हमसफर

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

अब कुछ किताबों की

भारतीय समाज के व्यामोहों का द्वंद्व यानी निन्यानबे


पात्र और तिथि को छोड़ इतिहास में कुछ भी सच नहीं होता और साहित्य में इसका उलट होता है, क्योंकि इतिहासविद के पास पात्रों के अंतर्जगत में प्रवेश का अवसर नहीं होता। जो इतिहासकार का कार्य नहीं वही उपन्यासकार का धर्म होता है। इसे हम लेस्ली स्टीफन की तरह भी नहीं देख सकते जिनका मानना था कि ऐतिहासिक उपन्यास साहित्यिक वर्णसंकर हैं। 1857 के काल से शुरू होकर 20 वीं सदी के अंतिम दशक की आहटों को सुनानेवाले उपन्यास निन्यानबे को देखकर ऐसा नहीं लगत। अपने साहित्यिक कौशल की छौंक से ऐतिहासिक उपन्यासों की रूक्षता को दूर रखने में सक्षम उपन्यासकार रवींद्र वर्मा का छठा उपन्यास है। बहुत बार विराट अध्ययन, शोध, चिंतन व व्यापक जीवनानुभव से संपृप्त के कारण ऐतिहासिक उपन्यास की मूल गलतियों पर भी उंगली रखने वाले साबित होते हैं। इतिहास की भूलों के परिर्माजन का ऐसा आह्वान इतिहासकारों के लिए चुनौती है। शायद इन्हीं कारणों से पाल ग्रेप ने ऐतिहासिक उपन्यासों को इतिहास का शत्रु बताया है। ग्रेप की इस पीड़ा को बखूबी समझा जा सकता है दिनकर की कविता ‘कलम आज उनकी जय बोल’ के जरिए जिसमें एक जगह उन्होंने कहा है –

जो अगणित लघुदीप हमारे
तूफानों में एक किनारे
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।
कलम आज उनकी जय बोल।
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बिचारा
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य, चंद्र, भूगोल-खगोल
कलम आज उनकी जय बोल।

वैसे उपन्यास के प्रतिपाद्य से इसका कोई खास सरोकार नहीं, फिर भी रह-रहकर नायकों से आक्रांत – अभिभूत इतिहास के शोर में डूबे चीत्कार को निन्यानबे का पाठक सुने बगैर नहीं पाता। उपन्यास के केंद्रीय पात्र रामदयाल के अपनी शादी के बाद अपनी पत्नी से बयान इसका साक्ष्य है – तु्महें मालूम है गांधी जी ने अपनी पत्नी से टट्टी साफ करवाई थी। यदि मुझे अपनी शादी और आजादी में से एक को चुनना है तो मैं आजादी चुनूंगा। और तबसे इस किशोरी को लगातार रामदयाल के अचानक गायब हो जाने का राज समझ मे आने लगा। वह बहस नहीं करती। सुंदरकांड का पाठ करती। संकटमोचन का व्रत रखती। यह एक किशोरी की कथा नहीं। यह उन सभी किशोरियों की कथा है जिसके जीवन का खाद पानी पहले तो गुलामी की बैडियों को तोड़ने-काटने में सूखा और फिर आजादी के उपभोक्ताओं का निवाला बना।
करीब डेढ़ सदी के विस्तार में फैला यह उपन्यास उन अर्थों में ऐतिहासिक नहीं जिन अर्थों में प्रसाद के उपन्यास आते हैं या फिर गढ़कुंडार, रानी लक्ष्मीबाई, दिव्या, चित्रलेखा है। जिस तरह बड़े से बड़े सच का एक स्थानीय संदर्भ होता है, उसी तरह इतिहास भी निरपेक्ष नहीं रहता, वहीं हमारी जीवनदृष्टि इतिहासबोध से रूपाकार पाती है। रानी लक्ष्मीबाई लिखते समय वृंदावन लाल वर्मा के पास जो इतिहास उपलब्ध था, आज वह वहीं नहीं अंटका है। नए साक्ष्य और नए विमर्श इतिहास को गतिशील बनाए रखते हैं। काल का उत्खनन सतत जारी है और अनावृत्त परतों से उभरनेवाला सच इतिहास को गीता या कुरान नहीं रहने देता। स्मृति की सत्ता का जीवन की तात्कालिकताओं के सदैव संवाद चलता रहता है, जिसे युवा आलोचक ज्योतिष जोशी सामाजिकता-ऐतिहासिकता का द्वंद्व कहते हैं। काल का यह द्वंद्व व्यक्ति के सरोकारों प्रकट करता है और यही वह सरोकार है जिसने निन्यानबे को उपरोक्त की श्रेणी से बाहर रखा है। 1857 से 1993-94 तक के विस्तृत काल क्षेत्र का यह उपन्यास केंद्रीय पात्र रामदयाल की पांच पीढ़ियों के इर्द-गिर्द बुना गया है।
आंदोलनों और उसके स्वप्नों में ऊंघता एक कस्बाई जीवन है जिसे मूलतः समाज-राज का रूपक कह सकते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के अवशिष्ट जो बदलती परिस्थितियों के साथ अपने आदर्शों को नहीं बदल पाते, जीवन की मुख्यधारा से उसी तरह दूर होते गए हैं जैसे तलछट, जहां कुछ भी आकर्षक व भोग्य नहीं रहता। वह पात्र है रामदयाल, जो नेहरू के स्वप्नों के भारत से इस कदर डूबता-उतरता है कि अपने निहायत निजी क्षणों में वैयक्तिक दबावों तक को नहीं समझ पाता। अपनी जरूरतों से दरकनिरा होता जाता है। पारलौकिक आसक्तियां भौतिक जीवन रुग्ण बना डालती हैं। ‘उस’ जीवन के लिए इस जीवन के लिए कुछ भी मोल नहीं समझने वालों की स्थिति हो जाती है रामदयाल की। भारत स्वप्नों के नायक के भ्रमजाल में उलझा यह पात्र अपने ही जीवन संदर्भों को वास्तविक जमीन नहीं दे पाता और स्वप्न में टहलते के रोग (सोम्नैंबुलिज्म) की स्थिति में आ जाता है। यहां राष्ट्रीय विकास के सांस्कृतिक आयाम के संदर्भ में व्यक्त प्रख्यात समाजशास्त्री पूरनचंद्र जोशी के विचारों को देखा जाना रोचक है – जिन मानसिक बेड़ियों की रचना भारतीयों को गुलाम रखने के लिए विदेशी शासकों ने की थी उनसे कहीं अधिक सशक्त वे बेड़ियां थीं जिन्हें भारतीयों ने गुलामी की कटु वास्तविकता के संदर्भ में मानसिक संतुलन और सामंजस्य बनाने के लिए सृजित किया था। (परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयाम) क्योंकि इसी धूर्तता और पाखंड से भरी वह चालबाजियां थीं, जो एक ओर लक्ष्मीबाई की वास्तविकता में डूबने नहीं देतीं और लेखक भी उसे महिमामंडित करने से नहीं चूकता। ‘सबको मालूम था कि रानी ने झांसी मांगी थी और उन्हें मौत मिली थी।‘ झांसी में डूब गया लेखक लक्ष्मीबाई की राष्ट्रीय निष्ठा को समझ नहीं पाता या समझना नहीं चाहता। विख्यात इतिहासकार विपिन चंद्र संपादित ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ की स्थापना के अनुसार विद्रोह के मौके पर उन्होंने अंग्रेजों से समझौते की पेशकश भी की
कि अगर उसकी मांगें मंजूर कर ली जाएं (राज्य वापस कर दिया जाए यानी डाक्ट्राईन आफ लैप्स खत्म कर दिये जाने की स्थिति में) वह अंग्रेजों का साथ देंगी और इस तरह झांसी की तरफ से अंग्रेजों को कोई खतरा नहीं रहेगा। वैसे राष्ट्रीय परिदृश्य में विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के पीछे स्वराज्य की गुलाम लालसा-समझ काम कर रही थी। एक गुलामी की बजाए दूसरी गुलामी का चुनाव ही तो था यह। यही लालसा लक्ष्मीबाई के पास राष्ट्रविरोधी (अ-राष्ट्रीय) फार्मेट में थी। यदि नाजियों का त्रिगुट मानवविरोधी था तो अंग्रेजों का आधिपत्य कहां से मानवीय कहा जा सकता था। यही अमानवीय लालसा लक्ष्मीबाई के यहां राष्ट्रविरोधी (अराष्ट्रीय) के फार्मेट में थी या राष्ट्र के प्रति उदासीनता के रूप में थी। लेकिन नेहरू का इंद्रजाल था जिसकी वास्तविकता को संग्राम में शामिल पीढ़ी शायद देखना नहीं चाहती थी। रामदयाल की मनोदशा का ब्यौरा (लेखक के शब्दों में) इसका उदाहरण है – घर की क्या हालत थी? नेहरू जी नहीं रहे थे, बड़ा लड़का शराब पीने लगा था, छोटा सौर में था। बिलू मां जितनी लंबी हो गई थी। नेहरू के न रहने से कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक शून्य छा गया। अब आवडी स्वप्न का क्या होगा ? दरअसल इसके ठीक निचली सतह पर देखना होगा कि कहीं यह किसी को रिझाने का अंदाज तो नहीं।
ऐसे संजय की तरह तो अतीत जीवी था, एक सामंती समाज सृजन की पीड़ा और प्रफुल्लता से आधुनिक समाज में बदलता हुआ नजर आता है। अपनी सारी भीषण विफलताओं और विडंबनाओं के बाद भी, नई पीढ़ी फटती हुई आवाजों में अपनी माली हालत की प्रतिध्वनि तक नहीं सुन पाते। और आंखें ऐसी कि जिसमें विराट स्वप्न तो होते हैं, पर उसमें बेटे का पट्टीदार जांघिया होता है और न ही बेटी की कमर के नीचे वही जांघिया। 22 जनवरी 1955 के अखबार में ‘भारत समाजवाद की ओर’ शीर्षक से छपी कांग्रेस की आवडी सम्मेलन की रपट में खोए रामदयाल को पता भी नहीं चलता कि उसका बेटा बलराम दयाल कब आया और बैठक के दूसरी ओर बैठे-बैठे उकता रहा था। अपनी उकताहट में वह बाबू कहकर चिल्लाता है। पूरा संवाद लेखक के उपरोक्त आशय को प्रतिध्वनित करता है –
बाबा
हां उन्होंने अखबार से सिर ऊपर उठाया, लेकिन शायद अखबार की कोई पंक्ति अधूरी छूटी थी। उन्होंने तुरंत अपनी आंखें अखबार में गड़ा दीं।
बाबू
हां, बोलो, रामदयाल ने अखबार में आंखें गड़ाए पूछा।
मुझे रुपए चाहिए
कितने
पचास।
पचास रुपए का क्या होगा
डाक्टरी का फार्म भरना है।
ऐसा लगा जैसे अखबार के बहुत मसले हैं और रामदयाल के लिए सबसे जरूरी है कि वे चुपचाप अखबार पढ़ते रहें जैसे पहले पढ़ रहे थे। रामदयाल अखबार ऐसे पढ़ रहे थे जैसे बल्लों बैठक में न हो और न ही उसने कुछ बोला हो। यह स्थिति उस पिता की है जो अब भी स्वतंत्रता संग्राम में खोए अपने भाई की बलि को नहीं भूल पाया है। जबकि यह पुत्र आजादी के बाद के जीवन संघर्षों और उसके व्यामोहों में भटक रहा है। इसके भी तो खोने का भय है। यह व्यामोह हैं पराधीन व स्वातंत्र्योत्तर भारत का और व्यामोहों का द्वंद्व है जो उन्हें अपनी लालसाओं से मुक्त नहीं होने देता और अपनी जमीन को भी बंजर कर दे रहा है। यह एक उदाहरण भर है। ऐसी स्थितियां बारहा है उपन्यास में।
उपन्यास का नायक रामदयाल अपने एक पुत्र का नाम संग्राम में शहीद भाई के नाम पर हरि रखता है। यही हरि है जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अर्जित जीवन के उच्चतर मूल्यों को ध्वस्त करते हुए सपने की सौदागीरी तक करने लगता है। आपातकाल में संजय गांधी की अराजक टोलियों में शामिल होने से लेकर ठेकेदार बनने तक यह बेटा रामदयाल के आदर्श को तिलतिलकर मिट्टी में मिला देता है और रामदयाल को लगने लगता है कि इस सदी में हरि दो बार पेदा हुआ। पहली बार उसने आजादी के लिए घर छोड़ा। दूसरी बार उसने मारूति के लिए और तब रामदयाल का क्षोभ उसका व्यक्तिगत नहीं रह जाता। पहले हरि को देश की आजादी ढूंढ़ते हुए खो गया। अब हरि अपनी आजादी ढूंढ़ते हुए खो रहा है। अपनी आजादी आजादी नहीं होती, अपनी उठाईगीरी होती है। यह उन रामदयालों की मनःस्थिति है जो मोहभंग से गुजर चुका है ऐसा नहीं। इस दिग्भ्रमित बेटे के बारे में यह रामदयाल का ही मंतव्य नहीं हो सकता कि इसके पास नंगईका विकल्प खादी का कुर्ता पाजामा है। ऐसा नहीं कि आवडी पर रामदयाल को पूरा भरोसा था – भरोसा – भरोसा होता तो रामदयाल आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी छोड़ते ही क्यों।
निहायत निजी सुख-सुविधाओं के आपदग्रस्त होते गए मध्यवर्ग मध्यवर्ग में अपनी जमीन, सरकार के साथ एक उपभोक्तावादी सलूक शेष रह जाता है। रामदयाल का छोटा पुत्र कृष्णकुमार कला के बाजारू सरोकारों से जुड़कर ही एक दिन अजनबी निष्ठुर हो जाता। यह है हमारे समय की कला और उसका संवेदना से सरोकार। बहन की चिंता में डूबा परिवार उसे अपनी ओर नहीं खींचता और वह पेरिस जाने के लिए इसी घर से पैसे तक की अपेक्षा करने लग जाता है। अपने भाई के स्वप्न को बेटे (हरि) में जीवित करने की जिद/हसरत पाले रामदयाल बेबस, लाचार व ठूंठ से बने रह जाते हैं। निन्यानबे लाख तक पहुंचकर करोड़पति बनने का स्वप्न हरि में हहरा रहा है और दूसरी ओर रामदयाल जीवनृ-मृत्यु से जूझ रहे हैं। उनका सोचना कितना वाजिब लगता है – क्या करोड़पति होने के लिए दुनिया को भोग का चारागाह बना देना जरूरी है ? इस तरह रामदयाल के घात-प्रतिघात पर खड़ा जिन त्रासदियों का शिकार आज भारत है, उसी के अक्स यहां हैं।
अब जब कविता में गद्य का प्रवेश हो रहा है, वहीं गद्य में भी उसकी ही शर्तों पर कविता की आवाजाही भी दिखती है, जिसे निन्यानबे में प्रचुरता से देखा जा सकता है। गद्य में कविता की यह आवाजाही ही सूक्ष्मता, अर्थमयता, बिंबात्मकता व सारगर्भितता के धरातल पर जारी है। कविता में गद्य के प्रवेश के साथ सपाटबयानी के खतरे से बचने के लिए जिस सतर्क काव्य विवेक की जरूरत है, यहां भी यह प्रासंगिक है। भाषा के साथ जो क्रीड़ा वृत्ति कुरु कुरु स्वाहा, अठारह सूरज के पौधे, रागदरबारी में है, वह यहां नहीं। इन उपन्यासों में अपनी शैली से मुग्ध हो जाने के कारण वहां फार्मूलाबद्धता का खतरा (संकट) पैदा नहीं हुआ है। भले वह उनकी अन्विति को ग्रसता नहीं। वर्णन की फार्मूलाबद्धता के कारण बहुधा परिवेश की यथार्थता के साथ लेखक के संबंध विच्छिन्न से हो जाते हैं। वह विच्छिन्नता एक हद तक यहां भी दीखती है, पर इतर कारणों से।
डा सुरेश सिन्हा को अपनी रचना प्रक्रिया बताते हुए वृंदावन लाल वर्मा का लिखा पत्र यहां देखने योग्य है – ‘ऐतिहासिक उपन्यास लिखना एक दुःसाध्य कार्य है। जिस काल का उपन्यास लिखा जाता है, जब तक उस काल की राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थिति, मानवजीवन और इतिहास का स्पष्ट चित्र सामने न हो, तब तक यह कार्य सरल नहीं होता।‘ शायद इन्हीं कारणों से 200 पृष्ठों के इस उपन्यास का तीन चौथाई हिस्सा बीसवीं सदी के पांचवें-छठे दशक के बाद से जुड़ा हुआ है तो पिछले सौ साल को एक चौथाई में समेट लिया गया है।
( उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित)
(पहल-61,1999)

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

डायरी के पन्ने से

मानवीय ऊष्मा को बचाने की व्यग्रता

चिड़िया की चिट्ठी आई है
आसमान में उड़ूंगी
और गाऊंगी पेड़ पर बैठकर
पेड़ की चिट्ठी आई है
सबको दूंगा छाया
फल-फूल और सुगंध
चिड़ियों को घोंसला बनाने के लिए
मौसम की चिट्ठी आई है
बहुत जल्दी लौटूंगा
तुम्हारे उधर लेकर वसंत को
आदमी की ऐसी ही चिट्ठी का इंतजार है मुझे
जो अभी तक नहीं मिली।

चिड़िया, पेड़, मौसम के जरिए जीवन में जिस मानवीय संलग्नता की कवि को प्रतीक्षा है उसमें धैर्य की जगह एक अकुलाहट है। आज से दस साल पूर्व कमलेश्वर संपादित गंगा में प्रकाशित उक्त चिट्ठी शीर्षक कविता के कवि कमलेश्वर साहू की यह अकुलाहट अपनी काव्ययात्रा में देशकाल में अपने स्पेस को और भी विस्तार प्रदान करती हुई सघन और तीव्र होकर प्रश्नाकुल हुई है। विडंबनाबोध तक पहुंचा उनका स्वर है –

प्रभु
कल किसी ने
शहर को जलाकर
राख कर दिया
आग लगानेवाले की प्रभु
रक्षा करना ताकि अगली बार
तुम्हारे घर में चोरी हो !
तुम्हारा खून हो !!
तुम्हारे घर में आग लगे।

धर्मपरायण मध्यवर्ग की धार्मिक विश्वासों के प्रति बदली हुई दृष्टि को कविता में इस खतरनाक तरीके से अर्जित करना हमारे समय के ही कवियों को गवारा होगा। यह अलग बात है कि संप्रेषण के उनके अंदाज में वह कशीदाकारी नहीं जो आलोचकों का ध्यान खींचती, आलोचना की छवियों, परंपरा और प्रतिमान की तलाश में खोये आलोचकों की निगाह यदि कमलेश्वर की कविता पर नहीं गई तो अकारण नहीं।
अच्छी कविताओं की एक विशेषता और अनिवार्य विशेषता उसकी सहज संबोध्यता, काव्यशास्त्री जिसे संप्रेषण और अभिव्यंजना कहते हैं। यह कमलेश्वर के यहां प्रचुरता के साथ है। उनकी कविता गर्भवती स्त्री, कच्चा दूध, आंगन, अच्छा दिन, दादी की गुल्लक हो या मां की याद, प्रांगण उसका आत्मीय होकर भी आत्मग्रस्त नहीं। यहां रिश्तों के बीच गुम हो रही मानवीय ऊष्मा को बचाने की अजब व्यग्रता है।
(19.04.1998)

भावी परंपरा
मुक्त और उदार जैसे साथ-साथ चलनेवाले शब्द सभ्यता के इस दौर तक आकर विपरीत ध्रूवों पर चले गए हैं। बाजार की मुक्ति के साथ समाज अनुदार होता गया। हाल यह है कि मुक्त बाजार के इस सर्वग्रासी दौर में शब्द के अलावे सभी ने अपने – अपने भोजन, वस्त्र और आवास तलाश लिए हैं। असुरक्षा-संशय का अधिकाधिक घटाटोप टंगा-घिरा है तो शब्द पर ही। कारण भी है। जहां हमारे शब्देतर सरोकार अधिकाधिक भौतिक होते हैं, वहीं शब्द के सरोकार केवल और केवल अभौतिक। विचित्र सा लगता है कि जब कहते हैं, इस दौर की कविताएं सभी दौरों की अपेक्षा लौकिक अधिक हुई हैं। काव्य रीतियां भी पनपीं, पर वह रीति काव्य में तब्दील होने से रहीं। क्योंकि शब्द के सरोकार अभौतिक गोते हुए भी लालसाएं लौकिक ही थीं।
मुक् बाजार ने हमारे सभी सरोकारों को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य दिया है। और यह भी तथ्य है कि जटिलतर होते जा रहे समाज की चुनौतियों से जूझने के लिए हम जितने ही बड़े परिप्रेक्ष्य में अपने को उतारते हैं या खड़ा पाते हैं, हमारी सीमाएं उतनी ही खुलकर सामने आती हैं। कहें कि हम उतनी ही बड़ी सीमाओं से साक्षात करते हैं। ऐसे में हमारे दौर के शब्दकर्म को अपनी सीमाओं से साक्षात होने का झटका झेलना पड़ा है।
जिस तरह सभी दौर की काव्य परंपराएं अपनी प्रस्थानकालीन प्रवृत्तियों का विकसित रूप व परिमार्जित स्वरूप हैं, उसी तरह भावी काव्य परंपरा की नींव का काम करेंगी कुछ युवतम कवियों समृद्ध रचनाशीलता। निलय उपाध्याय, कुमार अंबुज, विनय सौरभ, बद्री नारायण, एकांत आदि कुछ ऐसे ही नाम हैं। समय व सभ्यता के संकट व समाज की चुनौतियों से इनका साक्षात कैसा है व उसकी अभिव्यक्ति का स्थापत्य कैसा है, यह तय करेगा इनका काव्य विवेक। संवेदन तंत्र की जटिलता बढ़ी है, पर यदि लेखक उसके लिए अपेक्षित भावलीन व्यवस्था विकसित नहीं कर पता तो चीजें खंडित नजर आती हैं या एकरैखिक (सतही)। अभिव्यक्ति के किन औजारों का युवा रचनाशीलता कैसा इस्तेमाल कतरती है यह यथार्थ से उनके मुठभेड़ या रिश्ते से तय होना है। फिलहाल तो युवा रचनाशीलता को देखकर कहा जा सकता है कि यथार्थ से उनके सरोकार महज दर्शक के नहीं रहे। यथास्थिति से एक तरह का क्षोभ – असंतोष उनकी रचना को शांत और करुण नहीं नहीं रहने देता। सामाजिक बेहतरी के सपने, बाजारवादी व्यवस्था के घटाटोप में सामाजिक-सांस्कृतिक संकटों से जूझने की बेबसी से इनकी रचनाशीलता अछूती नहीं रहती। भाव-विचार का सांद्रण, वस्तुरूप की ताजगी और सबसे ऊपर सहजता और सूक्ष्मता को अपनी रचनाओं में साध रही यह पीढ़ी निश्चय ही कहीं की भी थाती हो सकती है।
(11.10.1998)

