हमसफर

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

डायरी के पन्ने से

भाइयों के विरोध की मनोरचना


तसलीमा को देशनिकाला देनेवाली बांग्लादेशी हुकूमत को पानी पी-पीकर गरियानेवाले भारतीय वाम और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की जबान को तब लकवा मार गया जब उन्हीं के देश में उन्हें ठिकाना नहीं मिल रहा। वही वाम तब अपनी जबान अवश्य खोलता है जब खास तबके की भावना से खिलवाड़ करनेवाले मकबूल फिदा हुसैन को खाड़ी मुल्क में शरण लेनी पड़ी। इसी वाम की जबान से पर तब और ताला जड़ जाता है जब महाराष्ट्र में पहले मनसे, फिर शिवसेना की प्रताड़नाओं-धिक्कारों और फजीहतों के बीच उत्तर भारतीयों या हिंदीभाषियों (कथित भाइयों) को जलालत झेलनी पड़ी। मुल्क में हिंदी पट्टी की बदौलत अपनी सियासी रोटियां सेंकनेवाली दक्षिणपंथी पार्टियां और उसके सिंपेथाइजर तबके की जुबान पर ताला जड़ गया है। हिंदी भाषियों या उत्तरभारतीयों के साथ महाराष्ट्र में हो रहे अत्याचार को मीडिया अपने तरीके से बाजार के स्पेस में लोकेट करने की फिराक में लगा है। माहिरों ने अपने बौद्धिक करतबों से सियासी अठखेलियों से निकले इस फीनोमेना को मीडिया के उपद्रव का हिस्सा बना दिया। बाजार की गोद में राजनीति की केलिक्रीड़ा और मीडिया के उपद्रव में शामिल महानुभावों ने बड़े ही कौशल से महाराष्ट्र की गरिमापूर्ण ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से इस नई परिस्थिति का कंट्रास्ट पैदा किया है। इसमें मैं प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश, पानी और पूल के कथाकार महीप सिंह तथा वाक् के संपादक और उत्तरआधुनिकता के हिंदी पैरोकार सुधीश पचौरी से लेकर कई लेखक पत्रकारों के उदगार पढ़ने को मिले। (ये वही सुधीश पचौरी हैं जिन्होंने हिंदी में कविता के अंत के साथ सभी विधाओं – आलोचकों का अंत कर डाला था। उन्होंने नामवर को हिंदी का अंतिम आलोचक तक कहा था। यह था हिंदी के समृद्ध होते भविष्य की उनकी समझदारी।) ये वही पचौरी साहब हैं जिन्होंने संडे मेल के दौर में इंद्रप्रस्थ भारती और हंस समेत कई जगहों पर। अब वही पचौरी साहब रिटायर्ड होने पर भाइयों का प्रवक्ता बनकर मनसे को औकात में रहने की हिदायत दे रहे हैं।
हिंदी के दिग्गज महानुभावों ने महारा्ष्ट्र की उदात्त विरासत को मेमोरी चिप्स से खंगालकर मीडिया के स्क्रीन पर उंड़ेल दिया। बड़े ही स्वीकार्य अंदाज में कई गोले दागे, जैसे सुगर कोटेड कैप्सुल में तीखा रसायन। लेकिन उत्तर भारतीयों की सामाजिक-राजनीतिक गैरजवाबदेही को उसकी निर्दोषता में क्यों डुबो दिया ? मैं नाचीज यह समझ नहीं सका। यदि परिदृश्य से तटस्थ’ कांग्रेस इसकी जिम्मेवार है तो शिवसेना से गलबांही करनेवाली भाजपा भी उतनी ही जिम्मेवार। परमाणु करार पर उबलनेवाला वाम जब ‘सेज’ पर लेट गया है तो उसे यह हालात सवालिया नहीं लगते। अपने समय-समाज से इस हिंदी पट्टी के राजनेता लापरवाह नहीं होते तो कोई कारण नहीं था कि दूसरे प्रदेश को चोटी पहुंचाने में खून-पसीना एक करनेवाले अपनी मिट्टी में सोना नहीं बोते। आखिर कृशकाय-पीड़ित हिंदी पट्टी क्यों क्षम्य है। आखिर पलायन की हालत हर जगह क्यों नहीं बनी। मैं भाषागत व सांस्कृतिक वैमनस्य के लिए वैधता की जमीन नहीं तलास रहा।
