हमसफर
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
तहखाने से
सेठ के गल्ले में पैसा
खून से लथपथ
हड्डियों से घिरा लगता हो
पर मेरे पाकेट में आते ही
इस पर
टाफी को रोता बच्चा होता है
क्लिप-सिंदुर को कुनमुनाती बीवी होती है
सूनी अंगीठी, लुढ़की शीशी, खाली कनस्तर,..
पूरी गरमी के साथ पाकेट जलाते हुए।
यहां वो मक्खियां नहीं होतीं
सेठ के गल्ले में चौगिर्द
जैसे कोढ़ पर।
पैसा
पाकेट में नहीं
पैसे पर बैठ
हिचकोले खाने लगता हूं
और लू पीते हुए भी मुझे
आईसक्रीम नहीं दिखती इस पर
कुल्फी नहीं, लस्सी नहीं, पिक्चर भी नहीं
हां
बहते हुए पैसे में
लाचारगी के लहू जरूर देखता हूं
मेरे पाकेट में पैसा
पैसा नहीं
अनब्याही इच्छाओं से
बुढ़ाई जरूरतों का बलात्कार रह जाता है
रोशनी का गर्भपात
दबे पांव आकर
लौटते सपने...
मेरे पाकेट में पैसा
पैसा नहीं रहता सिर्फ।
(राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती/ अक्तूबर 1988 )
डरना
डरे हुओं के पास
जहर होता है खिलाने को
खाने/ फिर खिलाने को
डरते हैं
जो करोड़ों पेट पर लात रखते हुए बढ़ते हैं
और सौंपते हैं नदी को
सैकड़ों टन अनाज
डरते हैं
जो सैकड़ों अनमोल खिलखिलाहट के बदले
एक सर्पाकार हंसी रखते हैं जेब में।
डरते हैं
जो संघर्ष की कीमत में
फाहे सा फफूंद लगा मरहम सुझाते हैं
डरें कैसे नहीं
जो जीते हैं
लाखों – करोड़ों के बदले !
डरते हैं उनसे
जो जानते हैं
हवा को ठूंसकर,
आकाश को लपेटकर
नहीं भरा जा सकता है
चमचमाती सुनहली पेटियों में
डरते हैं उनसे
जो बाईबिल- कुरान में
रामायण- पुराण में
निस्पंद लेटने को तैयार नहीं
डरें कैसे नहीं
जो राक्षस बन चुके पूरी तरह।
राक्षस डरते हैं उनसे
जो खुद पकते हैं / सीझते हैं / जाने कितनी आग पर
पकाने को चावल न होने पर
डरें वो सच से
जिसे भगवान के भौंडेपन की निस्तेज निगाहें
झेल तो नहीं पातीं
मगर जरूर दिखाती हैं
खूनी गुफा की ओर बढ़े रास्ते
दिल में दीमकों का ढेर हो तो
डरना ही पड़ता है सूरज से
डरना लाजिमी है उनसे
जिनकी झोली में डर नहीं
डरना निहायत जरूरी है
राक्षस बने रहने के लिए।
(राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती/ अक्तूबर 1989)
पर्दे पर
पर्दे पर छाया है थूक एक स्त्री का
लहू के तालाब हैं चारों ओर
पर मांसल और उत्तेजक स्त्री होने के कारण
उसके थूक पर मुग्ध है कैमरामैन
और फोकस में वह तालाब गायब हो जाता है
दुःख के नाड़े से जो दुनिया बंधी है
वह एक धागे – सी दिखती है और नहीं भी
जब उसकी स्कर्ट पर फोकस जाता है
तो वह आसमान बन जाती है पर्दे पर
वह ब्रह्मांड सुंदरी, विश्व सुंदरी और न जाने
क्या-क्या रह चुकी है
और उसके लिए एक गठीला नायक पागल हो चुका है
और एक अपराधी
वह माल बन चुकी है पर्दों के लिए
पागल यदि पड़ोस में लड़ता है
तो छा जाती है वह पर्दे पर
अपराधी कहीं उलझता है
तो कैमरा अंधा हो जाता है उसे खोजते-खोजते
कैमरा उसके आंसू और पसीना नहीं देखता
वह नहीं देखता उसके क्षत-विक्षत सपने
वह सिर्फ अंगों की गोलाई देख पाता है
पर्दे पर उसके लब धमाके शक्ल में फुसफुसाते हैं
कि इराकियों का मर्सिया और चीत्कार और
बगदाद की झोपड़ी की किलकारी
चींटियों की तरह रेंगती लगती है
उसके प्रहार से बचने के लिए
रास्ता तलाशते हैं कराहते दुःख
खून से लथपथ इराक से जब सन गई आतंकित दुनिया
और सिनेमा के सारे दुःख उतार दिए गए पर्दे पर
तो आईमैक्स कि विशाल पर्दे पर वह तिल रखने की जगह नहीं ले पाता
जो दिखता है जीवन में हर जगह
नहीं दिखता उस पर्दे पर जहां
उस मांसल और उत्तेजक स्त्री की गाड़ी से टकराता पेड़
दिखाई देता है
दुखों के सागर में डूबती दुनिया
उस स्त्री के घाव, उसका पसीना
कुछ नहीं दिखता जब उसके अंगों की गोलाई
और उघड़ी जांघें मिल जाती है केमरे को
(कथादेश/नवंबर 2004)
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
तहखाने से
जीवन तब भी था
जब हमारे पास आग नहीं थी
पहिया भी नहीं
और नहीं थी खंड-खंड करती इच्छाएं
नदी-पोखर, खेत-खलिहान, पुरखों की गांठ
इतनी ढीली नहीं पड़ी थी
कि बिलबिलाते इथोपियाओं को छोड़
अमरीका की तरह दुरगम परदेश में बिला जाते
रहस्य की तलाश में
आदमी से कटकर
भटक गए समय का
मंगल अभियान नहीं था जीवन
जब बांझ गुस्से का इजहार हो चुकी हो संसद
जहां मेरी ही मुट्ठी व बटुए
इस्तेमाल किए गए
तमाचे की तरह मुझपर
धकियाया गया था जिसे
कुर्सी उसे मिली
यह भी जीवन है
भ्रष्टाचार के संरक्षण में
जी रहे समय का
यह भी जीवन है कि
रिमोट पर जीता शयन-कक्ष
कुर्सी का गुरुत्वकेंद्र बनता है
और बन जाता है
युद्ध का संचालन केंद्र
जीवन किवाड़ है
मानवी खोहों के बीच अंटका
अपने-अपने अगले मौसम के लिए
जीते हैं जैसे ऊंट, कछुआ, मेढ़क
जीवन भी पोषण के इंतजार में
धैर्य नहीं खोता।
रोटी
(एक)
रोटी हमारे हाथ में आने से पहले
गुजर चुकती है हम में से
गुस्सैल पराजित नदी-सी
चूल्हों पर चढञने से पहले
छा जाती है घर पर
स्वप्नवाही गंध की तरह
रोटी खाने से पहले
खा चुका होता है बच्चा
अपने हिस्से का वसंत
गटक जाता है युवक
चिलचिलाती धूप में
सूखते सपनों का सागर
पी जाती है पीड़ाओं का गंगाजल
रोटी तोड़ती औरतें
रोटी तोड़ती औरतें
टूट-टूट जुड़ती हैं
झेलती हैं देह भर
रोटियां मन-मन
(दो)
दुनिया, बाजार, लोग,...
