हमसफर

सोमवार, 16 अगस्त 2010

मीडिया का रीतिकाल

(एक पत्रकार की डायरी के धुंधले पन्ने से)

(यह पिछले पोस्ट का आंशिक संशोधित रूप है।)
यह सही है कि इस बाजारवादी दौर की स्पर्द्धा में टिके रहने के मकसद से अखबारों के लिए अधिकाधिक विज्ञापन बटोरना ही एक मात्र ध्येय रह गया है। समाचार की गुणवत्ता और पत्रकारिता के मानक से इस पत्रकारिता का कोई सरोकार नहीं रह गया है। कोई भी अखबार घराना चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, यह उसके सर्वाइवल के सवाल से जुड़ गया है। अच्छी खबर और असरदार खबर एक दुर्घटना की तरह सामने आता है। विषहीन खबरें ही एक्सक्लूसिव का दर्जा पा रही हैं। खबर का पहला और आखिरी मानक यही है कि खबर से अखबार या अखबार के संरक्षक-पोषक का वित्तीय हित जोखिम में नहीं पड़ रहा हो। और ऐसे में वह एक्सक्लूसिव हो रही हो तो हो जाए! किसका क्या बिगड़ता है। इस रस्ते चलकर अखबार के ऐड सर्वर बन कर यल्लो पेज बन जाने का खतरा बढ़ जाएगा। फिर सवाल उठेगा कि यल्लो पेज ही क्यों नहीं ? अखबार की क्या जरूबरत?

आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास
इसी के साथ आहिस्ते-आहिस्ते एक चुनौती भी प्रवेश करेगी, जिसकी चिंता फिलहाल हिंदी प्रिंट मीडिया को नहीं है। अद्यतन तकनीकों के इस्तेमाल के साथ निकलनेवाले अखबार आज जिन बाजारवादी हथकंडों को अपना रहे हैं, विदेशी अखबार बाजार ने कब का उसे तौबा कर दिया है। विज्ञापन की रेट बढ़ाने के लिए अखबार के प्रसार को बढ़ाने जो तरीका है पीसीसी के जरिए, स्कीमों के जरिए वह अखबार को मीडिया प्रोडक्ट से हटाकर उपभोक्ता सामान बनाकर छोड़ेगा। अब पाठकों को ग्राहक बनाया जा रहा है तरह-तरह के पैकेज में बांधकर। यह सब इसलिए ठीक कहा जा सकता है कि यह एक व्यवसाय हो चुका है। पर इसे अखबार घराने घोषित रूप से कबूलते नहीं। ढिंढोरा पीटते हैं मानक और पत्रकारीय सरोकार और मान-मूल्यों का। यहां विज्ञापन की चिंता और बाजार को लुभाने की जितनी चिंता होती है उतनी चिंता कारपोरेट लेवल पर खबरों के लिए समाचारधर्मिता की नहीं होती। जैसे एसाईनमेंट पत्रकारों को या संपादकों को दिए जा रहे हैं वे लाइजनिंग और नेटवर्किंग के होते हैं और ठेठ में कहें तो दलाली के होते हैं। इस दरम्यान विचार-चिंतन का स्पेस मरता जा रहा है या फिर धीरे-धीरे मारा जा रहा है। स्वाभाविक है कि हिंदी अखबारों ने सोचना लगभग छोड़ दिया है। शायद यही कारण है कि विचार अब अखबार के लिए गैरजरूरी हो गए हैं। क्या समाचार संपादक, राजनीतिक संपादक और विचार संपादक की पृथक सत्ता इसे साबित नहीं करती।