जो भी मीडिया के सर्वोच्च पीठ पर आसीन पर आसीन हैं, उन्होंने मीडिया में जो भी कद हासिल किया है, वह किसी सिफारिश या संयोग की बदौलत नहीं। यह किसी भी पत्रकार हसीन शाश्वत ख्वाब होता है। फिर ऐसे में चीजों को देखने का वह नजरिया उनके प्रतिष्ठानों से गायब क्यों है ? ऐसा लगता है जैसे इस फिनोमेनल साफ्टवेयर को आपरेट करने की सपोर्टिंग टूल नहीं है। मेरे पल्ले यह बात नहीं उतरी कि चैनलों के कुछ पैनल डिस्कसन को छोड़ प्रिंट मीडिया में कहीं भी यह बहस और कोशिश नहीं दिखी कि मुंबई में मराठी मानस में क्या उमड़-घुमड़ रहा है। मराठी मिडिया इसे कैसे ले रहा है। यह जरूरी बात हिंदी मिडिया के पन्नों से सिरे से गायब है।
इतने बड़े पैमाने पर उत्तर भारतीयों के साथ यह उधम औक उत्पात नहीं मचता यदि राज ठाकरे को इतनी व्यापक सामाजिक स्वीकृति व सहमति नहीं मिली होती। चार दशक पूर्व सियासी स्क्रीन पर अधिकाधिक स्पेस पाने की तड़प के रूप में सामाजिक सौहार्द के चेहरा को कुचलते हुए बाल ठाकरे का मराठी मानस उभरा था। ठीक उसी तर्ज पर वक्त की मांग के अनुसार तल्खी के साथ आज की तारीख में महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश के रूप में देखना ठीक नहीं। कई चीजों के घालमेल और एक साथ मौजूदगी और अंतर्क्रिया से जटिल हो रहे परिदृश्य को इस दृष्टि से देखकर बहुत सतही नतीजे निकाले जा सकते हैं। यह ठीक है कि क्षेत्रीय राजनीति करनेवालों के लिए क्षेत्रीय अस्मिता को भड़कानेवाले मसलों की शरण में जाना पड़ता है। इसी के साथ यह भी सवाल है कि गठबंधन के समीकरणों से संचालित राजनीति किस क्षेत्र में नहीं, पर हर जगह यह उपद्रव नहीं दीखता। सामासिक संस्कृति वाले बहुभाषी समाज में अस्मिता के सवाल ऐसी टकराहट पैदा नहीं करते। असम, उड़ीसा, महाराष्ट्र में इस मसले ने तांडव मचा रखा है तो कहीं न कहीं एक कारण यह भी है। कहीं न कहीं उस मराठी मानस का अवचेतन ‘राज’ के उधम से तुष्ट हो रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय पार्टी से जुड़कर क्षेत्रीय आधार के ढीले पड़ने के खतरे से खेलना बाल ठाकरे को सुरक्षित नहीं दीखा। इसीलिए शुरू में राज को राजनीति के बर् फ्लू का चूजा कहनेवाले ठाकरे साहब अंततः अपनी बिसात और औकात पर आ ही गए और आग में घी उंड़ेलने लगे तो अकारण नहीं। मैं इसे जायज नहीं ठहरा रहा, पर उधम की सहूलियतें दनेवाले समाज से निरपेक्ष नहीं रहा जा सकता। मैं यह देखने की कोशिश पर बल देना चाहता हूं कि आखिर दशकों से महाराष्ट्र के विकास में अस्थि-मज्जा की तरह रच-पच गए भाई लोग एकबारगी उच्छिष्ट कैसे हो गए। क्या यह अधिकाधिक छा रहे उत्तर भारतीयों में मराठी अस्मिता को लेकर बसा उपेक्षाभाव के कारण तो नहीं ? या फिर जेनेटिक फिटनेस में पिछड़ने की पीड़ा तो नहीं ?