सारी चीजें रिसती हैं बूंद-बूंद
रोटी के सुराख से इस तरह
कि दीवार ढहने के भय के साथ
चेहरों के प्लास्टर भरभरा जाते हैं
फटते हैं रोटी पर लिपटे गणित के पन्ने
रोटी पर तैनात रहते हैं
भरपूर गोचर-अगोचर संगीनधारी
जो निर्वस्त्र भूख में मरते हैं
दागदार रोटियां घर करती हैं उन में
रोटी खाते हुओं को चबा जाती है रोटी
सरहदें कुतर जाने के बाद
रोटी का सिलसिला खत्म नहीं हो जाता
रोटी खा लेने भर से
रोटी की रेल नींद में भी दौड़ती है
जैसे बुढ़ापे में बचपन
अगली सदी की करवटें
ऊंघती सदी में।
(समकालीन भारतीय साहित्य/मार्च-अप्रैल 1998 में प्रकाशित)
लड़की
जैसे हम अपने तलुए देखते हैं
उसकी जांघें सहलाते हैं
नितंबों को थपथपाते हैं खुले में
अपने स्तन का घाव का दर्द
उसकी आंखों दिखना तो दूर
पीठ के खरोंच तक नहीं देख सकती
खुले में यह सोचकर वह सिहर उठती है वह
क्योंकि मल्लिका सेरावत और राखी सावंत नहीं,
अपनी पीठ की खरोंच तक देखने के लिए
खिड़की दरवाजे बना लेती है अंगोपांग को
और आंखें चिपक जाती हैं दसों दिशाओं पर
‘खतों में कलेजा’ को झोंककर चूल्हों पर रसोई बनाती है
तो धुआं और चेहरे के बीच
पिघलती बर्फ नहीं दिखती, अपनी नागरिकताओं से वंचित
वह नहीं बोल पाती अपनी जबान
अपनी हंसी नहीं हंस पाती
कबका भूल चुकी है अपना रोना
अकेले में खुद को खटखटाकर
खौफनाक गलियों में गुजरती है वह।
मां की शिक्षा
मांओं ने हमें
कलम, कमल और न जाने कितने शब्द
खाने को भूलकर, नहाने को टालकर
इसलिए नहीं सिखाए होंगे कि
हम किसी के दिलो-दिमाग में सुराख करें कलम से
कमल से हम किसी मूरत को खरोंचें
और दूध पीकर खूल बहाएं,
मांओं ने नहीं सोचा होगा
त्याग और धैर्य, कष्ट और तप से सींचे गए असंख्य शब्द
उसी के शरीर पर कोड़े की तरह पड़ेंगे
अपने खून से सींचे गए, पोसे गए शब्दों को
जब आग में झुलसते देखती होगी मांएं
तो क्या गुजरता होगा, मांएं ही जानती हैं।
पढ़े-लिखे बड़े हो गए बच्चों को यह समझ न आएगी।
हमारे छुटपन में सिखाए शब्द ही हैं
कभी हिजड़े उसे ले जाते हैं अपनी गली
उससे खेलते-ठठाते हैं
तो कभी खद्दरधारी मसखरा करते हैं
उन शब्दों का गला घोंटते हैं
जैसे मूक मजदूरों का बोनस, तनख्वाह हो
मांएं किस तरह अबूझ लगने वाले शब्दों को
हमारे स्मृतिगर्भ में डालती हैं
यह उसके आंसू, हंसी या मौन में छिपा है
चुप्पी की गहराई में तैरते
खुशी की हवा में लहराते
अबूझ शब्दों ने खोली
अपनी अर्थपेटियां
मांओं के सिखाए गए असंख्य शब्द
उनके ही बदन पर कोड़े की तरह बरसते हैं
तो मांएं ही हैं जो
आज भी हमें कलम, कमल, प्रेम और न जाने कितने शब्द
सिखाने में लगी हैं।
काबुल से बगदाद
काबुल और बगदाद से खुली गाड़ी
कहां रुकेगी
यूएनओ के ढहते गुंबदों से आती है फुसफुसाहट
बहुत भोले हैं वे जिन्हें इस गाड़ी का धुआं
दूसरे किसी देश के किसी प्रांत के किसी गांव में नहीं दिखता
कुली का काम पा जाने की लालच में
उस धुएं का प्रदूषण नहीं दिखता
नहीं जानते कि यह गाड़ी
रेडियो वेव के वेग से चलती है
शायद यह धुआं ही इतना छा गया कि पार का नजारा
नहीं दिखता कमजोर आंखों को
वे नहीं जानते कि यह गाड़ी पटरी पर नहीं चलती
इसलिए जितना डर बैंकों को लुट जाने क है
उतनी ही आशंका खेत-खलिहानों के रौंदे जाने की भी है
कभी भी कुचली जा सकती है पेड़ के नीचे चलती पाठशाला
और कभी भी पांच सितारा होटल मिट्टी के ढेर में बदल सकता है
हारमोनियम और मृदंगों पर हांफते
चैता और रउगपति राघव...कभी भी गुम हो सकते हैं सिंथेसाइजर में
और कभी भी जेनिफर लोपेज, ब्रिटनी स्पीयर बनती बालाएं
मिट सकती हैं
खतरा जब एक जैसा हो हर जगह
तो बचने के अलग-अलग रास्ते
और भी खतरनाक हो जाते हैं।
(पटना से प्रकाशित गणादेश साप्ताहिक के वार्षिक अंक 2009 में प्रकाशित)
जो बचा है खत्म होने से
(एक)
जहां मूर्तियां खरोंचने वाले हाथों में कूंचियां हैं
हमारे दुधमुंहें सपने छटपटाते हैं वहीं-कहीं
भोजन, वस्त्र और आवास के बिना
छोटी होती हुई ओझल हो गई पृथ्वी
अपने चांद-सितारों के साथ हमारी नजरों में
कि हम इतने ऊंचे उठ गए
हम वहां पहुंच गए हैं
खुरदुरी त्वचा वाली सभ्यता को लेकर
जहां सात आसमान पर जीवन की खोज जारी है
और जीवाश्मों में पूर्वजों की
जहां के पर्यावरण के ताप-दाब
द्रवों को रहने की इजाजत नहीं देते
फूट-फूटकर रोने की स्थिति में
हमारे आंसू नहीं रहे हमारे साथ
प्रकाश वर्षों की इस यात्रा में बिछुड़ गए आंसू
कहीं गड्ढे में अपना सागर तलाश रहे।
( दो )
सेकेंड की सुई पर सवार इस समय ने
दिन और महीने के हिसाब छीन लिया
ऋषि-मुनियों की कामनाएं उदरस्थ कर गए हे सभ्यता पुरुषों !
कुछ करो उपाय
कि पृथ्वी ही पृथ्वी रहे हमारे स्वप्नों में
गाएं हम गीत तो पृथ्वी के
देखें हम स्वप्न तो पृथ्वी के हे कलाकार !
रंगो पृथ्वी को पृथ्वी से !
2006 में कच्चू और शकरकंद
अब कच्चू को कच्चू की तरह नहीं देख सकते आप
नहीं कह सकते – कच्चू खाएगा ?
शकरकंद कहकर गाली भी नहीं दे सकते किसी को
बाजार के सिरमौर हो गए सब
कैसे न हो, बीवी को भरोसा न पानेवाले
अब दुनिया को शीतल पेय की गारंटी देते फिर रहे हैं
रौनक हो गए हैं गल्ले की
अब ये हाट से आ गए बाजार में
हो सकता है पाउचों में समा जाएं नया भेस लेकर
गदहा कहें तो पीटे जा सकते हैं
यह एक विजयी उम्मीदवार का चुनाव चिह्न है
उनके टामी को कुत्ता कहकर देख लें
बोलना भूलकर भौंकने लग जाएंगे
उतना ही खतरनाक हो गया है
कच्चू और शकरकंद लगाकर गाली देना
मेमें अपने हाथों से छीलती हैं कच्चू और शकरकंद
ठीक ही तो बाबू लोग अब ले जाने लगे हैं शकरकंद
अपने बास को खुश करने।
अब तो हाट की चीफ गेस्ट हो गए हैं
बड़े नाज-नखरे हो गए हैं इनके
पटल 16 रुपए, कच्चू 14 रुपए
टमाटर 16 रुपए, शकरकंद 18 रुपए
किसी का भी कान काट दें ये
अब आप ही कहें भला
कौन कहेगा कच्चू को कच्चू
और कौन शामत मोल ले शकरकंद की गाली देकर
अब आप किसी को लल्लू भी तो नहीं कह सकते।
समाचारों की दुखद घड़ी
बिग बी के बीमार पड़ जाने से
पूरा बालीवुड आईसीयू में भर्ती है
मंत्रियों की फौज अपना मुंह दिखाने में लगी है
नेताओं की कतार गुलदस्ता लेकर खड़ी है
भीषण दुःख की इस घड़ी में पूरा देश स्वास्थ्य कामना में
एक पांव पर खड़ा है
कैमरामैन को फुरसत नहीं, रिपोर्टर किनकी बाईट ले
बस आज का समाचार इतना ही।
ऐश्वर्या के गले में खराश है
ऐसे में आज समाचार पढ़ना शिष्टाचार के खिलाफ होगा।
इन खबरों के प्रायोजन में
विज्ञापनों की झड़ी लग गई
यह कंपनियों की ओर से शुभकामना और हमदर्दी है।
इसे बटोरने में कैमरे का शीशा टूट गया
और रिपोर्टर के बीमार पड़ जाने से
आत्महत्या करनेवाले किसानों के घर
और परिजनों की पीड़ा नहीं दिखाई जा सकी
इस भारी अफसोस में डूबे चैनलों पर
सारा दिन फैशन शो की बाढ़ रही।
(समकालीन भारतीय साहित्य माच-अप्रैल 2009 में प्रकाशित)
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
टिप्पणियों से
सामाजिक चिंताओं अपेक्षाओं से मुक्त संस्कृतिकर्म अंततः वायवी होकर विलास में तब्दील हो जाते हैं। कला की स्वायत्ता के नाम पर भी इस हद को लांघने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। और धर्म जैसी नाजुक चीजों से छेड़छाड़ तो तभी संभव है जब वह अपनी गलित संलग्नताओं, संलिप्तताओं व संकीर्णताओं से उबरने के लिए आत्मसंघर्ष को हम स्वीकारें। मकबर फिदा हुसैन की मिथकों से छेड़छाड़ की पुरानी शगल रही है। टोटलिटी में देखने से स्पष्ट होता है कि यह कला की स्वच्छंदता नहीं, यह उनकी स्वेच्छाचारिता और स्वैर है।
आजकल जिसके औचित्य को सिद्ध करने के लिए पेशेवर नैतिकता प्रोफेशनल मोरेलिटी को ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाता है, कला भी इसी हथियार का इस्तेमाल करने लगी है। जब वह विकृतियों को ढोने का डस्टबिन बनना स्वीकार कर लेती है तो उसकी बाध्यता हो जाती है अपने वायवी सरोकारों की रक्षा करना।