न ये चांद होगा न तारे ये होंगे यानी पत्रकार-संपादक जैसे शब्द खो जाएंगे
बाजार अपने प्रयोजन के लिए जिस अंदाज में सारे उपक्रम कर / करवा रहा है इसे संपादकों की विद्वदमंडली नहीं समझ रही है, ऐसा नहीं। बस कारपोरेट मकसद को पूरा करने का एक तामझाम भर रह गया है। सभी अपने कारपोरेट मकसद साधने के यज्ञ में लगे हुए हैं। जिस दूरी तक यह यज्ञ मकसद साध रहा है, साथ हैं। और दूसरी बात लाख-दो लाख (प्रधान संपादकों के वेतन) किसे बुरा लगेगा। इसमें अपना क्या जाता है। करवा लो जो करवाना है। ... बाजारवाद के जिस मारक दौर में अखबार व्यावसायिक घरानों के व्यापार संपादन (बिजनेस एडिट) के लिए निकलते हैं और समाचार प्रबंध किए जाने लगे हैं, उसे देखकर कहना बुरा नहीं कि संपादक का काम समाचार का प्रबंधन (मैनेज) और मालिक का काम व्यवसाय का संपादन (बिजनेस एडिट) करवाना रह गया है। नहीं मालूम बड़े घरानों के मुख्य / प्रधान संपादक का काम इससे इतर रह भी गया है ? डिगनिटी को भूलकर इसका थोड़ा सरलीकरण कर कहें तो संपादक का काम खबरों का इंतजाम (न्यूज को मैनेज) और मालिक का काम बिजनेस को एडिट करवाना भर रह गया है। इस तरह संपादक न्यूज मैनेजर तथा मालिक बिजनेस एडिटर हो गया है। धंधा हो प्रबुद्धों का और विचार गायब हो तो क्या हो सकता है !! पेशा हो चिकित्सा का और स्किल सिर्फ और सिर्फ मैनेजमेंट का ही खोजा जाए तो क्या हो सकता है (बड़े-बड़े अस्पतालों में जाकर देखा जा सकता है इसे)। विचार की सत्ता (विजनरी दीमाग) के कमजोर होने से ऐसा होता गया है। यहां सतर्क रहना जरूरी हो गया है, क्योंकि इसी तरह राजनीति में मूल्य के धागे टूटे तो अपराध की गांठें बढ़ती गईं। जिस पीसीसी या गिफ्ट स्कीम के सहारे प्रसार बढ़ाया जाता है, उसकी दीवार बेहद भंगुर होती है। ऐसे में खर्च एक स्तर पर जाकर अनुत्पादक कहा जाए तो बुरा नहीं। दरअसल जिस विज्ञापन बाजार को लुभाने के लिए प्रसार के सारे तामझाम खड़े किए जाते हैं, वे अपनी चमक बहुत जल्द खो देंगे। विज्ञापन संपादक, प्रसार संपादक की शब्दावली आखिर क्या दर्शाती है। आनेवाले दिन में आपसे संपादक व पत्रकार जैसे शब्द भी छीन लिए जाएंगे। इसका होमवर्क तो शुरू हो ही गया है।

