हमसफर

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

अँग्रेज़ी बहुत काम आती है, लेकिन हिंग्लिश नहीं

                              पराई मिट्टी का हिंदी प्रेम
हिंदी फैली या सहज हुई है तो स्वाभाविक स्थिति के कारण नहीं, संकट के कारण, पलायन के कारण, बोलियों की ताकत और सौंदर्य के कारण, दीनता के कारण। हिंदी प्रदेशों के अविकास ने महानगरों को सस्ते में मजदूर, नौकर, चपरासी, पहरेदार, रिक्शेवाले, ड्राइवर उपलब्ध कराए। इनकी भी अपनी अंजली भर हिंदी इनके साथ वहां गई। इन्होंने खिचड़ी जबान सीखी और अपने कुछ शब्द, शब्दरचना, विन्यास खोये और कुछ हासिल किए। केबीसी 5 में बैठे एक मराठी दंपति में से पत्नी पुरुष के बारे में कहती है कि वह नरभसा जाते हैं। यह क्या है।
सवाल यह भी है कि हिंदी-चूषक मीडिया, राजनीति और संस्कृति की सत्ताओं में बैठे लोग इस सबके लिए क्या कर रहे हैं? जो भी दबाव या आग्रह है वह जबान के फैलाव के कारण, भाषा के आत्मसम्मान के कारण नहीं। यह हिंदीभाषी प्रदेश के श्रमविस्तार से संभव हुआ है। सिस्टम के साथ उसकी अनुकूलता (कंपैटिबिलटी) के कारण नहीं। इसलिए जब दबाव निहायत ही बाजार का होगा तो उसकी फलश्रुतियां भी उसी की शक्लोसूरत में आएंगी न। यही कारण है कि भाषा के प्रति उनका कोई गंभीर सलूक नहीं दीखता। बाजार की हसीन गोद में बैठकर पूंजी की केलिक्रीड़ा और अटखेली को उत्तेजक बनाने का काम कर रहे हैं मीडिया और फिल्म के हिंदी चूषक हिंदी से छेड़छाड़ और बलात्कार कर। (ये न तो हिंदी के हैं और न ही किसी और भाषा के। यह तो भाषा मात्र के साथ दुर्व्यवहार है। अन्यथा वे ऐसा सलूक करते ही क्यों।) ये गुलाम हिंदी चूषक एक बोली की तरह भी भाषा को नहीं बरतते हैं। एक उथलापन है पूरे परिदृश्य में। यह सारा का सारा परिदृश्य उत्साह नहीं जगाता, एक गंभीर चिंता का विषय है।
कहते हैं आज हिंदी का बाजार अरबों का है। हां, बाजार उसे मिलता है जिसका मास होता है। और बाजार में पैठ किसी संरक्षण के जरिए नहीं बनती, स्पर्द्धा से मिलती है हिंदी को जो जगह मिलनी है, अपने भरोसे, अपने संघर्षों से  वह तो मिल ही रही है, पर व्यवस्था का सहकार जहां चाहिए, वहां हम बेहद कमजोर पड़ जाते हैं। अपने मुल्क में ही इसे राष्ट्रभाषा बनाने के नाम पर विरोधियों की अपेक्षा हिंदीवाले (हिंदी जनपद अधिक) ही अधिक बिखरे नजर आते हैं। चीन. जापान. रूस, चेक, हंगरी में विदेशी हिंदी विद्वानों ने हिंदी शिक्षण की एक सुदृढ़ परंपरा कायम की है, पर उन्हें भी पीड़ा होती है हिंदी के घर में हिंदी को उपेक्षित देखकर। ऐसा लगता है जैसे भारत हिंदी का स्वाभाविक घर नहीं।
दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग के ''गांधी ग्राम'', सैंडटन कन्वेंशन सेंटर, दूसरा तल, मौड स्ट्रीट, सैंडटन-2196, में गत 22-24 सितंबर 2012 को संपन्न विश्व हिंदी सम्मेलन में यूएनओ में हिंदी को जगह दिलाने के लिए बजटीय प्रावधान आदि को लेकर कई ऐलान हुए। औपचारिक धारणा है कि इसके लिए लॉबिंग करनी होगी। ऐसे में बेहद दिलचस्प होगा यह जानना कि जिन विदेशी विद्वानों को इस आयोजन में सम्मानित किया गया है, उनके हिंदीगत सरोकार कैसे हैं। हिंदी को लेकर विकसित हो रही वैश्विक समझदारी क्या है, इनसे जान सकते हैं। इस बाबत दो विदेशी विद्वानों आस्ट्रेलियाई डा. पीटर गेरार्ड फ्रेडलांडर व चेक डा. दागमार मारकोवा से संपर्क मुमकिन हुआ।