एमएफ हुसैन यूं ही ‘माधुरी फिदा हुसैन’ नहीं बने। अपनी कला के लिए जिन सरोकारो के निष्कर्ष से वह ‘माधुरी सौंदर्य शास्त्र’ तक पहुंचते हैं, वही कला को मित्तलों की वाल पेंटिंग बनना मंजूर कर सकते हैं। दीवार की पपड़ियों जितनी जिस कला की उम्र हो वह यदि कौड़ियों के लिए अपनी कला को समर्पित करे, तो उसकी सामाजिक अपेक्षाएं कैसी भी हों इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। संस्कृतिकर्म यदि साधना नहीं बने तो हमारे संस्कार को परिमार्जित करने की क्षमता उसमें नहीं आती। और जब कलाकार तक के संस्कार परिमार्जित न हों तो उससे उच्चतर जीवन मूल्यों की निष्ठा की अपेक्षा ही फिजूल है।
कोई मंदिर में प्रवेश करते समय चप्पल यूं ही नहीं खोल देता है, यह सांसारिक लालसाओं, लिप्तताओं, संलग्नताओं से मुक्ति की उसकी भौतिक चेष्टा है. जो प्रतीकवत है। लेकिन अस्सी साला हुसौन कला की साधना करते – करते फूहड़ प्रतिमाओं के सान्निध्य से अपने को धन्य मानने लगें तो कला की खैरियत नहीं।
कला की इस दुर्दशा पर जहां बुद्धिजीवियों व संस्कृतिकर्मियों को उत्तेजित होना चाहिए था, वहां राजनीति को शिरकत करनी पड़ी। और शिवसेना का यह हस्तक्षेप बुरा लगता है तो सिर्फ इसलिए कि ‘समाज’ के उस तबका का चुप रहना, निष्क्रिय रहना हमें बुरा नहीं लगा। राजनीति यूं ही सर्वग्रासी नहीं बनी। सबने मिलकर उसके लिए माकूल अवसर बनाए। यही कारण है कि सत्ता का समीकरण बना रही राजनीति किसी भी विवाद का राजनीतिकरण करने से बाज नहीं आती। यह समय है इन्हीं तथाकथित प्रबुद्धों के छद्म आभिजात्य के प्रपंचों, तिलिस्मों को जानने-गुनने का।
हुसैन ने जब मिथकों का उपहास उड़ाया तो उनकी यह विलास दृष्टि इस्लामी गलित मिथकों-परंपराओं के गुहांधकारों में क्यों नहीं गई ? वहां भी कई गलित परंपराएं- संस्कार आज भी पूरी ताकत के साथ मौजूद हैं। वहां हुसैन की निगाह नहीं जाती। वह भारतीयों की सहिष्णुता, उदारता का बाजारू इस्तेमाल की मंशा कला में प्रयोग (उपभोग) करते हैं। उन्होंने जब ‘सरस्वती’ के साथ ऐसा सलूका किया था तब भी हाय-तौबा मचा था, लेकिन माफीनामे का राग तब सुनने में नहीं आया। लेकिन उन्होंने आज यदि ‘सीता’ के साथ बदसलूकी को कबूला है और माफी मांगी है तो तो इसमें कहीं भी कलाकार के सामाजिक धर्म के नाते नहीं, बस एक बाजारू दबाब सक्रिय था। ‘माधुरी’ केंद्रित अपनी फिल्म गजगामिनी की शूटिंग ठप पड़ी थी शिवसेना की बंदिशों से। और उनकी माफी से शूटिंग का वह बंद द्वार खुल गया। जीवन की परिवर्तनशील सरोकारों से जुड़कर कला क्या ऐसी ही क्रांतिधर्मी चेतना से युक्त होगी, जिसकी कोई सामाजिक अपेक्षाएं न हों। हो तो बस व्यक्तिगत स्वेच्छाचारी लालसाएं और बर्बर कुंठाओं का विस्फोट।
(1995 में बिहार आब्जर्वर के लिए लिखी टिप्पणी)
शनिवार, 27 मार्च 2010
राज्य सत्ता के पुजारी
23 मार्च 2010 दोपहर। कामरेड को खाना खिलाकर गए कुछ ही पल हुए होंगे कि शहर में सुगबुगाहट। कामरेड कानू ने खुदकुशी कर ली। जो बूढ़ा पिछले दो दशक से अधिक समय से हर पल का साक्षी था उसे यह बात और भी समझ में नहीं आई। मीडिया ने तो पार्क स्ट्रीट के बाजार में लगी आग पर तूफान मचा रखा था। किसी जमाने में जिस नक्सलबाड़ी की चिंगारी ने राज्य की नींद जिस तरह हराम की थी, आखिर मौका मिलने पर सत्ता कैसे चूकती। उसने नक्सलबाड़ी के जनक कानू सान्याल की मौत को आत्महत्या करार दिया तो क्या ताज्जुब। और भी ताज्जुब कि इसे बंगाल के आई जी ने खुदकुशी मानने से इनकार कर दिया। गले में फंदा तक की तो बात ठीक है, पर पांव जमीन पर हों और कोई टेबल-कुर्सी तक न हो पास में तो कोई साक्ष्य को कैसे झुठला सकता है। अखबारों ने जी भर कर खुदकुशी को साबित करने के साजो सामान इक्टठा किए। अखबार नहीं आंदोलन के एक लेखक ने तो नायकों के अवसान को हताशा का अंत सिद्ध करने तक की कोशिश की और कानू को इसी आईने में देखा भी। शोषण और अन्याय की पोषक राज्य सत्ता को एक झटके में निर्दोष बताने के लिए इससे अच्छा निष्कर्ष सहज ही कैसे कहीं मिलेगा। शोषण से मुक्ति के लिए लड़ाई में शामिल योद्धा अपनी बर्बादी को न्यौतता है। यह बात समझ में आती है। पर अपने पीछे खड़ी कतार को एक झटके में गर्त में डालने के लिए क्या वह खुदकुशी कर सकता है। क्या उसकी खुदकुशी में वह परिस्थिति शामिल नहीं जिसमें वह निरंतर और भी निहत्था होता जाता है। राज्य सत्ता और भी मारक होती जाती है। ऐसी आवाज करनेवाले विदूषक क्या राज्य का काम आसान नहीं करते। क्या कामरेड कानू की शुरुआत और विकास की व्याख्या इस अंत से हो सकती है और क्या उसका निषकर्ष उन स्थापनाओं को पुष्ट करेगा जो इस धारा को जारी रखने के लिए जरूरी है। लाखों-करोड़ों की आस्था जिस धारा, प्रवृत्ति और ढांचे से जुड़ी है, क्या उसे बदनाम कर कमजोर करने का मौका नहीं है यह। यदि हां तो मीडिया के पल्लू में पलती ऐसी कोशिश को संगठित साजिश का हिस्सा नहीं माना जा सकता है।
(27.03.2010)
शुक्रवार, 19 मार्च 2010
डायरी के पन्ने से
तसलीमा को देशनिकाला देनेवाली बांग्लादेशी हुकूमत को पानी पी-पीकर गरियानेवाले भारतीय वाम और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की जबान को तब लकवा मार गया जब उन्हीं के देश में उन्हें ठिकाना नहीं मिल रहा। वही वाम तब अपनी जबान अवश्य खोलता है जब खास तबके की भावना से खिलवाड़ करनेवाले मकबूल फिदा हुसैन को खाड़ी मुल्क में शरण लेनी पड़ी। इसी वाम की जबान से पर तब और ताला जड़ जाता है जब महाराष्ट्र में पहले मनसे, फिर शिवसेना की प्रताड़नाओं-धिक्कारों और फजीहतों के बीच उत्तर भारतीयों या हिंदीभाषियों (कथित भाइयों) को जलालत झेलनी पड़ी। मुल्क में हिंदी पट्टी की बदौलत अपनी सियासी रोटियां सेंकनेवाली दक्षिणपंथी पार्टियां और उसके सिंपेथाइजर तबके की जुबान पर ताला जड़ गया है। हिंदी भाषियों या उत्तरभारतीयों के साथ महाराष्ट्र में हो रहे अत्याचार को मीडिया अपने तरीके से बाजार के स्पेस में लोकेट करने की फिराक में लगा है। माहिरों ने अपने बौद्धिक करतबों से सियासी अठखेलियों से निकले इस फीनोमेना को मीडिया के उपद्रव का हिस्सा बना दिया। बाजार की गोद में राजनीति की केलिक्रीड़ा और मीडिया के उपद्रव में शामिल महानुभावों ने बड़े ही कौशल से महाराष्ट्र की गरिमापूर्ण ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से इस नई परिस्थिति का कंट्रास्ट पैदा किया है। इसमें मैं प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश, पानी और पूल के कथाकार महीप सिंह तथा वाक् के संपादक और उत्तरआधुनिकता के हिंदी पैरोकार सुधीश पचौरी से लेकर कई लेखक पत्रकारों के उदगार पढ़ने को मिले। (ये वही सुधीश पचौरी हैं जिन्होंने हिंदी में कविता के अंत के साथ सभी विधाओं – आलोचकों का अंत कर डाला था। उन्होंने नामवर को हिंदी का अंतिम आलोचक तक कहा था। यह था हिंदी के समृद्ध होते भविष्य की उनकी समझदारी।) ये वही पचौरी साहब हैं जिन्होंने संडे मेल के दौर में इंद्रप्रस्थ भारती और हंस समेत कई जगहों पर। अब वही पचौरी साहब रिटायर्ड होने पर भाइयों का प्रवक्ता बनकर मनसे को औकात में रहने की हिदायत दे रहे हैं।
हिंदी के दिग्गज महानुभावों ने महारा्ष्ट्र की उदात्त विरासत को मेमोरी चिप्स से खंगालकर मीडिया के स्क्रीन पर उंड़ेल दिया। बड़े ही स्वीकार्य अंदाज में कई गोले दागे, जैसे सुगर कोटेड कैप्सुल में तीखा रसायन। लेकिन उत्तर भारतीयों की सामाजिक-राजनीतिक गैरजवाबदेही को उसकी निर्दोषता में क्यों डुबो दिया ? मैं नाचीज यह समझ नहीं सका। यदि परिदृश्य से तटस्थ’ कांग्रेस इसकी जिम्मेवार है तो शिवसेना से गलबांही करनेवाली भाजपा भी उतनी ही जिम्मेवार। परमाणु करार पर उबलनेवाला वाम जब ‘सेज’ पर लेट गया है तो उसे यह हालात सवालिया नहीं लगते। अपने समय-समाज से इस हिंदी पट्टी के राजनेता लापरवाह नहीं होते तो कोई कारण नहीं था कि दूसरे प्रदेश को चोटी पहुंचाने में खून-पसीना एक करनेवाले अपनी मिट्टी में सोना नहीं बोते। आखिर कृशकाय-पीड़ित हिंदी पट्टी क्यों क्षम्य है। आखिर पलायन की हालत हर जगह क्यों नहीं बनी। मैं भाषागत व सांस्कृतिक वैमनस्य के लिए वैधता की जमीन नहीं तलास रहा।