खुंटियल दाढियों के नीचे पिज्जा-बर्गर यानी मीडिया का सोशल आडिट हो तो कितना बेहतर

अब जब कारपोरेट घराना मशीनरी के हाथों पत्रकार को एक टूल की तरह इस्तेमाल करेगा तो इसकी गारंटी मानिए कि वह सिर्फ और सिर्फ उसीका टूल नहीं बना रह जाएगा, वह अपने हित भी साधेगा। वह मशीन नहीं कि आप जितना और जैसा काम लेना चाहें, उतने काम के बाद उसे ठप कर दें। बाप के लिए बीड़ी-ताड़ी-दारू लानेवाला बेटा सिर्फ बीड़ी पीकर ही रह जाए ऐसा कैसे होगा। कभी तो वह भी चखेगा। लसत लगेगी और फिर दारू में मिलावट और फिर खरीद में उलटफेर और दारू में गिरावट लाकर वह भी अपने पीने का जुगाड़ कर तो लेगा ही। ए राजा को संचार मंत्री बनाने के वास्ते बिजनेस घरानों के लिए लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया की दलाली करनेवाले दिग्गज और पूज्य पत्रकारों के नाम जिस तरह सामने आए, वह इसीकी फलश्रुति है। और जो बिका हुआ हो, उसे खरीदनेवाला कोई नहीं होता। आज पत्रकारों का कद गिरता जा रहा है तो उसमें छुटभैये पत्रकारों का जो भी हाथ हो, बड़े और नामी-गिरामी लोगों ने गिरावट को जिस तरह इंस्टीच्यूशनलाइज कर दिया, वह उन्हें अंततः गिरा रहा है। हम जानते हैं कि
भ्रष्टाचार की शक्ल पिरामिड की होती है। ऊपर की एक बुंद नीचे कितनी बुंदों में तब्दिल हो जाएगी तय नहीं। और इसके लिए पत्रकारीय पेशे में तरह-तरह के सुधार के नाम पर उन्हें बांधने की कोशिश हो रही है। पत्रकार की आलोचकीय धार व मेधा को कुंद करके सारा काम किया जा रहा है। यही कारण है कि जिस बाजारवाद के खिलाफ मीडिया को मोर्चा संभालना चाहिए था, वह उसका चारण-भाट बना फिर रहा है। भाटों की खुली स्पर्द्धा में वह नंबर एक के लिए भिड़ा हुआ है। कारपोरेट संस्कृति ने अपने प्रोफेशनलिज्म की जबान में इसे टेकनिकल स्किल का नाम दे रखा है। एलपीजी (उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण) के द्वार से जो सामाजिक अनुदारता प्रवेश कर गई, मीडिया घरानों ने भी उसे कम प्रश्रय नहीं दिया है। श्रमिक अधिकार और सूचनाधिकार के लिए भोंपू लगाकर चीखनेवाले अखबारों में श्रम कानूनों का सर्वाधिक उल्लंघन हो रहा है। सूचनाओं की गोपनीयता भी वहीं बरती जा रही है। किस मकसद से किसी मसले को लेकर अखबार आक्रामक तेवर अपना रहा है और किस मकसद से अभियान की टें बोल जाती है, पत्रकार को इन वजहों से दूर ही रखा जाता है। मुंह की खाता है पत्रकार तो खाए। खबरों के बाजार में न तो संपादक या मालिक को कसरत करने पड़ते हैं। इसलिए मजे से स्विच आन-आफ करते रहते हैं ये बंदे।
एक चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, खिलाड़ी आदि अपने पेशे के धुंरधर हों यह तो अपेक्षा होती ही है और वाजिब भी है, पर वे उनके अपने सामाजिक दायित्व हैं इसे वे नहीं भूलते। ऐसा इसलिए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन कोई बताए कि आज मीडिया का कोई सामाजिक दायित्व रहा गया क्या। वैसे राजनीति भी सामाजिक दायित्व से कट गई है। (इस पर बाद में कभी।) किन सामाजिक अपेक्षाओं – जिम्मेवारियों से मीडिया को बंधा होना चाहिए और आज जिस किसी भी स्थिति में पहंचा है वह किन अपेक्षाओं और जिम्मेवारियों को पूरा करते हुए। और यह सब करते हुए इस क्रम में उनके यहां काम करनेवाले पत्रकारों ने कितने बनाए यह जानना बेहद जरूरी है। आखिर जब आप इस समाज से कुछ लेते हैं तो समाज को क्या दे रहे हैं और जो दे रहे हैं, क्या वही समाज का प्राप्य भी है। यह सब तब तक नहीं जाना जा सकता है जब तक कि मीडिया का सोशल आडिट नहीं होता। सवाल यह हो सकता है कि व्यवस्था उसे देती क्या जो सोशल आडिट की बात हो। तो व्यवस्था न दे, पर समाज उससे कहीं अधिक दे रहा है। और व्यवस्था कैसे नहीं दे रही है आखिर मंदी के दौर के दौर में रियायत इसी व्यवस्था ने दी थी। और जो भी वह पा रहा है वह इस तंत्र से सहूलियत पाने के ही कारण है न। यदि मीडिया का सोशल आडिट नहीं होता तो छुट्टा सांढ़ हो जाएगा। आज वह पत्रकारीय मानक को तोड़ रहा है, भाषा को गंदी कर रहा है। आगे जाकर स्लैंग जबान में अखबार निकालने की बात करेगा। कल को वह नए सांस्कृतिक संकट खड़े करेगा।

