हमसफर

सोमवार, 22 नवंबर 2010

डाल से तोड़े गए पत्ते का पुनर्वास नहीं होता

(देश भर में औद्योगीकरण के नाम पर विस्थापन का जो खेल चल रहा है, नर्मदा, सिंगूर व नंदीग्राम उसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इस क्रम में भरी-पूरी आबादी को अमानवीय उत्पीड़न से गुजरना पड़ रह है। मानवता के नाते और भावी चुनौतियों के बरक्स विस्थापित हो रहे लाचार लोगों के दर्द को सुनना-समझना जरूरी हो जाता है। इसी आलोक में हम हिंदी कवि कुमार अंबुज का एक पत्र दे रहे हैं। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के क्रम में हिंदी कवि कुमार अंबुज ने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक मार्मिक पत्र लिखा था। बेहद यादगार यह पत्र किसी राजकीय रिकार्ड में हो कि न हो, पर माडरेटर को लगता है कि यह 20 वीं सदी के खूबसूरत पत्रों में शुमार किया जा सकता है। विकास के निर्बंध-स्वेच्छाचारी माडल में बड़े बांधों से हो रहे विस्थापन के खिलाफ एक करुण आवाज है यह।
इस पत्र के मिलने का एक प्रसंग पाठकों के साथ शेयर करना चाहता हूं। ज्ञान दा (पहल संपादक और कथाकार ज्ञानरंजन) एक-एक चीज का बड़ा ही सार्थक इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने मुझे एक पत्र कुमार अंबुज के किसी पत्र के पीछे के सादा हिस्से में लिखा गया था। पत्र के इस मार्मिक अंश से पूरे पत्र को पाने की इच्छा हुई। पत्र में लिखे पते पर संपर्क करने पर कुमार अंबुज का बड़ा ही आत्मीयता भरा पत्र मय इस अनुरोध के मिला कि अखबार में छापूं तो उसकी प्रतियां ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’, मेधा पाटेकर, वाणी प्रकाशन को भी भेजूं। मैंने वैसा ही किया। इस बात को कम से कम 11 साल हो गए। - माडरेटर)