एक सजग यायावर
हिंदी के बाबा नागार्जुन, मैथिली के यात्री और मिथिला जनपद के वैद्यनाथ मिश्र। जीवन भर यायावरी की, देह छोड़ी अपने ठौर। स्वामी सहजानंद का किसान आंदोलन हो या लोकनायक का छात्र आंदोलन, सबमें मौजूद रहे। और इसी तरह वह वामपंथी आंदोलन की सांस्कृतिक एकता के प्रतिनिधि भी रहे। इस मौजूदगी में सदैव वैचारिक प्रतिबद्धता उनके साथ रही, पर जनता को पीछे छोड़कर पार्टी की विचारधारा नुमा डस्टबिन बनकर नहीं। जनपक्षधरता की प्रतिबद्धता अपनी पूरी उग्रता के साथ उनमें मौजूद थी, इसलिए ऐसा संभव हुआ। मुझे उनमें औरों की तरह विचलन नहीं दीखता तो इसीलिए। लोगों को कभी-कभी दीखनेवाला विचलन दरअसल यही जनपक्षधरता थी। यह जनपक्षधरता भारतीय समाज में रूढ़ नहीं। वह अपनी मूलवृत्तियों में वामपंथी तो थे, पर वामपंथ की रूढ़ियां उनके यहां नहीं थीं। क्योंकि प्रतिबद्धता जीवन से सीधे जीवन से जुड़ने नहीं देती। जीवन और व्यक्ति के बीच विचारधारा का हस्तक्षेप होता है, जबकि नागार्जुन के काव्य संसार में एक प्रत्यक्ष व सघन जीवनदर्शिता है। यही प्रत्यक्ष जीवनदर्शिता उन्हें अपनी वैचारिकता की पूरी निर्मम चीरफाड़ में मदद करती है, जो सनातनी वामपंथियों को गवारा नहीं। इसीलिए उन्होंने एक जगह कहा है - करूं मैं उद्दंडता के काम। यही है जो आभासी अराजकता का भेद खोलती है। इसके लिए उन्हें आक्षेपों का शिकार होना पड़ा है और उपेक्षाओं का भी। बावजूद इसके संघर्ष का विसर्जन कहीं नहीं हुआ है। जीवन से सीधे जुड़ने की यह अविरल विकलता है –
प्रिय मुझे है जलन
प्रिय संताप।
संघर्ष में टिके रहने का विकट जीवट निराला में भी ऐसा ही था –
कौन फिर मुझको वरेगा
जो न तू उस पथ मरेगा।
छात्र आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका में होने के बावजूद उसके हासिल से उनका मोहभंग भी हुआ और ‘खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ कहकर उन्होंने एक तरह से अपनी संलिप्तताओं पर भी करारा प्रहार किया। न तो उन्हें राजनीति का भटकाव गवारा था और न ही साहित्यिक भटकाव। वाम के नाम साहित्य की राजनीति करनेवाले प्रलेस तक को उन्होंने नहीं बख्शा था-

रहा उनके बीच मैं
था पतित मैं, नीच मैं।
दूर जाकर गिरा, बेबस उड़ा पतझड़ में।
धंस गया आकंठ कीचड़ में।

आत्मभर्त्सना की इस सीमा तक जाने के लिए जिस नैतिक बल व आत्मत्याग की जरूरत होती है, भला उसके प्रहारों को दूसरा कौन बर्दाश्त करता। यही कारण था कि राज्य के सबसे गंदे मोहल्ले में उचित देखरेख व इलाज के अभाव में वह तीन सालों से मृत्युशैया पर पड़े रहे। इस साल भले उनके जन्म दिन को उनके यहां पर्व की तरह मनाया गया, फिर भी कवि के लिए उसमें चिंता नदारद ही रही। क्या इस उत्सवधर्मी माहौल में यह समाज अपने अन्यायों पर आत्मचिंतन कर पाएगा।

(22.11.1998)

दीन-दुनिया को टटोलती कारुणिक पुकार

बड़े विचित्र तरीके से हिंदी कविता को इन दिनों दुर्भाग्यों और सौभाग्यों से गुजरना पड़ रहा है। दुर्भाग्य इस अर्थ में कि आलोचना इन दिनों अतिक्रमण हटाने के उस बुल्डोजर की तरह हो गई जो किसी आदेश-निदेश की यांत्रिकता से संचालित है, मानवीय विवेक से नहीं। और सौभाग्य इस अर्थ में कि सड़क से विस्थापित कविताओं में सभी तलछट ही नहीं। पिछले डेढ़ दशकों से सक्रिय कवि जयप्रकाश मिश्र की कविता से गुजरते हुए कहीं भी दृष्टि और संवेदना की वैसी फिसलन नहीं दीखती जिसे अनगढ़ शिल्प करार दिया जाए। कवि जयप्रकाश का ‘कविता का खूबसूरत संसार’ (कवि की ही शब्दावली में) खोये को बटरने के प्रयास से बना है। इसके साथ ही बने हुए के खोने की विकट आहट भी मौजूद है उनकी कविता में। आज जब चोट पर मरहम लगाने तक के लिए राजनीतिक चोंचलेबाजी देखने को मिलती है, वैसे में रचना – विरचना के दाब से गुजरते हुए उनकी कविता बड़े ही संयत व अराजनीतिक किस्म का भावतंत्र खड़ा करती है। सारतः यह कविता दीन-दुनिया को टटोलती एका कारुणिक पुकार है।
(दिसंबर 1998 का कोई दिन)

तन्मयता व तरलता के कवि राजेश

पूंजीवादी व्यवस्था के उत्तर आधुनिक चोंचले के रूप में बाजारवाद के रूप में इस दुनिया की नियति को हिंदी काव्यजगत ने इधर पकड़ने की अच्छी कोशिश की है। देखने की बात यह है कि जहां तन्मयता है वहां तरलता नही। क्योंकि चौंकन्नापन और संवेदनशीलता बहुधा एक साथ नहीं होते। यह चौंकन्नापन और तरलता दोनों ही राजेश जोशी में ही। यह उनकी शुरुआती रंगत का अद्यतन फैलाव है। ‘मिट्टी का चेहरा’ (1985) से लेकर ‘नेपथ्य में हंसी’ (1994) तक यह सूक्ष्म से होकर गहन और विस्तृत होती गई।
क्या यह सुनने को बैठा रहूं धरती पर
कि पालक मत खाओ ! मेथी मत खाओ !
मत खाओ हरी सब्जियां!
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मैं वहीं उगाऊंगा हरी सब्जियां और
तंदूर लगाऊंगा
देखना एक रात
मैं उड़ जाऊंगा
(मिट्टी का चेहरा)

कई बार बाजार जब चीजों से लद जाते हैं
समाज में पैदा होने लग जाते हैं
नए उपद्रव
- वस्तुओं के बारे में एक वक्तव्य (नेपथ्य में हंसी)

राजेश जोशी के यहां मौजूद स्थानीयता की रंगत को महज एक प्रतिबद्ध कवि के जीवंत मनानवीय लगाव का साक्ष्य (परमानंद श्रीवास्तव) भर नहीं कहा जा सकता है क्योंकि यहां प्रतिबद्धता के साथ एक काव्यचातुर्य भी है जिसके कारण उनके यहां फंतासी का काव्यविवेक दीखता है।

नदियों का नहीं
समु्द्रों का नहीं
पेड़-पहाड़ों का नहीं
बाजारों का है यह समय।

‘मिट्टी का चेहरा’ संग्रह की ‘आठ लफंगों और एक पागल औरत का गीत’ कविता जैसे भविष्य के समस्त काव्य संसार पर बाजार के दबाव को रिफ्लेक्ट कर रही हो। यह उदघोषणा जैसे विद्रोही कवि मायकोवस्की के उस घोषणापत्र की याद दिलाता है जो उन्होंने सुरुचि के गाल पर तमाचा शीर्षक से भविष्यवाद के घोषणापत्र के रूप में पेस किया था। (यह अलग बात है कि राजेश ने मायकोव्स्की की कविताओं का अनुवाद भी किया है और वह संग्रहाकार छपा है – पतलून पहना बादल नाम से)

कोई दस-बारह वर्ष पहले शंभूनाथ ने ‘परिवर्तन’ में ‘मिट्टी का चेहरा’ के संदर्भ में राजेश की काव्य प्रवृत्ति को आत्मगत जड़ता में हस्तक्षेप की व्यापक उत्कंठा के रूप में चिह्नित किया था तो अकारण नहीं। वीरेन डंगवाल के संदर्भ में मैंने साक्षात्कार और इंद्रप्रस्थ भारती में लिखा था कि सामयिक हुए बगैर सार्वकालिक नहीं हुआ जा सकता और स्थानीय हुए बगैर सार्वभौमिक नहीं। इसे यहां कह सकते हैं कि सरलता अर्जित किए बगैर वैशिष्ट्य हासिल नहीं हो सकता। आरंभिक दौर में जो स्थानीय रंगत विरल थी अब वह सांद्र व सूक्ष्म होकर और गहन व सघन हुई है जोशी के यहां। यही इनका वैशिष्ट्य है। क्योंकि जीवन को सूक्ष्मता और गहनता देखे बगैर स्थायी प्रभाव छोड़नेवाली जोशी जी जैसी कविताएं लिख पाना मुमकिन नहीं।
(13.12.1998)


हिंदी गद्य के कबीर के लिए

अक्खड़ता सादगी और साहस से आती है। भाषा में यह नैतिक चेतना कबीर से हिंदी गद्य को यदि मिली है तो वह काशीनाथ सिंह में देखने को मिलती है। कहानी हो या उपन्यास या फिर कथा रिपोर्ताज। कविता में चरित्रों की अमूर्तता और निर्वैयक्तिकता उसके फार्म की उपज है, पर कहानी में इसके होने का कारण यही नहीं। यहां विस्तार है, विवरण है और पर्याप्त अवसर भी। फिर भी एक हिचक है, और यदि कहानी में चलते – फिरते, रोजनामचा की आवाजाही हूबहू हो तो होठ बिचकाते हैं, लेकिन यह तबतक नहीं होता जब तक कि निर्मम बेलागपन न हो। दूसरों की तस्वीर साफ – साफ रखने के लिए अपनी जिस चीरफाड़ की जरूरत है व काशीनाथ सिंह में है। काशीनाथ सिंह (की रचनाशीलता) पर कुछ बोलने में सकुचाने के पीछे कदाचित वही सीमा आड़े आ जाती हो नामवर सिंह को भी। काशीनाथ पर कुछ भी लिखने-बोलने का मतलब है उन लोगों – समयों पर बोलना – लिखना, जिनके साथ सक्रिय सदेह रिश्ते हैं। कितने लोग बरत पाते हैं इस ईमानदार साहस को। सामाजिक संबंधों को परिभाषित करना लेखन है तो आलोचना भी इससे बरी नहीं। क्योंकि आलोचना भी एक रचना है, काशीनाथ का यह जुमला ही नहीं उनकी एक एक किताब का भी नाम है और आलोचना की रचनाधर्मिता को उनकी नजर से देखना भी। क्या सप्राण भाषा। जैसे श्रेष्ठ कवियों के प्राणवान गद्य।
‘’लालटेन हमारी चुप्पी को प्रकाशित कर रहा है’’ (आखिरी रात कहानी) से लेकर ‘’नियम विज्ञान के होते हैं जिंदगी के नहीं। जो जिंदगी को नियम से चलाते हैं वे चुतिया है। - संतवाणी ‘’ (संतों, असंतों और घोंघा वसंतों का अस्सी) जैसी अभिव्यक्तियों के बीच काशी के विकास की छाया देखी जा सकती है।
(24।10.2001)

दिल को सुकून रूह को आराम आ गया

कोलकाता की हिंदी जमात में जब नामवर के निमित्त के आयोजनों का सिलसिला, अलका सरावगी को साहित्य अकादमी के उपलक्ष्य में पार्टी का दौर चल रहा था, ठीक उसी समय हिंदी का विख्यात कथाकार इसराइल अनाम की तरह आखिरी सांसें गिन रहे थे।
साहित्य अकादमी पुरस्कार देने के निर्णय के अंतिम दौर में जब निर्णायक मंडली उधेड़बुन में रही होगी, ऐन तभी हिंदी के कथाकार इसराइल जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। कोलकाता की ही अलका सरावगी को पुरस्कृत किया जाना था, कोलकाता में ही साहित्य मेला लगा था और इसी बीच कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में पड़े पिलिया से पीड़ित इसराइल की किसी को सुध नहीं थी। क्योंकर होगी। वे साहित्य के कोई सेलिब्रिटी भी तो नहीं थे। और सेलिब्रिटी तो मटियानी और नागार्जुन भी थे, पर किसे कितनी सुध रही। 12 दिसंबर 2001 से भरती होने के दो सप्ताह तक बीमारी से लंबी जद्दोजहद के बाद 26 दिसंबर की मध्याह्न रात उन्हें हम सबसे छीन कर ले गई।
बिहार के गोपालगंज जिले के एक छोटे से गांव मुहम्मदपुर से जब कोलकाता आए होंगे तब से भी कहीं अधिक अनजाने हो गए थे हिंदी जगत के लिए अपनी मौत के क्षणों में। पिता की तरह चटकल मजदूर के रूप में जीविका शुरू की, प शीघ्र ही अपनी साहित्यिक रुझान व मार्क्सवादी समझ के कारण बीटी रणदिवे और नीरेन घोष के प्रिय बन गए। अब इन्हें माकपा के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ का संपादक-प्रकाशक बना दिया गया तो वे आजीवन रहे। वे पार्टी के होलटाइमर थे। माकपा के जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में एक इसराइल जलेस की केंद्रीय समिति के सचिव तथा पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष भी थे।
एक कथाकार के रूप में पश्चिम बंग हिंदी अकादमी, मध्य प्रदेश सरकार तथा बिहार सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था। वामपंथी रुझान के कथाकारों में आमतौर पर मजदूर वर्ग को लेकर उनकी वर्गीय चेतना ईमानदार कम हमदर्द अधिक हो जाती है। गैरवाजिब भावुकता और उत्साह के अतिरेक के शिकार हो जाते हैं वे। पर इसराइल इससे अलग थे। इन्हीं विशेषताओं के मद्देनजर शिव कुमार मिश्र उन्हें शेखर जोशी के सिवा पहले कहानीकार मानते थे।
(दिसंबर 2001 का कोई दिन)

यह तो होता ही रहता है

थोक के भाव में लिखे हिंदी साहित्य के इतिहास शायद ही एक भी ग्रंथ हो, जिसने इतिहास लेखन की अकादमिक सीमाओं और मठाधीशी को त्यागा हो। यह परंपरा रामचंद्र शुक्ल से ही शुरू हो जाती है। हिंदी साहित्य मौलिक रूप से जितना ही समृद्ध और जीवंत है, उसका इतिहास लेखन उतना ही दुहराव व अनुकरण से भरा। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों में अपने समकालीनों को लेकर पाई जानेवाली कुंठा ने उन्हें भले ही तात्कालिक आनंद दिया हो, तृप्ति दी है, पर हमेशा – हमेशा के लिए हिंदी जाति को उसके मूल संस्कार और वाजिब गौरव से काटा है। साहित्य स्रोत है और इतिहास परिप्रेक्ष्य, यह बात जानना इतिहास लेखकों के लिए जितना ही जरूरी, उससे कम जरूरी नहीं साहित्येतिहास लेखकों के लिए भी। लेकिन समाज से कटे लेखकों में मूल दृष्टि का ही अभाव नहींहोता, बल्कि स्रोत की विश्वसनीयता की परख भी नहीं होती। यह अकारण नहीं है। पारिवारिक सर्वेक्षण करने निकले लोगों के उस जत्थे की कल्पना कीजिए जो मोहल्ले की किसी बैठकी में शामिल होकर पूरे मोहल्ले या गांव के ब्योरे इकट्ठे कर लेता है। क्या सारा का सारा इतिहास लेखन इसी तरह बरता गया नहीं लगता है।
वास्तविक नायक तो मुख्यधारा के खिलाफ होने के कारण उपेक्षित और वंचित होता है विभिन्न प्रतिष्टानों की कृपा से। मुखालफत के साथ ही उसकी नियति अभिशप्त हो जाती है। इतिहास लेखक तो आक्रांत होता है सत्ता के तिलिस्म से या सफलता और लोकप्रियता से। दिनकर ने लेखक को इस ग्लानियुक्त कर्म से उबरने के लिए ही कदाचित लिखा था –
क्या जाने इतिहास बिचारा,
अंधा चकाचौंध का मारा।

(कलम आज उनकी जय बोल)।

अपने समय के घोर उपेक्षित जर्मन यहूदी लेखक वाल्ट बेंजामिन को ठौर के लिए ताजिंदगी भटकते-भागते रहना पड़ा और अंत में खुदकुशी का दामन थामना पड़ा। व्याख्याता बनने से वंचित कर दिए गए बेंजामिन के दर्शन और विचार का लोहा भले ही अब दुनिया में माना जाने लगा हो। स्पेन के गुमनाम कस्बे में उनकी कब्र पर उनकी ही एक पंक्ति खुदी है – ‘यशस्वी लोगों की बजाए अनाम लोगों की स्मृति को सम्मान दिना ज्यादा कठिन है।‘ इतिहास का निर्माण ऐसे लोगों की स्मृति में ही हुआ है। दिनकर सर्वनाम ‘उनकी’ बेंजामिन का अनाम लोग को ही रिप्लेस करता है। मुक्तिबोध का संघर्ष बेंजामिन से अलग नहीं। इतिहासकारों की वर्चस्ववादी सत्ता की प्रताड़ना की जो अजब पीड़ा बेंजामिन की इस उक्ति में है। वैसा ही कुछ हुआ हिंदी में मुक्तछंद प्रथम प्रयोक्ता महेश नारायण श्रीवास्तव के साथ। अमेरिकी कवि वाल्ट ह्विटमैन ने 1855 में छंद को तोड़कर ‘लीव्ज आफ ग्रास’ लाया तो उसके 15-16 सालों बाद महेश नारायण श्रीवास्तव ने हिंदी में वही उद्यम किया। जिस तरह वाल्ट ह्विटमैन की ‘लीव्ज आफ ग्रास’ को अपने दम पर उनके प्रायः सभी समकालीनों ने धज्जियां उड़ाईं, उसी तरह महेश नारायण श्रीवास्तव की मिश्र बंधु से लेकर डा. रामविलास शर्मा ने जी भर अनदेखी की। कविता के इन क्रांतिकारी अध्यायों की एक झलक साहित्य की वर्चस्ववादी सत्ता और उसकी निरंकुशता से मिल जाती है।
(22.02.2002)

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

सेर्गेई एसेनिन: रूसी कविता का अमर लोकगायक

(21.09.1895-28.12.1925)
‘इस जीवन में मरण कहीं से भी नया नहीं

लेकिन जीवन, सचमुच और भी नया है’

यह अथाह जीवन राग जिस विद्रोही कवि का है उसने यह पंक्तियाँ आत्महत्या से दो दिन पहले अपने लहू से लिखी थीं. मृत्यु से दो दिन पहले अपने लहू से लिखे इस विदा गीत से कवि के अपार जीवन राग को समझा जा सकता है, तीस साल के जीवन में पाँच शादियां, छह प्रेम और दो दर्जन से अधिक किताबें, हाँ, छोटे से जीवन को मस्ती के राग में जीनेवाला यह कवि सेर्गेई अलेक्सांद्रोविच येसेनिन सिर्फ 23 साल में राष्ट्र की ऐसी हस्ती हो जाता है कि पार्टी नेता तथा साम्यवादी आलोचकों को उनकी ‘जुबान पर ताला’ लगाने की ओछी हरकत करने को मजबूर होना पड़ता है. उन्होंने अपनी आलोचना और हैसियत का इतना इस्तेमाल तो किया ही कि किसानी राग और ग्राम्य संवेदना में रची-बसी कविता के सर्जक को देश छोड़ देना पड़ता है. अपने समकालीनों की घोर उपेक्षा, उनके असहयोग और रचनाओं पर दशकों लंबे प्रतिबंध के बाद किसी की रचना किस तरह जिंदा रहती है सेर्गेई एसेनिन इसके अन्यतम उदाहरण हैं. ऐसेनिन ने 1917 में लिखी अपनी एक कविता में एक जगह कहा भी है ‘आनन्द की भीख मांगनेवाला कमजोर होता है/ सिर्फ गर्व ही मजबूती से जीता है’. सचमुच आत्मसम्मान और जीवन का आनन्द जैसे उनकी फिलासोफी थी. वैसे उनकी नियति आत्महंता कवयित्री मारीना और कुछ-कुछ मायाकोव्स्की से जरूर मिलती है. मारीना ने 49 वर्ष की आयु में आत्महत्या की थी. हाँ, मायकोव्स्की को अपने समय में अल्पकालिक ही सही, पर थोड़ी मान्यता जरूर मिली थी. वैसे 1918 तक महज 23 साल की उम्र में मैरिंगोफ (एसेनिन के जीवन पर आधारित विख्यात व विवादास्पद संस्मरण ‘ए नोवेल विदाउट लाइज’ के लेखक) से मुलाकात के समय तक वह एक राष्ट्रीय हस्ती जरूर बन गये थे.