अपने ही खून का स्वाद मजे से चख रहे हैं पत्रकार

रही बात पेशा के चौगीर्द पत्रकारीय सरोकारों से दूर प्रबंधन को अपने इस्तेमाल की खुली छूट देकर बंधुओं ने अपना जो नुकसान किया है उसीकी फलश्रुति है कि आज उनसे अखबार बेचने को कहा जा रहा है तो कहीं विज्ञापन बटोरने का काम दिया जा रहा है। चुपचाप शिरोधार्य करने का नतीजा है कि आज ‘चुनाव’ खबर के लिए कोई विषय ही नहीं रहा। हिंदी क्षेत्र विशेषकर बीमारू राज्यों में कहीं भी चुनाव को कवरेज नहीं दिया जाता। जो दीखता है वह पैकेज की शर्तों के तहत होता है। इस पर तो दिल्ली की एक संस्था बड़ा अध्ययन भी करवा रही है। इसका एक अपना ही किस्सा है। प्रभाष जोशी जी ने अखबारों की इस प्रवृत्ति के खिलाफ अभियान ही छेड़ दिया था। इस अभियान को वैसे भी अखबार हाथों-हाथ ले रहे थे, जिन्होंने चुनाव के दौरान न्यूज स्पेस बेचने का काम किया था। सिर्फ इस एक कारण से दैनिक जागरण ने अपने सभी संस्करणों में जोशी की मौत को उपेक्षणीय अंदाज में छापने की हिदायत दे डाली थी। जोशी जी के अभियान से घेरे में तो ढेरों अखबार आते, पर यह रुख किसी ने नहीं अपनाया। अब यह अलग बात है कि दैनिक जागरण तो फिर भी खबर छापी, पर जिस जनसत्ता को उन्होंने हिंदी पत्रकारिता का मानक बनाया और जिसके मरते दम तक सलाहकार संपादक रहे, उसी जनसत्ता से उनकी मृत्यु की खबर छूट गई। यह रिकार्ड में है। अब उसके कारण घराने अंतर्विरोध था या अभियान को ठेंगा दिखाना था, इसका अलग ही किस्सा है। कुल मिलाकर पत्रकारीय भूल या फिर चूक पत्रकारों के ही खिलाफ गई न। रावण का विरोध करते-करते कोई रावण हो जाए, ठीक वहीं बात हुई। इसका ठीकरा किसी एक पर नहीं फोड़ा जा सकता है।

पत्रकार एक सोलर सिस्टम में रह रहा है

कोई संपादक कहीं न तो अकेला जाता है और न ही अकेला निकाला जाता है। वह एक सूर्य की तरह अंतरिक्ष में चक्कर काटता है। सूर्य का अस्त होते ही उसके विश्वासपात्रों (योग्यता कोई आधार नहीं होती) के दिन ही नहीं लदते, नए महानुभाव यह जाने बगैर उसे निकाल बाहर करते हैं कि अब उनका क्या होगा जिसने अपनी उम्र का दो तिहाई-आधा हिस्सा उस अखबार को दिया है। संपादक तो फिर भी संपादक या एक-दो इंच के अंतर से अपनी जगह पा लेगा, पर वह पत्रकार जो सड़क पर धकेल दिया गया वह पत्रकारिता में रह भी पाएगा, इसकी फिक्र किसी को नहीं। अखबार मालिक और उसके दलाल प्रधान संपादकों को इससे कोई सरोकार नहीं। लेकिन तय मानिए एक दौर आएगा जब इस प्रवृत्ति के कारण विप्लव भी मच जाए। यह अलग बात है कि सारे खेल उपलब्ध आप्शंस के कारण होते हैं। तर्क हो सकता है कि मानवीय होकर वह अखबार को बाजार में उपलब्ध बेस्ट से वंचित क्यों रखे। लेकिन सारे खेल बेस्ट के लिए नहीं होते। नए दलाल के लिए स्पेस बनाने के लिए घरानों को यह वाजिब लगता है।