भारत विद्या और बौद्ध धर्म की शिक्षा से जुड़े आस्ट्रेलियाई विद्वान डा. पीटर गेरार्ड फ्रेडलांडर का परिवार एमएन राय के जमाने से भारत से जुड़ा है। उनकी दादी 1950 के आसपास एमएन राय से मिलने भारत आई थी। यहां से ले गई मूर्तियां वगैरह के कारण पीटर का मन जिज्ञासाओं से भर उठा। विद्यालयी शिक्षा के बाद विश्व भ्रमण पर निकलने र भारत पहुँच तो यहां की संस्कृति से मंत्रमुगध होकर वे लगभग पाँच साल तक ीं रुक गए और साथ ही साथ हिन्दी पढ़ने लगा। यहां वे अँग्रेज़ी सिखाते। उसके बाद अंत में उन्होंने विश्वविद्यालय से हिन्दी में बीए किया शोधकार्य के लिए उन्होंने संतों पर अध्ययन किया और संतगुरु रैदास की जीवनी और कृतियों पर शोध प्रबंध लिखा फिर उन्होंने भारत में अमरीकी विद्यार्थियों को हिन्दी सिखाई और बाद में ऑस्ट्रेलिया में बसकर यहाँ हिन्दी, भारतीय अध्ययन और बौद्ध धर्म की शिक्षा देने लग
डा. पीटर का मानना है कि जहाँ भी भारतीय मूल के लोग रहते हैं वहां हिन्दी एक अंतर्राष्ट्रीय संम्पर्क भाषा बन गई है,हिंदी के प्रति उनका अनुराग और श्रद्धा तो हम भारतीयों के लिए प्रेरक है। वे कहते हैं कि जब दुनियादारी की बातें करन हो तो लोग अँग्रेज़ी में बात करते हैं, लेकिन दिल की बातें करन के लिए हिन्दी, स्वभाविक भाषा है इस भारतीय भाषा में बात करना ज़्यादा सहज महसूस होता है। डा. पीटर की इस अनुभूति को जानकर सहज ही पिछले दिनों सामने आया वह शोध ध्यान में जाता है जिसके अनुसार हिंदी भाषी अंग्रेजी बोलने की बजाए हिंदी बोलकर अधिक सहज और तनावमुक्त रह सकते हैं पराई मिट्टी में बसा हिंदी प्रेम कितना वैज्ञानिक और अनुरागपूर्ण है।
वे कहते हैं कि हिन्दी एक परिवर्तनशील भाषा है और यह उसकी सक्षमता है कि दूसरी भाषाओं के शब्द आत्मसात कर अपनी ताकत को और भी बढ़ा लेती है। पहले हिन्दी ने फ़ारसी और अरबी को अपनाया, अब अँग्रेज़ी की बारी है। हाँ और यह भी सोचिए कि अब हिन्दी सबसे सशक्त समाचार पत्रों और टीवी का माध्यम बन गई है उनकी धारणा है कि हिन्दी दुनिया क सबसे बड़ी भाषाओं में न सिर्फ बनी रहेगी, बल्कि आगे भी बढ़ेगीहिंदी की समस्या पर उनका कहना है कि  समय के साथ चलना चाहिए सके लिए सीखने और सिखाने के लिए पर्याप्त संसाधन की जरूरत हैसके साथ-साथ अँग्रेज़ी का प्रचलन अब भारत में बहुत बढ़ गया है, फिर भी सिर्फ दस प्रतिशत लोग अँग्रेज़ी बोलते हैं उनका आग्रह है कि हिन्दी को आम लोगों से जुड़े रहने के लिए इसे और भी सशक्त बनाना होगा। इसलिए सी हिन्दी अपनानी चाहिए जिसके शब्दभंडार आम बोलियों पर आधारित ो। इसके लिए वे शुचितावादियों से हटकर शुद्ध हिन्दी से कुछ दूर बनाकर रहन का आग्रह करते हैंवे कहते हैं हमें हिन्दी को आकर्षक बनाना चाहिए, शुद्ध नहींयूएनओ में हिंदी की मान्यता के लिए भावी प्रयासों की बाबत उनका मानना है कि इससे हिंदी के मार्ग के रोड़ों का कोई सीध सम्बंध तो नहीं है।  संभव है इससे सबकी भलाई हो, पर उनकी अभिलाषा है कि यूएन में हिन्दी की जगह हो और हिन्दी में लोग यूएन में बोल सकें
हिंदी की चेक विदूषी डा. डा. दागमार मारकोवा का हिंदी से जुड़ाव संयोगवश हुआ। 18 साल की उम्र में आगे पढने का सवाल आया। तभी संयोगवश भारत के बारे में कुछ पुस्तकें हाथ आ गयीं। और फिर उन्होंने हिंदी पढ़ने का निश्चय कर लियाऔर ब से हिंदी से उनका दिल लगा हुआ है। जहां तक हिंदी के वैश्विक परिदृश्य की बात है तो वे फिलहाल इस वक्त को इसके लिए प्रासंगिक नहीं समझतीं। पहले हिंदी को अपने देश में उसकी जगह मिलनी चाहिए। फिर संयुक्त राष्ट्र संगठन की बात की जा सकती है। गहरे खेद के साथ वे कहती हैं कि पश्चिम में रहनेवाले भारतीय अक्सर हिंदी भूल जाते हैं। डा. दागमार जोर देकर कहती हैं कि पहले हिंदी भारत में अपनी जगह बनाए तभी विश्व की बात की जा सकेगी। वे कहती हैं कि हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह तो मनाया जाता है, लेकिन जब मेरे son की age seventeen years है जैसा वाक्य सुनने में आता है तो दुख होता है। हिंदी की समस्या उन्हें उसकी घरेलू परिस्थितियों में दीखती है। उनका आशय हिंदी का ग्रंथियों, कुंठाओं से उबर कर घर में मजबूत हालत में आने से है। वे मानती हैं कि अँग्रेज़ी बहुत काम ती है, लेकिन Hinglish नहीं। वे कहती हैं कि जहाँ तक मुझे मालूम है तो जिन देशों की भाषाएँ हिंदी जैसी विकसित हैं उन देशों में से किसी में भी अपमी भाषा अँग्रेज़ी फ़्रेंच आदि से इतनी नहीं दबीं जितनी भारत में।
(ई-मेल के द्वारा लेखक की प्रश्नावली का विदेशी विद्वानों से मिले जवाब के आधार पर।)

मंगलवार, 4 सितंबर 2012

दैनिक भास्कर के पन्नों पर आत्महंता



गत दिनों दैनिक भास्कर के धनबाद संस्करण के डीबी स्टार (19 अगस्त 2012, रविवार) की कवर स्टोरी धनबाद के ब्लॉगरों पर केंद्रित थी। उसमें आपके ब्लॉग आत्महंता का भी जिक्र था। रिपोर्टर सदफ नाज की यह स्टोरी जितनी अपने शीर्षक से विषय को फोकस कर रही थी, उतनी व्यौरे और प्रकृति में नहीं। इस ब्लॉग के मोडरेटर की जानकारी में झारखंड के किसी भी अखबार या उनके परिशिष्ट में इस तरह की यह पहली कोशिश थी। प्रथम प्रयास होने के नाते इसकी कुछ सीमाएं स्वाभाविक रूप से दिखीं। दरअसल इस स्टोरी को ब्लॉग पर केंद्रित होना चाहिए था, लेकिन यह केंद्रित हो गया ब्लॉगर पर। इसके साथ ही ब्लॉग की कुछ खासियत के साथ विशिष्ट ब्लॉगर का जिक्र तथा उनका वर्सन जरूरी था। ऐसा होता कि वे क्यों फॉलो करते हैं यह ब्लॉग तो निश्चय ही स्टोरी की उपादेयता और भी बढ़ जाती। और दूसरी बात कि ब्लॉग के यूआरएल अंग्रेजी में विस्तार से होने चाहिए थे। स्टोरी के बाद आए कई फोन से यह और भी स्पष्ट हो गया कि ब्लॉग पता  अंग्रेजी में होना कितना जरूरी था। जैसे आत्महंता के दो वर्सन उपलब्ध हैं। एक लिखा जाता है – atmahanta और दूसरा aatmahanta. यह ब्लॉग  दूसरी वर्तनी में उपलब्ध है। इसके अलावे एक उपलब्ध है wordstar पर, जबकि दूसरा यानी यह ब्लॉग blogspot पर उपलब्ध है। कुल मिलाकर ऐसे प्रयास को थोड़े व्यापक स्तर पर करने से स्टोरी का असल मकसद पूरा होगा।
लिंक पर जाकर आप भी इसे देख सकते हैं।
बदलते दौर में दर्शक की मरती समीक्षा चेतना को जगाए रखने के लिए हर हाल में चैनलों, इंटरनेट, ब्लाग, यू ट्यूब, ट्विटर आदि पर अखबारों में एक पन्ना देना चाहिए। कुछ अखबारों ने यह प्रयास शुरू कर दिया है। इनकी रफ्तार और समाज पर इसके बढ़ते-फैलते शिकंजे को देखते हुए हिंदी समाचार पत्र जितनी जल्द इसे अपना ले, सेहत के लिए बेहतर होगा। नया पन्ना पाठकीय आधार बढ़ाने में बहुत जल्द फर्क लाएगा। अखबार जिस संचार क्रांति का हिस्सा है, उस फ्रेम की शेष चीजों से उसका रिश्ता दूर-दूर का होकर रह गया है। असंख्य साइट पर भटकने के बजाए विवेकवान पथ ढूंढ़ने के अलावे चैनलों के प्रवाह में चयन का विवेक पैदा करना भी मीडिया का धर्म है। यह प्रयोग एक खास तरह का माइंड सेट तैयार करेगा। ज्वलंत विषयों पर आभासी संसार (वर्चुअल स्पेस) में क्या कुछ हो रहा है, पाठकों को इसका भी पता चलेगा। लेकिन ऐसे प्रयास तभी संभव होंगे जब आप कुंठाओं से मुक्त हो विरादराना अंदाज में चीजों को देखें-गुनें।