रूस के नियोजन क्षेत्र के कोस्टेटिनो (अब येसेनिनो) के एक गाँव में किसान परिवार में जन्मे एसेनिन बालपन से ही बाबा-दादी के पास भेज दिए गए. अपनी आत्मकथा में एसेनिन ने बचपन को याद करते हुए बर्बर चाचाओं के दुर्दांत खिलंदड़ेपन का    लोमहर्षक ब्यौरा दिया है (भारत में दलित लेखकों की जीवनी में ही ऐसे ब्यौरे मिलते हैं)। उसके एक चाचा थे जो उसे तीन साल की उम्र में अकेले घोड़ा पर बैठा कर सरपट दौड़ा देते थे। ऐसे में बालक एसेनिन पागल की तरह चिल्ला पड़ता था। फिर उसे तैरना सिख्या गया। एक चाचा साशा तो उसे नाव पर बिठाकर तट से बहुत दूर निकल जाते थे। इसी दौरान बालक एसेनिन के सारे कपड़े खोलकर उसे नगी में फेक देते थे। वह नन्हा बालक कीचड़ में फंसकर जब तड़फड़ाने लगता तो वे उसे नीच-अभागा कहते हुए फटकार लगाते। इसी तरह कवि ने अपने किशोर वय के दुर्दांत अनुभव संसार का भी पट खोला है। कवि जब आठ साल का था तो उसके एक अन्य चाचा उसका इस्तेमाल शिकारी कुत्ते की तरह करते। मारे गए बत्तख को पकड़ने के लिए वे उसके पीछे पानी तैरकर जाने को मजबूर करते। पेड़ पर चढ़ने में वह माहिर था। आस-पड़ोस के बच्चों के बीच उस किशोर को एक कुशल साईस तथा लड़ाकू के रूप में जाना जाता था। यही कारण है कि उसके चेहरे पर हमेशा ही खरोंचें रहतीं। इस दुर्दांत अनुभव से गुजरते हुए मुक्ति के लिए भटकते एसेनिन को देखकर रूसी कथाकार मैक्सिम गोर्की के मां उपन्यास के नाना की याद जीवंत हो उठती है। अपनी आत्मकथा में वे कहते हैं कि सिर्फ ही दादी थी जो उसे दुष्टताओं के लिए फटकारती, डांट पिलाती। बहुत ही स्वाभाविक ढंग से चाचाओं की क्रूरताओं के बीच बालक एसेनिन में दुष्टता पलने लगी थी। दादी के इस प्रतिरोध का उसके दादा यह कहकर विरोध करते कि ऐसे ही यह बालक मजबूती के साथ विकास करेगा और कायदे का इंसान बनेगा। दादा दादी को इसके लिए कोसते थे। वे तो दादी को बालक एसेनिन के पास फटकने तक से रोकते थे। बेइंतहा नजाकत से भरी दादी इस बालक को हद से ज्यादा प्यार करती थी। हर शनिवार को वह इस बालक के नाखुन काट देती और खास तरह के तेल लगाकर उसके केश काढ़ देती थी, घुंघराले होने के कारण उसके केश में कंघी करना मुश्किल होता था। नौ साल की अल्पवय में ही एसेनिन ने कविता लिखनी शुरू कर दी. साहित्यिक विलक्षणता से संपन्न एसेेनिन 1912 में मास्को आ गये और प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े प्रतिष्ठानों में प्रूफरीडिंग का काम करने लगे. अगले साल मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी में बतौर बाहरी छात्रा दाखिला ले लिया और यहाँ डेढ़ साल तक पढ़ाई की. उनकी शुरुआती कविताएँ, रूसी लोककथाओं, पौराणिक आख्यानों से प्रभावित रहीं. 1915 में वे सेंट पीटर्सबर्ग चले आये, जहाँ उनका परिचय अलेक्जेंडर ब्लाक, सेर्गेई गोरोदेत्स्की, निकोलाई क्लूयेव तथा आंद्रे बेली जैसे समकालीन कवियों से हुआ. साहित्यिक हलके में यहीं पर वे एक सुपरिचित हस्ताक्षर बन गये, बतौर कवि आजीविका चलाने में शुरुआती दौर में ब्लाक की काफी मदद रही.

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अपनी आत्मकथा में एसेनिन ने कबूला भी है कि बेली से उन्हें रूप की समझ मिली, जबकि ब्लाक तथा क्लूयेव की सोहबत ने प्रगीत का संस्कार दिया. 1915 में एसेनिन का पहला काव्यसंग्रह ‘रादुनित्सा’ प्रकाशित हुआ और इसके बाद ‘मृतक के लिए संस्कार’ 1916 में आया. मार्मिक व तीखी कविताओं (जो कि प्रेम और आम जीवन सरोकारों को लेकर है) के कारण आज वह रूस के सर्वाधिक प्रिय कवियों में गिने जाने लगे हैं. एक दौर था जब इन्हीं मार्मिक और किसानी राग में डूबी कविताओं से तत्कालीन आलोचक और पार्टी नेता बुरी तरह भयभीत हो उठे थे. इस तबके का मानना था कि एसेनिनवाद कहीं युवाओं की नागरिक निष्ठा को कमजोर न कर दे. सत्ता प्रतिष्ठान में इस सुगबुगाहट ने उन्हें लंबे समय तक राजनयिक अनुग्रह से वंचित रखा. सुदर्शन और रोमांटिक व्यक्तित्व के धनी एसेनिन के एक के बाद एक कई प्रेम प्रसंग चले और बेहद कम उम्र में उन्होंने पाँच शादियाँ रचायीं. पहली शादी 1913 में प्रकाशन गृह की सहकर्मी अन्ना इज्र्याद्नोवा से हुई. इससे उन्हें यूरी नाम का बेटा हुआ (स्टालिन शासन काल में इसकी गिरफ्तारी हुई और 1937 में गुलग श्रमिक शिविर में इसकी मौत हुई.)
1915 में वे सेंट पीटर्सबर्ग चले गये, जहाँ उनकी मुलाकात क्यूयेव से हुई (बाद में दो साल दोनों में गहरी छनी, वे साथ रहे, साथ में संग्रह निकाला, क्यूयेव के नाम अज्ञात को संबोधित उनके तीन प्रेमपत्र भी पाए गये हैं.) 1916-17 में वह सैन्य कार्य में लगा दिए गये, लेकिन 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद जल्द ही रूस प्रथम विश्व युद्ध से बाहर हो गया.

क्रांति से जीवन की बेहतरी के भरोसे पर कवि ने इसका समर्थन किया, पर जल्द ही यह भ्रम साबित हुआ तथा कहीं-कहीं उन्होंने बोल्शेविक शासन की आलोचना भी की है (निष्ठुर अक्टूबर क्रांति ने मुझे छला.) लगभग यही दौर रहा होगा जब मायकोव्स्की ने भी बोल्शेविक वालों से निराश होकर ‘बेडबग’ नामक व्यंग्य लिखा. एसेनिन द्वारा अपने मित्र अलेक्सांद्र बोरिसोविच कुसिकोव को पेरिस से लिखे एक पत्र में यह दर्द, गुस्सा, नफरत का सैलाब बनकर उभरा है: ‘जब मनमुटाव और चुगली के अलावे क्रांति में कुछ नहीं बचा, जब अपने पूर्व के दुश्मनोें (जिसे वह गोली मारा करते थे) से हाथ मिलाने लगे हों तो मेरे लिए यह साफ हो चुका है कि शिकार को निकले लोगों के लिए हम लोगों (तुम और मैं) की बिसात महज सुअर की होकर रह गयी है. मेरे दोस्त, सुनो जब हम मास्को में थे तो वे हमें बैठने को कुर्सी तक नहीं देते थे. लेकिन अब मैं बुरी तरह हताश हूँ. मैं किस क्रान्ति की पैदाइश हूँ, मैंने यह सोचना छोड़ दिया. मैं सिर्फ यह देखता हूँ कि वह न तो फरवरी क्रांति थी, न ही अक्तूबर क्रांति. वह हमारे दिल में सिर्फ छद्म नवंबर क्रांति थी और आज भी है.’ पेरिस में रहते हुए उन्हें रूस से जिस बात की अपेक्षा थी उसे उन्होंने अपना दुर्भाग्य कहा था ‘यह दुर्गति ही है कि मैं भाग्य की प्रतीक्षा करता हूँ’ बहुत पहले लिखी ‘एक औरत के नाम खत’ कविता में उन्होंने जब कहा कि ‘सच्चाई को सिर्फ फासले से देखा जा सकता है’ तो जैसे वह अपने संदर्भ में रूस को संबोधित कर रहे थे. गोया उनके गुजर जाने के बाद रूस को उनकी अहमियत का अहसास होगा. और हुआ भी.

अगस्त 1917 में अभिनेत्री जिनैदा राइख (बाद में त्सेवोलोद होल्ड की बीवी हो गयी). से दूसरी शादी रचाई. इससे उन्हें तात्याना नाम की बेटी हुई तथा कांस्टंेटिन नामक बेटा पैदा हुआ. कांस्टेंटिन आगे चलकर विख्यात फुटबालर स्कोेरर हुआ. 1918 में कवि ने खुद का प्रकाशन व्यवसाय शुरू किया. प्रकाशन गृह का नाम रखा ‘मास्को लेबर कंपनी आफ द आर्टिस्ट आफ बल्र्ड’. 1921 में चित्रकार अलेक्सेई याकोव्लेव की स्टूडियो में आवाजाही के क्रम में उनकी मुलाकात अमरीकी मूल की पेरिस में रहनेवाली नर्तकी इसाडोरा डंकन से हुई. 17 साल बड़ी इसाडोरा नाम मात्रा की रूसी जानती थी. 2 मई 1922 को शादी रचाई. नवविवाहित दंपत्ति के यूरोप तथा अमरीका प्रवास के दौरान निर्णायक मुकाम आया. यहाँ वे बुरी तरह नशे के आदी हो गये. नशे में हमेशा धुत्त रहते. इस अवस्था में उनके उत्पात से रेस्त्रां के कमरों में टूट-फूट होती रहती. रेस्त्रां के लोग भी परेशान रहने लगे थे. इससे प्रकाशन जगत में उनकी प्रतिष्ठा को भयंकर आघात पहुँचा. डंकन के साथ उनका दांपत्य थोड़े ही दिनों टिका. (60 सालों तक प्रतिबंधित रहे अनातोली मेरिंगोफ के एक संस्मरणात्मक गं्रथ ‘झूठ के बगैर एक उपन्यास’ में यह सम्बन्ध काफी विस्तार और मौलिकता के साथ प्रकट हुआ है) वे 1923 में मास्को आ गये, यहाँ आते ही उन्हें अभिनेत्री आगस्टा मिक्शीश्खेव्स्काया मिल गयी. उसके साथ भी कुछ दिनों का दांपत्य रहा. हालाँकि इसाडोरा से उन्होंने कभी तलाक नहीं लिया. इसी दौरान उनका चक्कर गैलिना बेनिस्लाव्स्काया के साथ भी चला. इसने एसेनिन की मौत के एक साल बाद उन्हीं की कब्र के पास खुदकुशी कर ली.

एसेनिन के व्यवहार में लापरवाही बढ़ती गयी और इन्हीं सालों में कवयित्राी नादेइदा वोल्पिन से अलेक्जेंडर नामक बेटा हुआ. वैसे एसेनिन की जानकारी में यह बात कभी नहीं आ सकी, लेकिन बड़ा होकर यही अलेक्जेंडर एसेनिन वोल्पिन का विख्यात कवि हुआ था तथा सोवियत संघ में 1960 के दशक में आंद्रेई सखारोव व अन्यों के साथ असंतुष्टों के आन्दोलन का नेता बना. बाद में जाकर उसे अमरीकी उदारवादी गणितज्ञ के रूप में ख्याति मिली.

जीवन के आखिरी दो साल पूरी तरह अस्थिरता में बीते तथा इस दौर में सारा वक्त नशा सेवन में डूबा रहा. इस सबके बावजूद इसी दौरान उन्होंने अपनी कुछ विख्यात कविताएँ रचीं. 1925 में चंचल चित्त के एसेनिन की भेंट सोफिया तोल्सताया (लेव तोल्सताय की पोती) से हुई और उससे पाँचवीं शादी हुई. तोल्सताया ने हरसंभव संभालने की कोशिश की. पर पूरी तरह मानसिक रुग्णता के बाद कुछ भी नहीं किया जा सका और उन्हें अस्पताल में माह भर के लिए भर्ती होना पड़ा. अस्पताल से रिहाई के दो दिन बाद ही उन्होंने अपनी कलाई काट ली. इसी खून से उन्होने अपनी अंतिम कविता विदाई लिखी. अगले दिन एंग्लेटेरे के होटल के अपने कमरे की छत गर्म करनेवाली पाइप से टंगकर खुदकुशी कर ली. इस समय उनकी उम्र सिर्फ 30 साल की थी. वैसे कहा तो यह भी जाता है कि उनकी हत्या जीपीयू के एजेंटों ने कर दी थी और उसे खुदकुशी का रूप दे दिया. 1925 में एसेनिन से हुई आकस्मिक मुलाकात के बाद मायकोव्स्की ने लिखा था: ‘...काफी मुश्किल से मैंने एसेनिन को पहचाना. पीने की उसकी जिद बेहद मुश्किल से टाल सका. उसने जिद करते हुए नोटों की गड्डी लहराई थी. दिन भर की उसकी छवि मेरे लिए काफी निराशाजनक लगी. शाम को मैंने अपने संगी-साथियों से उसकी मुमकिन मदद पर विचार-विमर्श किया. दुर्भाग्य से इस दिशा में कोई भी बात नहीं की जा सकी.’ यही कहीं कुछ-कुछ इसी लहजे में इल्या एहरबुर्ग ने भी अपने संस्मरण (‘जनता वर्ष व जीवन’) में एक जगह लिखा है ‘वह सदैव पिछलग्गुओं से घिरे रहते थे. सबसे बुरी बात तो यह होती थी कि इनमें से शायद ही किसी की दिलचस्पी साहित्य में थी. लेकिन इनमें कोई किसी का वोदका पीना चाहता तो कोई किसी की शोहरत के मजे लूटना चाहता और दूसरों की पहचान की ओट में सब कुछ करता. हालाँकि वे तो गुजर गये, पर उन्होंने खुद में उनलोगों को डुबोया. एसेनिन को उनकी कीमत मालूम थी, लेकिन तुच्छ लोगों के साथ होकर वे सहज रहते.’ अनातोली मेरिंगोफ ने अपने विस्तृत संस्मरण में एक जगह लिखा है कि ‘यदि उसने हमलोगों को छोड़ने का फैसला किया है तो इसका मतलब है कि उसने अपनी रचनाशीलता पर से भरोसा खो दिया. उसकी मौत का और कोई कारण हो ही नहीं सकता. क्योंकि कविता को बचाने के सिवा उसके जीवन का कोई मकसद ही नहीं था.’ एसेनिन की रचनाशीलता पर यह मेरिंगोफ का अकेला भरोसा नहीं था. जनप्रतिरोध के साथ खड़े उस दौर के लगभग सभी सर्जकों का उनपर ऐसा ही भरोसा था. मायाकोव्स्की ने ‘सेर्गेई एसेनिन’ शीर्षक अपनी कविता में लिखा है: ‘काश! थोड़ी-सी स्याही उस होटल एंग्लेटेरी में/ तो कोई कारण नहीं था/ नस काट डालने का.’ इस कदर किसी की रचनाशीलता पर भरोसा उसी का हो सकता है जिसने डूबकर उसे देखा हो. ऐसा लगता है जैसे उन्होंने एसेनिन के इस अंत में अपनी नियति देखी थी...नहीं तो फिर क्या कारण था कि वह इस कविता में आगे जाकर कहते: ‘लेकिन सुनो/ क्यों चाहते हो बढ़ाना/ आत्म्हत्याओं की संख्या?’ (पतलून पहना बादल/ अनु. राजेश जोशी). विरल और दुर्भाग्यजनक संयोग है कि मायाकोव्स्की (1893) और मारीना त्स्वेतायेवा (1892) ने भी क्रमशः 1930 में तथा 1934 में आत्महत्या की. कवि ओसिप मंदेलश्ताल ने भी आत्महत्या की कोशिश की थी.

हालाँकि वे अत्यधिक लोकप्रिय रूसी कवियों में शुमार रहे तथा शासन की ओर से राजकीय सम्मान के साथ उन्हें दफनाया गया. लेकिन जोसेफ स्टालिन तथा निकिता खु्रश्चेव के शासनकाल में उनकी अधिकांश रचनाएँ प्रतिबंधित रहीं. इस प्रतिबंध में निकोलाएव बुखारिन की आलोचना का अहम रोल रहा. आसिप मंदेलश्ताम, बोरिस पास्तरनाक, मायाकोव्स्की, मारीना की तरह ही स्टालिन शासन के बाद ही उनकी रचनाओं का पुर्नप्रकाशन संभव हुआ. 1966 में उनकी अधिकांश रचनाएँ प्रकाश में आयीं.

आज एसेनिन की कविताएँ बच्चों की जुबान पर हैं, इनमें से कई तो संगीतबद्ध हैं और लोकप्रिय हो चुकी हैं. असमय मृत्यु, अभिजातों-साहित्यिकों की संवेदनशून्यता, आज जनता का सम्मान, संवेदनशील व्यवहार, इन सबने मिलकर इस रूसी कवि को एक शाश्वत तथा करीब-करीब मिथकीय छवि प्रदान की. जहाँ तक साहित्यिकों की संवेदनशून्यता की बात है तो उसे ओसिप मंदेलस्ताम के उस बयान के आईने में देखना दिलचस्प होगा जिसमें उन्होंने युवा कवियों की रचनाओं को अथक रुदन कहते हुए मायाकोव्स्की की कविता को बचपना तथा मारीना त्स्वेतायेवा की कविता को बेस्वाद हुआ कहा था. ऐसे में उनकी निगाह में एसेनिन की कविता के लिए कौन-सी जगह बचती है. लेकिन एसेनिन अपनी कविताओं के किसानी भावतंत्र को अपनी रचनाशीलता का संस्कार देकर राष्ट्र के भविष्य का सार गढ़ रहे थे. उनके भाष्य में गाँव का चरित्रा पैतृक भूमि के चरित्रा में ढल गया. 1920 में आया उनके एक संग्रह का नाम ‘मैं गाँव का आखिरी कवि हूँ’. इसमें कवि का बड़बोलापन लग सकता है, लेकिन कवियों की प्रौढ़ व सत्ताश्रयी जमात पर नयी पीढ़ी द्वारा फेंके गये हथगोले के रूप में देखना मौजूं होगा. उनके दौर के नये कवि एक तरफ जहाँ अक्मेइज्म व भविष्यवाद में अपने को ढालने को बेताब थे, वहाँ एक कवि का गाँव की ओर रुख करना निश्चय ही उपेक्षा के दंश को आमंत्रित करने की तरह था.