जो भी मीडिया के सर्वोच्च पीठ पर आसीन पर आसीन हैं, उन्होंने मीडिया में जो भी कद हासिल किया है, वह किसी सिफारिश या संयोग की बदौलत नहीं। यह किसी भी पत्रकार हसीन शाश्वत ख्वाब होता है। फिर ऐसे में चीजों को देखने का वह नजरिया उनके प्रतिष्ठानों से गायब क्यों है ? ऐसा लगता है जैसे इस फिनोमेनल साफ्टवेयर को आपरेट करने की सपोर्टिंग टूल नहीं है। मेरे पल्ले यह बात नहीं उतरी कि चैनलों के कुछ पैनल डिस्कसन को छोड़ प्रिंट मीडिया में कहीं भी यह बहस और कोशिश नहीं दिखी कि मुंबई में मराठी मानस में क्या उमड़-घुमड़ रहा है। मराठी मिडिया इसे कैसे ले रहा है। यह जरूरी बात हिंदी मिडिया के पन्नों से सिरे से गायब है।
इतने बड़े पैमाने पर उत्तर भारतीयों के साथ यह उधम औक उत्पात नहीं मचता यदि राज ठाकरे को इतनी व्यापक सामाजिक स्वीकृति व सहमति नहीं मिली होती। चार दशक पूर्व सियासी स्क्रीन पर अधिकाधिक स्पेस पाने की तड़प के रूप में सामाजिक सौहार्द के चेहरा को कुचलते हुए बाल ठाकरे का मराठी मानस उभरा था। ठीक उसी तर्ज पर वक्त की मांग के अनुसार तल्खी के साथ आज की तारीख में महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश के रूप में देखना ठीक नहीं। कई चीजों के घालमेल और एक साथ मौजूदगी और अंतर्क्रिया से जटिल हो रहे परिदृश्य को इस दृष्टि से देखकर बहुत सतही नतीजे निकाले जा सकते हैं। यह ठीक है कि क्षेत्रीय राजनीति करनेवालों के लिए क्षेत्रीय अस्मिता को भड़कानेवाले मसलों की शरण में जाना पड़ता है। इसी के साथ यह भी सवाल है कि गठबंधन के समीकरणों से संचालित राजनीति किस क्षेत्र में नहीं, पर हर जगह यह उपद्रव नहीं दीखता। सामासिक संस्कृति वाले बहुभाषी समाज में अस्मिता के सवाल ऐसी टकराहट पैदा नहीं करते। असम, उड़ीसा, महाराष्ट्र में इस मसले ने तांडव मचा रखा है तो कहीं न कहीं एक कारण यह भी है। कहीं न कहीं उस मराठी मानस का अवचेतन ‘राज’ के उधम से तुष्ट हो रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय पार्टी से जुड़कर क्षेत्रीय आधार के ढीले पड़ने के खतरे से खेलना बाल ठाकरे को सुरक्षित नहीं दीखा। इसीलिए शुरू में राज को राजनीति के बर् फ्लू का चूजा कहनेवाले ठाकरे साहब अंततः अपनी बिसात और औकात पर आ ही गए और आग में घी उंड़ेलने लगे तो अकारण नहीं। मैं इसे जायज नहीं ठहरा रहा, पर उधम की सहूलियतें दनेवाले समाज से निरपेक्ष नहीं रहा जा सकता। मैं यह देखने की कोशिश पर बल देना चाहता हूं कि आखिर दशकों से महाराष्ट्र के विकास में अस्थि-मज्जा की तरह रच-पच गए भाई लोग एकबारगी उच्छिष्ट कैसे हो गए। क्या यह अधिकाधिक छा रहे उत्तर भारतीयों में मराठी अस्मिता को लेकर बसा उपेक्षाभाव के कारण तो नहीं ? या फिर जेनेटिक फिटनेस में पिछड़ने की पीड़ा तो नहीं ?
जो पैनल डिस्कसन सामने आए उनसे इतना तो साफ हो ही गया कि राष्ट्रीय मीडिया यानी हिंदी मीडिया इस पूरे प्रकरण के केंद्र में सिर्फ राज को रखे हुए था। लेकिन यह बौद्धिक तबका भूल गया कि विरोध का स्वर प्रखर व प्रबल होने से विरोध का केंद्र और भी सबल होता जाता है। मैं नहीं कहता कि राज का विरोध छोड़ देना चाहिए, लेकिन राज के मकसद के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थ को भूलना नहीं चाहिए। राज का विरोध जितना ही तल्ख होगा, वह उतना ही अपने मतलब में कामयाब होता जाएगा। राज के खिलाफ अंगारे उगलनेवाले निरीह थे या बेजमीन और मतलबी, यह वक्त के साथ साफ हो गया। भाई लोग बेघर होते गए और अमर जैसे लोगों का स्वर मंद होते हुए लगभग थम सा गया। और उसके जवाब में क्या हुआ कि राज की बयानबाजी पर प्रतिबंध लगने पर उनके चाचा आग उगलने लगे। हमें यह देखना होगा कि शिवसेना के बाल ठाकरे का विरोध करनेवाले अमर सिंह और राज ठाकरे की सांस्कृतिक समझदारी और कंप्यूटर की भाषा में कहें तो कनफिगरेशन क्या है। आखिर इस फायरिंग की सीन से बहस तलब मुद्दा बाहर क्यों नहीं बाहर आया। फलतः मनसे-शिवसेना की बढ़त के साथ हिंदी पट्टी का आवेग लगभग थम सा गया। यही होता है इस पट्टी में सभी मसलों का।
बुनियादी सकटों से जूझते लोग (इसमें पूरी हिंदी पट्टी शामिल है) तात्कालिक सहूलियतों की ओर जल्द खिंचते हैं। रोजी-रोटी और तरह-तरह के टुच्चे सियासी मसलों के जंगल में एकबार फिर सबके सब सो गए। सत्ता (विचार, संस्कृति और साहित्य समेत) को जागीर समझनेवाली हिंदी पट्टी यदि अविकास में तड़पती है तो उसे समझना चाहिए कि कुंडलिनी जागरण में लगे उके सियासी साधक आखिर किसके कल्याण के लिए सक्रिय हैं। केंद्रीभूत शक्तियों से हटकर सत्ता के बाहर भी कई अंगीभूत सत्ताएं हैं जहां उनके मसीहा अपनी नजर गड़ाए हुए है। लालू के पुत्र क्रिकेट में, पासवान-विलासराव देशमुख के पुत्र फिल्म में ! आखिर कोई बात तो है ? इस सियासत से (में) मुल्क में आग भी लगे तो इनका क्या ?
यह ठीक है कि राज ने महानायक (बिग बी) की छवि पर प्रहार करके ओछी और छिछली मानसिकता का परिचय दिया है। लेकिन राज ने अपने तईं सिर्फ महानायक ही नहीं, एख अस्मिता पर भी प्रहार किया था। कुशल योद्धा छोटे-छोटे ठिकानों की बजाए बड़े दुर्गों को निशाना बनाते हैं। हिंदी पट्टी को यह सवाल खुद से करना चाहिए कि क्या बिग बी पर यह हमला पहला हमला है ? अब तक उनपर हुए हमलों में सभी हमले हिंदी पट्टी ने किए थे। महानायक को अपनी ही हिंदी पट्टी में लगातार मारक हमलों से नहीं जूझना पड़ा क्या ? क्या हिंदी पट्टी में उनकी छीछालेदर जायज है और मुंबईवाले करें तो नाजायज ? मुद्दे को सुविधाजनक ओटों में बैठकर, दबकर, छिपकर नही देखा जा सकता। ऐसे में मसलों का वस्तुगत रूप (समूचापन) नहीं दीखता। रोशनी में तोज नहीं हो चीजें धूंधली दीखती हैं। यही हुआ भी। इसीके साथ एक और दुर्घट घटित हुआ। बचाव में वाजिब पक्ष के सामने नहीं आने से अवांछित लोग अगुआ बन जाते हैं और परिदृश्य को हल्का और अगंभीर कर देते हैं। इससे बाजी उलट जाती है। एक तरह से कहें तो सही दिशा में नहीं चलने से बहस का गर्भपात हो जाता है। रुश्दी, तस्लीमा, एमएफ हुसैन आदि मामलों में यही हुआ। बिग बी बचाव के लिए ढल के रूप में मैदान में उतरे अमर सिंह इसी के ताजा सबूत हैं। अमर सिंह बिग बी और भाई लोग को अलग-अलग कर देखते हैं।
इस देश की सामासिक संस्कृति के विकास के लिए त्रिभाषा फार्मुला लाया गया था। अपने दौर में इस पर थोड़ी बहस भी हुई थी। उसका विरोध भले द्रविड़ क्षेत्रों में हुआ, पर सामासिकता की आत्मा को आहत किया हिंदी पट्टी ने उसे खारिज करके। राहुल सांकृत्यायन, अज्ञेय, राजेंद्र मिश्र जैसे कितने मौलिक हिंदी विद्वान हुए जिनमें हिंदीतर भाषाओं के प्रति अनुराग बचा था ? केदारनाथ सिंह (मूल बांग्ला कवि का सहारा लेकर) और नागार्जुन ने तो बांग्ला से अनुवाद भी किया था। पर यह प्रवृत्ति परंपरा का रूप नहीं ले सकी। जिस मुंबई ने मोहन राकेश, कमलेश्वर, शैलेंद्र जैसों को एक बड़ी महफिल दी, उन्होंने मराठी मानस को ले कितनी निजता प्रदर्शित की ? (यही ठीक है कि इससे उनका अवदान कम नहीं हो जाता है, पर बदले परिदृश्य में आकलन का एक व्यापक आधार जरूर बनता है।) शायद इलियट ने इसी लिए कहा था The present influences the past. लेकिन प्रभाकर माचवे, पी नरसिम्हा राव, चंद्रकांत बांदिवडेकर, मधु लिमये, मधु दंडवते, गंगाधर गाडगिल, प्रमिला केपी, ए अरविंदाक्षन, एमएस राधाकृष्ण पिल्लई, जार्ज फर्नांडिज की एक लंबी परंपरा रही है हिंदीतर लेखकों, विचारकों (राजनीतिक) की जिन्होंने हिंदी को मान दिया है। क्या इसे हिंदी पट्टी की अस्मिता के प्रति अनुराग नहीं माना जा सकता है ? कृपया इसे करियर के लोभ से उपजा लगाव नहीं कह सकते हैं। ऐसा ही होता तो समूची हिंदी पट्टी इस कदर दरिद्र नहीं होती। हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका (इसका भी अपना ऐतिहासिक महत्व रहा है) ‘कल्पना’ हैदराबाद से बद्री विशाल पित्ती निकाला करते थे। हिंदी के प्रतिष्ठित कवि वेणु गोपाल की धरती द्रविड़ रही। हिंदी की प्रचार की कई संस्थाएं आज दक्षिण भारतीय मजे से चला रहे हैं। इसे सिर्फ हिंदी की व्यापक स्वीकृति से उपजी बाध्यता से जोड़कर देखने से ऐसे लोगों की निष्ठा और अनुराग का निहितार्थ विरूपित हो जाएगा। यह एक सांस्कृतिक उदारता थी, जिसे हिंदी वालों ने आहत किया है। यह अखिल भारतीयता से जुड़ाव की विकलता से पैदा हुआ है। गैरजिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर किसे वैधता प्रदान करेंगे ?