 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

चिदंबरम साहब हिरन आपके ही दरवाजे रुकेगा!

ग्लैड्सन डुंगडुंग


(उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चित हुए ग्लैड्सन डुंगडुंग की कहानी से जनजातीय उत्पीड़न और विस्थापन का दर्द जाना जा सकता है। आवारा राजनीति और निर्बंध विकास के गल्ले से विस्थापन की पीड़ा नहीं सुनी जा सकती है। इसे विस्थापन के खिलाफ लड़नेवालों से जाना जा सकता है। यह वही सच है जिसे निराला ने लोहे का स्वाद मे कहा है –

लोहे का स्वाद
उस लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
नीचे दिया जा रहा पत्र उन्होंने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के कोट्टेगुडा में आततायी राज्यसत्ता के सीआरपीएफ बर्बरता के बाद 10 जुलाई 2012 को केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम को लिखा था। आसपास के तीन गांवों से आए ग्रामीण आगामी बीजोत्सव के आयोजन के लिए बैठक कर रहे थे। हिंदी मे उल्था कर इसे यहां दिया जा रहा है। डुंगडुंग झारखंड ह्यूमन राइट्स मूवमेंट (जेएचआरएम) के महासचिव है। लगातार पुलिस अत्याचार तथा जनजातीय मसलों पर लिख-बोल रहे हैं।  33 वर्षीय यह आदिवासी युवा योजना आयोग की उपसमिति का सदस्य है। ग्लैडसन डुंगडुंग देश के चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।
- मोडरेटर।)


गृहमंत्री पी चिदंबरम के नाम ग्लैडसन डुंगडुंग का खुला पत्र


जुलाई 10, 2012
ग्लैडसन डुंगडुंग
झारखंडमिरर.ओआरजी

आदिवासी प्रकृति के साथ ही जीते और प्रकृति के साथ ही मरते हैं। वे अति प्राकृतिक ईश्वर में विशावस करते हैं, इसीलिए सभी अवसरों पर वे प्रकृति की पूजा करते हैं। आदिवासियों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि और वन पर निर्भर है, वह भी सर्वथा वर्षा पर आश्रित। इसीलिए खेती से पहले और बाद में ग्रामीण एकत्र होकर अपने अति प्राकृतिक ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। इन आदिवासी समुदायों की सर्वथा सर्वसम्मति पर आधारित अपनी जनतांत्रिक व्यवस्था भी है, जो व्यवहारतः ग्रामीण आयोजनों में दीखती है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिला के कोट्टागुडा गांव में कोट्टागुडा, सरकेगुडा और राजपेंटा के ग्रामीण दिनांक 28 जून 2012 को परंपरागत उत्सव बीजपेंडुम(बीजोत्सव) के आयोजन की योजना के मकसद से एकत्र हुए थे, ताकि उत्सव आयोजित करने के बाद वे अपने खेतों में बीज बोना शुरू कर सकें क्योंकि क्षेत्र में मौनसून आ चुका है।     

दुर्भाग्यवश, उनमें से 17 लोगों के लिए अपनी तरह की यह आखिरी बैठक साबित हुई। क्षेत्र से माओवादियों के खात्मे के नाम पर तैनात सीआरपीएफ की कोब्रा बटालियन व छत्तीसगढ़ पुलिस ने ग्रामीणों को चारों तरफ से घेरकर उन्हें कोई संकेत दिए बगैर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। फलस्वरूप उनमें से 16 को छाती, सिर और शरीर के दूसरे भागों पर गोलियां लगीं और घटनास्थल पर ही उन्होंने दम तोड़ दिया तथा एक को दूसरी सुबह क्रूरतापूर्वक मार डाला। सुरक्षाबलों ने 18 नृशंस माओवादियों को मौत के घाट उतारने का दावा किया है और इस मौके को उन्होंने नक्सलविरोधी अभियान की एक बड़ी कामयाबी के जश्न के रूप में मनाया। इसी तरह केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दावा किया कि सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ में शीर्ष नक्सल नेताओं को भून डाला और मुठभेड़ पर सवाल उठते ही उन्होंने सफाई देने की कोशिश की।  

हालांकि, टीवी चेनलों और अखबारों में मुठभेड़ की ब्रेकिंग न्यूज चलने के साथ ही कहानी पूरी तरह से झूठी लगने लगी। तत्काल ही सभी के दिमाग में एक सवाल कौंध गया कि सीआरपीएफ कैंप से बमुश्किल तीन किमी की दूरी पर स्थित गांव में 18 शीर्ष माओवादी कैसे बैठक कर सकते हैं? अंततः बीजापुर मुठभेड़ की सचाई का खुलासा हो ही गया। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के खिलाफ राज्यपोषित अपराध की अथक रिपोर्टिंग करनेवाले जांबाज पत्रकार अमन सेठी के प्रयास से एक बार फिर सुरक्षाबल के शीर्ष अधिकारियों, छत्तीसगढ़ सरकार व केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की झूठ खुलकर सामने आ गई। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षाबलों ने ग्रामीणों की शांतिपूर्ण जुटान पर गोलियां दागी। 12-15 वर्ष के पांच बच्चों समेत 20 ग्रामीण मारे गए और चार लड़कियों के साथ बदसलूकी की गई। खबर का सार यही था कि उस दिन उस गांव में कोई माओवादी नहीं था। आगामी बीजोत्सव को ले विचार-विमर्श के मद्देनजर सभी ग्रामीण एकत्र हुए थे, जब सुरक्षाबलों ने उनपर गोलियां चलाईं, जिसके परिणामस्वरूप पांच बच्चों समेत 20 ग्रामीण मारे गए।
3 तथा 4 जुलाई 2012 को जेपी राव, कोपा गुंजम तथा डा. नंदिनी सुंदर के तीन सदस्यीय तथ्यान्वेषी दल द्वारा कोट्टागुडा, सरकेगुडा तथा लिंगागिरि गांवों के दौरा के बाद की रिपोर्ट ने और भी दहलानेवाले तथ्यों का खुलासा किया। रिपोर्ट के अनुसार इन गांवों पर 2005 में सलवा जुड़ुम मिलिशिया द्वारा हमले हुए थे तथा तीनों गांवों के लगभग सभी घर फूंक दिए गए थे। फलस्वरूप सभी ग्रामीण आंध्र प्रदेश पलायन कर गए थे और वर्ष 2009 में ही फिर अपने गांव आ सके। सुरक्षाबलों ने दुबारा उनपर हमला कर 7 नाबालिग समेत 17 लोगों को मार डाला। इसके अलावे 9 ग्रामीण जख्मी हुए और पांच महिलाओं के साथ मारपीट और बदसलूकी गई।     