क्या से क्या हो गया, बेवफा हो गया...
यह ठीक है कि विकासक्रम में कोई भी क्षेत्र अंतरअनुशासनिक (interdisciplinary ) हो जाता है। यह भी ठीक है कि सब कुछ सीधे मूल विषय से जुड़ा नहीं दीखता, पर विषय के एप्रोच और ट्रीटमेंट से उसका सरोकार जुड़ा होता है। पर मीडिया के धंधे में बहुत कुछ ऐसा जुड़ा है जो सिर्फ और सिर्फ मीडिया से बाजार के हित साधने के लिए। ऐसा नहीं कि कारपोरेट ढांचा या एचआर पालिसी का सीधे-सीधे पत्रकारिता से कोई सरोकार हो। यहां तक कि इस सबके बाद मीडिया हाऊसों में पत्रकारों का कद गिरा है। विजनरी पत्रकार कमजोर हुए हैं। इस गिरावट को शिखर पर बैठे प्रधान संपादकों को मंजूर है तभी तो विज्ञापन प्रबंधक, प्रसार प्रबंधक आदि-आदि के सामने संपादक प्रत्यय लग गया है। विज्ञापन संपादक, प्रसार संपादक आदि का चलन और क्या इंगित कर रहा है ?
आखिर ऐसा इसीलिए हुआ है न कि पत्रकारिता को पत्रकारिता की तरह नहीं लेना है। इसलिए भी यहां निवेश शब्द जुड़ा है। निवेश सीधे किसी को भी बाजार में ला बैठाता है। और दूसरी बात कोई भी निवेश किसी की क्रांतिकारिता के लिए नहीं करेगा। अखबार नहीं आंदोलन कहकर खुश जरूर हुआ जा सकता है। और सवाल तो यह है कि पूंजीपति के पैसे से चल रहे आंदोलन का चरित्र कैसा होगा ? क्या पूंजीपति सामाजिक सरोकारों से जुड़ी क्रांतिकारिता के लिए अपना धन बहाएगा ? वह जब भी करेगा तो निवेश, दान या अनुदान नहीं। दान या अनुदान एक बार, दो बार हमेशा के लिए नहीं। यहां धन और पूंजी को समझ लेना जरूरी है। हां, आंदोलनकारियों को आंदोलन के मूल्य के इस क्षरण को समझना होगा। आंदोलन के अवमूल्यन को सबल करने के इस मिशन से दूर रहने की जरूरत है। आखिर आंदोलन ही होता तो कारपोरेट हित के लिए अखबार का इस्तेमाल नहीं होने देता। हां, यह माना जा सकता है कि आंदोलन पूंजीपति के हित को जिलाए रखने का आंदोलन है। भ्रष्ट नेताओं मंत्रियों पर तबतक निगाह नहीं पड़ती जब तक कि कोई डील रुक न जाए। झारखंड से बाहर रहकर प्रभाष जोशी या वीरेन दा जब किसी अखबार की पीठ ठोकते हैं तो उन्हें नहीं मालूम कि अनजाने वे किस पत्रकारीय आचरण को अनुमोदित कर रहे हैं। आखिर इस अनुशंसा से किसका भला हो रहा है। यह अनुशंसा कारपोरेट घराने की ब्रांडिंग से जुड़ी हुई है या पत्रकारिता की ठाठ के पक्ष में खड़ी होती है। सर्वाधिक पत्रकारों की बलि यदि किसी ने ली है तो इस एक अखबार ने। कोई झारखंड में आकर देखे कि किस तरह इसने कारपोरेट हित की रक्षा में दर्जनों तेज-तर्रार पत्रकारों की एक फौज को सड़क पर लाकर छोड़ दिया। यहां आकर देखा जा सकता है कि इस हाउस के चुनाव कैसे थे ! यह बात तो परिप्रेक्ष्य के विस्तार की है, पर हम एक बार फिर से संदर्भ पर आएं। जिन क्षेत्रों में प्रसार बढ़ाए जाते हैं, दरअसल उन क्षेत्रों में साधनहीनता व पिछड़ापन के कारण आधुनिक जीवनशैली के साजोसामान दुर्लभ हैं। जब इन क्षेत्रों के पाठक ऐसे उत्पाद के उपभोक्ता नहीं हो सकते हैं तो विज्ञापन देने का फायदा क्या होगा? यह भी शीघ्र ही उन कारपोरेट घरानों को समझ में आने लग जाएगी जिनके सहारे अखबार घरानों के बजट बनते हैं। जाहिर है कि यह बात उनकी समझ में आ भी रही है, पर यहीं मीडिया अपनी धौंसपट्टी से अपनी दाल गलाती है। यहां उसके कारपोरेट उसूल ताख पर रखे रह जाते हैं।


दो कदम तुम भी चलो, दो कदम हम भी चलें....