परछाईं,13 राधा कालोनी, गुना, मध्य प्रदेश
17.08.1999

आदरणीय श्री दिग्विजय सिंह जी,
मुझे एक लेखक के रूप में यह पत्र इसलिए लिखना पड़ रहा है कि मेरी यह जिम्मेवारी है कि मैं समाज और जनता के बीच उस आवाज को तेज करूं जिसकी आप लगातार अनसुनी कर रहे हैं। इसलिए आपको याद दिलाने की धृष्टता कर रहा हूं कि आप शासन प्रमुख और जनतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए जनप्रतिनिधि होने के नाते, नर्मदा बचाओ आंदोलन और बड़े बांधों के संदर्भ में समुचित जिम्मेवारी और संवेदनशीलता से काम नहीं ले रहे हैं।
कोई भी आदमी राजनीतिक होने या तकनीकी होने से पहले एक मनुष्य होता है और वही उसकी सबसे बड़ी जरूरत है। आप सहमत होंगे कि तमाम राजनीतिक उपादान और विकास के नियम भी अंततः अपनी श्रेष्ठता और सफलता इसीमें निहित पाते हैं कि एक मनुष्य का मनुष्य और उसकी प्राकृतिक स्वतंत्रता को उजाड़े बिना ही एक विकसित समाज का, राष्ट्र का निर्माण कर सकें।
एकलेखक के नाते मेरी दिलचस्पी बांध की तकनीक में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उससे मनुष्य तो नहीं उजड़ जाएगा। बड़े बांधों से जिन लोगों तक लाभ पहुंचेगा उसकी गणना को मैं नहीं जानता, बांध के सवाल पर पीछे हटने से सरकारों को कितना नफा-नुकसान होगा उसे भी मैं नहीं जानता और न ही जानना चाहता हूं क्योंकि मैं मनुष्य को जानता हूं। मेरा सारा सरोकार जनता से है। जानना होगा तो जानना चाहूंगा कि क्या बड़े बांध बनने से एक आदमी भी विस्थापित नहीं होगा ? एक आबादी भी डूब में नहीं आएगी ? इसलिए एक मनुष्य की तरह से, उसीकी तरफ से मैं यह पूछने के लिए विवश हूं कि उजाड़ फैलाकर आप कैसी हरियाली चाहते हैं ? क्या आप गांव-शहर बसने की ऐतिहासिक प्रक्रिया और परंपरा के बारे में जराभी विचार करना चाहते हैं ? एक गांव बसने में जितना मानवीय प्रयास, कष्ट, उल्लास और जिजीविषा शामिल होती है उसकी तौल में आप विकास का कौन पक्ष पलड़े में रखना चाहते हैं ? प्रश्न यह भी है कि एक मनुष्य की भावुकता, उसकी संवेदना, आत्मीयता और उसके संताप को आप किस निगाह से देखते हैं ? और आप विकास को किस तरह से देखते हैं ? विनाश के साथ विकास कैसे हो सकता है ? तकनीकों को, विकास के औजारों को मनुष्यों के शवों के ऊपर स्थापित नहीं किया जा सकता है। यह सभ्यता के विनाश का रास्ता है।
एक न्यायाधीश, एक वैज्ञानिक और एक यंत्री क्या कहता है, इसके बरक्स यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह सुना जाए कि एक विस्थापित हुआ आदमी क्या कहता है। उसकी आवाज से प्रामाणिक कुछ नहीं हो सकता। यह संसद, प्रशासन और न्यायालय यदि उजड़ते हुए आदमी की आवाज को कैद करने के लिए काम करेंगे तो यह हमारे समय की सबसे बड़ी अमानवीयता और ऐतिहासिक भूल होगी।
एक गांव, एक आदमी और एक शहर जब डूब में आता है तो वह मानचित्र पर एक निशान मिट जाने भर की घटना नहीं है। इसके साथ वे गलियां भी डूबती हैं जो कई आदमियों के, कई सालों तक एक साथ चलने से, व्यवहार करने से बनती हैं। वे पेड़, वे वनस्पतिय़ां डूब जाती हैं जो आपसे एक जीवित मनुष्य की तरह बर्ताव करती रहीं और दुख, सुख रोग-शोक में काम आती रहीं। वह चंद्रमा, वे तारे और वह सूर्य भी डूब जाता है जो सिर्फ उसी गांव से, उसी कोण से और उसी जगह से इतना आत्मीय और सुंदर दीख सकता था। दिशाएं डूब जाती हैं और वे घर डूब जाते हैं जिनमें जन्म हुआ, जिनकी खिड़कियों से दुनिया को देखने का काम शुरू हुआ और जिनमें गाने गाए गए, उत्सव मने, जिनकी छाया में विपत्तियां झेलीं जिनके सीने से लग रोना रोया, जिनकी मुंडेरों पर सुबह का स्पर्श देखकर सुंदरता का पहला सबक सीखा और जिनमें विलाप हुआ और जिनकी दीवारों के सहारे फिर से खड़े होकर जीवन में वापसी हुई। एक गांव जब डूबता है तो मनुष्यों केवे तमाम संबंध और एक परंपरा ही डूब जाती है जो गांव में पीढ़ियों तक रहकर ही संभव हो पाती हैं। कुओं, खेतों, ढूहों और चौपालों का डूब जाना क्या सिर्फ अजीवित चीजों का डूब जाना है ? क्या हमारी स्मृतियों का डूब जाना एक साधारण और उपेक्षणीय घटना हो सकती है?
सवाल ये भी है कि क्या आप एक आंदोलन को सिर्फ एक विरोध की तरह देखते हैं ? क्या कोई आंदोलन आपके लिए महज एक सामाजिक बाधा है? जब आंदोलनकारी चढ़ते हुए पानी में मृत्यु की परवाह किए बिना खड़ा रहता है तो क्या यह एक जिद भर है ? जो बुद्धिजीवी और समाजसेवी लोग आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं क्या यह उनके लिए शगल है ? क्या नर्मदा और नदियों को बचाने का जिम्मा आंदोलनकारियों और समाजसेवियों का ही है, शासन का नहीं ? सरकार का प्रमुख होने के नाते इन सवालों पर चलताऊ तरीके से निष्कर्ष निकाल लेना घातक होगा। संभव है कि आंदोलन की ऊष्मा और उसकी ताकत को शासन-प्रशासन के जरिए एक दिन परास्त भले ही कर दिया जाए लेकिन उसके बीज मर नहीं सकते। मनुष्य की निराशा सबसे ताकतवर और दुस्साहसिक होती है। सबसे ज्यादा हिंसक और सबसे ज्यादा विध्वंसक। आपको चाहिए कि आपके राज्य में कोई मनुष्य इतना निराश न हो जाए कि वह सृजनात्मकता का, प्रेम का रास्ता छोड़कर अन्य किसी नकारात्मक रास्ते पर चला जाए, यह हार-जीत का, जय-पराजय का मामला नहीं है। और यदि है भी तो जनता की जीत में ही लोकतंत्र की राज्य की जीत शामिल है। बातचीत के लिए प्रस्तुत होने और समाधान के लिए प्रस्तुत होने में गहरा फर्क है।
एक डूबते हुए गांव के निवासी का विस्थापित होना, गांव से शहर में पढ़ने-लिखने, नौकरी करने गए आदमी के विस्थापित होने जैसा नहीं है। डूब में आ रहे गांव के निवासियों के लिए, यह प्रलय आने जैसा है। उनके संसार को नष्ट किए जाने जैसा है। उसे देशनिकाला देने जैसा है। उसीकी अनुभूति और कष्ट को शब्दों में अभिव्यक्त करना लगभग असंभव है है। इसलिए उसे राजनीतिक चेष्टाओं और कानूनी शब्दावली से समझने का प्रयास भी हास्यास्पद भी है और दारुण भी। पुनर्वास का अर्थ इतना सीमित नहीं हो सकता कि आप एक बीघा जमीन की जगह एक बीघा जमीन दे दें। क्या डाल से तोड़ दिए गए पत्ते का पुनर्वास संभव है ? जबकि हद यह कि हजारों परिवार उजड़ चुके हैं। उनकी बलि दे दी गई है। उनका न्यूनतम पुनर्वास भी नहीं हुआ है। और हजारों परिवार इन्हीं हालातों का शिकार होनेवाले हैं।