पोल-पट्टी खुलने के बाद केंद्रीय गृहमंत्री तथा आपरेशन ग्रीन हंट के शिल्पकार पी चिदंबरम ने निर्दोष ग्रामीणों की हत्या पर गहरा शोक जताया। एक हठभरा सवाल रह जाता है कि 17 आदिवासियों की नृशंस हत्या पर खेद कह देना भर काफी है क्या ? दूसरा, कि इस मामले में राजनीतिक दलों खासकर विपक्षी पार्टी भाजपा चुप क्यों है ? क्या 17 निर्दोष गैर आदिवासियों की जघन्य हत्या पर वह ऐसा ही सलूक करतीं ? कांग्रेस शासित राज्य में ऐसी ही घटना होने पर क्या भाजपा चुप रह जाती ? बेगुनाह आदिवासियों के नरसंहार के लिए कौन जिम्मेवार है ? क्या पी चिदंबरम इसके लिए जिम्मेवार नहीं हैं जो क्षेत्र से माओवादियों के खात्मे के नाम पर वर्ष 2009 से सुरक्षाबलों की तैनाती करते रहे हैं ? 
सीआरपीएफ महानिदेशक विजय कुमार यह कह कर बेशर्मी से सुरक्षाबलों के आपराधिक कृत्य का औचित्य सिद्ध करते हैं कि यह जानना नामुमकिन था कि उस रात वे (सुरक्षा बल) गोलियां किन पर चला रहे थे। आगे वह कहते हैं कि वह क्षेत्र एक बड़ा ही रहस्यमय संसार है, जहां कौन नक्सल है और कौन नहीं यह चिह्नित कर पाना नामुमकिन है। इसलिए यह सवाल उठाया जा सकता है कि उन ग्रामीणों को सुरक्षाबलों ने क्यों भूना जिनको लेकर वे आश्वस्त नहीं थे कि वे कौन हैं ? किसने उन्हें बेगुनाह ग्रामीणों पर गोली चलाने का हुक्म दिया ? क्या सुरक्षाबल महज शक के बिना पर किसी पर भी गोली चला सकते हैं ? घटना की जांच के लिए नियुक्त एसडीएम कुरुवंशी ग्रामीणों से पूछते हैं कि उन्होंने रात को बैठक क्यों की ? वे (कुरुवंशी) गांव भी नहीं जाते हैं और अपने दफ्तर में ही ग्रामीणों को बुलाते हैं, जो स्पष्टतः इंगित करता है कि राज्य का इरादा न सिर्फ आदिवासियों को न्याय में देर करना है, बल्कि यह भी स्पष्ट है कि उनके खिलाफ राज्यपोषित अपराध जारी रहेगा।

तहलका संपादक शोमा चौधरी ने अपने स्तंभ एडिटर कटमें बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि बस्तर का जीवन इतना सस्ता क्यों है ? इस सवाल का सीधा सादा जवाब है कि चुंकि भारतीय राज्य अमूमन यह विश्वास करता है कि देशभर में जंगल में रहनेवाले आदिवासी माओवादी या नक्सली हैं, जो कि निवेश के वातावरणके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इसके नागरिकों के प्रति संवैधानिक दायित्व की अपेक्षा हमेशा ही निवेश के वातावरणको लेकर परेशान रहते हैं। दरअसल भारतीय राज्य ने किसी भी कीमत पर आदिवासी क्षेत्रों के संसाधनों पर कब्जादारी करने का तय कर लिया है, जो कि भारत के महाशक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त करेगा। इसीलिए विकास और प्रगति के नाम पर जल, जंगल, जमीन और अन्य संसाधन भारतीय राज्य को सौंपने से इनकार कर चुके आदिवासियों की हत्या करने के लिए वन क्षेत्रों में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है।

हालांकि, जैसे ही हम फर्जी मुठभेड़ पर सवाल उठाते हैं, तो हम से प्रतिप्रश्न किया जाता है कि माओवादियों द्वारा सुरक्षाबलों की हत्या पर हम चुप क्यों रहते हैं ? इस सवाल का जवाब दूसरे सवाल में मिल सकता है, जब गत साठ सालों में जिन जंगलों में वे नहीं पहुंच सके, तो उन जंगलों में अब भारतीय राज्य सुरक्षा बलों को क्यों भेज रहा है ? क्या ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए या फिर खनिज की लूट को आसान करने के लिए ? यदि भारतीय जनता की सुरक्षा के लिए सुरक्षाबलों को वहां भेज जाता है तो फिर वही सुरक्षा बल बेगुनाह ग्रामीणों की रक्षा के बजाए उनकी हत्या, उनका उत्पीड़न व महिलाओं से बलात्कार क्यों करता है ? आखिर किसकी सुरक्षा के लिए वनों में सुरक्षा बल तैनात किए जाते हैं ? क्या सच यह नहीं है कि वनक्षेत्रों में सुरक्षाबलों की तैनाती जनता को बचाने की बजाए कारपोरेट हित की रक्षा के लिए की जाती है ?  

बौद्धिक तर्क चाहे जो भी हो, लेकिन सचाई है कि वर्ष 2009 के बाद नक्सलविरोधी अभियान के नाम पर देश भर में सैकड़ों बेगुनाह नागरिकों की हत्या की गई है, लेकिन आज तक एक भी प्रमुख जांच नहीं बैठी। इसलिए कारपोरेट गृहमंत्री पी चिदंबरम को हर हाल में इस्तीफा दे देना चाहिए, सारतः क्योंकि छत्तीसगढ़ के कोट्टागुडा, सरकेगुडा और राजपेंटा के बेगुनाह 17 आदिवासियों समेत सभी बेगुनाह ग्रामीणों की जघन्य हत्या के एकमात्र जिम्मेवार वे ही हैं। पी चिदंबरम से सवाल पूछा जाना चाहिए कि 17 बेगुनाह लोगों की बेशकीमती जान ले लेने के बाद खेद भर कह देना काफी है क्या ? क्या नक्सलविरोधी अभियान के नाम पर देश भर में हुए फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में वे सीबीआई जांच करवाएंगे ? और क्या बेगुनाह नागरिकों की हत्या करने के लिए वे शीर्ष सैन्य अधिकारियों को दंडित करेंगे या फिर इस जुर्म से रियायत पर मस्ती करने देंगे ? याद रखिए, पर चिदंबरम साहब हिरन आपके ही दरवाजे रुकेगा!    