दो स्थितियां बचती हैं –
1. गुणवत्तापूर्ण प्रसार
2. प्रसार के लिए ग्रामीण इलाकों में आधार

1.
शहरी क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार, समृद्धि, सुरुचि के कारण वैचारिक स्थैर्य होता है। वहां के पाठक मनुश्किल से टूटते हैं। ये क्वालिटी कांशस होते हैं। इसीलिए इन्हें व्यावसायिकता के साथ मूल्य व वैचारिक स्तर की समृद्धि जरूर बांधती है। चौबिसों घंटे चलनेवाले चैनलों के कारण राष्ट्रीय व महत्व की बड़ी खबरें अखबारों में इन्हें नहीं बांधतीं। सुबह अखबार में पढ़ने से पहले वे कई बार इसे देख चुके होते हैं। इसीलिए समाचार को यह ध्यान में रखकर तैयार किया जाए कि हमारे पाठक पहले दर्शक हैं। वह खबरों में विजीबिलिटी खोजेगा। अब पाठक की लालसाएं, जरूरतें, दिलचस्पियां पहले जैसी नहीं रही। इसके साथ ही यह भी तय है कि नवधनाढ्य तबका अभिजात तबके में शामिल होने को आतुर व दरिद्र सांस्कृतिक चेतना से लैस जिस गैर जिम्मेवार नई पीढ़ी के हाथों में चैनलों की बागडोर है, वह कई बारहा समाचारों की प्रस्तुति को हास्तास्पद बना देती है। इसलिए खबरों में इन तत्वों की भरपाई से खबरों में पठनीयता का प्रभाव लाया जा सकता है। संवेदना और सगजता के स्तर पर खबरों में दृश्य संवेदना को प्रमुखता देनी होगी। इसके लिए बौद्धिकता के छींटों के साथ कल्पनाशीलता की छौंक की भी जरूरत है। शहरी क्षेत्रों में पाठकीय आधार तभी फैलाए जा सकते हैं। बहुत दिन नहीं हुआ है जब लिखित शब्दों की महत्ता भरे दौर में किताबों का एक पन्ना, तो समीक्षा का एक पन्ना हुआ करता था (जनसत्ता में अब भी मौजूद है)। बदलते दौर में दर्शक की मरती समीक्षा चेतना को जगाए रखने के लिए हर हाल में चैनलों, इंटरनेट, ब्लाग, यू ट्यूब, ट्विटर आदि पर एक पन्ना देना चाहिए। इनकी रफ्तार और समाज पर इसके बढ़ते-फैलते शिकंजे को देखते हुए हिंदी समाचार पत्र जितनी जल्द इसे अपना ले, सेहत के लिए बेहतर होगा। शायद फिलहाल किसी हिंदी अखबार ने ऐसा नहीं किया है। नया पन्ना पाठकीय आधार बढ़ाने में बहुत जल्द फर्क लाएगा। अखबार जिस संचार क्रांति का हिस्सा है, उस फ्रेम की शेष चीजों से उसका रिश्ता दूर-दूर का होकर रह गया है। असंख्य साइट पर भटकने के बजाए विवेकवान पथ ढूंढ़ने के अलावे चैनलोंम के प्रवाह में चयन का विवेक पैदा करना भी मीडिया का धर्म है। यह प्रयोग एक तरह का माइंड सेट तैयार करेगा।