जो पैनल डिस्कसन सामने आए उनसे इतना तो साफ हो ही गया कि राष्ट्रीय मीडिया यानी हिंदी मीडिया इस पूरे प्रकरण के केंद्र में सिर्फ राज को रखे हुए था। लेकिन यह बौद्धिक तबका भूल गया कि विरोध का स्वर प्रखर व प्रबल होने से विरोध का केंद्र और भी सबल होता जाता है। मैं नहीं कहता कि राज का विरोध छोड़ देना चाहिए, लेकिन राज के मकसद के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थ को भूलना नहीं चाहिए। राज का विरोध जितना ही तल्ख होगा, वह उतना ही अपने मतलब में कामयाब होता जाएगा। राज के खिलाफ अंगारे उगलनेवाले निरीह थे या बेजमीन और मतलबी, यह वक्त के साथ साफ हो गया। भाई लोग बेघर होते गए और अमर जैसे लोगों का स्वर मंद होते हुए लगभग थम सा गया। और उसके जवाब में क्या हुआ कि राज की बयानबाजी पर प्रतिबंध लगने पर उनके चाचा आग उगलने लगे। हमें यह देखना होगा कि शिवसेना के बाल ठाकरे का विरोध करनेवाले अमर सिंह और राज ठाकरे की सांस्कृतिक समझदारी और कंप्यूटर की भाषा में कहें तो कनफिगरेशन क्या है। आखिर इस फायरिंग की सीन से बहस तलब मुद्दा बाहर क्यों नहीं बाहर आया। फलतः मनसे-शिवसेना की बढ़त के साथ हिंदी पट्टी का आवेग लगभग थम सा गया। यही होता है इस पट्टी में सभी मसलों का।
बुनियादी सकटों से जूझते लोग (इसमें पूरी हिंदी पट्टी शामिल है) तात्कालिक सहूलियतों की ओर जल्द खिंचते हैं। रोजी-रोटी और तरह-तरह के टुच्चे सियासी मसलों के जंगल में एकबार फिर सबके सब सो गए। सत्ता (विचार, संस्कृति और साहित्य समेत) को जागीर समझनेवाली हिंदी पट्टी यदि अविकास में तड़पती है तो उसे समझना चाहिए कि कुंडलिनी जागरण में लगे उके सियासी साधक आखिर किसके कल्याण के लिए सक्रिय हैं। केंद्रीभूत शक्तियों से हटकर सत्ता के बाहर भी कई अंगीभूत सत्ताएं हैं जहां उनके मसीहा अपनी नजर गड़ाए हुए है। लालू के पुत्र क्रिकेट में, पासवान-विलासराव देशमुख के पुत्र फिल्म में ! आखिर कोई बात तो है ? इस सियासत से (में) मुल्क में आग भी लगे तो इनका क्या ?
यह ठीक है कि राज ने महानायक (बिग बी) की छवि पर प्रहार करके ओछी और छिछली मानसिकता का परिचय दिया है। लेकिन राज ने अपने तईं सिर्फ महानायक ही नहीं, एख अस्मिता पर भी प्रहार किया था। कुशल योद्धा छोटे-छोटे ठिकानों की बजाए बड़े दुर्गों को निशाना बनाते हैं। हिंदी पट्टी को यह सवाल खुद से करना चाहिए कि क्या बिग बी पर यह हमला पहला हमला है ? अब तक उनपर हुए हमलों में सभी हमले हिंदी पट्टी ने किए थे। महानायक को अपनी ही हिंदी पट्टी में लगातार मारक हमलों से नहीं जूझना पड़ा क्या ? क्या हिंदी पट्टी में उनकी छीछालेदर जायज है और मुंबईवाले करें तो नाजायज ? मुद्दे को सुविधाजनक ओटों में बैठकर, दबकर, छिपकर नही देखा जा सकता। ऐसे में मसलों का वस्तुगत रूप (समूचापन) नहीं दीखता। रोशनी में तोज नहीं हो चीजें धूंधली दीखती हैं। यही हुआ भी। इसीके साथ एक और दुर्घट घटित हुआ। बचाव में वाजिब पक्ष के सामने नहीं आने से अवांछित लोग अगुआ बन जाते हैं और परिदृश्य को हल्का और अगंभीर कर देते हैं। इससे बाजी उलट जाती है। एक तरह से कहें तो सही दिशा में नहीं चलने से बहस का गर्भपात हो जाता है। रुश्दी, तस्लीमा, एमएफ हुसैन आदि मामलों में यही हुआ। बिग बी बचाव के लिए ढल के रूप में मैदान में उतरे अमर सिंह इसी के ताजा सबूत हैं। अमर सिंह बिग बी और भाई लोग को अलग-अलग कर देखते हैं।