यदि मराठी जन चाहते हैं कि वहां की आबोहवा, मिट्टीपानी से जीवन का पोषण पानेवाले मराठी से प्रेम करें तो इस आग्रह में बुरा क्या है ? कभी हिंदी पट्टी में भी ऐसा उग्र आंदोलन चला था। आखिर बिहार (तब झारखंड के साथ) के सिंद्री में रहीं मीनाक्षी शेषाद्री और जमशेदपुर में रहे माधवन ने हिंदी सीखी या नहीं ? आखिर जमशेदपुर में रहनेवाले सी भास्कर राव और धनबाद में रहे बी जगदीश राव की हिंदी इतनी अच्छी क्यों हुई ? लेकिन मुंबई में जन्मे, पले बढ़ेरजा मुराद से पूछिए कि वे मराठी कितना जानते हैं ? सीना ठोककर मराठी जानने का दंभ भरने वाले रजा मुराद आईबीएन सेवन के पैनल डिस्कशन में श्रोताओं से मिली चुनौती के बाद भी उनके मुंह से बकार (ध्वनि) नहीं फूटा था।
(24.02.2008)
शुक्रवार, 12 मार्च 2010
डायरी के पन्ने से
तसलीमा को देशनिकाला देनेवाली बांग्लादेशी हुकूमत को पानी पी-पीकर गरियानेवाले भारतीय वाम और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की जबान को तब लकवा मार गया जब उन्हीं के देश में उन्हें ठिकाना नहीं मिल रहा। वही वाम तब अपनी जबान अवश्य खोलता है जब खास तबके की भावना से खिलवाड़ करनेवाले मकबूल फिदा हुसैन को खाड़ी मुल्क में शरण लेनी पड़ी। इसी वाम की जबान से पर तब और ताला जड़ जाता है जब महाराष्ट्र में पहले मनसे, फिर शिवसेना की प्रताड़नाओं-धिक्कारों और फजीहतों के बीच उत्तर भारतीयों या हिंदीभाषियों (कथित भाइयों) को जलालत झेलनी पड़ी। मुल्क में हिंदी पट्टी की बदौलत अपनी सियासी रोटियां सेंकनेवाली दक्षिणपंथी पार्टियां और उसके सिंपेथाइजर तबके की जुबान पर ताला जड़ गया है। हिंदी भाषियों या उत्तरभारतीयों के साथ महाराष्ट्र में हो रहे अत्याचार को मीडिया अपने तरीके से बाजार के स्पेस में लोकेट करने की फिराक में लगा है। माहिरों ने अपने बौद्धिक करतबों से सियासी अठखेलियों से निकले इस फीनोमेना को मीडिया के उपद्रव का हिस्सा बना दिया। बाजार की गोद में राजनीति की केलिक्रीड़ा और मीडिया के उपद्रव में शामिल महानुभावों ने बड़े ही कौशल से महाराष्ट्र की गरिमापूर्ण ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से इस नई परिस्थिति का कंट्रास्ट पैदा किया है। इसमें मैं प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश, पानी और पूल के कथाकार महीप सिंह तथा वाक् के संपादक और उत्तरआधुनिकता के हिंदी पैरोकार सुधीश पचौरी से लेकर कई लेखक पत्रकारों के उदगार पढ़ने को मिले। (ये वही सुधीश पचौरी हैं जिन्होंने हिंदी में कविता के अंत के साथ सभी विधाओं – आलोचकों का अंत कर डाला था। उन्होंने नामवर को हिंदी का अंतिम आलोचक तक कहा था। यह था हिंदी के समृद्ध होते भविष्य की उनकी समझदारी।) ये वही पचौरी साहब हैं जिन्होंने संडे मेल के दौर में इंद्रप्रस्थ भारती और हंस समेत कई जगहों पर। अब वही पचौरी साहब रिटायर्ड होने पर भाइयों का प्रवक्ता बनकर मनसे को औकात में रहने की हिदायत दे रहे हैं।
हिंदी के दिग्गज महानुभावों ने महारा्ष्ट्र की उदात्त विरासत को मेमोरी चिप्स से खंगालकर मीडिया के स्क्रीन पर उंड़ेल दिया। बड़े ही स्वीकार्य अंदाज में कई गोले दागे, जैसे सुगर कोटेड कैप्सुल में तीखा रसायन। लेकिन उत्तर भारतीयों की सामाजिक-राजनीतिक गैरजवाबदेही को उसकी निर्दोषता में क्यों डुबो दिया ? मैं नाचीज यह समझ नहीं सका। यदि परिदृश्य से तटस्थ’ कांग्रेस इसकी जिम्मेवार है तो शिवसेना से गलबांही करनेवाली भाजपा भी उतनी ही जिम्मेवार। परमाणु करार पर उबलनेवाला वाम जब ‘सेज’ पर लेट गया है तो उसे यह हालात सवालिया नहीं लगते। अपने समय-समाज से इस हिंदी पट्टी के राजनेता लापरवाह नहीं होते तो कोई कारण नहीं था कि दूसरे प्रदेश को चोटी पहुंचाने में खून-पसीना एक करनेवाले अपनी मिट्टी में सोना नहीं बोते। आखिर कृशकाय-पीड़ित हिंदी पट्टी क्यों क्षम्य है। आखिर पलायन की हालत हर जगह क्यों नहीं बनी। मैं भाषागत व सांस्कृतिक वैमनस्य के लिए वैधता की जमीन नहीं तलास रहा।
जो भी मीडिया के सर्वोच्च पीठ पर आसीन पर आसीन हैं, उन्होंने मीडिया में जो भी कद हासिल किया है, वह किसी सिफारिश या संयोग की बदौलत नहीं। यह किसी भी पत्रकार हसीन शाश्वत ख्वाब होता है। फिर ऐसे में चीजों को देखने का वह नजरिया उनके प्रतिष्ठानों से गायब क्यों है ? ऐसा लगता है जैसे इस फिनोमेनल साफ्टवेयर को आपरेट करने की सपोर्टिंग टूल नहीं है। मेरे पल्ले यह बात नहीं उतरी कि चैनलों के कुछ पैनल डिस्कसन को छोड़ प्रिंट मीडिया में कहीं भी यह बहस और कोशिश नहीं दिखी कि मुंबई में मराठी मानस में क्या उमड़-घुमड़ रहा है। मराठी मिडिया इसे कैसे ले रहा है। यह जरूरी बात हिंदी मिडिया के पन्नों से सिरे से गायब है।
इतने बड़े पैमाने पर उत्तर भारतीयों के साथ यह उधम औक उत्पात नहीं मचता यदि राज ठाकरे को इतनी व्यापक सामाजिक स्वीकृति व सहमति नहीं मिली होती। चार दशक पूर्व सियासी स्क्रीन पर अधिकाधिक स्पेस पाने की तड़प के रूप में सामाजिक सौहार्द के चेहरा को कुचलते हुए बाल ठाकरे का मराठी मानस उभरा था। ठीक उसी तर्ज पर वक्त की मांग के अनुसार तल्खी के साथ आज की तारीख में महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश के रूप में देखना ठीक नहीं। कई चीजों के घालमेल और एक साथ मौजूदगी और अंतर्क्रिया से जटिल हो रहे परिदृश्य को इस दृष्टि से देखकर बहुत सतही नतीजे निकाले जा सकते हैं। यह ठीक है कि क्षेत्रीय राजनीति करनेवालों के लिए क्षेत्रीय अस्मिता को भड़कानेवाले मसलों की शरण में जाना पड़ता है। इसी के साथ यह भी सवाल है कि गठबंधन के समीकरणों से संचालित राजनीति किस क्षेत्र में नहीं, पर हर जगह यह उपद्रव नहीं दीखता। सामासिक संस्कृति वाले बहुभाषी समाज में अस्मिता के सवाल ऐसी टकराहट पैदा नहीं करते। असम, उड़ीसा, महाराष्ट्र में इस मसले ने तांडव मचा रखा है तो कहीं न कहीं एक कारण यह भी है। कहीं न कहीं उस मराठी मानस का अवचेतन ‘राज’ के उधम से तुष्ट हो रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय पार्टी से जुड़कर क्षेत्रीय आधार के ढीले पड़ने के खतरे से खेलना बाल ठाकरे को सुरक्षित नहीं दीखा। इसीलिए शुरू में राज को राजनीति के बर् फ्लू का चूजा कहनेवाले ठाकरे साहब अंततः अपनी बिसात और औकात पर आ ही गए और आग में घी उंड़ेलने लगे तो अकारण नहीं। मैं इसे जायज नहीं ठहरा रहा, पर उधम की सहूलियतें दनेवाले समाज से निरपेक्ष नहीं रहा जा सकता। मैं यह देखने की कोशिश पर बल देना चाहता हूं कि आखिर दशकों से महाराष्ट्र के विकास में अस्थि-मज्जा की तरह रच-पच गए भाई लोग एकबारगी उच्छिष्ट कैसे हो गए। क्या यह अधिकाधिक छा रहे उत्तर भारतीयों में मराठी अस्मिता को लेकर बसा उपेक्षाभाव के कारण तो नहीं ? या फिर जेनेटिक फिटनेस में पिछड़ने की पीड़ा तो नहीं ?