2.
प्रसार के ग्रामीण आधार को व्यापक करने में किसी पीसीसी (पब्लिक कंटैक्ट कंपैनिनयन) का सर्वे नहीं करेगा। स्वभाव से संकोची, प्रकृति से भावुक व चरित्र के भोले इन पाठकों को अपना समाज बहुत बांधता है। गरीबी, निरक्षरता-अशिक्षा, अंधविश्वास, बेकारी के कारण इनमें भावुकता तो होती ही है, पर साथ ही एक ग्राहक के रूप में ये प्राइस कांशस होते हैं, वैल्यू (कंटेंट) कांशस नहीं। इन्हें बांधने का बेहतर काम क्षेत्रीय रिपोर्टर से ही लिया जा सकता है। क्षेत्रीय रिपोर्टर बहुत बड़े प्रचारक साबित हो सकते हैं। वे हमारी ब्रांडिग बेहतर कर सकते हैं। उन्हें थोड़ा सम्मान और थोड़ी आत्मसंतुष्टि मिले तो उनकी माउथ पब्लिसिटी हमारे बहुत काम आ सकती है।
उपरोक्त दोनों स्थितियों में खबरों का उत्खनन शहरी क्षेत्रों में बेहद चुनौती भरा है। आज यदि अपने परिशिष्टों में हिंदी अखबार हिंग्लिश का इस्तेमाल करने लगा है तो उसी प्रभाव (चुनौती) का नतीजा है, पर बेहद नकारात्मक ढंग से। यह भी साबित होता है कि हम बढ़ने के अपने प्रयोगों में पिछड़ेपन का संकेत देते हैं। यह प्रयोग उपभोक्तावाद की निरंकुश विलासी और लंपट आदतों को प्रतिष्ठित करने जैसा है। एक दरिद्र सांस्कृतिक चेतनावाले अर्द्धशिक्षित समाज में ही यह रब क्ष्मय / संभव है हम इसे ही साबित करते हैं। नई पीढ़ी को भाषा की तमीज के जरिए सांस्कृतिक चेतना के प्रति गंभीर व जिम्मेवार बनाने के बजाए उसे मूल्यों से लापरवाह करने की भयंकर भूल कर रहे हैं। हमें समझना चाहिए कि भाषा एक सामाजिक-सांस्कृतिक युक्ति (socio-cultural device) है। उसके स्रोत समाज-संस्कृति में वनिहित होते हैं। दरअसल जहां समस्या होती है, वहीं रोग के लक्षण हों, यह जरूरी नहीं। बाजार से लड़ने के बजाए मीडिया उसके सामने नतमस्तक है तो इसे समझना मुश्किल नहीं। इसलिए यह मीडिया से भूल नहीं हो रही है, सारी अपसंस्कृति में वह इरादतन एक उपक्रम रच रहा है। जौंडिस का लक्षण आंख में जरूर होता है, पर इलाज आंख से शुरू नहीं करते। पर हिंदी अखबार ने यही किया है। उपभोक्तावादी संस्कृति के जो सांस्कृतिक खतरे हैं और तज्जन्य सामाजिक जोखिम सबकुछ को यह मीडिया आसान कर दे रहा है।