एसेनिन की नयी कविताएँ तो रूसी लोकगीतों की परंपरा में शामिल हो गयी है.
(कथादेश, जुलाई 2010)

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

राजभाषा हिंदी की साठवीं बरसी पर

भाषा एक सांस्कृतिक उपक्रम है, इससे कौन मुकरेगा। इतिहास इसका गवाह है कि सांस्कृतिक मूल्यों के छीजन के साथ राष्ट्रीय गौरव और चेतना मद्धिम पड़ती जाती है। फिर इससे फर्क नहीं पड़ता है कि हम किसके देश हित और राष्ट्रीय गौरव को अपना गौरव मान रहे हैं। आपको इस पर आपत्ति नहीं होती कि आपका सम्मानित विदेशी अतिथि अपने कुत्ते – बिल्लियों के नाम पर इंडिया रखे। और यही रास्ता है गुलामी का। आज तो बाजारीकरण ने अपनी सहूलियतों के जाल से इसे और भी आसान कर दिया है। हम बहुत फख्र के साथ कहते हैं कि आज हिंदी का महत्व एक बार फिर बढ़ गया है। लेकिन क्या यह ठीक उसी तरह नहीं जैसे ‘बुच्ची और दाइ’ तथा नेपालियों को बहादुर कहकर काम निकालते हैं। हिंदी कहां पा रही है प्रतिष्ठा। राज्य सत्ता के प्रतिष्ठानों में, शैक्षणिक संस्थानों में या सांस्कृतिक उपक्रम में या फिर सियासत के चकलाघर में ? पता नहीं आपकी निगाह में वह कहां है। हिंदी किसके लिए गौरव का मसला है, हिंदी किसको रोटी देती है। जो रोटी कमाते हैं उनका हिंदी से कैसा लगाव है। हमने हमेशा हिंदी के सवाल को बेहद सतही ढंग से देखा है। हिंदी की गलाजत को लोग किस तरह देखते हैं पता नहीं। अभी भारतीय परंपरा के अनुसार पितृपक्ष चल रहा है और संयोग से हिंदी (राजभाषा) पखवाड़ा भी। ऐसे में रसमी तौर पर ही सही मैं हिंदी के पितरों को याद करते हुए यह टिप्पणी कर रहे हूं।
किसे इस बात की फिक्र है कि सिख कटार रखें तो वह आत्मक्षार्थ कहा जाएगा और दूसरे रखें तो पाकेटमार कहे जाएंगे। यहां कानून धार्मिक स्वतंत्रता कहकर अराजकता को संरक्षण देता है। क्या भाषाई मसले पर हिंदी इसी सलूक का शिकार नहीं हो रही है।
हिंदी की आत्मरक्षा का सवाल वह सरकार कैसे भूल जाती है जो हिंदी की पक्षधरता के नाम पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्माा गांधी, विनोबा भावे, नेहरू का हवाला देकर इसकी वकालत का ढिंढोरा पीटती नहीं थकती। जिस देश में राष्ट्रीय तिरंगा, राष्ट्रीय फल, राष्ट्रीय पक्षी, राष्ट्रीय पेड़, राष्ट्रीय खेल और यहां तक कि राष्ट्रीय पशु (जानवर) तक है, पर कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं। संस्कृति-सभ्यता की आदि जननी का देश कहलाने का गौरव लूटनेवाले इस देश की सांस्कृतिक गैरजिम्मेदारी और राष्ट्रीय बेशरमी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है आजादी के 63 सालों और संविधान बनने के 60 सालों बाद भी भाषाई गरिमा का ख्याल किसी को नहीं। हमें याद नहीं कि विश्व हिंदी सम्मेलन में शिरकत को लेकर और पुरस्कार को लेकर तो कई विरोध हुए, प्रदेश के नाम पर कुरबानी के कई आंदोलन हुए, परछोटे से देश बांग्लादेश की तरह भाषाई अस्मिता के सवाल पर मर-मिटनेवाले एक भी संस्कृतिकर्मी, भाषाविद, लेखक या कवि सवा अरब वाले इस देश में नहीं हुए। यही वह देश है जिसके प्रधानमंत्री जी जी - 20 के सम्मेलन में विदेशी भाषा में सभा को संबोधित करनेवाले एकमात्र विभूति होते हैं।
याद कीजिए 28 अक्तूबर 1923 को सवा छह सौ साल के ओटोमन साम्राज्य की सल्तनत के खात्मे के बाद मुस्तफा कमाल पाशा की ताजपोशाी हो रही थी और राष्ट्रभाषा का सवाल था कि कौन सी भाषा हमारी राष्ट्रभाषा हो। अधिकारियों ने इसके फैसले के लिए एक दिन की मोहलत मांगी, लेकिन अंत में पाशा ने बारह बजे रात में घोषणा कर दी कि आज से तुर्की की राष्ट्र भाषा तुर्की होगी।
अरबी, बोसनियाई, कुर्दिश, सरकासियन जैसी भाषाएं वहां भी हैं, पर भाषाई केंद्रीयता के सवाल पर भारतीय ग्रंथिया वहां नहीं। यहां तो कहने को नेताजी सुभाष चंद्र बोस से लेकर, गांधी, नेहरू और टैगोर तक को हिंदी की पक्षधरता के नाम पर कोट कर दिया जाता है, पर असलियत कौन नहीं जानता कि किसके मन में कितना हिंदी प्रेम था। डा. सुनीति कुमार चाटुर्ज्या का नाम तो बहुत लिया जाता है, पर उन्होंने भी हिंदी को रोमन में लिखे जाने की वकालत की थी। आखिर भाषा को जब लिपि से ही काट दिया जाएगा तो ध्वनियों (फोनेटिक्स) का कोई राल बचेगा भी? क्या यह हिंदी को हिंदी के घर में घेर कर मारने का इंतजाम नहीं कहा जा सकता है। मैं समझता हूं कि यह बहस का विषय है, श्रद्धा का नहीं। पर भाषाई मामलों में सरलीकरण कभी भी हितकारी नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि भाषाएं ऐसी भी हैं जो कई लिपियों में लिखी जाती हैं। पंजाबी का उदाहरण लें। इसे गुरुमुखी, देवनागरी व अरबी में लिखी जाती है। लेकिन यह हिंदी का कोई मानक नहीं होगा। यदि हिंदी ज्ञान व तकनीक की भाषा नहीं बन सकी है तो इसमें भाषा की तकनीकी सीमा आड़े आती है या हमारी नीचताएं-तुच्छताएं। भाषाविद तो इसकी लिपि और भाषा को वैज्ञानिक कहते नहीं अघाते। आखिर ऐसा क्यों हुआ है कि चीन ने चीनी भाषा में और रूस ने रूसी भाषा में वह सबकुछ अर्जित कर लिया है जिस पर किसी मुल्क का ज्ञान-विज्ञान गौरव कर सकता है। मैं फिर कहूंगा कि सभ्यता-संस्कृति की आदि जननी कहलाने का गौरव लूटनेवाले इस मुल्क को अपनी भाषा में नवजात और पिछड़े मुल्कों को देखना चाहिए कि वह कैसे वह सब अर्जित कर लिया है। भाषा की सीमा बताकर उसे आधुनिक दौर के लिए पिछड़ी भाषा करार देनेवाले निर्णायक भूमिका में बैठे लोगों का भाषा-साहित्य से कोई वास्ता नहीं। यह ठीक उसी तरह का मजाक है जैसे ढेरों रियलिटी शो में जुरी में बैठे लोगों को उस संबंधित विधा से दूर-दूर का वास्ता नहीं। आप क्या कहेंगे कि उड़ीसा के मानस साहू की टीम रेत की जिस सहकारी विधा में अनूठा प्रयोग कर रही है और वे लोग जो अद्भूत प्रभाव छोड़ रहे हैं वह दुर्लभ है, लेकिन इंडियाज खोज टैलेंट खोज -2 के फाईनल में जाने से उसे रोक लिया गया था। बाद में वाईल्ड कार्ड इंट्री से उन्हें मौका मिला। ऐसे कितने ही टेलेंट हंट रियलिटी शो चलते हैं जिनके जूरी को संबंधित विधाओं की एबीसी नहीं आती, बस सेलिब्रिटी हैं यही उनकी योग्यता है। कुछ इसी तरह का हैौ कि हिंदी के भाग्य विधाता जो बन बैठे हैं या जिन्हें बनाया गया है उनका भाषा-संस्कृति कर्म से कोई सरोकार नहीं। इसके लिए जो संसदीय समिति है उसके सदस्य इसके उदाहरण हैं।

खतरा हिंदी वालों से है
विदेशियों ने जिस गौरव और सम्मान के साथ जुड़ाव महसूस किया है और उसे अपनाया है, कहीं न कहीं उसका ही फल है कि 173 विदेशी विश्वविद्यालयों में उसकी पढ़ाई चल रही है। एक अमरीकी विश्वविद्यालय पेनसिल्वानिया विश्वविद्यालय में तो मैनेजमेंट के छात्रों के लिए हिंदी का पाठ्यक्रम अनिवार्य है। हिंदी का प्रचार-प्रसार में जिस तरह केरल ने मिसाल कायम की है, वह हिंदी प्रदेश में नहीं दिखती। अंतराष्ट्रीय प्रकाशकों की दिलचस्पी हिंदी में होने से लेकर से लेकर विश्व सिनेमा बाजार में हिंदी सिनेमा की पूछ और एमएनसी के लिए हिंदी का महत्व इस बात का सबूत है कि हिंदी का बाजार व्यापक हुआ है। बाजार इसलिए नहीं मिला है कि इसमें सरकार का कोई हाथ है। बाजार उसे मिलता है जिसका ‘मास’ होता है। और बाजार में पैठ किसी संरक्षण के जरिए नहीं बनती। भारत का चीनी उद्योग इसीलिए प्रभावित हुआ क्योंकि इसे सरकारी संरक्षण मिला हुआ था। जिस किसी भी उद्योग को सरकारी संरक्षण मिला होता है वह उन सहुलियतों और रियायतों के कारण खुली प्रतियोगिता का सामना नहीं कर पाता जिन्हें कंपीट कर बाजार में टिकना संभव है। सरकार को करना ही होता तो पहले विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर आज तक संयुक्त राष्ट्रसंघ में इसे स्थान दिलाने के नाम कोई भी पहल नहीं हुई, सिवाय इसके कि अपने कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी में संबोधित किया। दुबारा कार्यकाल में राजग का कोआ प्रयास नहीं दीखा। हां मारीशस में हिंदी सचिवालय व वर्द्धा में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अस्तित्व में आ गया। हिंदी को जो जगह मिलनी है अपने भरोसे वह तो मिल ही रही है, पर व्यवस्था का सहकार जहां चाहिए वहां हम बेहद कमजोर पड़ जाते हैं। अपने मुल्क में ही इसे राष्ट्रभाषा बनाने के नाम पर विरोधियों की अपेक्षा हिंदीवाले ही अधिक बिखरे नजर आते हैं। चीन. जापान. रूस, चेक, हंगरी में विदेशी हिंदी विद्वानों ने हिंदी शिक्षण की एक सुदृढ़ परंपरा कायम कर दी है, पर उन्हें भी पीड़ा होती है घर में हिंदी को उपेक्षित देखकर। गुलाम भारत में केंद्रीयता के सवाल को लेकर रजवाड़ों में मनमुटाव व संघर्ष छिड़े रहते थे, पर विदेशी ताकत के समक्ष झुकने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। आखिर अपने बीच का कोई शिखर पर तो नहीं है, यह देखकर उन्हें तसल्ली होती थी। कुछ-कुछ आज उसी तरह भारत एक भाषायी गुलामी के उत्तर औपनिवेशिक दौर में है और हिंदी के मामले में भी वही हो रहा है। जिस बंबइया फिल्मों को हिंदी के प्रचार-प्रसार का श्रेय दिया जाता है, उसकी पटकथा से लेकर संवाद तक सभी कुछ रोमन में लिखे होते हैं। अमिताभ, प्रियंका, मनोज वाजपेयी, आशुतोष राणा जैसे उंगली पर गिने जानेवाले हैं जो अपने संवाद हिंदी में मांगते हैं। लेकिन इससे होता क्या है। इस बार (14 सितंबर 2010 के आसपास ) संसदीय राजभाषा समिति की बैठक का विरोध करनेवाले महानुभाव हलफनामा लेकर बता सकते हैं कि उन्होंने निजी स्तर पर इसका कितना भला किया है। हिंदी माध्यम के विद्यालयों में कितनों के बच्चे व आश्रितों की शिक्षा-दीक्षा हो रही है। आप विपक्ष में हों या सत्ता में, सत्ता पर प्रभाव कम नहीं हो जाता। आप रसूखवाले रहे हों तो आपका कोई काम नहीं रुकता। भाषा, देश, समाज की बात हो तो कन्नी काटने के लिए व्यवस्थागत कई सीमाएं दीखाने लग जाते हैं, लेकिन यही सीमा तब आड़े नहीं आती जब आपके निजी मसले होते हैं। सार्वजनिक जीवन से अर्जित निजी रसूख का इस्तेमाल तब क्यों नहीं होता। क्या सिर्फ इसका हलफनामा आप ले सकते हैं कि हिंदी संबंधित जिम्मेदारियों या ओहदों पर होते हुए आपने निजी स्तर पर हिंदी के लिए क्या किया है। और इसके जिम्मेदार क्षेत्रीय भाषा के लोग नहीं हिंदी वाले ही है। पर हिंदी की रोटी खानेवाले और हिंदी पट्टी से आनेवाली विभूतियों ने क्या किया है यह एक सोशल आडिट का विषय है। राजकोषीय व्यय पर पलनेवाले विभाग और उनके अधिकारियों ने अपनी कुर्सीगत जिम्मेवारियों को निबाहते हुए अपेक्षाओं-आकांक्षाओं को पूरा किया है इसके आकलन का समय आ गया है। कहा जा सकता है कि हिंदी को खतरा हिंदीवालों से है, हिंदी प्रेमियों से नहीं। जिन्होंने हिंदी को जीवन दे दिया है उनसे भी नहीं। यह एक खतरा है जिसके सामने अभी चुप हो गए, तो फिर यह भी हो सकता है कि हम गुंगे कर दिए जाएं।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

माओ के बाद

इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या, वर्ग चेतना, वर्ग संघर्ष और सर्वहारा का अधिनायकवाद जैसे सिद्धांतों पर प्रतिष्ठित मार्क्सवाद से दुनिया भर के मजदूरों को एक करने का आह्वान फूटता है। सही भी है। इनके शोषण उत्पीड़न की ज़ड़ में जिस सामंतवाद का खाद पानी है, उसीसे राज्य सत्ता विकसित हुई है। लेकिन क्या फटी और कमजोर आवाज पर ये एकजुट हो सकेंगे। किसी भी मुल्क में एक मार्क्सवादी पार्टी नहीं जिसे प्रातिनिधिकता हासिल हो। सभी मुल्कों की वामपंथी पार्टिय़ां बिखरी हुई हैं।
शोषण के कारकों को चिह्नित करते हुए मजदूर में चेतना लाने की बात करनेवाले यह बताएंगे कि उनकी चेतना कितनी प्रगतिशील है? जर्मनी से इंग्लैंड गए मार्क्स को वहां एंगेल्स मिलता है। रूस जाने पर उसे लेनिन मिलता (मिलते तो कई हैं, पर प्रतीक एक ही बन पाता है) है। चीन आने पर उसे माओ मिलता है। पर भारत आने पर उसे क्या मिलता है ? जिस एमएन राय को दूसरे कामिंटर्न में लेनिन के साथ काम करने का मौका मिलता है। जिसने भारतीय मार्क्सवादी पार्टी का बिरवा बोया था, उसे ही बर्दाश्त नहीं कर पाया। हमारे दौर के प्रख्यात मार्क्सवादी चिंतक कामरेड एके राय को उनकी पार्टी पचा नहीं पाई।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि भारत में मार्क्सवाद के साथ कोई एक अनिवार्य नाम नहीं जुड़ पाया। भारतीय मार्क्सवाद के लिए सम्मान, भरोसे से दुनिया भर में प्रचलित कोई नाम नहीं मिलना क्या भारतीय यह वाम का अविकास तो नहीं ? जिस वर्गीय चेतना के विकास और पहचान से मार्क्सवाद के फलने-फूलने को खाद-पानी मिलता है, कहीं वही तो यहां सिरे से गायब नहीं ? जाति और वर्ग के द्वंद्व में उलझा वाम इसे कब सुलझा पाएगा ? मालथस के सिद्धांत को पानी पी-पीकर गाली देनेवाले वामपंथी कब अपने गिरेबान में झांकेंगे ? गैरकांग्रेसवाद से उपजा समाजवाद (लोहियावाद) जाति के द्वंद्वों में सिमटकर रह जाता है तो गैर भाजपावाद के लिए सेकुलरवादी एजेंडा को लेकर एकत्र वाम के पास इस्लामी आतंकवाद की काट में कोई जवाब नहीं है।
यदि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है तो क्या सत्ता हासिल करने के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर उग्रवामपंथियों की कोई भूमिका नहीं बचती है सिवाए हिंसा के? देखने की बात यह है कि इस उत्पात में जिसकी बलि होती है वह इस सत्ता प्रतिष्ठान में क्या हैसियत रखता है ? गिरिडीह के भेलवाघाटी-चिलखारी से लेकर असम-उड़ीसा-आंध्रप्रदेश के जंगलों व देहातों में मारे गए निरीह भोले ग्रामीण-आदिवासी सामंतवाद पोषित सत्ता प्रतिष्ठान में क्या हैसियत रखते थे ? इनके खात्मे से उनकी लड़ाई ने कौन सा मुकाम हासिल कर लिया। भ्रष्टाचार की शक्ल पिरामिड की होती है। ऊपर में बैठा एक आदमी नीचे की कतार के हजारों – लाखों को अपने प्रभाव में रखता है। क्या मुल्क के बड़े कारपोरेट घराने, भ्रष्ट मंत्री-नेता भ्रष्टाचार की इस कड़ी में कोई जगह नहीं रखते ? क्या उन उग्र कामरेडों (नक्सलियों) को इनसे कोई शिकायत नहीं। मारे गए महतो, गंझू, मंडल ही शोषण मूलक समाज के पोषक हैं और मुल्क के बड़े कारपोरेट घराने, भ्रष्ट मंत्री-नेता इनकी जागीर हैं। क्या इनके मारे जाने से मुल्क के बड़े कारपोरेट घराने, भ्रष्ट मंत्री-नेता की पकड़ सत्ता के विभिन्न मठों-पीठों पर ढ़ीली पड़ने लगी है ? कामरेड बताएं कि गृह मंत्री पी चिदंबरम के लालगढ़ चार अप्रैल 2010 के दौरे के बाद लालगढ़ (पश्चिम बंगाल) में दस जवान और पांच अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा (छत्तीसगढ़) में 76 जवानों की हत्या कर इस लड़ाई को कितना आसान कर लिया।
यह मानता हूं कि वर्गशत्रु के सफाए के बगैर समाज को संदेश देना आसान नहीं। पर सफाए का तौर तरीका अपने लोगों के बीच आतंक और अविश्वास बना रहा है या संवेदना के तार मजबूत हो रहे हैं। आखिर नक्सलबाड़ी के बाद से कामरेडों ने कितने शोषक कारपोरेट घरानों, भ्रष्ट मंत्रियों व बेईमान बड़े अफसर-नेताओं का सफाया किया है। क्या लड़ाई की उनकी प्रकृति से इसका अंदाजा मिलता है कि वे कैसे समाज के लिए, कैसे समाज की रचना के लिए विकल हैं। उस समाज के नागरिक कौन होंगे। कम से कम मारे जानेवाले निहत्थे, निरीह, भोले आदिवासी, ग्रामीण तो नहीं होंगे। वे जो समाज बसाएंगे वह किनके रहने-बसने के लिए होगा। आखिर उनके सपनों का कोई खाका तो होगा ?
ऐसे कामरेडों से जब भी मेरी बात होती है तो ऐसे सवालों पर वे लड़ाई को दो धड़े में बंटा बताते हैं। एक समझदारों की लड़ाई और दूसरा धड़ा गैरसमझदारों के हिस्से में बताते हैं। आखिर गैरसमझदारों पर उनका अंकुश नहीं, तो फिर आंदोलन को कहां ले जाना चाहते हैं।

मैं यह मानता हूं कि वर्गशत्रु के सफाए के लिए कई बार हथियार उठाना जरूरी हो जाता है और ऐसे में जब आप हमला करते हैं तो भीड़ गांधी बनकर आपको नहीं देखेगी, यह भी सच है। ऐसे में आत्मरक्षा में आपको आतंक फैलाना पड़ता है, क्यों आपको बचकर निकलना भी है। लेकिन ऐसा कैसे होगा कि जिस वर्गशत्रु को आपने निशाना बनाया है, वही चूक जाए। ऐसी चूक एक बार होगी, दो बार होगी। बार-बार नहीं होगी। और जब बार-बार होगी तो इस बिंदु पर सोचना होगा कि ऐसी चूक क्यों हो रही है ? कहीं यह योजना से ही बाहर तो नहीं या योजनाबद्धता की कमी तो नहीं? एक साम्राज्यवादी सेना की टुकड़ी जब किसी गैर मुल्क में हमले की योजना बनाती है तो इसके पूर्व वह एक गणना करती है कि एक शत्रु के सफाए से कितने नागरिक का नुकसान होगा। नागरिक नुकसान की एक सीमा उन्होंने तय कर रखी है। इस सीमा का आकलन सही हुआ तब तो वह हमला करती है, अन्यथा इसे वह मुल्तवी करती है। लेकिन समतामूलक समाज की स्थापना के लिए शोषण मुक्त करने की जंग में उतरे हमारे कामरेड अपने वर्गशत्रु और अपने लोगों के बीच कैसा फासला रखते हैं। अमूमन वे जिनसे रसद पानी लेते हैं उन्हीं जैसों का सफाया भी करते हैं। और रसद पानी भी आतंक के बल पर।
दूसरी बात खून-खराबे की इस लड़ाई के गुरिल्ले दस्ते में मारे-जानेवाले लोग महतो, गंझू, माझी जैसे निरीह ही होते हैं, मिश्रा, प्रसाद, झा, चक्रवर्ती नहीं होते। जो मारे जाते हैं उनके पैरों में हवाई चप्पल भी होती है तो फटी-पुरानी, टायर की। कपड़े भी होते हैं चिथड़े से कम नहीं। क्या इनकी शिक्षा मार्क्सवाद की कक्षा में हुई होती है। क्या वे विचारधारा की लड़ाई में शामिल लोग हैं या फिर कैरियर (रसद ढोनेवलाले, हथियार ढोनेवाले, ङथियार चलानेवाले), जिन्हें एवज में कुछ पैसे दे दिए जाते हैं।
शिक्षा को सलाम, विकास को सलाम – कुछ इलाकों में कामरेडों ने स़ड़क का निर्माण बाधित कर रखा है तो कुछ इलाकों में विद्यालय का निर्माण। कहीं-कहीं तो पूरे भवन को ही उड़ा दिया है। कहा जाता है लेवी के कारण। जड़ में जो भी हो। अभी लालगढ़ में हिंसा के अलावा लूट का भी जिक्र मिला है। क्या माओ ने ऐसे किसी भी आंदोलन के लिए एक भी शब्द कहा है ? माओ ने जो भी कहा है उन्हीं के शब्दों में हू ब हू देखिए और आत्ममंथन कीजिए। माओ की लाल किताब (माओ त्सेतुंग की संकलित रचनाएं) आपने पढ़ा और पढ़ाया भी होगा। भाग चार में अनुशासन के तीन मुख्य नियमों और ध्यान देने योग्य आठ बातों को फिर से जारी करने के बारे में चीनी जनमुक्ति सेना के जनरल हेडक्वार्टर की हिदायतें पेश हैं –

अनुशासन के तीन मुख्य नियम –
1) अपनी सभी कार्यवाहियों में आदेश का पालन करो।
2) आम जनता की एक सुई या एक टुकड़ा धागा तक न उठाओ।
3) दुश्मन से जब्त की हुई हर चीज को सार्वजनिक उपयोग के लिए जमा करा दो।

ध्यान देने योग्य आठ बातें इस प्रकार हैं –
1) नम्रता से बोलो।
2) जो कुछ खरीदो, उसकी ठीक-ठीक कीमत अदा करो और जो बेचो, उसकी ठीक-ठीक कीमत लो।
3) उधार ली हुई हर चीज को वापस लौटा दो।
4) हर ऐसी चीज की कीमत अदा करो जो तुमसे खराब हो गई हो।
5) जनता को न मारो और उसे अपश्बद न कहो।
6) फसल को नुकसान न पहुंचाओ।
7) महिलाओं से छेड़छाड़ न करो।
8) बंदियों के साथ बुरा बरताव न करो।

इन नियमों को कामरेड माओ ने दूसरे क्रांतिकारी गृहयुद्ध के दौरान चीनी मजदूर किसानों की लाल सेना के लिए तय किए थे। ये नियम लाल सेना के राजनीतिक कार्य के महत्वपूर्ण अंग थे और इन्होंने जनता की सैन्य शक्ति का निर्माण करने, सेना के भीतर पारस्परिक संबंधों सही ढंग से निभाने, आम जनता के साथ एकता कायम करने और बंदियों के प्रति जन सेना की सही नीति निर्धारित करने में महान भूमिका अदा की। कामरेड ने बेहद आग्रह के साथ अपने साथियों को इसके अनुपालन के लिए प्रभाव व विश्वास में लिया। उक्त बातों में उन्होंने दो बातों पर विशेष बल दिया – महिलाओं की नजर से बचकर नहाओ और बंदियों की जेबों की तलाशी न लो।
अब मेरे कामरेड भाइयों से आग्रह है कि इस आईने में अपने को देखें और कहें कि आज उन्होंने माओ को कहां ला रखा है !
(07.04.2010)

अब आप खुद ही देखें कि नेपाल में क्या हो रहा है। क्या नेपाल में पुष्पदहल कमल यानी कामरेड प्रचंड अपने माओवादी कामरेडों को हथियार समर्पण को मना पा रहे हैं।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

यशवंत जी ऐसी नहीं होती पत्रकारिता!