जो पैनल डिस्कसन सामने आए उनसे इतना तो साफ हो ही गया कि राष्ट्रीय मीडिया यानी हिंदी मीडिया इस पूरे प्रकरण के केंद्र में सिर्फ राज को रखे हुए था। लेकिन यह बौद्धिक तबका भूल गया कि विरोध का स्वर प्रखर व प्रबल होने से विरोध का केंद्र और भी सबल होता जाता है। मैं नहीं कहता कि राज का विरोध छोड़ देना चाहिए, लेकिन राज के मकसद के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थ को भूलना नहीं चाहिए। राज का विरोध जितना ही तल्ख होगा, वह उतना ही अपने मतलब में कामयाब होता जाएगा। राज के खिलाफ अंगारे उगलनेवाले निरीह थे या बेजमीन और मतलबी, यह वक्त के साथ साफ हो गया। भाई लोग बेघर होते गए और अमर जैसे लोगों का स्वर मंद होते हुए लगभग थम सा गया। और उसके जवाब में क्या हुआ कि राज की बयानबाजी पर प्रतिबंध लगने पर उनके चाचा आग उगलने लगे। हमें यह देखना होगा कि शिवसेना के बाल ठाकरे का विरोध करनेवाले अमर सिंह और राज ठाकरे की सांस्कृतिक समझदारी और कंप्यूटर की भाषा में कहें तो कनफिगरेशन क्या है। आखिर इस फायरिंग की सीन से बहस तलब मुद्दा बाहर क्यों नहीं बाहर आया। फलतः मनसे-शिवसेना की बढ़त के साथ हिंदी पट्टी का आवेग लगभग थम सा गया। यही होता है इस पट्टी में सभी मसलों का।
बुनियादी सकटों से जूझते लोग (इसमें पूरी हिंदी पट्टी शामिल है) तात्कालिक सहूलियतों की ओर जल्द खिंचते हैं। रोजी-रोटी और तरह-तरह के टुच्चे सियासी मसलों के जंगल में एकबार फिर सबके सब सो गए। सत्ता (विचार, संस्कृति और साहित्य समेत) को जागीर समझनेवाली हिंदी पट्टी यदि अविकास में तड़पती है तो उसे समझना चाहिए कि कुंडलिनी जागरण में लगे उके सियासी साधक आखिर किसके कल्याण के लिए सक्रिय हैं। केंद्रीभूत शक्तियों से हटकर सत्ता के बाहर भी कई अंगीभूत सत्ताएं हैं जहां उनके मसीहा अपनी नजर गड़ाए हुए है। लालू के पुत्र क्रिकेट में, पासवान-विलासराव देशमुख के पुत्र फिल्म में ! आखिर कोई बात तो है ? इस सियासत से (में) मुल्क में आग भी लगे तो इनका क्या ?
यह ठीक है कि राज ने महानायक (बिग बी) की छवि पर प्रहार करके ओछी और छिछली मानसिकता का परिचय दिया है। लेकिन राज ने अपने तईं सिर्फ महानायक नहीं एक अस्मिता पर प्रहार किया था।
जारी
(24.02.2008)
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
डायरी के पन्ने से
नंदीग्राम हादसे के बाद आल इंडिया माइनारिटी फोरम का फरमान और कोलकाता से तसलीमा के निष्कासन को कैसे समझा जाए ? क्या यह ठीक उसी तरह नहीं जैसे जार्ज ने अमरिका बनाम ईराक की लड़ाई में दुनिया को धमकाया था यह कहकर कि ईराक-बनाम अमेरिका में जो उनके साथ खड़ा नहीं वह आंतंकवादी है ? पश्चिम बंगाल सरकार झुकी भी। क्या भारतीय इस्लामी कट्टरता की कठपुतली नहीं? क्या यह मान लिया जाए कि भारतीय वामपंथ अपनी उम्र के आठवें दशक तक आते-आते सठिया गया और उसके पास अपने लाड़ले इस्लामी कट्टरता को पुचकारने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। आखिर लेखक भरोसा बदलावकारी ताकतों पर है या फिर वह प्रतिक्रियावादियों की अनुकंपा पर हैं। अश्लील प्रसंगों से चर्चित और कट्टरता को तार-तार करते अंश से विवादित ‘द्विखंडिता’ से तसलीमा को उन अंशों को आखिरकार अल्पसंख्यक महानुभावों के दबाव और आतंक में आकर निकालने को राजी हो गई और तर्क दिया कि शांति का माहौल बनाने के लिए उन्होंने ऐसा किया। क्या वह लज्जा का दूसरा पाठ लिखेंगी ? कोलकाता को स्थाई ठिकाना माननेवाली तसलीमा जब (कोलकाता से निकलकर) भारत को अपना ठिकाना मानने लगीं तो क्या यह नहीं माना जाए कि राजमार्ग, राष्ट्रीय मार्ग से यह रास्ता अब अंतरराष्ट्रीय रास्तों से मिलकर बांग्लादेश जाने के लिए पगडंडी तो निकाल रही हैं ? लेकिन तसलीमा को इसकी तनिक भी चिंता नहीं कि ऐसा करके उसने अपने पक्ष में खड़े मानवीय सरोकारों से जुड़े मानवाधिकार की रक्षा के लिए आंदोलन के मुंह पर कालिख तो नहीं पोत रही हैं? विवादास्पद अंश प्रतिबंध मुक्त करने के लिए दो-दो बार कोलकाता उच्च न्यायालय गए मानवाधिकारवादी सुजत भद्र कौन है, तसलीमा ने यह जानना नहीं चाहा ? तसलीमा के इस पूरे अध्याय से भारतीय वाम का चेहरा वामपंथी लेखक संगठनों की हवाबाजी कहां गई ? भारतीय वाम का क्रांतिकारी परचम देखना हो तो भारत छोड़कर खाड़ी देश में रह रहे एमएफ हुसैन और बांग्लादेश छोड़कर भारत में रहने की जिद पर अड़ी तसलीमा के कंटेक्स्ट में इस टेक्स्ट को देखना होगा। कल्पना की उड़ान और कला की स्वायत्तता की वकालत करते हुए हुसैन के पक्ष में खड़े होनेवालों को क्यों नहीं दिखता कि हुसैन की कूंचियां हिंदू देवियों के कूच-नितंब पर क्यों फिरती हैं ? अपने मुहम्मद व पैगंबरों की खोहों में जाकर उसके रंग क्यों सूख जाते हैं ? या कूंचियां ही सूख जाती हैं ? प्रताड़ना और शोषण का चित्रण करते हुए इस्लामी कट्टरता और सामंती जकड़न में कराहती आवाजें क्यों नहीं उनके कानों तक पहुंचती हैं ? इस्लामी कट्टरता और सामंती खोहों को कलम से आलोकित करनेवाली कलम से तस्लीमा की यौन उच्छृंखलताएं क्यों नहीं दिखती भारतीय जनवादी वाम लेखक संघों को ? क्या यह संस्कृतिकर्म के नाम पर फलने फूलनेवाली ऐय्याशी में हिस्सेदारी की चाहत तो नहीं। आखिर कौन उनकी जबान को सिलता है जो जबान कभी विभूतिनारायण राय से लेकर एमएफ हुसेन तक को संरक्षण की वकालत करती है।
भारतीय वामपंथ के आंचल में ठौर पाए वामपंथी लेखकों को ऐसे मसलों पर सांप सूंघ लेता है। वामपंथ की चालाकियां उनकी धूर्त्तता का सहारा बनती हैं। माकूल जवाब तलाशने में उन्हें दगाबाज बनना पड़ेगा और कुछ तो बनते भी हैं। उसके भटकाव व बिखराव के सूत्र को पकड़ने के लिए समूचेपन में जाना होगा, जो इनकी फितरत में नहीं।
(02 दिसंबर 2007)
डायरी के पन्ने से
दुनिया रोज बनती है पर सबकी नजर गई होगी। इसकी समीक्षाओं पर भी। क्या ऐसा नहीं लगता कि आलोकधन्वा का रचनाकर्म एक खतरनाक दौर से गुजर रहा है। जिस लंबे तप और संघर्ष के बाद व्यक्तित्व का तेज उनकी कविता को एक काव्यमूल्य के रूप में मिला था, वह क्रमशः भोथर होने लगा है। वामपंथ का पतित गठजोड़ प्रकृति से सर्वहमति का स्वर अपनाने की विवशता या स्वाभाविकता की तरह भी घटित हुआ माना जा सकता है।
राजनीतिक लंपटता और टुच्चेपन की नागरिक स्वीकृति के पीछे प्रबुद्ध वर्ग के गलत इस्तेमाल का भी हाथ है इसमें। अपनी सुविधा और साध के लिए प्रबु्द्ध वर्ग को यह जरूर मंजूर है। यह वर्ग अपना गलत इस्तेमाल होने देता है राजनीतिक लंपटताओं का वैधानिक औचित्य सिद्ध करने में। जो काव्य मुहावरा आलोक ने अर्जित किया था, उसे वह एकबारगी छिन्न-भिन्न नहीं हुआ। इसके लिए उनकी अपनी जीवन स्थितियां व जीवनसंघर्ष के बीच लालसाओं का प्रभुत्व भी जिम्मेवार है। लेकिन बदलाव के इस परिप्रेक्ष्य पर ऊंगली रखने की बजाए ललित कार्तिकेय इसे दृष्टि-अंतर्वस्तु, रूप और शैली की सुखद संगति के रूप में देखते हैं। श्री कार्तिकेय को इसमें न कोई द्वंद्व न कोई दरार दिखती है (जनसत्ता के 23 मई 1998 के अंक में श्री कार्तिकेय की समीक्षा साधारण की आदिम महत्ता) दूसरी ओर परमानंद श्रीवास्तव हैं जो इसे विचलन नहीं मानते, बल्कि आलोकधन्वा की कविता से वाजिब अपेक्षा को उनकी जिम्मेदारी के बजाए काव्याभिरुचि की तानाशाही या वामपंथ की सांस्कृतिक क्रांति के भीतर नवउपभोक्तावाद की सुगबुगाहट । यह सिर्फ आलोक का विचलन नहीं, बल्कि समग्र वामपंथ का खतरनाक दौर भी है, जिसे श्री श्रीवास्तव सभ्यता विमर्श कहकर खुश हो लेते हैं। परमानंद श्रीवास्तव को जिस तरह सांस्कृतिक मानवीय विमर्श की ताकत पर भरोसा है तो उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इस देश में कैसे गैरकांग्रेसवाद की लड़ाई पिछड़ा-दलित में बिखर गई और और सामाजिक न्याय के लिए खड़ी लड़ाई भ्रष्टाचार का जवाब नहीं ढूंढ़ सकी और खास किस्म का संप्रदायवाद को रच बैठा। बिखराव को समेटने की प्रवृत्ति की कमी कैसे गैर भाजपावाद की उपज वामपंथी उग्रता में होती है। अंतर्विरोध को पाटने में नाकाम तीसरी ताकत हमेशा बिखरकर अपने ही खिलाफ खड़ी होती रही।