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

संगीत की मठाधीशी का जवाब है भारती बंधु का सूफियाना अंदाज

                सूफी गायक की कबीर की अनूठी प्रस्तुति


बाजारवाद की सहूलियतों ने कई तरह से दौर को रिझाकर अंधा किया है। उसकी हसीन गोद में बैठकर मीडिया से ले लेकर राजनीति, विज्ञान से लेकर संस्कृति तक सभी अपने को धन्य मान रहे हैं। यह नए तरह का रीतिकाल है। सभी पैबस्त हैं किसी न किसी फार्मेट में। सभी के लिए कोई न कोई लकीर है। और सब के सब बिकाऊ। सभी भरोसा तो करते हैं – जो दीखेगा वह बिकेगा, पर वे क्यों भूल जाते हैं जो चीज बिकती है वह टिकती नहीं। रीतियों (ढर्रों-पाखंडों) पर प्रहार करनेवाले कबीर तो बाजार को और भी कभी नहीं सुहाए। और ऐसे में किसी ने कबीर को अपना ओढ़ना-बिछौना कर लिया हो तो यह दौर उसे सिरफिरा ही कह सकता है। और सिरफिरा जब कबीर को गाने लगे तो आप माथा ही धुन सकते हैं न। लेकिन नहीं, आप जहां भी हों एक बार स्वामी जीसीडी भारती उर्फ भारती बंधु को सुन लें, कई भ्रांतियां वैसे ही छिन्नमूल हो जाएंगी जैसे कबीर का जीवनदर्शन करता है। पिछले 45 सालों से सूफियाना अंदाज में कबीर को गानेवाले भारती बंधु की करीब छह हजार प्रस्तुतियां हो चुकी है।

प्रस्तुतियों के वैशिष्ट्य ने कबीर गायन की भारती बंधु शैली को ही जन्म दे दिया। कबीर की सीख और कबीर का मर्म, कबीर का वैभव और कबीर का फक्कड़पना, कबीर का गांभीर्य और कबीर की अल्हड़ता के अलावे भारतीय काव्य का वैभव व शास्त्रीय संगीत का वैविध्य, सब कुछ एक साथ दिखे पिछले दिनों झारखंड की कोयला राजधानी में जब 3 जनवरी को जांबाज पुलिस अधिकारी रणधीर प्रसाद वर्मा की 21 वीं पुण्य तिथि पर उनको सुनने का मौका मिला। शास्त्र और लोक, चाहे वह संगीत के पैमाने पर हो या कविता के संसार का, सबकुछ सहज ही भारती बंधु दिखा गए। कबीर के यहां राग-रागीनियों में बंधे पद हैं तो समाज-धर्म की जड़ताओं पर प्रहार भी। मिश्र शिवरंजनी राग पर ही आधारित कबीर का पद जरा धीरे-धीरे गाड़ी हांको, मोरे राम गाड़ी वालेगाना शुरू किया तो क्रमशः शांत रस की इस रचना को श्रोताओं की भागीदारी तक ले जाकर उन्होंने फक्कड़पना और अल्हड़ता से पूरे माहौल को कबीरमय कर दिया। दुनिया से विदा हो रहे शव का अनुरोध है कि श्मशान थोड़ा धीरे-धीरे ले चलो, ताकि संसार में रहने का और मौका मिल जाए। संगीत का वैभव अर्थ-विन्यास को विखंडित करते हुए जब आगे बढ़ता है तो पूरे मजमा जैसे करुणा की एक उदास चादर (मर्म) से बाहर मस्ती में रम जाता है। कबीर का जीवन राग बनता है ठाठ और मस्ती से। भारती बंधु यहां इसे ही साबित करते हैं अपने अंदाज में। शास्त्रीय संगीत की बंदिश टूटेगी तभी वह लोक का कंठहार बनेगी, यह भी साबित कर दिखाया है इन्होंने।

जड़ों की तलाश में निकला साधक जमीन तोड़ेगा ही। भारती बंधु ने अपने अंदाज में शास्त्रीय संगीत की जमीन तोड़ी है। उनकी सगभग सभी प्रस्तुति में संगीत के वैभव का नजारा साहित्य की गंभीर समझ के साथ है। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने यूं नहीं कहा होगा कि भारती बंधु भारतीय संगीत की नई खोज हैं। यह वह आलोचक है जो खुद कबीर के मर्मज्ञ है। कबीर के अनन्य अध्येता और अनुसंधाता हजारीप्रसाद द्विवेदी से उनकी जो परंपरा बनी वह दूसरी परंपरा की खोज से आगे बढ़कर डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल तक आती हुई आग बढ़ रही है। और कबीर पर जब भारती बंधु बोलते हैं, तो यह आलोचक एकटक देखता रह जाता है (भारती बंधु के हवाले) । बकौल भारती बंधु उन्होंने कबीर का शास्त्रीय अध्ययन नहीं किया है। उन्हें नामवर की भी सलाह थी कि समीक्षकों को पढ़कर मौलिकता आहत होगी। 

कबीर को दुर्लभ अंदाज में तो कुमार गंधर्व ने भी गाया है। और वह संगीत के लिए मील का पत्थर भी है। संगीत के इस मूर्तिभंजक का गायन चुनिंदे श्रोताओं को रिझाता है। लेकिन दुर्लभ कबीर को यानी कबीर के बहुत विरल पहलू या अनदेखे पहलू का उदघाटन जिस अनोखे अंदाज में भारती बंधु करते हैं, वह एक अदभुत संसार हमारे सामने खोलता है। यह भारतीय संगीत के लिए प्रयोग भी हो सकता है और शास्त्रियों के लिए विकार भी। आखिर कबीर को ही इसकी परवाह कहां थी, जो साहेब की बंदगी करनेवाले साधक को होगी। यही कारण है कि कबीर के रस्ते इनके यहां अमीर खुसरो भी धड़ल्ले से पहुंच जाते हैं। राग कल्याण में जब खुसरो की रचना छाप-तिलक सब छीनीको उन्होंने पेश किया तो यह प्रस्तुति यह साबित कर रही थी कि कबीर गायन की भारती बंधु शैली शैलियों का समागम और प्रयोगों के वैभव से समृद्ध है। जहां संगीत का वैविध्य और काव्य वैभव एक साथ है।

