हमसफर

शनिवार, 7 अगस्त 2010

शिबू को आज भी विश्वास से देखते हैं सर्जक

- सरकार के लिए जोड़तोड़ के बीच कथाओं के नायक

फणीश्वरनाथ रेणु ने वास्तविक जीवन से चलित्तर कर्मकार तथा बावनदास जैसे पात्रों को उठाकर अपने ऐतिहासिक आंचलिक उपन्यास ‘मैला आंचल’ के कथानक में पिरोया। इसी तरह भैरव प्रसाद गुप्त, राही मासूम रजा, नागार्जुन ने भी वास्तविक जीवन से पात्रों को उठाया, पर हू ब हू रखने की बजाए, काल्पनिक कलेवर प्रदान किया है। उल्लेखनीय यह नहीं है कि किसने वास्तविक पात्रों को किस रूप में चित्रित किया है। उल्लेखनीय यह है कि ऐसे पात्र जब वास्तविक जीवन में मूल्यों व व्यवस्थाओं की टकराहट के बीच कृतियों से हटकर मौजूद दिखाई पड़ते हैं तो सर्जक अपने पात्र को कैसे देखते हैं। यह मामला फिलहाल इसलिए मौजूं हो गया है कि कई कथाकारों की कृतियों में ईंट-गारे की तरह रचे-बसे शिबू झारखंड के राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर चर्चा की धुरी में हैं। चर्चा की धुरी ही नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीतिक कुंडली के प्रभावी घर में बैठे हैं। गुरु जी को अपना औपन्यासिक नायक बनानेवाले कथाकार कुर्सी की उठापटक में शामिल अपने नायक को कैसे देखते हैं? उनकी भूमिका को राजनीतिक मूल्यों की गिरावट की स्वाभाविक परिणति मानते हैं या शिबू का निजी पतन या फिर समग्र भारतीय चरित्र की विकृतिका हिस्सा ? हम यहां बात कर रहे हैं ‘गगन घटा घहरान’ के लेखक मनमोहन पाठक व ‘समर शेष’ के सर्जक विनोद कुमार की।

परिवर्तन जीवन का नियम है – पाठक

अपने चर्चित पहले उपन्यास ‘गगन घटा घहरान’ में शिबू सोरेन को चित्रित करनेवाले हिंदी कथाकार मनमोहन पाठक गुरु जी की स्थिति को कतई अजीबोगरीब नहीं मानते। उनका साफ कहना है कि अब न तो यह शिबू का पतन या न ही उनकी चारित्रिक गिरावट है। इसे वह अपने पात्र की वास्तविक जीवन में विकृति या विचलन भी नहीं मानते। श्री पाठक कहते हैं कि परिवर्तन जीवन का नियम है। यह अजूबा तब लगता है जब हम किसी पात्र या चरित्र से अदभुत आकांक्षाएं पाल लेते हैं। इस महान सभ्यता के मूल्य, परंपरा, संस्कृति को अपनी पीठ पर लादे प्रभु वर्ग या श्रेष्ठ जाति के नेताओं में जब विचलन या विकति दिखाई पड़ते हैं तो यह सवाल नहीं उठता। दर्जन भर भाषाओं के ज्ञाता नरसिम्हा राव या मनमोहन सिंह या डा. जगन्नाथ मिश्र अपने वास्तविक रूप में दीखते हैं तो सवाल वहां उठना चाहिए, पर ऐसे सवाल वहां नहीं उठते है। जनसंघर्षों की बदौलत जिस राजनीतिक मुकाम पर आज सोरेन दीखते हैं, वहां उस वर्ग के नेता के लिए पहुंचना दुर्लभ है। कथाकार मनमोहन पाठक स्वीकारते हैं कि शिबू आज जैसे दीखते हैं वैसे नहीं थे। इसका मतलब यह नहीं कि अपने कथानक के पात्र को वास्तविक जीवन में हटकर देखने पर उसे खारिज कर दें। हमारा वश तो अपने कथानक व उसके घटनाक्रम पर होता है। जहां तक बदले स्वरूप को लेकर कथा को पिरोने की बात है तो यह चरित्र में निहित आग के कारण संभव होता है। कोई चरित्र कथाकार को अपने जीवन में उपस्थितियों के कारण खीचता है। यह आग तब तक शिबू में थी, हमने उन्हें अपनी कृति में लिया। यह भी सच है कि समकालीन राजनीति में शिबू के पास आज भी बहुत कुछ ऐसा है जो बहुतों के पास नहीं है। वैसे यह गौर तलब है कि आज से 18 साल पहले जब यह उपन्यास छपा था तभी अपने लेख में कथाकार नारायण सिंह ने उपन्यास के साल भर में अप्रासंगिक हो जाने की बात कही थी। (उपन्यास कतार प्रकाशन से प्रकाशित)

पोखरिया के गुरु जी नहीं लग रहे – विनोद

‘समर शेष है’ नामक अपने उपन्यास में शिबू सोरेन को अपना नायक बनाने वाले पत्रकार कथाकार विनोद कुमार बहुत सपाट और बेलाग भाव में कहते हैं कि आज समर्थन के लिए लोगों के पास जानेवाले गुरु जी पोखरिया के गुरु जी नहीं लगते। उन्होंने अपने उपन्यास का हवाला देते हुए कहा कि जिस कालखंड पर आधारित गुरु जी का चरित्रांकन हुआ, उस समय वे वैसे थे। कुर्सी की जोड़तोड़ में लगे अपने नायक को देखकर वे कहते हैं कि समर्थन वापसी तो ठीक थी, लेकिन अब वे जो कुछ कर रहे हैं ठीक नहीं लगता। उन्हें धीरज और साहस का परिचय देना चाहिए था। एक अल्पायु सरकार के लिए भागमभाग में लगे गुरु जी को देखकर धक्का लगता है। वे कहते हैं कि पोखरिया से निकलने के बाद उन्होंने दुबारा टुंडी का रुख तक नहीं किया। वे बहुत दूर चले गए हैं। ऐसा नहीं कि उस कालखंड में चलाए गए अपने संघर्ष को वे भूल गए हैं, पर संसदीय राजनीति अब काजल की कोठरी हो गई है, जहां से बेदाग निकलना मुमकिन ही नहीं। वे भलीभांति जानते हैं कि कांग्रेस ने उनको छला ही है। कहीं न कहीं, वे कांग्रेस के बगैर सरकार चलाना चाहते थे, पर परिवार से मोहग्रस्त हो जाने के बाद राजनीति में उनके निकट के लोग उनसे दूर होते गए। वे जो कर रहे हैं राजनीति में होने के कारण ऐसी कामना कर सकते हैं, पर उनके साथ भला नहीं होगा। ऐसा लगता है कि दिक्कू राजनीति का विरोध करते-करते वे भी दिक्कू हो गए है। (उपन्यास प्रकाशन संस्थान दिल्ली से प्रकाशित।)

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