एक भी समीक्षा ऐसी नहीं दिखी जिसे आलोक के उन्नत काव्याकाश में जीवनदृष्टि की वक्रता दिखी। 70 के दशक में छह कविताएं, 80 के दशक में तीन कविताएं, 90 के दशक में 32 कविताएं। यह समझने और ताड़ने का मसला है कि उर्वरता और बंजरपन का कुछ न कुछ रिश्ता (निर्णायक) जरूर ही प्रगल्भता व मितभाषिता से है जो उनके जीवन सरोकारों में क्रमशः खुलती चली गई। उनकी संलग्नताओं में बदलाव व विस्तार की दिशा इसकी सबूत है, लेकिन टिप्पणियां हैं कि खुशामद ही करती हैं।
क्या आज पाश होते तो उनका भी यही हस्र होता ? मुझे लगता है कि ऐसा नहीं होता। ऐसा इसलिए कि जिस समाज के वह थे उसके मूल संस्कारों को तिलांजलि देकर ही वह कम्यूनिस्ट हुए। आखिर कहीं न कहीं तो धर्म के विरुद्ध खड़ा होना ही होगा। क्योंकि इन्हीं संस्कारों में संक्रमण के कीटाणु हैं। संस्कारों को तिलांजलि देने का मतलब असामाजिक होना कत्तई नहीं। सामाजिक बेहतरी के सुखद सपने और बदलाव की आग उनमें हमेशा जीवित रही। यह सिर्फ उनके साथ की बात नहीं। प्रो. वरावरा राव व क्रांतिकारी गायक गायक को देखा जा सकता है जो अपनी वृत्तियों और सरोकारों में हमारे सामने अविचल खड़े हैं। आलोक का अंधकार कहीं न कहीं हिंदी पट्टी की नियतियों व नियंताओं से भी जुड़ा है। यह अंधकार हिंदी पट्टी की राजनीतिक चेना से उपजा है, जहां सामंती समाज के अवशेष से अभी भी मोह और आकर्षण बचा है। कम्यूनिस्टों का जातिवादी रुझान (झुकाव) और क्या है ? यही कारण है कि आज नंदीग्राम और सिंगूर पर प्रो. वरावरा राव की कविता चिंगारी तो उगलती है और गदर की आवाज में धधक बची हुई है। यह तय है कि पाश भी निस्तेज नहीं होते। क्या ‘गोली दागो पोस्टर’ और ‘जनता का आदमी’ की कविता की आग का दरिया नंदीग्राम और सिंगूर तक आते-आते सूख नहीं गई ? क्या कवि खुद इसके नैरंतर्य को नंदीग्राम में नहीं ढूंढ़े ? या तुलसी और सूर की तरह सारी परिस्थितियों में जैसे पाठ तैयार कर लिए जाते हैं क्या उसी तरह आलोक का जीवंत पक्ष जाने बगैर एक पाठ रिड्यूस कर दिया जाए ? क्या मान लिया जाए कि वे आज कविता के जीवंत परिप्रेक्ष्य से उसी तरह गायब हैं जैसे बच्चन मरने से 20 साल पहले या त्रिलोचन अभी मंद पड़े हैं (चाहे कारण जो भी हो)। कहीं एक बार फिर हमें वाम के विचलन का यह संक्रमण पैदा करने वाले समाज में ही ढूंढ़ना होगा।
(जून-जुलाई 1998 में मदन कश्यप को लिखे पत्र के आधार पर)
सोमवार, 7 दिसंबर 2009
डायरी के पन्ने से
करीब 13 साल पहले हिंदी कविता और उसके भाष्यकार को अजय तिवारी ने उनके कुलीनतावादी चेहरे को तार-तार करने का दुस्साहसिक कृत्य किया था। समकालीन कविता और कुलीनतावाद में सिर्फ कुलीनतावादी चेहरे को काटने-पीटने का सवाल नहीं था, बल्कि इसी बहाने उन्होंने हिंदी पट्टी की साहित्यिक-सांस्कृतिक मठाधीशी को भी तार-तार किया था। यह तिवारी जी की आलोचना ही थी जहां मुक्तिबोध की उधारी दिखी थी। अपनी आलोचनाओं में अंतर्राष्ट्रीय रीडिंग रूम दिखानेवाले तो बहुतेरे हुए, पर पोलिश सौंदर्यशास्त्री जान पारांदोव्स्की वाला पन्ना किसी ने नहीं पलटा था। (मुक्तिबोध ने बगैर किसी का हवाला दिए कला के जिन तीन क्षणों की बात की है, वह जान पारांदोव्स्की की अवधारणा है।)
ऐसा लगता है जैसे वर्ष 1957 में पुस्तक ‘नई कविता के प्रतिमान’ नहीं आती तो ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसा प्रतिमान गढ़ा भी जाता या नहीं, संदेह ही है। लेकिन अजय तिवारी की इस किताब के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। हिंदी पट्टी जैसा आत्ममुग्ध समाज है, उसे यथास्थिति में बने रहना पसंद है। ऐसा लगता है जैसे निर्बंध लूट के लिए सियासी सुराज ही उसका एकमात्र मकसद था, अन्यथा सर्वाधिक हलचल और हिलकोरों से भरा यह समाज आजादी (कथित) के बाद इस कदर निस्पंद नहीं रह जाता। उसे शासक वर्ग भाने लगा है। प्रतिरोध की चेतना से लबालब भरे रहनेवाले इस समाज की भाषा-संस्कृति से ठसक यूं ही गायब नहीं हो जाती। वहां की क्षेत्रीय राजनीति देखिए, भोजपुरी, मैथिली, खोरठा, छत्तीसगढ़ी बोली-बानी की कला-संस्कृति में आहट सुनिए। बालीवुड के थूक-पेशाब से सना हुआ है सब कुछ। न ही बालीवुड की प्रतिकृति है, न ही क्षेत्रीय संस्कार। हम फिर आते हैं गायब हो गई उसकी सांस्कृतिक ठसक पर। वह व्यवस्था का विरोध सिर्फ अपने हितों को बरकरार रखने या इसका इजाफा करने के वास्ते ही करता है। चालाकी से चमकती खुंटियल दाढ़ियों के पीछे का बर्बर-हिंस्र जंगल आपको नहीं दीखेगा। इस खुंटियल दाढ़ी में रहनेवाले समाजवादियों के विभिन्न संस्करण (मीडिया, एनजीओ, राजनीति) को बुरा नहीं लगना चाहिए कि लोहियावाद का गैरकांग्रेसवाद किन सिमेंटिंग फैक्टर्स की बदौलत चला। कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ने के लिए आया लोहियावादी समाजवाद जातिवाद का खुंखार चेहरा लेकर हाजिर हो गया। सांप्रदायिकता की काट में आया सामाजिक न्याय व सेकुलरवाद उग्र इस्लामियत का संरक्षक हो गया। वहां जब आलोचना प्रशंसा-अनुशंसा करने लगी हो, तो उससे तटस्थता की उम्मीद खतरनाक नादानी से अधिक कुछ नहीं कही जा सकती। तटस्थता की अनिवार्य परिणति निर्मम आत्मालोचना में होती है और आज सत्ताकामी आलोचक (विभिन्न क्षेत्रों में) यह नहीं कर सकता। वह वहां नहीं जा सकता है, जहां पहुंचकर तिवारी जी ने कविता की कुलीनता की खबर लेते हुए उन सबको भी औकात बताई थी, जो आलोचना के शीर्ष पुरुष बने फिरते हैं या फिर फैंटेसी के गुहांधकार में प्रगतिवाद का परचम धरे हुए हैं। वह 70-80 साल की उम्र में भी राज्य स(भा)त्ता में घुसने, वीसी की कुर्सी पर पीठ धरने या शिक्षण संस्थाओं में पीठासीन होने की लार टपकाते गली-कूचियों में फिर रहा है। वह आलोचना करके अपनी हैसियत को जोखिम में नहीं डालना चाहता। हमें यह याद रहनी चाहिए कि साहित्य की भूमिका प्रतिपक्ष की भूमिका होती है। इसकी चेतना प्रतिरोध की होती है। चित भी मेरी, पट भी मेरी जैसी बात नहीं होती यहां। पर वह तो अब प्रतिरोध शब्द मात्र से परहेज करने लगा है। इसकी आवाज मात्र से भड़कने लगा है। साहित्य में सत्ता पिपासुओं की केंद्रीयता से साहित्य की भूमिका खतरे में पड़ती है।
तिवारी जी ने अपनी उस किताब में आलोक धन्वा की कविताओं पर चुप्पी पसार दी। क्या कन्फ्यूसियस की शब्दावली में इसे निगेशन माना चाए। उसने मौन को भी एक भाषा कहा है। उनकी कविता हिंदी आलोचना में विचलन को समझने का पैरामीटर देती है। आमतौर पर उनकी कविताएं विवरणात्मक उतनी नहीं होतीं (जैसी कि दीखती हैं), जितनी कि रूपकों की मनोरम पर्वत चोटियां। रूपकों की सवारी पर उड़ान भरती उनकी कविताएं बाद के दिनों में क्रमशः छोटी होती हुई, अमूर्तता में पनाह लेने लगी। ‘दुनिया रोज बनती है’ में परिवर्तन की शाश्वतता का आख्यान मनोहारी तो है, पर उसके फलितार्थ (समूची कविताओं को पढ़ने के बाद सिर्फ धूम मचाई कविताओं के आधार पर नहीं) आलोक के प्रशंसकों के लिए खतरनाक संकेत है। दूसरी ओर कविता को लगभग गरिया के अंदाज तक जाकर साहित्य की रजनीशी करते राजेंद्र यादव पर तिवारी जी की चुप्पी अखरती है। वैसे अपने जमाने में सार्त्र भी कविता को साहित्य होने से खारिज करते रहे। जिन तार्किक परिणतियों के बूते राजेंद्र यादव (मन्नू भंडारी की भाषा में छलात्कारी) का विचार संसार खड़ा है, तो मैं उन्हें साहित्य का रजनीश पाता हूं। एक बार पीएल पीकाक ने काव्य की निष्प्रयोजनीयता साबित करने के लिए एक पुस्तिका ही लिख डाली। इसमें उन्होंने कहा था कि तर्क और विज्ञान के युग में काव्य केवल बर्बरता का ही अवशेष है। लगभग यही अंदाज था अरस्तु का जब उन्होंने कहा था कि कवि-कलाकार को समाज में नहीं रहने देना चाहिए। यह अलग बात है कि अरस्तु ने यह यूनान की सामरिक पृष्ठभूमि में कहा था। बावजूद इसके हम उसे जायज नहीं ठहरा सकते। पीकाक को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए प्रसिद्ध कवि पीबी शेली ने द डिफेंस आफ पोएट्री नामक निबंध ही लिख डाला। शेली की यह परंपरा आज भी अंग्रेजी कविता में जिंदा है। पोएट्री इंटरनेशनल वेब हर साल इसी विषय पर एक व्याख्यान रखता है। वेब जाकर हर साल दिए गए व्याख्यान को देखा जा सकता है। हमारा सवाल है कि इतनी बड़ी पट्टी में साहित्य की रजनीशी का कोई जवाब नहीं है ?
