हमसफर

शनिवार, 27 मार्च 2010

राज्य सत्ता के पुजारी

कानू सान्याल के बाद ....


23 मार्च 2010 दोपहर। कामरेड को खाना खिलाकर गए कुछ ही पल हुए होंगे कि शहर में सुगबुगाहट। कामरेड कानू ने खुदकुशी कर ली। जो बूढ़ा पिछले दो दशक से अधिक समय से हर पल का साक्षी था उसे यह बात और भी समझ में नहीं आई। मीडिया ने तो पार्क स्ट्रीट के बाजार में लगी आग पर तूफान मचा रखा था। किसी जमाने में जिस नक्सलबाड़ी की चिंगारी ने राज्य की नींद जिस तरह हराम की थी, आखिर मौका मिलने पर सत्ता कैसे चूकती। उसने नक्सलबाड़ी के जनक कानू सान्याल की मौत को आत्महत्या करार दिया तो क्या ताज्जुब। और भी ताज्जुब कि इसे बंगाल के आई जी ने खुदकुशी मानने से इनकार कर दिया। गले में फंदा तक की तो बात ठीक है, पर पांव जमीन पर हों और कोई टेबल-कुर्सी तक न हो पास में तो कोई साक्ष्य को कैसे झुठला सकता है। अखबारों ने जी भर कर खुदकुशी को साबित करने के साजो सामान इक्टठा किए। अखबार नहीं आंदोलन के एक लेखक ने तो नायकों के अवसान को हताशा का अंत सिद्ध करने तक की कोशिश की और कानू को इसी आईने में देखा भी। शोषण और अन्याय की पोषक राज्य सत्ता को एक झटके में निर्दोष बताने के लिए इससे अच्छा निष्कर्ष सहज ही कैसे कहीं मिलेगा। शोषण से मुक्ति के लिए लड़ाई में शामिल योद्धा अपनी बर्बादी को न्यौतता है। यह बात समझ में आती है। पर अपने पीछे खड़ी कतार को एक झटके में गर्त में डालने के लिए क्या वह खुदकुशी कर सकता है। क्या उसकी खुदकुशी में वह परिस्थिति शामिल नहीं जिसमें वह निरंतर और भी निहत्था होता जाता है। राज्य सत्ता और भी मारक होती जाती है। ऐसी आवाज करनेवाले विदूषक क्या राज्य का काम आसान नहीं करते। क्या कामरेड कानू की शुरुआत और विकास की व्याख्या इस अंत से हो सकती है और क्या उसका निषकर्ष उन स्थापनाओं को पुष्ट करेगा जो इस धारा को जारी रखने के लिए जरूरी है। लाखों-करोड़ों की आस्था जिस धारा, प्रवृत्ति और ढांचे से जुड़ी है, क्या उसे बदनाम कर कमजोर करने का मौका नहीं है यह। यदि हां तो मीडिया के पल्लू में पलती ऐसी कोशिश को संगठित साजिश का हिस्सा नहीं माना जा सकता है।
(27.03.2010)

2 टिप्‍पणियां:

  1. बार-बार विचारने के लिए बाध्य हो गया... वर्षों पहले जिस कानू से मैं मिला था, कई बार मिला था और जिनसे मिलने के बाद हर बार महसूस किया था कि मैं किसी व्यक्ति से मिलकर नहीं लौट रहा, बल्कि रिसर्च के किसी पाठ्‌यक्रम को पूरा कर लौट रहा हूं, उनके बारे में जिस आसानी से मीडिया ने निष्कर्ष निकाल दिया, वह हाहाकारी है। मैं स्तब्ध हूं और एक स्थायी वैक्यूम को अपने देह पर महसूस कर रहा हूं। समय तुम आओ, अब सब कुछ तुम्हें ही करना है।

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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