भड़ास 4 मीडिया पर साईट के कर्ताधर्ता यशवंत ने 10 अगस्त 2010 के अपने पोस्ट में जिस तरह राघवेंद्र जी के भास्कर ज्वाइन करने पर भड़ास निकाली है, उससे लगता है उनका निवाला छिन गया, अन्यथा कोई कारण नहीं कि एक वस्तुनिष्ठ मुद्दे को निहायत निजी खुन्नस भरे अंदाज में पेश किया है – ‘एक संपादक की बेवफाई’ शीषक से। वैसे भी यशवंत जी की इस पत्रकारिता का जवाब निकलना चाहिए। महानगरों में बैठे ब्लागर और साइटकार इसमें कुछ नहीं कर सकते। मैं इस मसले को लेकर पाठकों की राय आमंत्रित करता हूं। ऐसी छापामार पत्रकारिता के खिलाफ एक माहौल बनना चाहिए।

नहीं मालूम यशवंत जी कौन सी पत्रकारिता कर रहे हैं। क्या मकसद है और कोई मर्यादा भी है या नहीं इस छापामार पत्रकारिता का। कम से कम खबरों के बीच छूट रहे स्पेस की अंतर्कथाओं को तो गुनते। आपको पत्रकारों की पैरोकारी करनी है या प्रबंधन का पक्ष रखना है कुछ भी स्पष्ट नहीं। गुस्ताखी के साथ यह बात कहनी पड़ रही है। पत्रकारिता की खुफियागीरी या सेंधमारी से कौन सी पत्रकारिता क्या हासिल कर लेगी। आखिर ऐसी रिपोर्टो-प्रतिक्रियाओं की जिम्मेवारी कौन वहन करेगा जो अनाम छपती हैं। आखिर कौन सी पत्रकारिता को वे बढ़ावा दे रहे हैं।
कुछ दिनों पहले जिस हरिवंश जी और प्रभात खबर की जमकर खिचाई यशवंत जी ने की थी, 10 अगस्त के उक्त पोस्ट में उन्हें डिफेंड करने के लिए अपने हिसाब से एक पत्रकार को नंगा करने की कोशिश की। नहीं मालूम, पत्रकार बिरादरी के लिए यशवंत जी ने कितना क्या किया है, पर राघवेंद्र हैं कि प्रभात खबर से बाहर होकर उन्होंने उनका साथ निभाने के अपराध में जिन लोगों को बेघर किया गया उनके लिए अपने निहायत निजी जीवन को संकट में डालकर जी-जान लगाई। यह अलग बात है कि फिनांसर कमजोर निकला और पत्रिका अधिक नहीं चल सकी। इन पंक्तियों को लिखनेवाला प्रभात खबर से निकाला नहीं गया था, पर अनप्रोफेशनल एटीच्यूड के प्रति मुख्यालय की संपादकीय लापरवाही से आजीज आकर प्रभात खबर की नौकरी छोड़ी। राघवेंद्र जी के छोड़ने के बाद की बात है यह। फिर उनके साथ उनकी पत्रिका में हो लिया। पत्रिका से उनकी रुखसती के बाद मैंने पत्रिका चलाई और अपनी असहायता और दुर्दशाओं से पीडि़त होकर पत्रिका में राघवेंद्र जी के खिलाफ छापा भी। हरिवंश जी के प्रति मेरी श्रद्धा कभी कमी नहीं। प्रभात खबर को छो़ड़ने के बाद दुबारा मुझे बुलाकर मेरी परीक्षा (लिखित के साथ हर तरह की) ली गई। और परीक्षा उस व्यक्ति ने ली जो कभी मेरे समांतर कलकत्ते में था। बहुत छिछोरे अंदाज में वह (जिसने हरिवंश जी के बेतहाशा भरोसे को तोड़ा) मुझे अन्यत्र भेजने को तैयार हो गए। मैं नहीं गया। फिर हरिवंश जी के बुलावे पर मैं गया और क्विंटल भर की आश्वस्ति-प्रशस्ति लेकर लौटा। इस बार उन महोदय को हिदायत दी गई कि इस बार यह (मैं) हाथ से जाए नहीं। जहां भी दो, प्रभारी बनाकर दो। लेकिन सज्जन को मुझसे न जाने कौन सी खुन्नस थी, उन्होंने कोई रुकावट डाल दी।
मैं यह सब इसलिए बोल रहा हूं कि मैं राघवेंद्र जी का दलाल नहीं और हरिवंश जी का अंधभक्त नहीं। देश में क्षेत्रीय पत्रकारिता के मान-मूल्य रचनेवालों में बहुत ऊपर हैं वह। पर हरिवंश जी ने जिन चार-पांच पत्रकारों को सींचा, वे सब आज उनके साथ नहीं। नहीं मालूम यह सेलेक्शन का दोष है या...आज मैं सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हूं, खुश हूं। मीडिया में वापसी नहीं चाहता।
प्रभात खबर की दूसरी पारी से पहले राघवेंद्र जी को कम से कम तीन बार आफर मिल चुके थे। लेकिन अपनी तरह की धार की पत्रकारिता (आक्रामकता का) करने वाले राघवेंद्र जी को अपने लायक माहौल बनता नहीं दीखा। उनकी खासियत को उनके विरोधी खेमे के पत्रकार भी कबूलते हैं कि बिहार-झारखंड में इस मजबूती के साथ अपनी पत्रकार टोली-बिरादरी का साथ देनेवाला कोई और नहीं। प्रभात खबर को जो छवि और प्रसार उस दौर में मिला फिर वह सपना रहा। उसके बाद से धनबाद संस्करण में चार साल में छह प्रभारी-संपादक आ गए। रही बात प्रभात खबर छोड़कर चुपके-चुपके भास्कर जाने की, तो यह आपके भड़ास में नहीं समाया हो, पर वे भास्कर की प्राथमिकता में बहुत दिनों से थे। और क्षेत्र में लोग यह जानते थे। उच्च पदों पर आसीन लोगों की फजीहत अखबारों में किस तरह हो रही है इसे यशवंत जी बखूबी जान रहे हैं। दर्जनों उदाहरण है कि प्रावधान के बावजूद बगैर पूर्व सूचना के मुअत्तली की नोटिस थमा दी जा रही है। यदि प्रोफेशनलिज्म की भाषा में यह टेकनिकल स्किल है और तर्क है कि बाजार में उपलब्ध बेस्ट आप्शन से वह वंचित क्यों रहे। तो यह व्यक्ति के तौर पर पत्रकार भी हक मिलना चाहिए। यह प्रतिष्ठान के लिए तो चलेगा, पर एक पत्रकार जब अपने भविष्य को लेकर ऐसा कोई फैसला लेता है तो क्यों नागवार हो जाता है? एक अखबार के लिए संपादक या पत्रकार का आप्शन पाना मुश्किल नहीं, पर एक संपादक या पत्रकार के लिए अखबार का आप्शन ढूंढ लेना बहुत मुश्किल है। ऐसे में न्यायसंगत क्या है। यदि राघवेंद्र जी बताकर चले जाते तो प्रतिबद्धता और ईमानदारी बची रह जाती और बिना बताए चले गए तो सारी प्रतिबद्धता और ईमानदारी पल भर में छूमंतर हो गई। यह कैसी छुईमुई शुचिता है। दरअसल बाजार में निष्ठा का कोई मोल नहीं है। जिस कारपोरेट हथकंडा से पत्रकारीय बिरादरी को उजाड़ा जा रहा है, उसके खिलाफ खड़े नहीं हुए तो किस जगह खड़े हो उजाड़ का नजारा देखेंगे, वह भी नहीं मिलेगी। लड़ाई में बने रहने के लिए सर्वाइल का सवाल बड़ा है। इसे समझना होगा। यह मैं हरिवंश जी के विरोध में नहीं कह रहा। वह एक पत्रकार के दर्द को जिस तरह समझ रहे हैं बहुत कम लोग होंगे इसे समझनेवाले। वे बाजारवाद के दौर में वे खुद बदलाव की बात व अपेक्षा करते हैं। यह दुष्कर और क्रूर हो रहे तंत्र के खिलाफ खड़े होने की बात है। आखिर आप इतने सशक्त नहीं कि खुलकर लड़ने की स्थिति हो। आप इतने ताकतवर नहीं कि कंपनी से लड़कर सौ पत्रकार को रोजी रोटी दिला दें। आखिर कोई रास्ता तो निकालना ही होगा। किसी को आगे आना ही होगा। धारा के खिलाफ चलनेवाले गाली खाएंगे ही। यदि अखबार कहता है कि उसे कुछ पता नहीं था तो यह उसका भोलापन है। और भोलेपन का कोई जवाब नहीं।
आज कितने संपादक हैं जो प्रभात खबर की प्रिंटलाईन में हरिवंश जी धार को कुंद करने का काम कर रहे हैं और और निरंतर उसके मान मूल्यों को गिराने का काम कर रहे हैं। कोई माफिया के महिमामंडन में सपरिवार प्रभात खबर के पन्ने रंग रहा है तो कोई प्रभात खबर से बनी साख की सीढ़ी से खेल का खेल कर रहा है। वह भी सपरिवार। सूचना आयोग में जगह पाने में कैसे के लिए घराना काम आता है और कैसे किसी को हतोत्साहित किया गया, किसी से छिपा नहीं रहा। इसके दर्जनों उदाहरण हैं। हर तरह की दलाली में संलग्न हैं। शायद यशवंत जी भी जान रहे हों।
यशवंत जी इसमें क्या जायज होना चाहिए आप चुनें। किसी जमाने के नामचीन पत्रकार विनोद कुमार, दिग्गज शायरों के साथ मंच शेयर करनेवाले और कमलेश्वर की ‘गंगा’ पत्रिका में अंधविश्वास को गंगास्नान करानेवाले अच्छे-खासे पत्रकार देवेंद्र गौतम, नवोदित जुझारू पत्रकार दीपक शर्मा, धनबाद के नामचीन खेल पत्रकार विजय सिन्हा का कौन सा दोष था कि उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। और किसी ने अकुशल प्रबंधन की मनमानी पर ब्रेक नहीं लगाई। प्रबंधकीय या संपादकीय स्वेच्छाचारिता के कारण जब दर्जनों पत्रकार सड़क पर आ जाते हैं तो आप किसी प्रबंधन को इस अंदाज में कोसते हैं? राघवेंद्र जी के संदर्भ में आपने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, वह कहीं से शालीन नहीं कही जा सकती। हां, ऐसे रुख से एक खेमा को खुश जरूर किया जा सकता है। लेकिन इसका हासिल क्या होगा। किस पत्रकारीय सरोकार को बल मिलेगा ?

मीडिया का रीतिकाल

(एक पत्रकार की डायरी के धुंधले पन्ने से)

(यह पिछले पोस्ट का आंशिक संशोधित रूप है।)
यह सही है कि इस बाजारवादी दौर की स्पर्द्धा में टिके रहने के मकसद से अखबारों के लिए अधिकाधिक विज्ञापन बटोरना ही एक मात्र ध्येय रह गया है। समाचार की गुणवत्ता और पत्रकारिता के मानक से इस पत्रकारिता का कोई सरोकार नहीं रह गया है। कोई भी अखबार घराना चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, यह उसके सर्वाइवल के सवाल से जुड़ गया है। अच्छी खबर और असरदार खबर एक दुर्घटना की तरह सामने आता है। विषहीन खबरें ही एक्सक्लूसिव का दर्जा पा रही हैं। खबर का पहला और आखिरी मानक यही है कि खबर से अखबार या अखबार के संरक्षक-पोषक का वित्तीय हित जोखिम में नहीं पड़ रहा हो। और ऐसे में वह एक्सक्लूसिव हो रही हो तो हो जाए! किसका क्या बिगड़ता है। इस रस्ते चलकर अखबार के ऐड सर्वर बन कर यल्लो पेज बन जाने का खतरा बढ़ जाएगा। फिर सवाल उठेगा कि यल्लो पेज ही क्यों नहीं ? अखबार की क्या जरूबरत?

आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास
इसी के साथ आहिस्ते-आहिस्ते एक चुनौती भी प्रवेश करेगी, जिसकी चिंता फिलहाल हिंदी प्रिंट मीडिया को नहीं है। अद्यतन तकनीकों के इस्तेमाल के साथ निकलनेवाले अखबार आज जिन बाजारवादी हथकंडों को अपना रहे हैं, विदेशी अखबार बाजार ने कब का उसे तौबा कर दिया है। विज्ञापन की रेट बढ़ाने के लिए अखबार के प्रसार को बढ़ाने जो तरीका है पीसीसी के जरिए, स्कीमों के जरिए वह अखबार को मीडिया प्रोडक्ट से हटाकर उपभोक्ता सामान बनाकर छोड़ेगा। अब पाठकों को ग्राहक बनाया जा रहा है तरह-तरह के पैकेज में बांधकर। यह सब इसलिए ठीक कहा जा सकता है कि यह एक व्यवसाय हो चुका है। पर इसे अखबार घराने घोषित रूप से कबूलते नहीं। ढिंढोरा पीटते हैं मानक और पत्रकारीय सरोकार और मान-मूल्यों का। यहां विज्ञापन की चिंता और बाजार को लुभाने की जितनी चिंता होती है उतनी चिंता कारपोरेट लेवल पर खबरों के लिए समाचारधर्मिता की नहीं होती। जैसे एसाईनमेंट पत्रकारों को या संपादकों को दिए जा रहे हैं वे लाइजनिंग और नेटवर्किंग के होते हैं और ठेठ में कहें तो दलाली के होते हैं। इस दरम्यान विचार-चिंतन का स्पेस मरता जा रहा है या फिर धीरे-धीरे मारा जा रहा है। स्वाभाविक है कि हिंदी अखबारों ने सोचना लगभग छोड़ दिया है। शायद यही कारण है कि विचार अब अखबार के लिए गैरजरूरी हो गए हैं। क्या समाचार संपादक, राजनीतिक संपादक और विचार संपादक की पृथक सत्ता इसे साबित नहीं करती।


न ये चांद होगा न तारे ये होंगे यानी पत्रकार-संपादक जैसे शब्द खो जाएंगे
बाजार अपने प्रयोजन के लिए जिस अंदाज में सारे उपक्रम कर / करवा रहा है इसे संपादकों की विद्वदमंडली नहीं समझ रही है, ऐसा नहीं। बस कारपोरेट मकसद को पूरा करने का एक तामझाम भर रह गया है। सभी अपने कारपोरेट मकसद साधने के यज्ञ में लगे हुए हैं। जिस दूरी तक यह यज्ञ मकसद साध रहा है, साथ हैं। और दूसरी बात लाख-दो लाख (प्रधान संपादकों के वेतन) किसे बुरा लगेगा। इसमें अपना क्या जाता है। करवा लो जो करवाना है। ... बाजारवाद के जिस मारक दौर में अखबार व्यावसायिक घरानों के व्यापार संपादन (बिजनेस एडिट) के लिए निकलते हैं और समाचार प्रबंध किए जाने लगे हैं, उसे देखकर कहना बुरा नहीं कि संपादक का काम समाचार का प्रबंधन (मैनेज) और मालिक का काम व्यवसाय का संपादन (बिजनेस एडिट) करवाना रह गया है। नहीं मालूम बड़े घरानों के मुख्य / प्रधान संपादक का काम इससे इतर रह भी गया है ? डिगनिटी को भूलकर इसका थोड़ा सरलीकरण कर कहें तो संपादक का काम खबरों का इंतजाम (न्यूज को मैनेज) और मालिक का काम बिजनेस को एडिट करवाना भर रह गया है। इस तरह संपादक न्यूज मैनेजर तथा मालिक बिजनेस एडिटर हो गया है। धंधा हो प्रबुद्धों का और विचार गायब हो तो क्या हो सकता है !! पेशा हो चिकित्सा का और स्किल सिर्फ और सिर्फ मैनेजमेंट का ही खोजा जाए तो क्या हो सकता है (बड़े-बड़े अस्पतालों में जाकर देखा जा सकता है इसे)। विचार की सत्ता (विजनरी दीमाग) के कमजोर होने से ऐसा होता गया है। यहां सतर्क रहना जरूरी हो गया है, क्योंकि इसी तरह राजनीति में मूल्य के धागे टूटे तो अपराध की गांठें बढ़ती गईं। जिस पीसीसी या गिफ्ट स्कीम के सहारे प्रसार बढ़ाया जाता है, उसकी दीवार बेहद भंगुर होती है। ऐसे में खर्च एक स्तर पर जाकर अनुत्पादक कहा जाए तो बुरा नहीं। दरअसल जिस विज्ञापन बाजार को लुभाने के लिए प्रसार के सारे तामझाम खड़े किए जाते हैं, वे अपनी चमक बहुत जल्द खो देंगे। विज्ञापन संपादक, प्रसार संपादक की शब्दावली आखिर क्या दर्शाती है। आनेवाले दिन में आपसे संपादक व पत्रकार जैसे शब्द भी छीन लिए जाएंगे। इसका होमवर्क तो शुरू हो ही गया है।

खुंटियल दाढियों के नीचे पिज्जा-बर्गर यानी मीडिया का सोशल आडिट हो तो कितना बेहतर

अब जब कारपोरेट घराना मशीनरी के हाथों पत्रकार को एक टूल की तरह इस्तेमाल करेगा तो इसकी गारंटी मानिए कि वह सिर्फ और सिर्फ उसीका टूल नहीं बना रह जाएगा, वह अपने हित भी साधेगा। वह मशीन नहीं कि आप जितना और जैसा काम लेना चाहें, उतने काम के बाद उसे ठप कर दें। बाप के लिए बीड़ी-ताड़ी-दारू लानेवाला बेटा सिर्फ बीड़ी पीकर ही रह जाए ऐसा कैसे होगा। कभी तो वह भी चखेगा। लसत लगेगी और फिर दारू में मिलावट और फिर खरीद में उलटफेर और दारू में गिरावट लाकर वह भी अपने पीने का जुगाड़ कर तो लेगा ही। ए राजा को संचार मंत्री बनाने के वास्ते बिजनेस घरानों के लिए लॉबिंग करने वाली नीरा राडिया की दलाली करनेवाले दिग्गज और पूज्य पत्रकारों के नाम जिस तरह सामने आए, वह इसीकी फलश्रुति है। और जो बिका हुआ हो, उसे खरीदनेवाला कोई नहीं होता। आज पत्रकारों का कद गिरता जा रहा है तो उसमें छुटभैये पत्रकारों का जो भी हाथ हो, बड़े और नामी-गिरामी लोगों ने गिरावट को जिस तरह इंस्टीच्यूशनलाइज कर दिया, वह उन्हें अंततः गिरा रहा है। हम जानते हैं कि
भ्रष्टाचार की शक्ल पिरामिड की होती है। ऊपर की एक बुंद नीचे कितनी बुंदों में तब्दिल हो जाएगी तय नहीं। और इसके लिए पत्रकारीय पेशे में तरह-तरह के सुधार के नाम पर उन्हें बांधने की कोशिश हो रही है। पत्रकार की आलोचकीय धार व मेधा को कुंद करके सारा काम किया जा रहा है। यही कारण है कि जिस बाजारवाद के खिलाफ मीडिया को मोर्चा संभालना चाहिए था, वह उसका चारण-भाट बना फिर रहा है। भाटों की खुली स्पर्द्धा में वह नंबर एक के लिए भिड़ा हुआ है। कारपोरेट संस्कृति ने अपने प्रोफेशनलिज्म की जबान में इसे टेकनिकल स्किल का नाम दे रखा है। एलपीजी (उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण) के द्वार से जो सामाजिक अनुदारता प्रवेश कर गई, मीडिया घरानों ने भी उसे कम प्रश्रय नहीं दिया है। श्रमिक अधिकार और सूचनाधिकार के लिए भोंपू लगाकर चीखनेवाले अखबारों में श्रम कानूनों का सर्वाधिक उल्लंघन हो रहा है। सूचनाओं की गोपनीयता भी वहीं बरती जा रही है। किस मकसद से किसी मसले को लेकर अखबार आक्रामक तेवर अपना रहा है और किस मकसद से अभियान की टें बोल जाती है, पत्रकार को इन वजहों से दूर ही रखा जाता है। मुंह की खाता है पत्रकार तो खाए। खबरों के बाजार में न तो संपादक या मालिक को कसरत करने पड़ते हैं। इसलिए मजे से स्विच आन-आफ करते रहते हैं ये बंदे।
एक चिकित्सक, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, खिलाड़ी आदि अपने पेशे के धुंरधर हों यह तो अपेक्षा होती ही है और वाजिब भी है, पर वे उनके अपने सामाजिक दायित्व हैं इसे वे नहीं भूलते। ऐसा इसलिए कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। लेकिन कोई बताए कि आज मीडिया का कोई सामाजिक दायित्व रहा गया क्या। वैसे राजनीति भी सामाजिक दायित्व से कट गई है। (इस पर बाद में कभी।) किन सामाजिक अपेक्षाओं – जिम्मेवारियों से मीडिया को बंधा होना चाहिए और आज जिस किसी भी स्थिति में पहंचा है वह किन अपेक्षाओं और जिम्मेवारियों को पूरा करते हुए। और यह सब करते हुए इस क्रम में उनके यहां काम करनेवाले पत्रकारों ने कितने बनाए यह जानना बेहद जरूरी है। आखिर जब आप इस समाज से कुछ लेते हैं तो समाज को क्या दे रहे हैं और जो दे रहे हैं, क्या वही समाज का प्राप्य भी है। यह सब तब तक नहीं जाना जा सकता है जब तक कि मीडिया का सोशल आडिट नहीं होता। सवाल यह हो सकता है कि व्यवस्था उसे देती क्या जो सोशल आडिट की बात हो। तो व्यवस्था न दे, पर समाज उससे कहीं अधिक दे रहा है। और व्यवस्था कैसे नहीं दे रही है आखिर मंदी के दौर के दौर में रियायत इसी व्यवस्था ने दी थी। और जो भी वह पा रहा है वह इस तंत्र से सहूलियत पाने के ही कारण है न। यदि मीडिया का सोशल आडिट नहीं होता तो छुट्टा सांढ़ हो जाएगा। आज वह पत्रकारीय मानक को तोड़ रहा है, भाषा को गंदी कर रहा है। आगे जाकर स्लैंग जबान में अखबार निकालने की बात करेगा। कल को वह नए सांस्कृतिक संकट खड़े करेगा।