अभी पंडित शिवकुमार, वसुंधरा कोमकली, प्रहलादसिंह टिपानिया भी कबीर को गाते हैं। पर कबीर को इस तरह से गाना किसी मर्मज्ञ के लिए ही संभव है। उनको सुनकर आप बरबस कह पड़ेंगे कोई परम विद्वान हो सकता है, कोई संगीत का मर्मज्ञ हो सकता है, पर एक विद्वान गा भी सकता है तो यह भारती बंधु संभव करते हैं। उनका पूरा परिवार कबीरमय है। 45 सालों से वे कबीर को गाते हैं। कबीर पर ही उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की है। बड़ी बात यह नहीं, बड़ी बात यह है कि शास्त्रीय संगीत को जिस खिलंदड़ेपन से वे लोक तक पहुंचाते हैं, वह बड़ी बात है। कबीर से जुड़ा कोई भी उपक्रम लकीर का फकीर नहीं हो सकता। उनकी प्रस्तुति आत्मसात करने लायक है। और यही टिकता है। जो चीज बिकती हैं, वह टिकतीं नहीं। नामवर से लेकर अशोक वाजपेयी तक उन्हें चाहनेवालों में हैं। वाजपेयी ने उनमें कबीर की जीवंतता पाई है। कबीर को जब वे गाते हैं तो जैसे किसी शोधयात्रा में शामिल होने जैसा लगता है।

श्रोताओं में बैठे उपन्यासकार मनमोहन पाठक को बरबस लगने लगा कि कबीर के पद और साखी को सूफियाना फार्मेट में पेश करने का उनका अंदाज बाजारवाद के गिरफ्त में सिसकते भारतीय संगीत के लिए जैसे नया बिहान है। वो कहते हैं उनका संगीत शास्त्रीय संगीत की यात्रा को दीखाता है। जो कबीर अपनी अक्खड़ता और फक्करपना के लिए मशहूर हैं वीर रस की उनकी विरल रचना जो लड़े दीन के हेत सूरा सोई,...” को मिश्र सारंग में पेश किया तो ओज के इस अदभुत रस में श्रोता बरबस झूम उठे। सूरा सोई, सूरा सोई... का बहुआयामी दुहराव ओज और शांत तक श्रोताओं को पहुंचाता है। अहं को तिरोहित कर करुण रस की ओर ले जाने वाली कबीर की रचना मन फूला-फूला फिरे जगत मेंको उन्होंने पहाड़ी राग में पेश किया।

और यह सब हो रहा था शहर के हृदयस्थल रणधीर वर्मा चौक पर। चौक पर दोपहर के तीन बजे तक श्रोताओं की उमड़ी पड़ी भीड़ छंटने का नाम नहीं ले रही थी। पूरे चार घंटे चौक पर शास्त्रीय संगीत में भीड़ यदि बंधी रही तो यह इस बात का सबूत है कि लोकरंजन सिर्फ फूहड़ गीतों और उत्तेजक संगीत से ही नहीं किया जा सकता है। कुर्सी कम पड़ गई, सदर अस्पताल की छत पर श्रोता टिके रहे। यह तो चूके हुए बिकाऊ लोग हैं जिनका तर्क है कि शास्त्रीय संगीत आज नहीं चल सकता। यह उस शहर की बात है जहां संस्कार निर्माण की अल्पवय में ही पैसे का चस्का लग जाता है। यहां भी मल्टीप्लेक्स और माल हैं, अपार्टमेंट के कंक्रीटी जंगल यहां भी हैं, और यहां मुल्क में पहली बार चला शब्द माफिया का तंत्र है। लेकिन भारती बंधु ने कबीर को सूफियाना अंदाज में पूरी मस्त भीड़ को झूमने पर बेबस कर दिया। भारती बंधु की टोली में तबले पर संगत कर रहे थे अनुभव भारती, डफली पर साथ दे रहे थे लक्की भरती तथा मुख्य कोरस में भूषण भारती, दूसरे और तीसरे क्रमशः इरफान खान व नीतेश भारती।

Kabir Bani -"Zara Dheere Dheere Gaadi Haanko" by Bharti Bandhu near Somnath Temple
http://www.youtube.com/watch?v=DfnmoORv0zU

MANN LAGO MERO YAAR FAKIRI MEIN--BY--BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=M_Iooz5RmDI

SAB DIN HOTA NA EK SAMANA BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=2d3t6Es9xJA

CHHAP TILAK BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=QPpPppYRZAA

MANN FULAA FULAA FIIRE JAGAT MEIN BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=rnZrzb83X9s

BHAJAN MEIN LAGE RAHNA BHAI--BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=DMNnsJdux44

MORE RAM GADI WALE PART-II BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=AwMn8AQZGiE

CHUNRI KAHE NA RANGOULI GORI BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=veZbn1iHg3Q

SADHO RE SADHO BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=KAiXDagFpto


 