इस देश की सामासिक संस्कृति के विकास के लिए त्रिभाषा फार्मुला लाया गया था। अपने दौर में इस पर थोड़ी बहस भी हुई थी। उसका विरोध भले द्रविड़ क्षेत्रों में हुआ, पर सामासिकता की आत्मा को आहत किया हिंदी पट्टी ने उसे खारिज करके। राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय, राजेंद्र मिश्र जैसे कितने मौलिक हिंदी विद्वान हुए जिनमें हिंदीतर भाषाओं के प्रति अनुराग बचा था ? केदारनाथ सिंह (मूल बांग्ला कवि का सहारा लेकर) और नागार्जुन ने तो बांग्ला से अनुवाद भी किया था। पर यह प्रवृत्ति परंपरा का रूप नहीं ले सकी। जिस मुंबई ने मोहन राकेश, कमलेश्वर, शैलेंद्र जैसों को एक बड़ी महफिल दी, उन्होंने मराठी मानस को ले कितनी निजता प्रदर्शित की ? (यही ठीक है कि इससे उनका अवदान कम नहीं हो जाता है, पर बदले परिदृश्य में आकलन का एक व्यापक आधार जरूर बनता है।) शायद इलियट ने इसी लिए कहा था The present influences the past. लेकिन प्रभाकर माचवे, पी नरसिम्हा राव, चंद्रकांत बांदिवडेकर, मधु लिमये, मधु दंडवते, गंगाधर गाडगिल, प्रमिला केपी, ए अरविंदाक्षन, एमएस राधाकृष्ण पिल्लई, जार्ज फर्नांडिज की एक लंबी परंपरा रही है हिंदीतर लेखकों, विचारकों (राजनीतिक) की जिन्होंने हिंदी को मान दिया है। क्या इसे हिंदी पट्टी की अस्मिता के प्रति अनुराग नहीं माना जा सकता है ? कृपया इसे करियर के लोभ से उपजा लगाव नहीं कह सकते हैं। ऐसा ही होता तो समूची हिंदी पट्टी इस कदर दरिद्र नहीं होती। हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका (इसका भी अपना ऐतिहासिक महत्व रहा है) ‘कल्पना’ हैदराबाद से बद्री विशाल पित्ती निकाला करते थे। हिंदी के प्रतिष्ठित कवि वेणु गोपाल की धरती द्रविड़ रही। हिंदी की प्रचार की कई संस्थाएं आज दक्षिण भारतीय मजे से चला रहे हैं। इसे सिर्फ हिंदी की व्यापक स्वीकृति से उपजी बाध्यता से जोड़कर देखने से ऐसे लोगों की निष्ठा और अनुराग का निहितार्थ विरूपित हो जाएगा। यह एक सांस्कृतिक उदारता थी, जिसे हिंदी वालों ने आहत किया है। यह अखिल भारतीयता से जुड़ाव की विकलता से पैदा हुआ है। गैरजिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर किसे वैधता प्रदान करेंगे ?
यदि मराठी जन चाहते हैं कि वहां की आबोहवा, मिट्टीपानी से जीवन का पोषण पानेवाले मराठी से प्रेम करें तो इस आग्रह में बुरा क्या है ? कभी हिंदी पट्टी में भी ऐसा उग्र आंदोलन चला था। आखिर बिहार (तब झारखंड के साथ) के सिंद्री में रहीं मीनाक्षी शेषाद्री और जमशेदपुर में रहे माधवन ने हिंदी सीखी या नहीं ? आखिर जमशेदपुर में रहनेवाले सी भास्कर राव और धनबाद में रहे बी जगदीश राव की हिंदी इतनी अच्छी क्यों हुई ? लेकिन मुंबई में जन्मे, पले बढ़ेरजा मुराद से पूछिए कि वे मराठी कितना जानते हैं ? सीना ठोककर मराठी जानने का दंभ भरने वाले रजा मुराद आईबीएन सेवन के पैनल डिस्कशन में श्रोताओं से मिली चुनौती के बाद भी उनके मुंह से बकार (ध्वनि) नहीं फूटा था।








(24.02.2008)

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