अपने ही खून का स्वाद मजे से चख रहे हैं पत्रकार

रही बात पेशा के चौगीर्द पत्रकारीय सरोकारों से दूर प्रबंधन को अपने इस्तेमाल की खुली छूट देकर बंधुओं ने अपना जो नुकसान किया है उसीकी फलश्रुति है कि आज उनसे अखबार बेचने को कहा जा रहा है तो कहीं विज्ञापन बटोरने का काम दिया जा रहा है। चुपचाप शिरोधार्य करने का नतीजा है कि आज ‘चुनाव’ खबर के लिए कोई विषय ही नहीं रहा। हिंदी क्षेत्र विशेषकर बीमारू राज्यों में कहीं भी चुनाव को कवरेज नहीं दिया जाता। जो दीखता है वह पैकेज की शर्तों के तहत होता है। इस पर तो दिल्ली की एक संस्था बड़ा अध्ययन भी करवा रही है। इसका एक अपना ही किस्सा है। प्रभाष जोशी जी ने अखबारों की इस प्रवृत्ति के खिलाफ अभियान ही छेड़ दिया था। इस अभियान को वैसे भी अखबार हाथों-हाथ ले रहे थे, जिन्होंने चुनाव के दौरान न्यूज स्पेस बेचने का काम किया था। सिर्फ इस एक कारण से दैनिक जागरण ने अपने सभी संस्करणों में जोशी की मौत को उपेक्षणीय अंदाज में छापने की हिदायत दे डाली थी। जोशी जी के अभियान से घेरे में तो ढेरों अखबार आते, पर यह रुख किसी ने नहीं अपनाया। अब यह अलग बात है कि दैनिक जागरण तो फिर भी खबर छापी, पर जिस जनसत्ता को उन्होंने हिंदी पत्रकारिता का मानक बनाया और जिसके मरते दम तक सलाहकार संपादक रहे, उसी जनसत्ता से उनकी मृत्यु की खबर छूट गई। यह रिकार्ड में है। अब उसके कारण घराने अंतर्विरोध था या अभियान को ठेंगा दिखाना था, इसका अलग ही किस्सा है। कुल मिलाकर पत्रकारीय भूल या फिर चूक पत्रकारों के ही खिलाफ गई न। रावण का विरोध करते-करते कोई रावण हो जाए, ठीक वहीं बात हुई। इसका ठीकरा किसी एक पर नहीं फोड़ा जा सकता है।

पत्रकार एक सोलर सिस्टम में रह रहा है

कोई संपादक कहीं न तो अकेला जाता है और न ही अकेला निकाला जाता है। वह एक सूर्य की तरह अंतरिक्ष में चक्कर काटता है। सूर्य का अस्त होते ही उसके विश्वासपात्रों (योग्यता कोई आधार नहीं होती) के दिन ही नहीं लदते, नए महानुभाव यह जाने बगैर उसे निकाल बाहर करते हैं कि अब उनका क्या होगा जिसने अपनी उम्र का दो तिहाई-आधा हिस्सा उस अखबार को दिया है। संपादक तो फिर भी संपादक या एक-दो इंच के अंतर से अपनी जगह पा लेगा, पर वह पत्रकार जो सड़क पर धकेल दिया गया वह पत्रकारिता में रह भी पाएगा, इसकी फिक्र किसी को नहीं। अखबार मालिक और उसके दलाल प्रधान संपादकों को इससे कोई सरोकार नहीं। लेकिन तय मानिए एक दौर आएगा जब इस प्रवृत्ति के कारण विप्लव भी मच जाए। यह अलग बात है कि सारे खेल उपलब्ध आप्शंस के कारण होते हैं। तर्क हो सकता है कि मानवीय होकर वह अखबार को बाजार में उपलब्ध बेस्ट से वंचित क्यों रखे। लेकिन सारे खेल बेस्ट के लिए नहीं होते। नए दलाल के लिए स्पेस बनाने के लिए घरानों को यह वाजिब लगता है।

क्या से क्या हो गया, बेवफा हो गया...
यह ठीक है कि विकासक्रम में कोई भी क्षेत्र अंतरअनुशासनिक (interdisciplinary ) हो जाता है। यह भी ठीक है कि सब कुछ सीधे मूल विषय से जुड़ा नहीं दीखता, पर विषय के एप्रोच और ट्रीटमेंट से उसका सरोकार जुड़ा होता है। पर मीडिया के धंधे में बहुत कुछ ऐसा जुड़ा है जो सिर्फ और सिर्फ मीडिया से बाजार के हित साधने के लिए। ऐसा नहीं कि कारपोरेट ढांचा या एचआर पालिसी का सीधे-सीधे पत्रकारिता से कोई सरोकार हो। यहां तक कि इस सबके बाद मीडिया हाऊसों में पत्रकारों का कद गिरा है। विजनरी पत्रकार कमजोर हुए हैं। इस गिरावट को शिखर पर बैठे प्रधान संपादकों को मंजूर है तभी तो विज्ञापन प्रबंधक, प्रसार प्रबंधक आदि-आदि के सामने संपादक प्रत्यय लग गया है। विज्ञापन संपादक, प्रसार संपादक आदि का चलन और क्या इंगित कर रहा है ?
आखिर ऐसा इसीलिए हुआ है न कि पत्रकारिता को पत्रकारिता की तरह नहीं लेना है। इसलिए भी यहां निवेश शब्द जुड़ा है। निवेश सीधे किसी को भी बाजार में ला बैठाता है। और दूसरी बात कोई भी निवेश किसी की क्रांतिकारिता के लिए नहीं करेगा। अखबार नहीं आंदोलन कहकर खुश जरूर हुआ जा सकता है। और सवाल तो यह है कि पूंजीपति के पैसे से चल रहे आंदोलन का चरित्र कैसा होगा ? क्या पूंजीपति सामाजिक सरोकारों से जुड़ी क्रांतिकारिता के लिए अपना धन बहाएगा ? वह जब भी करेगा तो निवेश, दान या अनुदान नहीं। दान या अनुदान एक बार, दो बार हमेशा के लिए नहीं। यहां धन और पूंजी को समझ लेना जरूरी है। हां, आंदोलनकारियों को आंदोलन के मूल्य के इस क्षरण को समझना होगा। आंदोलन के अवमूल्यन को सबल करने के इस मिशन से दूर रहने की जरूरत है। आखिर आंदोलन ही होता तो कारपोरेट हित के लिए अखबार का इस्तेमाल नहीं होने देता। हां, यह माना जा सकता है कि आंदोलन पूंजीपति के हित को जिलाए रखने का आंदोलन है। भ्रष्ट नेताओं मंत्रियों पर तबतक निगाह नहीं पड़ती जब तक कि कोई डील रुक न जाए। झारखंड से बाहर रहकर प्रभाष जोशी या वीरेन दा जब किसी अखबार की पीठ ठोकते हैं तो उन्हें नहीं मालूम कि अनजाने वे किस पत्रकारीय आचरण को अनुमोदित कर रहे हैं। आखिर इस अनुशंसा से किसका भला हो रहा है। यह अनुशंसा कारपोरेट घराने की ब्रांडिंग से जुड़ी हुई है या पत्रकारिता की ठाठ के पक्ष में खड़ी होती है। सर्वाधिक पत्रकारों की बलि यदि किसी ने ली है तो इस एक अखबार ने। कोई झारखंड में आकर देखे कि किस तरह इसने कारपोरेट हित की रक्षा में दर्जनों तेज-तर्रार पत्रकारों की एक फौज को सड़क पर लाकर छोड़ दिया। यहां आकर देखा जा सकता है कि इस हाउस के चुनाव कैसे थे ! यह बात तो परिप्रेक्ष्य के विस्तार की है, पर हम एक बार फिर से संदर्भ पर आएं। जिन क्षेत्रों में प्रसार बढ़ाए जाते हैं, दरअसल उन क्षेत्रों में साधनहीनता व पिछड़ापन के कारण आधुनिक जीवनशैली के साजोसामान दुर्लभ हैं। जब इन क्षेत्रों के पाठक ऐसे उत्पाद के उपभोक्ता नहीं हो सकते हैं तो विज्ञापन देने का फायदा क्या होगा? यह भी शीघ्र ही उन कारपोरेट घरानों को समझ में आने लग जाएगी जिनके सहारे अखबार घरानों के बजट बनते हैं। जाहिर है कि यह बात उनकी समझ में आ भी रही है, पर यहीं मीडिया अपनी धौंसपट्टी से अपनी दाल गलाती है। यहां उसके कारपोरेट उसूल ताख पर रखे रह जाते हैं।


दो कदम तुम भी चलो, दो कदम हम भी चलें....

दो स्थितियां बचती हैं –
1. गुणवत्तापूर्ण प्रसार
2. प्रसार के लिए ग्रामीण इलाकों में आधार

1.
शहरी क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार, समृद्धि, सुरुचि के कारण वैचारिक स्थैर्य होता है। वहां के पाठक मनुश्किल से टूटते हैं। ये क्वालिटी कांशस होते हैं। इसीलिए इन्हें व्यावसायिकता के साथ मूल्य व वैचारिक स्तर की समृद्धि जरूर बांधती है। चौबिसों घंटे चलनेवाले चैनलों के कारण राष्ट्रीय व महत्व की बड़ी खबरें अखबारों में इन्हें नहीं बांधतीं। सुबह अखबार में पढ़ने से पहले वे कई बार इसे देख चुके होते हैं। इसीलिए समाचार को यह ध्यान में रखकर तैयार किया जाए कि हमारे पाठक पहले दर्शक हैं। वह खबरों में विजीबिलिटी खोजेगा। अब पाठक की लालसाएं, जरूरतें, दिलचस्पियां पहले जैसी नहीं रही। इसके साथ ही यह भी तय है कि नवधनाढ्य तबका अभिजात तबके में शामिल होने को आतुर व दरिद्र सांस्कृतिक चेतना से लैस जिस गैर जिम्मेवार नई पीढ़ी के हाथों में चैनलों की बागडोर है, वह कई बारहा समाचारों की प्रस्तुति को हास्तास्पद बना देती है। इसलिए खबरों में इन तत्वों की भरपाई से खबरों में पठनीयता का प्रभाव लाया जा सकता है। संवेदना और सगजता के स्तर पर खबरों में दृश्य संवेदना को प्रमुखता देनी होगी। इसके लिए बौद्धिकता के छींटों के साथ कल्पनाशीलता की छौंक की भी जरूरत है। शहरी क्षेत्रों में पाठकीय आधार तभी फैलाए जा सकते हैं। बहुत दिन नहीं हुआ है जब लिखित शब्दों की महत्ता भरे दौर में किताबों का एक पन्ना, तो समीक्षा का एक पन्ना हुआ करता था (जनसत्ता में अब भी मौजूद है)। बदलते दौर में दर्शक की मरती समीक्षा चेतना को जगाए रखने के लिए हर हाल में चैनलों, इंटरनेट, ब्लाग, यू ट्यूब, ट्विटर आदि पर एक पन्ना देना चाहिए। इनकी रफ्तार और समाज पर इसके बढ़ते-फैलते शिकंजे को देखते हुए हिंदी समाचार पत्र जितनी जल्द इसे अपना ले, सेहत के लिए बेहतर होगा। शायद फिलहाल किसी हिंदी अखबार ने ऐसा नहीं किया है। नया पन्ना पाठकीय आधार बढ़ाने में बहुत जल्द फर्क लाएगा। अखबार जिस संचार क्रांति का हिस्सा है, उस फ्रेम की शेष चीजों से उसका रिश्ता दूर-दूर का होकर रह गया है। असंख्य साइट पर भटकने के बजाए विवेकवान पथ ढूंढ़ने के अलावे चैनलोंम के प्रवाह में चयन का विवेक पैदा करना भी मीडिया का धर्म है। यह प्रयोग एक तरह का माइंड सेट तैयार करेगा।
2.
प्रसार के ग्रामीण आधार को व्यापक करने में किसी पीसीसी (पब्लिक कंटैक्ट कंपैनिनयन) का सर्वे नहीं करेगा। स्वभाव से संकोची, प्रकृति से भावुक व चरित्र के भोले इन पाठकों को अपना समाज बहुत बांधता है। गरीबी, निरक्षरता-अशिक्षा, अंधविश्वास, बेकारी के कारण इनमें भावुकता तो होती ही है, पर साथ ही एक ग्राहक के रूप में ये प्राइस कांशस होते हैं, वैल्यू (कंटेंट) कांशस नहीं। इन्हें बांधने का बेहतर काम क्षेत्रीय रिपोर्टर से ही लिया जा सकता है। क्षेत्रीय रिपोर्टर बहुत बड़े प्रचारक साबित हो सकते हैं। वे हमारी ब्रांडिग बेहतर कर सकते हैं। उन्हें थोड़ा सम्मान और थोड़ी आत्मसंतुष्टि मिले तो उनकी माउथ पब्लिसिटी हमारे बहुत काम आ सकती है।
उपरोक्त दोनों स्थितियों में खबरों का उत्खनन शहरी क्षेत्रों में बेहद चुनौती भरा है। आज यदि अपने परिशिष्टों में हिंदी अखबार हिंग्लिश का इस्तेमाल करने लगा है तो उसी प्रभाव (चुनौती) का नतीजा है, पर बेहद नकारात्मक ढंग से। यह भी साबित होता है कि हम बढ़ने के अपने प्रयोगों में पिछड़ेपन का संकेत देते हैं। यह प्रयोग उपभोक्तावाद की निरंकुश विलासी और लंपट आदतों को प्रतिष्ठित करने जैसा है। एक दरिद्र सांस्कृतिक चेतनावाले अर्द्धशिक्षित समाज में ही यह रब क्ष्मय / संभव है हम इसे ही साबित करते हैं। नई पीढ़ी को भाषा की तमीज के जरिए सांस्कृतिक चेतना के प्रति गंभीर व जिम्मेवार बनाने के बजाए उसे मूल्यों से लापरवाह करने की भयंकर भूल कर रहे हैं। हमें समझना चाहिए कि भाषा एक सामाजिक-सांस्कृतिक युक्ति (socio-cultural device) है। उसके स्रोत समाज-संस्कृति में वनिहित होते हैं। दरअसल जहां समस्या होती है, वहीं रोग के लक्षण हों, यह जरूरी नहीं। बाजार से लड़ने के बजाए मीडिया उसके सामने नतमस्तक है तो इसे समझना मुश्किल नहीं। इसलिए यह मीडिया से भूल नहीं हो रही है, सारी अपसंस्कृति में वह इरादतन एक उपक्रम रच रहा है। जौंडिस का लक्षण आंख में जरूर होता है, पर इलाज आंख से शुरू नहीं करते। पर हिंदी अखबार ने यही किया है। उपभोक्तावादी संस्कृति के जो सांस्कृतिक खतरे हैं और तज्जन्य सामाजिक जोखिम सबकुछ को यह मीडिया आसान कर दे रहा है।

बच्चू कहां जाओगे बचकर

पाठकों में गिफ्ट के लिए अखबार खरीदने की लत पकड़ने लगी है। ऐसी तरकीबों से पाठक पहले उपभोक्ता बनने लगा है, बाद में वह पाठक होता है। और जब वह उपभोक्ता होता है तो उसे विज्ञापन के मायाजाल अधिक बांधते हैं। बाजार बहुत मोहक अंदाज में हमें माया की तरह फांसता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया की फंतासी भरी दुनिया अधिक मोहती है उसे। एक तरह से हम अखबारों के प्रति वितृष्णा ही पैदा करने का काम करते हैं। इस तरह अखबार अपनी तरकीबों से पाठकीय चेतना पर प्रहार करने लगा है। पाठक अतिरिक्त रूप से सजग रहता है तय अवधि के पूरी होने के प्रति। गिफ्ट के लिए। लेकिन क्या यह पाठक जो उपभोक्ता बनकर रहा है, उसे संतुष्टि दर्शक बनकर है या पाठक बनकर ? इसलिए हमें सोचना चाहिए कि क्या अखबार इन हथकंडों को अपनाकर अखबार बना रह सकता है ? लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि अखबार अखबार बनकर ही जिंदा रह पाएगा। दरअसल हिंदी अखबार को अपना स्पेस उपभोक्ता व दर्शक के बीच ही लोकेट करना होगा।
इन चीजों पर चलने के लिए स्पष्ट नीति, मारक रणनीति और लंबी योजना की जरूरत है। यह सर्वथा नवजात के अनुभव व विचार हैं।
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मारक प्रतिस्पर्द्धा भरे बाजार में टिकना प्रतिद्वंद्विता में आगे निकलने की पृष्ठभूमि है। आंध्रा में नंबर वन इनाडु को पछाड़ने के लिए राजशेखर रेड्डी ने एख साथ 22 संस्करण वाला साक्षी दैनिक शुरू किया, प्रतिदिन एक करोड़ घाटे का बजट लेकर। ऐसे में जंग कई स्तरों पर चलानी होती है। संपादक को समाचार प्रबंधन से लेकर व्यवसाय संपादन तक के कौशल से लैस होना होगा।
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बाजार के दबाव के साथ सामाजिक प्राथमिकताओं और व्यक्ति की दिलचस्पी में आ रहे बदलाव को उनके आस्वादन के स्तर (ऐंद्रिक संवेदना में आए बदलाव) पर पकड़ना होगा। खबरें हार्ड हों या साफ्ट या फिर ह्यूमन स्टोरी, उनमें जीवंतता और सचित्रता जरूरी है। पाठकीय आस्वादन (टेस्ट) तक पहुंचने के लिए। प्रसार बढ़ाना शहरी क्षेत्रों की तुलना में कस्बों में ज्यादा मुमकिन है और अभी के बाजार में इसकी काफी गुंजाइश है।
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बाजार के दबाव में समाचार पत्रों में घटती जगहों ने खबरों की तादाद और आकार को प्रभावित किया है। ऐसे में खबरों के प्रवाह को बरकरार रखने के लिए विशेष नीति अपनानी होगी। स्वरूप के स्तर से हटकर वस्तु के स्तर पर भी।
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ब्रांडिंग से तात्पर्य वह नहीं जो बाजार से हमें मिला है, बल्कि वह जो जनता हर हाल में हमें देती है। इसीलिए किसी चले हुए अखबार के रिपोर्टर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह बासी खबरें परोस रहा है। उसके लिए महत्वपूर्ण है कि वह अपने पाठक को जो दे रहा है, पहली बार दे रहा है। पाठक ने स्वीकार भी किया है। इसी पाठकीय स्वीकार्यता को सोशल ब्रांडिंग कहते हैं। बाजार से जो ब्रांडिंग मिली है वह बेहद अस्थिर और चंचल है। इसकी कोई गारंटी नहीं जो आज आपके पास है और कल प्रतिद्वंद्वी के पास न हो। हर्षद मेहता को भी इसी बाजार की ब्रांडिंग मिली था। लेकिन उस ब्रांडिंग का बाजार के स्थायी तत्वों से कोई सरोकार नहीं था। आईपीएल, शशि थरूर, ललित मोदी इसी फिनोमेना के हिस्से हैं। इसे एकाधिकारवाद भी कह सकते हैं। लेकिन बाजार में जहां प्रतियोगिता पूर्णता की ओर बढ़ती है वहां उपभोक्ता की सार्वभौमिकता (consumer soveriegnty अर्थशास्त्र का महत्वपूण सिद्धांत है जो जाज आर्वेल के विख्याक उपन्यास नाइंटीन एटी फोर के मशहूर जुमले Big brother will watch you से मेल खाता है) से इनकार कर कितने दिन बचा सकता है।

(साल 2008 में एक बड़े अखबार में काम करते हुए लिखी हुई टिप्पणी। इसे अखाबर के संपादक ने भी विचारार्थ लिया था। कुछ बातों को मैं निजी स्तर पर लागू करके देख चुका था। उसी टिप्पणी का अपडेट रूप।)


टिप्पणियां

5 टिप्पणियाँ: :
भगीरथ ने कहा…
corporate interest is the highest priority in all the fields. so the alternative is to replace the corporate interest with public interest &in doing so
the whole system has to be changed
२७ अप्रैल २०१० ६:०५ पूर्वाह्न

Babli ने कहा…
बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! उम्दा प्रस्तुती!
३ मई २०१० ६:०२ पूर्वाह्न
रंजीत ने कहा…
I think, BHAGIRAH jee is right,but we can not do it becauze we are in nation where dual'ism is prevailing by the people with the people for the politician.
we expect best but can not accept someone who is really Best.
९ मई २०१० ६:२२ पूर्वाह्न
सृजनगाथा ने कहा…
भाषा, साहित्य और संस्कृति की प्रतिष्ठित पत्रिका www.srijangatha.com में आपके ब्लॉग का समादरण हुआ है । कृपया अवलोकन कीजिए ।
१२ मई २०१० ९:०१ अपराह्न

Amitraghat ने कहा…
"आप कहाँ गायब हो गये...? वापस आईये...."
२२ जून २०१० १०:३३ अपराह्न
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शनिवार, 14 अगस्त 2010

उधार

(इस स्तंभ में हम आपको ब्लागों की दुनिया में घटित हो रही चीजों के पास तो नहीं ले जाएंगे, पर वहां घटित हो रही विचारणीय और अदभुत चीजों पर आपसे बातचीत करेंगे।।


तो पहले आईना (www.aaeena.blogspot.com/) के ब्लागर कवि ध्यानेंद्रमणि त्रिपाठी की कविता पर कुछ बात हो जाए। साभार उधार।
पहले आप कविता पढ़ लें।

हमनी के जिनगी में
गुस्ताखी के साथ जिंदगी को स्लैंग में सुधारा है।)

(हजूर हमरा के खड़ी बोली कहे में भारी परशानी होखेला,
लेकिन कोशिश करत बानी कि तिपहिया जिन्दगी के कुछ बात राउर लो से कहीं।)

धनेसरा बोला है कि
हम रेक्सा चलाने वाला लो का
जिनगी से चउथा पहिया
हेरा गया है,

रेक्सा का एगो जानकार
बाताया है के बाबू
रेक्सा में पाछे के दुइ पहिया में
दाहिना फ्री होता है
बांया चेन से चलता है,

तभे हमरे समझ में आया
के हमरा शरीर बांयी तरफ
काहे झुका है?
और कि हमरा बांया कंधा से
बांयी जाँघ तक
एतना दर्द काहे रहता है?