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

समाजविरोधी विकास की नींव में है राजनीतिक संस्कार

       पल रहा है विकास का कीटनाशक सिद्धांत


सन दो हजार के नवंबर में जब तीन नए राज्य बने तो उनमें से झारखंड शायद एकमात्र राज्य था जहां किसी मुल्क से आजाद होने जैसा उल्लास था और उम्मीदों के पुल कुछ उसी तरह बांधे जा रहे थे जैसे कि भारत में सुराज से बांधे गए थे। उन तीनों मे से उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ का लगभग कायाकल्प हो चुका है। विकास के लिए भारतीय राज्य मे संभव माहौल वहां खड़ा हुआ। और दूसरी तरफ झारखंड में  जनजातीय उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। यदि बिहार मे 900 करोड़ रु का चारा घोटाला था तो झारखंड में मधु कोड़ा का चार हजार करोड़ रु का घोटाला। यहां कोड़ा जैसे दर्जनों नेता पैदा हो गए। यह सब कुछ हो रहा है मांदर की थाप पर। हां, एक विशेष बात यह हुई कि यूपी और मध्य प्रदेश बीमारू प्रदेश में आज भी आदर्श बने हैं, तो बिहार राष्ट्रीय फलक पर विकास और सुशासन के मानक गढ़ रहा है। उसकी प्रशंसा मे विरोधी पार्टियों के नेता भी जी नहीं चुराते। छत्तीसगढ़ भी तो आदिवासी बहुल राज्य था, लेकिन क्या विकास के लिए उसने सामाजिक सौहार्द्र का ताना-बाना छिन्न-भिन्न किया। क्या वहां भी बाहरी-भीतरी का कोई कुरुक्षेक्ष बना ?  इसे कौन नहीं जानता कि असंतोष और वैमनस्य की राजनीति में आसानी तो है, पर यह विकास का कोई रास्ता नहीं दे सकती। झारखंड अलग राज्य बन जाने से किसका कल्याण हुआ ? दलितों को रामराज का ख्वाब दिखानेवाली माया जिस तरह 87 करोड़ रु की निजी संपत्ति की मालकिन हो गई, पर दलितों को दलित नेताओं की प्रतिमा देखने के अलावा क्या हासिल हुआ। झारखंड मे भी निरीह आदिवासियों को अपने संपत्तिशाली सीएम व नेताओं को देखने के अलावे क्या हासिल हुआ। सारे सीएम आदिवासी हुए, पर विकास का जखीरा किनके पास हैं। हमे समझना चाहिए कि जन्म की प्रक्रिया मे ही जीवन के विकास सूत्र निहित होते हैं। बेहद कृत्रिम परिस्थिति मे, एक राजनीतिकि प्रतिशोध के माहौल मे इस झारखंड का जन्म हुआ। कौन नहीं जानता है कि झारखंड पार्टी (जयपाल सिंह) एक जमाने मे कांग्रेस के हाथों बिक गई थी। झारखंड स्वायत्त परिषद (जैक) की सुविधाओं के लिए झारखंड के धुर विरोधी लालू यादव के पीछे शिबू सोरेन और सूरज मंडल (झामुमो) लट्टू हो गए थे, आखिर इसे कौन नहीं जानता ? हम सभी उसके नतीजे को भोग रहे हैं। यहां कोई भी आंदोलन कुछ दिनों तक चलता जरूर है, पर शीघ्र ही शीर्ष पर पहुंचा नेता खरीद-फरोख्त मे शामिल हो जाता है। या तो उसे ही बेच दिया जाता है या फिर वही आंदोलन को बेच डालता है। यहां हमेशा ही एक विजनरी नेता की कमी रही। रामदयाल मुंडा का अध्ययन गहरा हो सकता है, पर मूलवृत्ति तो उनकी भी सूरज मंडल जैसी ही थी। 1992 में एक बार दुमका के ललमटिया में श्री मंडल ने खुलेआम अपने भाषण मे बाहरी लोगों को मारकर भगाने की बात कही थी। लगभग झारखंडी नेता के सुर मिलते रहे हैं। इधर अपनी मौत से कुछ पहले डा. रामदयाल मुंडा की यह मान्यता प्रबल और प्रखर रूप मे सामने आ रही थी कि प्रदेश के विकास के लिए जमीन को बाहरी लोगों के हाथों मे जाने से रोकना होगा। दुर्गा उरांव द्वारा छेड़े गए सीएनटी के इस उफान की पृष्ठभूमि मे इसे देखा जा सकता है। सर्वाधिक विचित्र बात यह है कि जिस बिहारी के विरोध मे सारी मान्यताएं, विचार और आंदोलन पनप रहे हैं, उसी झारखंड को बिहारी सलाहकारों (सुरक्षा-डीएन गौतम, विकास-आरसी सिन्हा) की जरूरत पड़ रही है। हां, यह अलग बात है कि सरकार मे मौजूद अंतर्विरोध से कार्यबल को बल मिलता है और नतीजतन असहयोग का माहौल तैयार होता है। इसी माहौल से आजीज आकर दोनों ही सलाहकार प्रदेश को अलविदा कर दें तो ताज्जुब नहीं। इस मुल्क को जितनी मुश्किल अल्पसंख्यकों को स्वीकार करने मे नहीं हुई, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल झारखंडी नेताओं-मंत्रियों को बाहरियों को स्वीकारने मे हो रही है। नतीजा सारा प्रदेश भुगत रहा है। महाराष्ट्र में बाहरियों पर जब गाज गिरती है तो इसी झारखंड के लोग पानी पी-पीकर राज ठाकरे को कोसते रहते हैं। और जब राजनीति की बारी आती है तो राज उनके रालमाडल बन जाते हैं। राज ठाकरे के कई रूप हैं।

समझौतों के रास्ते चलकर विकसित आंदोलन के नेता आखिर क्या दे सकते हैं सिवाए डोमिसाइल या सीएनटी के ? साठ के दशक में जब विनोद बिहारी महतो की धनबाद कचहरी में वकालत चमक रही थी तो उनका गुमाश्ता कौन था ? बोकारो स्टील प्लांट लगने से विस्थापित हुए लोगों पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था। इन विस्थापितों के मामले (केस) वकील साहब को लाकर कौन दे रहा था ? इसी लेन-देन में अविश्वास के सवाल पर बोकारो से आया एक आदिवासी धनबाद के हीरापुर मे लाठी लेकर उनपर टूट पड़ा था। लहूलुहान वकील साहब के माथे पर वह दाग अमिट रहा, पर झारखंड के चप्पे-चप्पे पर लगी प्रतिमाओं में किसी भी प्रतिमा पर यह दाग नहीं। कोई बता सकता है ऐसा क्यों हुआ। वकील साहब के इस गुमाश्ते को रोज के हिसाब से खाना-खोराकी दी जाती थी, इसका भी हिसाब दर्ज है। कहा जाता है कि वकील साहब के किसी नवाब के पास आज भी वह रिकार्ड है। वकील साहब का वह गुमाश्ता झारखंड ही नहीं देश की आदिवासी राजनीति का हीरो बना हुआ है। विनोद कुमार के उपन्यास समर शेषऔर मनमोहन पाठक के  “गगन घटा घहरानी में इसका कोई जिक्र नहीं। एक मूर्ति गढ़ी गई है, निष्प्राण-सी। जिन विनोद कुमार को पत्रकार हरिवंश की आंखों मे भूरापन दीखता है, उन्हे किन कारणों से यह सब नहीं दीखा। ताज्जुब। यह समझने की बात है। निजी असंतोष-क्षोभ के बुखार से पीड़ित हो उन्होंने एक कहानी ही लिख दी – भूरी आंखें। चर्चित हिंदी पत्रिका 'कथादेश' के 2011 के मीडिया विशेषांक  में यह कहानी छपी थी। सर्जना साधारणीकरण जरूर है, लेकिन दृश्य पर व्यक्तिगत का आरोप नहीं। सर्जना तो व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठाती है। झारखंड बनने पर विजनरी नेताओं की घोर कमी रही। जो नेता थे, उन्हें या तो चाटुकार चाहिए थे या फिर कमजोर दिल-दिमाग वाले भोले नेताओं को घेरने के लिए दलाल स्ट्रीट तैयार थी। यही कारण है कि जिन्हें पूरे राज्य के लिए पूज्य, सम्माननीय, होना चाहिए था, उन्हें एक विधानसभा क्षेत्र मे बेजमीन कर दिया जाता है। कौन नहीं जानता कि इसके पीछे कई विद्रूपताएं, विकृतियां हैं। गुरुजी की यह गलाजत भले एक दिन की नहीं है, पर कीटाणु जो रहता है वही प्रबल होकर आक्रांत करता है।