मुझे ऐसा लगता है कि जनतंत्र की आत्मा असहमति की आजादी के जिस सम्मान पर टिकी है, वह इन दिनों जोखिम (नुकसान) में है। यह सिर्फ हिंदी पट्टी की ही बात नहीं। पूरे देश में हम पाते हैं कि प्रबुद्ध वर्ग, बुद्धिजीवी तबका सबसे पहले तो मध्यवर्गीय लालसाओं से भरा पड़ा है। फिर वह सत्ता के पीछे लार टपकाता फिरने लगा है। दरअसल बुद्धिजीवियों का प्रपंच तब तार-तार होने लगा, जब से वह पार्टियों में सेंधमारी करने लगा है। वह पार्टियों की सारी गलाजत को मुकुट की मानकर चलता है और सारे तर्क-तीर उसकी रक्षा में तलाशता-चलाता फिर रहा है। कमोबेश साहित्यकार भी उसी बिरादरी में जाने लगा है। सभी भारतीय भाषाओं की देशज पत्रकारिता तबसे खतरे में पड़ गई है जब से वह कारपोरेट सत्ता के व्यूहचक्र में अपने को रखने लगा है। पत्रकारिता का उत्पात पूंजी की अटखेलियों और बाजार की गोद में हो रहा है। जनतंत्र व मानवाधिकार के हनन के सोते से वह प्यास बुझा रहा है। यही कारण है कि मुल्क में श्रम कानूनो का सर्वाधिक उल्लंघन करनेवाले प्रिंट मीडिया एक दोगली लड़ाई और घुटी आवाज में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरोध में मुंह खोलता है तो बाजार के मल उसमें प्रवेश पाने लगते हैं। बाजारवाद के उपद्रव और खतरों को पार करने के लिए खड़ा उपक्रम (मीडिया) कैसे सांस्कृतिक संकट बनकर खड़ा है, यह भी विचारणीय होना चाहिए। अब यह सिर्फ मीडिया नहीं रहा।
(अजय तिवारी को लिखे पत्र पर आधारित) 03.01.2007
बुधवार, 9 सितंबर 2009
अहसानमंद हैं गाली नहीं दें
नहीं मालूम यह कौन सी हवा चली कि लोग अपने दौरों में कीर्तिमान स्थापित करनेवालों को गाली देकर अपनी कालर ऊंची कर रहे हैं। क्रिकेट या टेनिस से मेरी दिलचस्पी मैदान में भारत या भारतीय की मौजदूगी रहने तक सीमित है। लेकिन प्रभाष जी ने खेल पत्रकारिता को जो कलेवर, मिजाज और तेवर दिए वह किसी खेल पत्रकार के बूते की बात नहीं। विषय कोई भी हो, वो अपनी कंटेंट को जिस तरह खोलते हैं, जैसा रिदम पैदा करते हैं विषय की जटिलता या प्रसंग से वाकफियत की कोई जरूरत नहीं होती। आखिर हिंदी का कौन पत्रकार इसे मानने को तैयार नहीं। उन्होंने एक अखबार से/में जो कुछ किया वह हिंदी पत्रकारिता का मानक हुआ। परिदृश्य में उनकी मौजूदगी प्रसंग को अर्थवान बना देती थी। हिंदी पट्टी की नई बिरादरी जो अभी-अभी मीडिया में प्रवेश ही कर रही है, उसे इन चीजों को देखना-सुनना, परखना-गुनना, सीखना-समझना चाहिए। दुर्भाग्य ही है कि वह आंख बंद कर चीजों को मंजूर कर रही है या खारिज कर रही है। वह परिदृश्य से विस्मित है या मगन है। दोनों ही हालातों में आखें बंद हो जाती हैं। आखिर जिस साक्षात्कार को लेकर लोग वितंडा खडा कर रहे हैं, क्या उसे समग्रता से, विषय को समूचेपन में उन्होंने देखा है। उन्होंने ब्राह्मण की, ब्राह्मणत्व की चर्चा जरूर की, पर कहीं भी उसे स्थापित करने के लिए तर्क नहीं गढ़े। आखिर सदियों का अभ्यास शारीरिक संरचना, व्यवहार, कौशल व उसके बाद संस्कार को कैसे अप्रभावित रहने देंगे। यह ठीक है कि उन्होंने किसी के चुनाव प्रचार में सभा को संबोधित कर दिया। आखिर कोई तो बता दे कि इस दुनिया की किसी भी सभ्यता का नायक सभी मायने में आदर्श रहा। मेरा तो मानना है कि सभी नायक लात की पैदाइश थे। यदि उनकी सीमाएं लोगों को स्वीकार्य हैं तो प्रभाष जी तो वह मूर्ति नहीं बने। आखिर उनके दाय को देखते हुए, इन चीजों पर स्वस्थ चर्चा संभव नहीं थी। हमें जिनका कर्जदार होना चाहिए, हम उन्हें गरियाकर कालर ऊंची करके खुश हो लेते हैं। यह सब मैं इसलिए नहीं लिख रहा कि मुझे उनकी कृपा प्राप्त है, या कृपा की अपेक्षा है। मैंने 14 सालों तक कस्बे में पत्रकारिता की है। और बड़े अखबारों में प्रभावी पदों पर रहने का मौका मिला। चीजों को विकृत होते हुए, विकृति के कारणों को खुली आंखों देखा। अखबार नहीं आंदोलन का नारा बुलंद करनेवाले अखबार में समन्वयक व फीचर प्रभारी का साल २००५ में इसलिए छोड़ दिया कि प्रबंधन अपनी दिलचस्पी के अनुसार चीजों को चलाने की छूट पा गया था। आज खूब खूशी-खुशी मीडिया से विदा होकर सामाजिक कार्य के क्षेत्र में हूं।
मेरे कहने का मतलब यह भी नहीं कि आप श्रेष्ठों के कूड़ों को पचा लें, पर स्वस्थ विमर्श भी तो एक विकल्प है। क्या वे इतने दुश्मन हो गए कि वे अब फूटी आंखों नहीं सुहाते?
शनिवार, 5 सितंबर 2009
कौन लगाएगा बंदिश
दाल गलाने का यह कौन सा तरीका ?
मैं जसवंत सिंह के इतिहास अध्ययन पर सवाल नहीं उठा रहा, पर राजनीति के घिनौने तौर-तरीके पर यह सवाल तो कर ही सकता हूँ कि उन्होंने पार्टी से निकाले जाने पर जो सवाल दागे वह किस दृष्टि के थे ? उसका इतिहास के किस सोच से वास्ता था। किस सियासी सोच के थे? इस बुढौती में वे पापों को छिपाकर रखने की कीमत मांगते से दिखते हैं। पेट साफ पेट साफ करने वाली दाई तो फिर भी बेहतर है, क्योंकि वह घोषित रूप से ऐसा काम करती है और एवज में कुछ भी अतिरिक्त नहीं मांगती। ब्लैकमेल करना तो उसके पेशे में आता ही नहीं। वह तो साफ कहते हैं कि उन्होंने आडवाणी के नक्शे-कदम पर चलने की कोशिश की। उन्हें दृष्टि, अध्ययन आदि आदि से क्या लेना-देना। उन्हें तो सिर्फ पापों की परदादारी का लगान चाहिए।