दुमका से बनारस
औरी बनारस से दिल्ली
का तिकोना सफर
इहे तिपहिया चलाने के लिए
किये हैं हजूर
चकाचक और एक्जाई
मन्टेन रखते हैं
हम अपना रेक्सा
सेवाभाव में एसप्रेस है
हमार रेक्सा
मखमली मसनंद
और हवाई जहाज है
हमार रेक्सा,

एगो बात अखरता है हजूर
हमरा आधा समय
सवारि से मोल भाव में
जाता है
गरीब लो से ज्यादा
अमीर सवारी को रेक्सा का
केराया कम कराने में
मजा आता है

एक दिन बड़े भाग से
सरकार खुदे हमरे रेक्सा
पे बैइठ गई
और सड़क से सीधे
संसद में पहुँच गई,
उहाँ पहुँच के ऊ हमें
टा टा बाय बाय कइ दिहिस
और दस रुपया में
संसद तक पहुँचावे का
हमार मेहनताना तय
कइ दिहिस,

दस रुपया मे
हजूर आपे बताइये
कतना बीड़ी मिलेगा?
राशन का हाल
राउर को पता है
ई बाजरे के आटा से
सिरिफ कब तक
पेट भरेगा?

हजूर
इतना दर्द भुलाने के लिए
हमरा मन तनी
माल्टा पीने का हुआ
पाउच का दाम देखे
तो सूँघे के काम चला लिया,

हजूर ई कइसा
अभिसाप है कि
रेक्सा में
चउथा पहिया पाप है?
कउन भरोसा
इहे सड़कवा पे चल पायेंगे
जहाँ पंचाइत खाप है?

हजूर
हम लो मेहनत से नहीं डरते
दर्द हैं दिन रात सहते
पसीने की नदी मे हैं बहते
और पुस्ता कि झोपड़पट्टी मे है रहते
किसी से कुछ भी नही कहते,

लेकिन हजूर
राउरे बताइए
कि इ चउथा पहिया
हमपे नजर कब डालेगा?
ई देश का संसद
हमको कब देखेगा?
ई सब सवाल
हमको बहुत परेशान
करता है
हमरा रेक्सा का घण्टी
घनघनान
करता है,

जब हजूर
छीन लेते हैं
आप अपना रेक्सा
तब हमको
बिसवास नही होता
रेक्सा हमरे भीतर
और गोड़े के नीचे
जमीन नही होता,

हजूर
हम आज एगो
गुस्ताखी किये हैं
सपना में अपना रेक्सा लेके
द्वारिका सेक्टर पाँच पे
खड़े हैं,

नोयडा से
मेट्रो आयेगा
खूब सवारी लायेगा
हमरा रेक्सा
कइयो चक्कर लगायेगा,

लेकिन ए हजूर
सपनवा टूट गया है
सरकार का चउथा पहिया
छूट गया है
बदनसीब हैं हम हजूर
हमरा सपना टूट गया है
बाँयी जाँघ पे हुआ था
एगो फोड़ा
रेक्सा चलाने से ऊ
फूट गया है॰॰

-ध्यानेन्द्र मणि त्रिपाठी

‘हमनी के जिनगी में’ (वैसे ब्लागर यानी रचनाकार ने ‘जिंदगी’ शब्द लिखा है।) साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को देखनी चाहिए। कविता के भाष्यकारों को देखना चाहिए कि लुच्चे बाजार की लंपटता और उसकी सहुलियतें कितनी भारी पड़ रही हैं जिनसे यह मुल्क बनता है उनके ऊपर। यह मुल्क टाटा-बिरला का नहीं है। अंबानी और जिंदल का भी नहीं है। उनका क्या वे तो एक सीमाहीन देश में रहनेवाले हैं जिनके लिए लंपट बाजार की रासलीला किसी अवतारी से कम नहीं। अंगीभूत सत्ताएं किस तरह रिक्शावाले के भावसागर में ऊभचूभ करते हुए एक पिघलती चादर तान देता है पाठक के ऊपर। इस मुल्क में आठ करोड़ ऐसे लोग है जिनकी रोजाना की आय 20 रुपए भी नहीं। लेकिन दिल्ली विधान सभा में विधायकों के लिए एक लाख मासिक वेतन (भत्ता) करने की मार हो रही है। जीवन के माल असबाब पर इठलाते हुए ये रिक्शावाले अमीरों की हरकत को कैसे देखते हैं उसे ध्यानेंद्र ने काफी गहरे में जाकर देखा-गुना है। यह कविता इसकी मिसाल है कि कविता के लिए सरोकारों का होना कितना जरूरी है। धूमिल की कविता ‘लोहे का स्वाद’ बरबस याद आ जाती है जिसमें कविता की रचनाशीलता के लिए उपजिव्य के संसार से तादात्मय स्थापित करने की बात की है उन्होंने – शब्द किस तरह कविता बनते हैं, इसे देखो, अक्षरों के बीच गिरे आदमी को पढ़ो....
इस दर्द को सुनने के लिए बहुस्तरीय दृश्यों को भेदना होगा। लेकिन यह कवि के सरोकारों से तय होता है। ध्यानेंद्र की कविता में हम देखते हैं कि संवेदना की तरलता में ऊबड़खाबड़ यथार्थ किस तरह पिघलकर मार्मिक धुन में हमें रुलाता है, सोचने पर मजबूर करता है। विचार का ठोसपन यहां वोलाटाईल हो जाता है। कविता के तानेबाने की आग में यथार्थ का तिलिस्म झुलस जाता है। रोजमर्रे के कामकाज किस तरह बाडीलैंग्वेज बनाते हैं रचनाकार की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि इसमें जो भूमिका अदा करता है वह कहीं से भी तथ्यों को बताने के इरादे से नहीं, काव्यात्मक प्रयोजनों का भीतरी अवयव हो जाता है। कवि व्यक्तित्व जब रचनाशीलता को जज्ब कर लेता है तभी इस तरह की रचना सामने आती है।

इस अनोखी कविता को पढ़ाने के लिए धन्यवाद भाई।

सप्ताह का मुद्दा

(सोचना-विचारना और फिर अभियानों में सहभागिता सामाजिक बदलाव के लिए जरूरी तो है, पर इसका असर एक माहौल के रूप में दीखना चाहिए। भाषण झाड़े जा रहे हैं, ब्लाग लिखे जा रहे हैं, साईट सजाए जा रहे हैं। अपने जैसे लोगों को / से पढ़ाया-लिखाया जा रहा है। दायरा बहुत सिमटा हुआ है। असहमतियों को लेकर सहिष्णुता यहां भी कम ही दिखती है। ऐसा लगता है कुछ मूल सवालों और जिज्ञासाओं को लेकर एक बहसतलब माहौल तैयार करना जरूरी है। इसके लिए माडरेटर ने आसानी से उपलब्ध माध्यम एसएमएस का सहारा लेना वाजिब और जरूरी समझकर एक पहल करने की कोशिश की है। )

नक्सल आंदोलन खेतिहार समुदाय में व्याप्त लंबे शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ असंतोष-आक्रोश से उपजा था। सत्ता प्रतिष्ठानों से ऐसे अन्याय के प्रतिकार की उम्मीद नहीं बची थी। जब निरपराध होकर भी राज्य सत्ता का निवाला बने तो हथियार उठाकर अपराधी की कतार में शामिल होना उन्हें शोषक तंत्र के सामने चुप रहने से कम खतरनाक लगा। विकासक्रम में इस लड़ाई की बेसलाईन आदिवासियों-दलितों के बीच सिमट गयी। दरअसल जो क्षेत्र विकास से दूर या अछूते रहे या रखे गए वहां शोषण की चक्की फ्रिक्शनलेस हो आसानी से चली। जंगलों या सुदूर पिछड़े इलाकों में इस आंदोलन के जाने का कारण एक तो यह था, दूसरे माओ की थियरी भी गांव से शहर की ओर बढ़ने की थी। शोषण व अन्याय को नियति न मानकर जिन्होंने सामाजिक व्यवस्था में उसकी वजह देखी, उनकी लड़ाई तो व्यवस्था के खिलाफ होगी ही। वर्गीय चेतना जगाते हुए वर्ग संघर्ष तक पहुंचने की जमीन उन्हीं इलाकों में उर्वर थी। सामाजिक चेतना से जुड़ाव के लिए आदिवासी-दलित होना जरूरी नहीं, सरोकार और संवेदनशीलता की जरूरत है। चारु मजूमदार, विनोद मिश्र, महेंद्र सिंह, कानू सान्याल आदिवासी तो नहीं थे, पर शोषण को सिस्टम में दोष का नतीजा मानते थे। वे इस आंदोलन को समर्पित थे तो इसीलिए कि बदलावकारी लड़ाई के व्यापक सरोकार से यह जुड़ा हुआ था। जातियों में सामाजिक बिखराव समतामूलक बदलाव की सोच को डाइल्यूट करते हुए इंटिग्रेट होने से रोकते हैं और आंदोलन को क्रांतिकारी तेवर अख्तियार नहीं करने देते। रूस में तो क्रांति की बजाए तख्तापलट की लड़ाई हुई। हां. चीन ने जरूर लड़ाई का जो माडल अपनाया वही क्रांति की वजह बनी।
दरअसल मुसलमान या तो नेशनलिस्ट हो सकते हैं या फिर एंटी नेशनलिस्ट हो सकते हैं। कट्टर देशभक्त भी रहे हैं और हैं। सिस्टम बदलने की ऐसी लड़ाई का हिस्सा वे कैसे हो सकते हैं जो सोच के सेट पैटर्न (यथास्थितिवाद) से बाहर नहीं झांक सकते। ये कहा जा सकता है कि वे कम्युनिस्ट तो हैं, लेकिन ऐसा इसलिए है कि इसमें उनके लिए कई सहूलियतें हैं। जैसे रा्ष्ट्रीयता के कुछ मान-मूल्यों के खिलाफ उनकी तुष्टि वहां हो पाती है। इस मुल्क में अल्पसंख्यक अराजकता को हवा देने के लिए कांग्रेस और वाम ने काफी हिफाजत से खुद को डिजाईन किया है। (तसलीमा के बहाने वाली टिप्पणी इसी ब्लाग में देखें। वैसे भी एक बार माओ के बाद वाली टिप्पणी देख लें।) बहस का हिस्सा यह हो सकता है कि ईसाई, पारसी, सिख भी तो नक्सली नहीं होते। दरअसल इनका फैलाव मुल्क में उस तरह नहीं है जिस तरह मुसलमानों का है। एक सिख, एक पारसी, एक ईसाई की जड़ उन समाजों में क्योंकर होगी जहां उनके सामाजिक सरोकार ही नहीं। लेकिन यह बात मुसलमानों पर लागू नहीं होती। वे मुल्क के इस छोर से उस छोर तक सभी बीहड़ से बीहड़ और कस्बाई इलाकों के वासी हैं।

और अब बहस का सवाल

सोचा है कभी मुसलमान नक्सली क्यों नहीं हुआ करते। जो हैं वे अपवाद है।

13 अगस्त 2010 को एसएमएस से मिले जवाब–

नहीं, लेकिन यह खोज की अच्छी दिशा है। क्या कारण है आप ही बताएं।
-कृष्णकांत, सचिव, अभिव्यक्ति फाउंडेशन, गिरिडीह (झारखंड)।

धार्मिक कट्टरता खुदा के विरुद्ध सोचने का हक नहीं देता। वह क्रांतिकारी होने से रोकता है। 90 फीसदी नक्सली आदिवासी है। हमला आदिवासी पर ज्यादा होगा तो मुसलमान क्यों नक्सली बनें।
पुष्पराज, पटना। (घुमंतू पत्रकार तथा नंदीग्राम डायरी के लेखक।)

क्यों।
विनोद सिंह, भाकपा माले विधायक, बगोदर, गिरिडीह (झारखंड) ।

दलित आदिवासी अधिक शोषित हैं। मुसलिम लेफ्टिस्ट हैं। टेररिस्ट भी हैं। नक्सली बीच का मामला है। अब एक सवाल यह भी है कि आदिवासी मुसलिम क्यों नहीं होता।
आप सही हो सकते हैं।
(कामरेड, जनजाति और आदिवासी एक ही हैं। और मुसलमान तो एक कौम है और आदिवासियों का अपना ही कौम है। हिंदू आदिवासी और ईसाई आदिवासी जैसा कुछ नहीं है। जिनका अंतरण हो गया है वे उस समुदाय से बाहर हो गए हैं।)
रामदेव विश्वबंधु, सामाजिक कार्यकर्ता, ग्राम स्वराज के झारखंड समन्वयक, गिरिडीह (झारखंड)।

मुसलमान लड़ाकू संस्कृति की उपज हैं। नक्सली वे होते हैं जो अपनी बात खुल कर नहीं कह सकते। इसलिए दलित नक्सली होते हैं। लादेन इंडिया में हो सकता है क्या।
आकाश खूंटी, झारखंडी भाषा-संस्कृति के सक्रिय कार्यकर्ता, खोरठा पत्रिका लुआठी के संपादक, बोकारो (झारखंड)।


अच्छा आयडिया।
संदीप भट्टाचार्य, एजीएम, बालासोर इस्पात एलायज, बालासोर (उड़ीसा)।


व्यापक रूप से नक्सली संघर्ष जनजातियों और आदिवासियों का आंदोलन है। मुसलमान ना तो जनजातियों में गिने जाते हैं और ना ही आदिवासियों में। वैसे भी मुसलमान जिहाद में विश्वास रखते हैं, ना कि किसी क्रांतिकारी आंदोलन में।आप सही फरमाते हैं भाई, नक्सल आंदोलन की शुरुआत जरूर पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई और कानू सान्याल, चारु मजूमदार आम किसान थे, लेकिन ये शक पहले हुआ। उसकी प्रासंगिकता हम आज के दौर में कैसे देख सकते हैं? क्या कानू की आत्महत्या उनकी इस आंदोलन से पूरी तरह टूट जाने की कहानी नहीं कहती है। हथियार लिट्टे, आईएसआई से मिल रहे हैं? सरकार की और हमारी जिम्मेवारी भी तय होनी चाहिए।
मुसलमान नक्सली नहीं होते क्योंकि वो किसान कम और दस्तकार, जुलाहा, कसाई, चर्मकार और बिजनेसमैन ज्यादा थे। उनका संघर्ष ज्यादा व्यापक और सबके लिए ना होकर सिर्फ मुसलमानों के लिए होता है। सवाल ये नहीं कि किन आदर्शों, मुद्दों और आब्जेक्टिव्स पर नक्सल संघर्ष चल रहा है, सवाल ये है कि क्या वास्तव में ये प्रासंगिक हैं जब नक्सलियों को ...(अधूरा)
भूमि सुधार एक दिशाहीन सशस्त्र संघर्ष में कैसे बदला और जंगलों में क्यों फैला ? ये बड़े सवाल हैं। किसी आंदोलन का आगाज जो आज से कई द....(अधूरा)
(भाई जनजाति और आदिवासी एक ही हैं। और मुसलमान तो एक कौम है और आदिवासियों का अपना ही कौम है। हिंदू आदिवासी और ईसाई आदिवासी जैसा कुछ नहीं है। जिनका अंतरण हो गया है वे उस समुदाय से बाहर हो गए हैं।)
ध्यानेंद्रमणि त्रिपाठी, आईना (www.aaeenaa.blogspot.com), दिल्ली।


लड़ाई अब सिर्फ लेवी की है। झारखंड में सामाजिक अंतर्विरोध की कोई लड़ाई नहीं चल रही है। वर्गमित्र और वर्गशत्रु भी चिह्नित नहीं हैं। राजनीतिक नियंत्रण के अभाव में सशस्त्र दस्तों का अपराधीकरण हो चुका है। आंदोलन भटक चुका है।
उनके लिए आईएसआई है न ?
देवेंद्र गौतम, वरिष्ठ पत्रकार और नामचीन शायर,www.ghazal.blogspot.com रांची (झारखंड)।
( इस बार सभी टिप्पणी एसएमएस से।)

14 अगस्त 2010 को एसएमएस से मिले जवाब–

क्योंकि अल्लाह मियां की डायरी में नक्सलिज्म की चर्चा नहीं है।

रंजीत, सीनियर कापी एडिटर, पब्लिक एजेंडा, रांची (झारखंड) http://koshimani.blogspot.com

तिलक राज कपूर ने कहा…
"कभी मुसलमान नक्सली क्यों नहीं हुआ करते?" का उत्‍तर देने के पहले यह जानना जरूरी है कि नक्‍सली कौन होते हैं? क्‍या नक्‍सलवाद का कोई संबंध जाति धर्म अथवा संप्रदाय से है? क्‍या नक्‍सलवाद मात्र एक उत्‍तेजना का रूप है? क्‍या नक्‍सलवाद वास्‍तव में एक आंदोलन है? बहुत से प्रश्‍न हैं इसकी जड़ों में। वास्‍तव में नक्‍सलवाद की जड़ों में एक सोच है जो कभी शोषित सर्वहारा की रही होगी अब यह सोच नेतृत्‍व और नियंत्रित के बीच की बात रह गयी है। कुछ लोगों को लगता है कि जो हो रहा है वह ठी‍क नहीं है और उसे इस प्रकार बदला जा सकता है और वे यही सोच अन्‍य ऐसे लोगों में भर पाते हैं जो आज में इतने उलझे हुए हैं कि आने वाले कल के बारे में सोच ही नहीं सकते।
जब सभी प्रश्‍नों पर समग्र रूप से सोचा जायेगा तो यह स्‍पष्‍ट हो जायेगा कि अन्‍य समुदायों की तरह बहुत से मुसल्‍मान स्‍वयं सक्षम हैं सोचने में और जीवन का मार्ग चुनने के लिये और जो नहीं हैं उनपर पूर्व से ही अन्‍य शक्तियों का कट्टर नियंत्रण है। खुली सोच वाला, किसी भी जाति संप्रदाय अथवा समुदाय से हो, नक्‍सली नहीं हो सकता। नकसली होने के लिये एक अलग ही मानसिकता चाहिये जो किसी में भी हो सकती है इसमें एक धर्म विशेष का संदर्भ उचित नहीं है।