विकास के लिए विस्थापन और विस्थापन से उठे पुनर्वास के सवालों के साए मे इसकी दूरगामी चिंताएं यदि धूमिल कर दी जाती है तो इसका कारण समझा जा सकता है। कारपोरेट दबाव व प्रलोभन के अपने सियासी समीकरण हैं। तात्कालिक राहत के लिए मुआवजे, नियोजन और पुनर्वास की जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, वह उस दूरगामी चिंता और संकट का हल नहीं हो सकती। विस्थापन से जब एक पूरी नस्ल उजड़ जाती है, भाषा-संस्कृति का तानाबाना गुम हो जाता है, एक पराएपन के आश्रय मे जीवन का हक दिखाया जाता है। सवाल है कि ऐसे में उस समाज को वापस लाया जा सकता है क्या जो अपनी भली-बुरी, छोटी-बड़ी पहचान की रोशनी मे सतत संघर्ष का आधार खोजकर सपने को सच करने मे जुटा रहता है। जिस जंगल से मानव अस्तित्व का सवाल जुड़ा है, क्या उसके रखवाले को उजाड़कर उस जंगल को बचाया जा सकता है। और नहीं तो फिर हरियाली के बिना किस जीवन का ख्वाब है नशीली आंखों मे ? -- क्या झारखंड मे बंजर व गैर-कृषियोग्य भूमि खत्म हो गई जो जंगल काटे जा रहे हैं और बस्तियां उजाड़ी जा रही है ? 38 लाख हेक्टेयर कुल सिंचाई योग्य भूमि होने के बावजूद 1.57 लाख हेक्टेयर यानी 8 प्रतिशत ही भूमि सिंचित है। यहां किस सीएनटी की मेड़ ने पानी को रोक रखा है ? आखिर पलायन कर चुके हजारों-लाखों झारखंडियों को महानगर के जाल में उलझकर कबतक रहने दिया जाएगा। किस सीएनटी के उल्लंघन ने रास्ता रोककर रखा है। जिस दुमका की जमीन पर दिशोम गुरु और बाबूलाल मरांडी अपनी सियासी बिसात बिछाते रहे हैं, आखिर उन्हें उसी प्रमंडल के पाकुड़ और साहिबगंज में वनाधिकार का उल्लंघन क्यों नहीं दीखता। वन माफियाओं ने पहाड़-जंगल काटकर जिस तरह ऐतिहासिक विरासतों को संकट में डाल दिया है वह बड़ा सवाल है, लेकिन इस पर किस का ध्यान है। क्या वन माफिया जब जंगल और पहाड़ काटते हैं तो कोई आदिवासी संकटग्रस्त नहीं हो रहा। आखिर माफिया की गलबांही कौन कर रहा है। वहां जिंदगी बहाल करने के लिएकिस सीएऩटी की जरूरत है।

आप आरएंडआर की पालिसी से एक पीढ़ी के प्रतिरोध को खत्म कर देंगे, पर अस्तित्व की चिंता से जब आगामी पीढ़ियां व्याकुल होंगी, प्रश्नाकुल होंगी और उनकी छटपटाहट किसी सामाजिक-राजनीतिक हिलोर को पैदा करेगी तो क्या राज्य-व्यवस्था उसे संभाल पाएगी। विकास के ये औजार ऐसे है जिनके दुष्प्रभाव तत्काल नहीं दीखते, पर कीटनाशक की तरह आगामी पीढ़ी को निगलते हैं और क्रमशः पूरा समाज इसकी चपेट मे आ जाता है। जिस तरह कीटनाशकों से अस्थमा, जन्मजात विकृतियां, कैंसर, हार्मोन जन्य विकृतियां, तंत्रिका संबंधी गड़बड़िया आदि उत्पन्न होती हैं, उसी तरह विकास के कीटनाशकों का भी अपना असर होता है। झारखंड के मर्म से जुड़े नेताओं का हाल देखिए। राज्य बनने के आठ साल बाद एक आरएंडआर पालिसी बनी भी तो बाद मे आई शिबू सोरेन की सरकार मे शिबू सोरेन ने खुद ही इस पर दुबारा विचार करने के नाम पर इसे ठंडे बस्ते मे डाल दिया।

अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए प्रशासन अमानवीय रुख तो अख्तियार कर सकता है, पर विकास के नाम पर भऱी-पूरी आबादी का विस्थापन भी तो एक अतिक्रमण है। आखिर यहां मानवाधिकार को कौन बहाल कराएगा। कौन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका है जो समाज को सरकारी अतिक्रमण से मुक्ति दिलाएगी। सिमडेगा के ग्लैड्सन डुंगडुंग के खाते-पीते घर के पास तीस एकड़ जमीन थी। बांध के नाम पर गई उसकी सारी जमीन के एवज मे उनके घर को कुल 11 हजार रुपए मिले। यह बस दो दशक पहले की बात है। वन-विभाग की ज्यादतियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई के चक्कर मे उनके माता-पिता की निर्मम हत्या कर दी गई। यदि ग्लैड्सन डुंगडुंग आज खुद के बूते पढ़े-लिखे नहीं होते तो कितनों को राज्य सत्ता का यह सच पता होता ? क्या किसी सरकार के पास या सत्तापोषित किसी संस्था के पास ऐसे ग्लैड्सन डुंगडुंगों का कोई आंकड़ा है ? किस सीएनटी एक्ट ने उन्हे उजड़ने से रोका। उनके अधिकारों की कितनी रक्षा हुई ? यह 33 वर्षीय नामी मानवाधिकार कायकर्ता ग्लैड्सन डुंगडुंग यदि आज झारखंड इंडिजेनस पिपुल्स फोरम का संयोजक, नवजीवन का संस्थापक सचिव, झारखंड ह्यूमन राइट मूवमेंट का महासचिव तथा योजना आयोग की एक उपसमिति का सदस्य है तो यह किसी की कृपा से नहीं। लेकिन सवाल है कि कितनों में ऐसा प्रतिरोध है जो जीवन-मरण के संकट के बीच से अपने को इस रास्ते पर ले चलने का माद्दा पैदा कर पाता है। क्या इतने के बाद भी राज्य का यह विकास किसी समाज के हित में दीखता है या मुट्ठी भर लोगों ने इसे अपनी लुगाई मान रखा है। जिस विकास ने जनहित से मुंह मोड़ रखा है, जिसने जीवन को और भी दुरूह किया है उसे समाजविरोधी ही तो कहा जा सकता है। 

जिन्हें (अखड़ा जैसी संस्थाओं को) झारखंडी भाषाओं को राजकीय दर्जा मिल जाने की खुशी है और यदि उसे वे किसी संघर्ष का परिणाम मान रहे हैं तो यह उनकी भयंकर भूल होगी। राज्य सत्ता की बेहद आसान कुटिल चाल को वे यदि नहीं पढ़ पा रहे हैं तो यह उनका भोलापन है या फिर...जब इस देश में 198 आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के खतरे से जूझ रही हैं तो क्या यह खुशी अपने प्रति प्रतिकूल माहौल (व्यापक तौर पर) बनने देने की स्थिति को छूट देना नहीं है ? अपनी लड़ाई सभी जनजातीय भाषा को लेकर होनी चाहिए।