बच्चू कहां जाओगे बचकर

पाठकों में गिफ्ट के लिए अखबार खरीदने की लत पकड़ने लगी है। ऐसी तरकीबों से पाठक पहले उपभोक्ता बनने लगा है, बाद में वह पाठक होता है। और जब वह उपभोक्ता होता है तो उसे विज्ञापन के मायाजाल अधिक बांधते हैं। बाजार बहुत मोहक अंदाज में हमें माया की तरह फांसता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की फंतासी भरी दुनिया अधिक मोहती है उसे। एक तरह से हम अखबारों के प्रति वितृष्णा ही पैदा करने का काम करते हैं। इस तरह अखबार अपनी तरकीबों से पाठकीय चेतना पर प्रहार करने लगा है। पाठक अतिरिक्त रूप से सजग रहता है तय अवधि के पूरी होने के प्रति। गिफ्ट के लिए। लेकिन क्या यह पाठक जो उपभोक्ता बनकर रहा है, उसे संतुष्टि दर्शक बनकर है या पाठक बनकर ? इसलिए हमें सोचना चाहिए कि क्या अखबार इन हथकंडों को अपनाकर अखबार बना रह सकता है ? लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि अखबार अखबार बनकर ही जिंदा रह पाएगा। दरअसल हिंदी अखबार को अपना स्पेस उपभोक्ता व दर्शक के बीच ही लोकेट करना होगा।
इन चीजों पर चलने के लिए स्पष्ट नीति, मारक रणनीति और लंबी योजना की जरूरत है। यह सर्वथा नवजात के अनुभव व विचार हैं।
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मारक प्रतिस्पर्द्धा भरे बाजार में टिकना प्रतिद्वंद्विता में आगे निकलने की पृष्ठभूमि है। आंध्रा में नंबर वन इनाडु को पछाड़ने के लिए राजशेखर रेड्डी ने एख साथ 22 संस्करण वाला साक्षी दैनिक शुरू किया, प्रतिदिन एक करोड़ घाटे का बजट लेकर। ऐसे में जंग कई स्तरों पर चलानी होती है। संपादक को समाचार प्रबंधन से लेकर व्यवसाय संपादन तक के कौशल से लैस होना होगा।
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बाजार के दबाव के साथ सामाजिक प्राथमिकताओं और व्यक्ति की दिलचस्पी में आ रहे बदलाव को उनके आस्वादन के स्तर (ऐंद्रिक संवेदना में आए बदलाव) पर पकड़ना होगा। खबरें हार्ड हों या साफ्ट या फिर ह्यूमन स्टोरी, उनमें जीवंतता और सचित्रता जरूरी है। पाठकीय आस्वादन (टेस्ट) तक पहुंचने के लिए। प्रसार बढ़ाना शहरी क्षेत्रों की तुलना में कस्बों में ज्यादा मुमकिन है और अभी के बाजार में इसकी काफी गुंजाइश है।
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बाजार के दबाव में समाचार पत्रों में घटती जगहों ने खबरों की तादाद और आकार को प्रभावित किया है। ऐसे में खबरों के प्रवाह को बरकरार रखने के लिए विशेष नीति अपनानी होगी। स्वरूप के स्तर से हटकर वस्तु के स्तर पर भी।
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ब्रांडिंग से तात्पर्य वह नहीं जो बाजार से हमें मिला है, बल्कि वह जो जनता हर हाल में हमें देती है। इसीलिए किसी चले हुए अखबार के रिपोर्टर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह बासी खबरें परोस रहा है। उसके लिए महत्वपूर्ण है कि वह अपने पाठक को जो दे रहा है, पहली बार दे रहा है। पाठक ने स्वीकार भी किया है। इसी पाठकीय स्वीकार्यता को सोशल ब्रांडिंग कहते हैं। बाजार से जो ब्रांडिंग मिली है वह बेहद अस्थिर और चंचल है। इसकी कोई गारंटी नहीं जो आज आपके पास है और कल प्रतिद्वंद्वी के पास न हो। हर्षद मेहता को भी इसी बाजार की ब्रांडिंग मिली था। लेकिन उस ब्रांडिंग का बाजार के स्थायी तत्वों से कोई सरोकार नहीं था। आईपीएल, शशि थरूर, ललित मोदी इसी फिनोमेना के हिस्से हैं। इसे एकाधिकारवाद भी कह सकते हैं। लेकिन बाजार में जहां प्रतियोगिता पूर्णता की ओर बढ़ती है वहां उपभोक्ता की सार्वभौमिकता (consumer soveriegnty अर्थशास्त्र का महत्वपूण सिद्धांत है जो जाज आर्वेल के विख्याक उपन्यास नाइंटीन एटी फोर के मशहूर जुमले Big brother will watch you से मेल खाता है) से इनकार कर कितने दिन बचा सकता है।

(साल 2008 में एक बड़े अखबार में काम करते हुए लिखी हुई टिप्पणी। इसे अखाबर के संपादक ने भी विचारार्थ लिया था। कुछ बातों को मैं निजी स्तर पर लागू करके देख चुका था। उसी टिप्पणी का अपडेट रूप।)


टिप्पणियां

5 टिप्पणियाँ: :
भगीरथ ने कहा…
corporate interest is the highest priority in all the fields. so the alternative is to replace the corporate interest with public interest &in doing so
the whole system has to be changed
२७ अप्रैल २०१० ६:०५ पूर्वाह्न

Babli ने कहा…
बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! उम्दा प्रस्तुती!
३ मई २०१० ६:०२ पूर्वाह्न
रंजीत ने कहा…
I think, BHAGIRAH jee is right,but we can not do it becauze we are in nation where dual'ism is prevailing by the people with the people for the politician.
we expect best but can not accept someone who is really Best.
९ मई २०१० ६:२२ पूर्वाह्न
सृजनगाथा ने कहा…
भाषा, साहित्य और संस्कृति की प्रतिष्ठित पत्रिका www.srijangatha.com में आपके ब्लॉग का समादरण हुआ है । कृपया अवलोकन कीजिए ।
१२ मई २०१० ९:०१ अपराह्न

Amitraghat ने कहा…
"आप कहाँ गायब हो गये...? वापस आईये...."
२२ जून २०१० १०:३३ अपराह्न
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