मैं कहना चाहता हूं कि आप विकास के वैकल्पिक माध्यमों और तरीकों पर ध्यान दें। अभी सिर्फ धन की बर्बादी हुई है जिसका मूल्य मनुष्यों के जीवन के आगे कुछ भी नहीं है। यह घोषणा अविलंब की जाए कि बड़े बांधों का निर्माण तत्काल रोका जाएगा और अन्य विकल्पों को सामने लाकर, विचार कर अमल किया जाएगा। जो लोग बेघर, बेगांव हो चुके हैं उनकी पुनर्वास समस्या का तुरंत हल किया जाए और आगे इस बर्बादी को एकदम रोक दिया जाए। यह कितना भयावह और क्रूर दृश्य है कि संपन्न, खाते-पीते खुशहाल लोगों को एक विपन्न, नारकीय जीवन में धकेल दिया जाए।
इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि जब-जब जनपक्षधरता के आंदोलन को नकारा जाता है, उसकी उपेक्षा की जाती है उनकी उग्रता विकट हो जाती है। इतिहास ऐसे ही उदाहरणों से भरा पड़ा है। जब शासनतंत्र गफिल होने लगता है तो यह समाज में एक बड़े संकट की सूचना होती है। आप एक विचारशील व्यक्ति की तरह इन बिंदुओं पर विचार करें और अविलंब बड़े बांध बनाने, ऊंचे बांध बनाने की शासकीय प्रतिज्ञा को तोड़ दें। यही एक बेहतर विकास का रास्ता होगा।
हमारे प्रदेश के पड़ोसी राज्यों, महाराष्ट्र और गुजरात शासन से बात करने के लिए आपसे अधिक सक्षम व्यक्ति कौन हो सकता है। यदि आप बड़े बांधों और विस्थापन के कष्ट को समझते हैं तो इससे अधिक सौभाग्य, डूब में आ रहे लोगों का और क्या हो सकता है ? क्योंकि तब आपकी दूरदर्शिता, संवेदनशीलता और कूटनीतिक निपुणता का लाभ विनाश के कगार पर खड़े लाखों लोगों को मिल जाएगा। और इसकी उम्मीद आपसे करना उचित ही है क्योंकि आप जिस जगह हैं वहां आपसे संरक्षण की अपेक्षा सहज और अधिकारपूर्ण है।
मुझे आशा है कि आप इस पत्र को जिम्मेवारी और गंभीरता से लेने की कृपा करेंगे।

शुभकामनाओं के साथ,

कुमार अंबुज,

सेवा में,
श्री दिग्विजय सिंह,
मुख्यमंत्री,
म.प्र. शासन, भोपाल। (सौजन्य पत्र लेखक)

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