१४ अगस्त २०१० ११:०७ अपराह्न
Gobar Pattee ने कहा…
कोई समुदाय या वर्ग क्यों नहीं नक्सली हुआ करते,यह कोई बहसतलब मुद्दा हो सकता है,मुझे नहीं लगता.ऐसे सवाल दूसरे वर्गों और समुदायों के बारे में भी पूछे जा सकते हैं.मसलन,आमतौर पर सवर्ण क्यों दलितों,आदिवासियों,पिछड़ों या गरीबों के किसी भी तरह के आंदोलन,चाहे नक्सवादी आंदोलन हो या सामाजिक न्याय का आंदोलन, के खिलाफ क्यों होता है ? दरअसल,कोई भी वर्ग या समुदाय पूरा का पूरा किसी एक विचारधारा अथवा आंदोलन का समर्थक या विरोधी नहीं हुआ करता.ऐसा नहीं है कि तमाम आदिवासी नक्सलवादी आंदोलन के साथा हैं.यह भी सच नहीं है कि सभी मुसलमान आतंकवादियों के जेहाद का समर्थन करते हैं.आप नहीं कह सकते कि सभी हिन्दू आर एस एस या भाजपा के समर्थक हैं.ऐसा भी नहीं है कि सभी हिन्दू अयोध्या में मस्जिद की जगह मंदिर चाहते हैं या सभी मुसलमान मस्जिद ही चाहते हैं.किसी का किसी विचारधारा अथवा आंदोलन के साथ होना य़ा न होना,कई नियामकों पर निर्भर करता है.सबसे प्रभावकारी परिस्थितियां होतीं हैं.परिस्थितियां सबसे पहले आदमी के मन को आंदोलित करती हैं.आदमी परिस्थितियों को बदलना चाहता है.लेकिन यहां भी जरुरी नहीं कि सभी का मन आंदोलित हो और यथास्थिति के खिलाफ उसके मन में उथल-पुथल मचे.यहां आदमी की व्यक्तिगत समझदारी उसे निर्णय लेने में सहायता करती है.अब समझदारी आती कहां से है ? कुछ मामलों में व्यक्ति की समझदारी उसके अंदर से आती है.कुछ मामलों में उसकी शिक्षा उसकी समझदारी को बढा़ती है.अब शिक्षा का मतलब क्या ? शिक्षा का मतलब यह नहीं कि आपके पास कितनी बड़ी डिग्री है.डिग्रियों का भी महत्व है,परन्तु डिग्रीधारी की समझदारी ही अव्वल हो,ऐसा भी नहीं है. बहुधा ऐसा देखा गया है कि एक पढ़ा-लिखा या डिग्रीधारी समस्याओं की जटिलताओं को उस स्तर तक नहीं समझ पाता है,जहां से समाधान का रास्ता निकल सकता है.परन्तु,एक अनपढ़ व्यक्ति भी दूर की कौड़ी ले आता है.ऐसा इसलिए कि उसके पास किताबी ज्ञान तो नहीं है,परन्तु उसका अनुभव संसार किसी भी डिग्री पर भारी पड़ता है.
नक्सलवाद नक्सलबाड़ी से चला तो बिहार में सबसे पहले शाहाबाद(अब भोजपुर) के सहार,संदेश और पीरो में अपना डेरा जमाया था.इसके मौजूं कारण भी थे.मध्य बिहार के इस इलाके में सामंतों का डंका बजता था.हरिजन और पिछड़ों का जीना दुभर था.देश तो आजाद हो गया था लेकिन ये सामंतो के गुलाम थे.इनका कोई सुनने वाला नहीं था.पंचायत से लेकर विधान सभा और संसद तक कहीं इनका कोई नहीं था.बिल्कुल असहाय.सामंतों के उत्पीड़न को अपनी नीयति मान चुके थे.इसके बावजूद,उनके बीच ऐसे लोग भी थे,जो अनपढ़ थे,लेकिन वे इस परिस्थिति को बदलना चाहते थे.वे भी आजादी चाहते थे.इसीलिए,जब नक्सलियों ने हरिजनों और पिछड़ों को विश्वास दिलाया कि वे उन्हें सामंतों की गुलामी से मुक्ति दिलाने में उनकी मदद करेंगे,तब दबे-कुचले लोगों ने नक्सलियों को हाथों-हाथ लिया था.उन्हें लगा कि चलो,कोई तो मिला जो उनकी मुक्ति की बात तो करता है. धीरे-धीरे विश्वास का दायरा बढ़ता गया और बिहार में नक्सलवादियों के सहारे हरिजनों ओर पिछड़ों को मुक्ति की राह दिखने लगी. बाद में इन्हें सामंतों से बहुत हद तक मुक्ति मिली.
यहां भी ऐसा नहीं था कि तमाम हरिजन और पिछड़े नक्सलवादी हो गए थे.और ऐसा भी नहीं कि तमाम सवर्ण सामंत और उत्पीड़क ही थे.आज भी छत्तीसगढ़ में कहा जाता है कि वहां के आदिवासी नक्सली हो गए हैं.लेकिन वहीं सलवाजुडुम में भी आदिवासी हीं है, जो नक्सलियों के खिलाफ बंदूक उठाए हुए हैं.
किसी व्यक्ति या समूह का किसी विचारधारा या आंदोलन के पक्ष या विपक्ष में होना परिस्थिति,परिवेश,संवेदनशीलता और विवेक पर भी निर्भर करता है.किसी बच्चे को जैसे माहौल में रखा जाएगा.बड़ा होकर वह वैसा ही करेगा.यदि किसी बच्चे को आर एस एस संचालित विद्यालय में डाल दिया जाए तो वह वहां से एक कट्टर संघी बनकर ही निकलेगा.इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बच्चा आदिवासी है ,हरिजन है या ब्राह्मण.
इसलिए किसी एक समुदाय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता कि वह नक्सलवादी क्यों नहीं है या तालीबानी क्यों नहीं है या संघी क्यों नहीं है

-गिरिजेश्वर,मैथन,धनबाद..


१६ अगस्त २०१० ६:५३ पूर्वाह्न
aatmahanta ने कहा…
कामरेड, चीजों को थोड़ी दूरी बनाकर देखने से उसकी समग्रता समझ में आती है। मैं आपकी समझदारी पर सवाल नहीं खड़े करता, पर यह भी उतना ही सच है कि हम जहां तक देख सकें दुनिया वहीं तक नहीं होती। मैंने समुदाय-कौम की बात की है, जाति की नहीं। जाति तो मुसलमान में भी हैं और अन्यत्र भी। लेकिन कोई प्रवृत्ति जब किसी जाति विशेष में या कौम विशेष में बहुतायत से पाई जाए तो निश्चय ही यह विशेष अध्ययन को आमंत्रित करता है। कभी कोई बीमार अपने को बीमार नहीं कहना चाहता। पर डाक्टर के पास जाने से भी नहीं घबड़ाता। और रही बात बहस के लायक मुद्दा का तो किसी भी गंभीर मसले को अमूर्तता का लबादा ओढाकर उसे बहस के दायरे से खारिज किया जा सकता है। और बहस में शिरकत की जिम्मेवारी से बाहर से आ सकते हैं। क्या आपको नहीं लगता कि इस मामले में एक बहसतलब मसले को इसलिए खारिज किया जा रहा है कि वह किसी 'वाद' या पार्टी लाईन के खिलाफ पड़ती है।
कामरेड चीजों को उसके वास्तविक रंगों-आभा में देखने के लिए अपनी आंखों से चश्मा हमें आंखों से उतारना होगा। हो सकता है बहस का विषय किसी चश्मे को पहन कर तैयार किया गया हो, पर बहस में आकर ही इसे देखा जा सकता है। मेरा इरादा किसी कौम को नीचा दीखाना नहीं था, सिर्फ यह परखना था कि मेरी जिज्ञासा सचमुच बहसतलब है या नहीं, या बस सिरफिरापन?

शनिवार, 7 अगस्त 2010

शिबू को आज भी विश्वास से देखते हैं सर्जक

- सरकार के लिए जोड़तोड़ के बीच कथाओं के नायक

फणीश्वरनाथ रेणु ने वास्तविक जीवन से चलित्तर कर्मकार तथा बावनदास जैसे पात्रों को उठाकर अपने ऐतिहासिक आंचलिक उपन्यास ‘मैला आंचल’ के कथानक में पिरोया। इसी तरह भैरव प्रसाद गुप्त, राही मासूम रजा, नागार्जुन ने भी वास्तविक जीवन से पात्रों को उठाया, पर हू ब हू रखने की बजाए, काल्पनिक कलेवर प्रदान किया है। उल्लेखनीय यह नहीं है कि किसने वास्तविक पात्रों को किस रूप में चित्रित किया है। उल्लेखनीय यह है कि ऐसे पात्र जब वास्तविक जीवन में मूल्यों व व्यवस्थाओं की टकराहट के बीच कृतियों से हटकर मौजूद दिखाई पड़ते हैं तो सर्जक अपने पात्र को कैसे देखते हैं। यह मामला फिलहाल इसलिए मौजूं हो गया है कि कई कथाकारों की कृतियों में ईंट-गारे की तरह रचे-बसे शिबू झारखंड के राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर चर्चा की धुरी में हैं। चर्चा की धुरी ही नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीतिक कुंडली के प्रभावी घर में बैठे हैं। गुरु जी को अपना औपन्यासिक नायक बनानेवाले कथाकार कुर्सी की उठापटक में शामिल अपने नायक को कैसे देखते हैं? उनकी भूमिका को राजनीतिक मूल्यों की गिरावट की स्वाभाविक परिणति मानते हैं या शिबू का निजी पतन या फिर समग्र भारतीय चरित्र की विकृतिका हिस्सा ? हम यहां बात कर रहे हैं ‘गगन घटा घहरान’ के लेखक मनमोहन पाठक व ‘समर शेष’ के सर्जक विनोद कुमार की।

परिवर्तन जीवन का नियम है – पाठक

अपने चर्चित पहले उपन्यास ‘गगन घटा घहरान’ में शिबू सोरेन को चित्रित करनेवाले हिंदी कथाकार मनमोहन पाठक गुरु जी की स्थिति को कतई अजीबोगरीब नहीं मानते। उनका साफ कहना है कि अब न तो यह शिबू का पतन या न ही उनकी चारित्रिक गिरावट है। इसे वह अपने पात्र की वास्तविक जीवन में विकृति या विचलन भी नहीं मानते। श्री पाठक कहते हैं कि परिवर्तन जीवन का नियम है। यह अजूबा तब लगता है जब हम किसी पात्र या चरित्र से अदभुत आकांक्षाएं पाल लेते हैं। इस महान सभ्यता के मूल्य, परंपरा, संस्कृति को अपनी पीठ पर लादे प्रभु वर्ग या श्रेष्ठ जाति के नेताओं में जब विचलन या विकति दिखाई पड़ते हैं तो यह सवाल नहीं उठता। दर्जन भर भाषाओं के ज्ञाता नरसिम्हा राव या मनमोहन सिंह या डा. जगन्नाथ मिश्र अपने वास्तविक रूप में दीखते हैं तो सवाल वहां उठना चाहिए, पर ऐसे सवाल वहां नहीं उठते है। जनसंघर्षों की बदौलत जिस राजनीतिक मुकाम पर आज सोरेन दीखते हैं, वहां उस वर्ग के नेता के लिए पहुंचना दुर्लभ है। कथाकार मनमोहन पाठक स्वीकारते हैं कि शिबू आज जैसे दीखते हैं वैसे नहीं थे। इसका मतलब यह नहीं कि अपने कथानक के पात्र को वास्तविक जीवन में हटकर देखने पर उसे खारिज कर दें। हमारा वश तो अपने कथानक व उसके घटनाक्रम पर होता है। जहां तक बदले स्वरूप को लेकर कथा को पिरोने की बात है तो यह चरित्र में निहित आग के कारण संभव होता है। कोई चरित्र कथाकार को अपने जीवन में उपस्थितियों के कारण खीचता है। यह आग तब तक शिबू में थी, हमने उन्हें अपनी कृति में लिया। यह भी सच है कि समकालीन राजनीति में शिबू के पास आज भी बहुत कुछ ऐसा है जो बहुतों के पास नहीं है। वैसे यह गौर तलब है कि आज से 18 साल पहले जब यह उपन्यास छपा था तभी अपने लेख में कथाकार नारायण सिंह ने उपन्यास के साल भर में अप्रासंगिक हो जाने की बात कही थी। (उपन्यास कतार प्रकाशन से प्रकाशित)

पोखरिया के गुरु जी नहीं लग रहे – विनोद

‘समर शेष है’ नामक अपने उपन्यास में शिबू सोरेन को अपना नायक बनाने वाले पत्रकार कथाकार विनोद कुमार बहुत सपाट और बेलाग भाव में कहते हैं कि आज समर्थन के लिए लोगों के पास जानेवाले गुरु जी पोखरिया के गुरु जी नहीं लगते। उन्होंने अपने उपन्यास का हवाला देते हुए कहा कि जिस कालखंड पर आधारित गुरु जी का चरित्रांकन हुआ, उस समय वे वैसे थे। कुर्सी की जोड़तोड़ में लगे अपने नायक को देखकर वे कहते हैं कि समर्थन वापसी तो ठीक थी, लेकिन अब वे जो कुछ कर रहे हैं ठीक नहीं लगता। उन्हें धीरज और साहस का परिचय देना चाहिए था। एक अल्पायु सरकार के लिए भागमभाग में लगे गुरु जी को देखकर धक्का लगता है। वे कहते हैं कि पोखरिया से निकलने के बाद उन्होंने दुबारा टुंडी का रुख तक नहीं किया। वे बहुत दूर चले गए हैं। ऐसा नहीं कि उस कालखंड में चलाए गए अपने संघर्ष को वे भूल गए हैं, पर संसदीय राजनीति अब काजल की कोठरी हो गई है, जहां से बेदाग निकलना मुमकिन ही नहीं। वे भलीभांति जानते हैं कि कांग्रेस ने उनको छला ही है। कहीं न कहीं, वे कांग्रेस के बगैर सरकार चलाना चाहते थे, पर परिवार से मोहग्रस्त हो जाने के बाद राजनीति में उनके निकट के लोग उनसे दूर होते गए। वे जो कर रहे हैं राजनीति में होने के कारण ऐसी कामना कर सकते हैं, पर उनके साथ भला नहीं होगा। ऐसा लगता है कि दिक्कू राजनीति का विरोध करते-करते वे भी दिक्कू हो गए है। (उपन्यास प्रकाशन संस्थान दिल्ली से प्रकाशित।)

सोमवार, 5 जुलाई 2010

आत्महंता ही क्यों

एक नौकर जब मालिक से लड़ता है तो वह एक चुनाव के तहत यह करता है.। इसलिए नहीं कहा जा सकता है कि अनजाने भविष्य की ओर वह बढ़ रहा है। उसे अपना भविष्य मालूम है क्योंकि वह जो कुछ करता है उसका नतीजा भी उसे पता है। आत्महंता कवियों के संदर्भ में भी यही कहा जा सकता है कि असहमतियों से होते हुए अभिव्यक्ति से लेकर सत्ता के विभिन्न प्रतिष्ठानों तक के विरोध तक आने में उसने यह जाना होगा। असहमतियों की तीव्रता विरोध को और उग्र और प्रखर करती है। परिवर्तनकामी शक्तियां समाज व व्यवस्था से संरक्षण व प्रोत्साहन की अपेक्षा नहीं करती।
उपेक्षा की गर्त में जाकर जोखिमों की अंधेरी गुफा के हवाले जिंदगियों की तबाही परिवर्तनविरोधी तथा यथास्थितिवाद की पोषक व्यवस्था के लिए चिंता का सवाल नहीं। सवाल यह है कि यह सब कुछ समाज में बचे-खुचे संवेदनशील प्रबुद्ध लोगों के प्रभावी तबके के होते हुए होता है। क्या जब 18 साल की उम्र में थामस चैटर्टन को लगातार भूखे रहने के बाद जहर की गोली खानी पड़ी (1770 में) तो इंग्लैंड के ब्रिस्टल के इस कवि को आक्सफोर्ड का होरेस वालपोल नहीं जानता था ? और स्वाभिमान ऐसा कि मकान मालकिन ने खाने की पूछी तो उसने अनमने भाव से उसकी बात को टाल दिया। यह उस कवि का हाल है कि जिसे अंग्रेजी रोमांटिक कविता संसार में प्रवर्तक की हैसियत से देखा जाता है। रूस में युवाओं के बीच हीरो की तरह देखे जाने वाले सेर्गेई एसेनिन को तीस साल की उम्र में (1925) तथा मारीना त्स्वेताएवा (1937) को क्रमशः उपेक्षा और भुखमरी में आत्महत्या करनी पड़ी तो उस समय तत्कालीन रूस में अख्मातोवा, लेनिन, स्तालीन, एए फादीव कौन नहीं थे और किसे उनके हालों की जानकारी नहीं थी ? उनका मजाक उड़ानेवाले ओसिप मंदेलश्ताम नहीं थे ? हस्र देखिए कि लेखकों की दुनिया में तानाशाह की तरह रहा लेखक संघ का अध्यक्ष फादीव बाद में अपने को गोली मारता है तथा मंदेलश्ताम को खुदकुशी की कोशिश करनी पड़ती है और गुमनाम मौत होती है। हंगरी में तबाही झेलते हुए अतीली जोसेफ को जब 32 साल की उम्र में रेलगाड़ी से कटकर जान देनी पड़ी तो क्या हंगारी साहित्यिक हलके में खासी हैसियत रखनेवाले प्रो. अंटाल होर्जन और आलोचक मिहाली वैबेट्स की उपेक्षा और नफरत को भुलाया जा सकता है ? एक यदि जोसेफ को एक अदद शिक्षक तक की नौकरी से दूर रखने के लिए वे हाथ धोकर पड़ गया था तो दूसरे ने मिली हुई फेलोशिप के फाउंडेशन से उन्हें बाहर कर दिया। और अंततः वे इसमें सफल भी रहे। अंग्रेजी कवयित्री सिल्विया प्लाथ को अपने कवि पति डेट ह्यूग्स के कुचक्रों और दुर्व्यवहारों तथा तत्कालीन प्रकाशक समुदाय की उपेक्षा से आजीज आकर नींद की गोलियां खाकर मौत की आगोश में जानी पड़ी तो अमेरिका में उस वक्त कौन नहीं था ? एलेन गिंसबर्ग नहीं थे या डेवियन थामस और 1960 के उस दौर में कौन नहीं था ? प्लाथ की कविताओ में मिलने वाले अवसाद, आत्महंता प्रवृत्तियां, हताशा की सघनता ने एक काव्य प्रवृत्ति ही विकसित कर दी जिसे अंग्रेजी कविता में सिल्विया प्लाथ इफेक्ट के नाम से जाना जाने लगा। कंफेशनल पोएट्री का एक घराना निकल पड़ा। 28 साल के अफ्रीकी कवि आर्थर नार्ट्ज को जब खुदकुशी करनी पड़ी तो सारी स्थितियों के साक्षी उसके गुरु रहे विख्यात अंग्रेजी कवि डेनिस ब्रूटस क्या कर रहे थे ? और अपने ही मुल्क में जिन लांछनों और स्थितियों से गुजर कर क्रातिकारी प्रगतिवादी कवि गोरख पांडेय ने सिजोफ्रेनिया में आत्महत्या की इसकी परिस्थितियां भी किसी से छुपी नहीं रहीं। हिंदी समाज के तथाकथित प्रगतिशील तबके में उनके प्रति उपेक्षा व नफरत का अंदाजा इसीसे लगाया जा सकता है कि उनके गुजर जाने के बाद भी उनपर कहानियां-किस्से नामी –गिरामी पत्रिकाओं में छपते रहे। और पाकिस्तान की सारा शगुफ्ता और अफगान कवयित्री नादिया अंजुमन के साथ हुई ज्यादतियों तथा भारत में मलयाली कवयित्री टीए राजलक्ष्मी (1965) को जिन स्थितियों में मौत को गले लगाना पड़ा उसकी जवाबदेह क्या वे ही सिर्फ थीं ? जिन स्थियों के हवाले निराला गए, क्या हिंदी जमात उसकी जवाबदेही से अपने को पूर्णतः मुक्त रख सकता है ? धूमिल, मुक्तिबोध के लिए रचे गए कुचाल-जाल भी किसी छुपे नहीं रहे। हिंदी के लड़ाकू कथाकार शैलेश मटियानी को अवसाद के दौर में जिन लांछनों और अवमाननाओं की बारिश झेलनी पड़ी, हिंदी की सिरमौर पत्रिका हंस के पन्ने जिस तरह रंगे गए, क्या इसकी जवाबदेहियों से वे अपने को परे रख सकते हैं ? उर्दू शायर शकेब जलाली, मीराजी का अंत जिन कवि आलोचकों के दौर में हुआ उनमें कई तो आज मजे और मस्ती के हैसियत-ओहदे में हैं। क्या जिन अंतों को सिर्फ नियतिवाद के हवाले कर चुप मार जाना होगा ? क्या जवाबदेह परिस्थितियां रचने के गुनहगारों में अपने को शामिल कर लेना नहीं है यह ? आखिर इस संक्रमण का कीटाणु तो कहीं होगा ? क्या इसका कीटाणुनाशक (एंटी बायोटिक्स) संभव नहीं ? इसीलिए मेरा मानना है कि खुदकुशी हमेशा सिर्फ यह नहीं कि फांसी पर झूल गए या नदी में छलांग लगा ली या गाड़ी से कट गए या फिर नींद की गोलियां गटक लीं। अपने हिसाब से और सचमुच रचनाशीलता से भरे अच्छे मकसद (सृजन से लेकर सामाजिक बदलाव के लिए आंदोलन तक सभी हैं इसमें) के लिए दीवानगी निजी जीवन के प्रति लापरवाही या उदासीनता भर देती है। उन बड़े मोहक लक्ष्यों के सामने निजी जिंदगी का कोई मोल नहीं देते। यह प्रवृत्तियां जीवन को अराजक करते हुए असुरक्षाओं के हवाले कर देती हैं और मौत को करीब ले आती हैं। महात्मा गांधी, रामकृष्ण, विवेकानंद, (तीनों के मन में आत्महत्या के प्रकट विचार तक आने के साक्ष्य हैं) पाश, धूमिल, राजकमल, रेणु, निराला, मंटो, मटियानी, चारु मजुमदार, विनोद मिश्र, महेंद्र सिंह (दोनों माले नेता), अरुंधती राय, ज्यां द्रेज आदि का जीवन इसका उदाहरण हैं। यह अलग बात है कि इनके अंतों (जो जीवित हैं उन्हें छोड़) को स्थुल रूप से भिन्न ठहराया जा सकता है।
ईसा पूर्व पांचवीं छठी सदी में प्लेटो ने जिन कवि-कलाकारों को समाज बहिष्कृत करने की बात कही थी, मैं उन्हीं को बचाने की बात कर रहा हू। 21 वीं सदी की प्रातःवेला में मेरा मानना है कि संस्कृतिकर्म जीवन की जड़ताओं के खिलाफ सामाजिक हलचल के पहल से लेकर मौजूदा सामाजिक हलचल में दखल भी है। और कवि इसी दखल के साथ अपनी रचना के माल-असबाबों, रचना के उपक्रमों के बहाने श्रेष्ठ जीवन मूल्यों के लिए परचम लहराता है। एक तरह से वह मानवीय सरोकारों के जीवित रहने के लिए वातावरण निर्माण के अभियान में शामिल हो जाता है। और पर्यावरण बच गया तो मिट्टी, पानी, हवा को बचाने की लड़ाई अलग-अलग नहीं लड़नी होगी। इन्हीं अर्थों में मैं संभावनाशील भविष्य के कवियों-कलाकारों को बचाने की एक मुहिम देखना चाहता हूं। ‘ अपारे काव्य संसारे, कविरेकः प्रजापति ...’ तो ध्वन्यालोक के आनंदवर्द्धन के स प्रजापति ब्रह्मास्वरूप कवि को असुरक्षित कर आप भला कौन सी दुनिया बचा लेंगे। और जो दुनिया बचा लेंगे उसमें करुणा, कोमलता, जीवटता, प्रेम विभिन्न जीवन राग कुछ भी तो नहीं होगा। पूंजी के क्रेडिट कार्ड और स्मृति के चिप्स लेकर आप कहां भागेंगे ?
(आत्महंताओं पर केंद्रित राजकमल प्रकाशन से प्रकाश्य लेखक की पुस्तक से)