा को लेकर होनी चाहिए।    

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