हमसफर

बुधवार, 21 सितंबर 2011

नीतीश जी आप पाकिस्तान में होते तो बेहतर होता

फेसबुक पर अपनी टिप्पणी के कारण अरुण नारायण के निलंबन पर

देश को नए बिहार से रू ब रू कराने के लिए धन्यवाद, नीतीश जी ! आपका यह बिहार होर्डिंगों व अखबारों में जगरमगर करता है। कौन नहीं जानता कि आउटडोर मीडिया (होर्डिंग, बैनर) व प्रिंट मीडिया (अखबार-पत्रिका) से झल्लाई जनता ने इन होर्डिंगों को किस तरह जलाया। निर्मल ग्राम की धूम जिस प्रदेश में मची हो और प्रधानमंत्री ग्रामसड़क योजना से चप्पे-चप्पे को सड़क से जोड़ने की सुविधा हो गई हो उस बिहार के झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र में कोई आकर बताए कि यह किस प्रदेश में आता है। यहां की लाखों की आबादी सड़क के दोनों ओर मलमुत्र विसर्जित करती है। आप उन इलाकों से गुजर जाएं तो लगेगा कि बहुत बड़ा किला फतह कर लिया आपने। सैकड़ों गांव हैं जहां बारिश में आप किसी भी वाहन से नहीं जा सकते। खरंजा (सिर्फ ईंटों बिछी सड़क को कहते हैं) की जो ईंट बीस साल पहले निकली थी, वहां कोई नई ईंट नहीं लगी, भले ही दस ईंट और भी खाली हो गई। कोई पोल झुकी थी तो वह गिर गई या बिला (लुप्त हो) गई, पर माथे पर तार नहीं टंगा। बिजली को विकास के माथे का सिंदुर कहा जाए तो ऐसे सैकड़ों गांव हैं जो अभी भी विधवा हैं। यहां बिजली क्या, उसके पोल तक नहीं बिछे। और एक बार ट्रांसफार्मर के कारण बिजली गई तो फिर इसकी सुनवाई कहीं नहीं। इस विधान सभा क्षेत्र के विधायक उन्हीं के समनाम डा. नीतीश मिश्रा जी हैं। रामदेव भंडारी वहीं के हैं और दो बार राज्य सभा सदस्य रहे। ऐसे इलाके बिहार में भरे होंगे। चूंकि मैं इस इलाके से आता हूं, तो यहां की जानकारी है।

पटना के नाला रोड में जन समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारियों पर हुआ बर्बरतापूर्ण लाठी प्रहार किसी पटनावासी को भूला नहीं होगा। ठकुरसुहातियों के बीच विजातीय स्वर को बर्दाश्त नहीं कर पाने का लक्षण है यह नीतीश जी। उत्तेजित होना ताकत की निशानी कहीं भी कभी नहीं समझी गई। बीमार, बूढ़ा और कमजोर ही उत्तेजित होते हैं, गाली देते हैं। मारपीट पर उतारू होते हैं। स्वस्थ व्यक्ति तो जवाब देगा। तर्क देगा नीतीश जी।

नीतीश जी अपनी छवि को लेकर कितने चौकन्ने हैं वह तो बाढ़ को लेकर गुजरात सरकार द्वारा बिहार सरकार को भेजी गई राशि के लौटाने से जगजाहिर हो ही चुका है। सरकार मोदी की होती या फिर बाघेला की, राहत तो आनी ही थी। मोदी ने बिहार की जनता को भाजपा के कोष से वह रकम नहीं दी थी। और मोदी ने वह राशि नीतीश जी आपको को नहीं दी थी। अखबार में छपे कटआउट वाले गुजरात के विज्ञापन पर छिड़े चर्चा से घबड़ाकर नीतीश जी आपने यह कदम उठाया था। इसे भी कौन नहीं जानता। क्या यह तानाशाही का एक रूप नहीं।

बिहार सरकार ने विधान परिषद कर्मी अरुण नारायण को जिस आधार पर बगैर कारण बताओ नोटिस के निलंबित किया है, वह राज्य सत्ता की तानाशाही को ही प्रकट करता है। और रही बात फेसबुक पर सरकार और अधिकारी के खिलाफ टिप्पणी करने की बात तो उसे कौन रोक सकता है।

चेकबुक से फेसबुक तक

मैं आता हूं, पहले आरोप पर। मैं अरुण को डेढ़ दशक से जानता हूं जब वह बोरिंग रोड तरफ रहते हुए स्नातक की पढ़ाई करते हुए साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हाथ बंटा रहे थे। समकालीन भारतीय साहित्य व पहल जैसी पत्रिकाओं में मेरी रचनाओं को पढ़कर संपर्क में आए थे। आज के कवि कुमार मुकुल तब होमियोपथी की डाक्टरी कर रहे थे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं पूरे हिंदी संसार में कोई भी सामने आकर कहे कि कभी-भी अपने सामने आए मौके को अरुण ने भुनाया है। एकाध होंगे तो वे निजी खुन्नस पाले लोग ही होंगे। हां, इतना जरूर है कि दिल्ली से लेकर पटना तक दर्जनों लोग होंगे जिन्होंने इस अरुण का इस्तेमाल (शोषण की हद तक) किया। मैं अपने को इससे अलग नहीं मानता। एक दैनिक में फीचर संपादन के क्रम में उन्होंने मेरे दिए कई एसाईनमेंट पूरे किए। मेरा अनुमान है कि हिंदी जगत अरुण को इतना तो जानता ही है।
सुविधा न होने के कारण बगैर किसी पारिश्रमिक के। डाक विभाग की गलती से हमनाम अरुण कुमार का चेकबुक यदि लेखक अरुण नारायण (इसका भी औपचारिक नाम अरुण कुमार ही है) तो डाक वालों का फर्ज क्या होना चाहिए। और मान्यवर अरुण कुमार (सिंह) जी आपने तो आवेदन दिया होगा न चेकबुक के लिए ? चेकबुक नहीं मिल पाने की स्थिति में आपने बैंक से शिकायत की या नहीं ? बैंक ने चेक आने पर क्या किया ? क्या नहीं माना जा सकता है कि सबकुछ साजीशन अरुण नारायण को फंसाने के लिए रचा गया हो। आखिर एक पैसे की भी गलत निकासी जब उस खाते से नहीं हुई तो अरुण कुमार सिंह जी कुछ भी नहीं कर सकते। और बैंक को अरुण नारायण ने अपना हस्ताक्षर करके चेक दिया था। नादान अरुण की गलती सिर्फ यह है कि अपने पते पर आए चेकबुक को अपना मान बैठा बगैर यह देखे कि इस पर किसकी खाता संख्या अंकित है। आखिर फर्जीवाड़ा ही करना होता तो वह अपने हस्ताक्षर से बैंक में चेक क्यों जमा करता ? बैंकिंग विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे मामले में बैंक सिर्फ उस चेक को खारिज करने के और कुछ नहीं कर सकता है। क्या उलट मामला अरुण कुमार सिंह, बैंक, डाक विभाग पर मिलजुलकर साजिश रचने का मामला नहीं बनता है।
रही बात फेसबुक पर विधान परिषद के सभापति और सरकार के खिलाफ असंवैधानिक टिप्पणी की तो सरकारी सेवा आचार संहित के दायरे में पहले तो कारण बताओ नोटिस देनी चाहिए थी। यह ठीक है कि सभापति को विशेषाधिकार प्राप्त है, पर सवाल है कि यह विशेषाधिकार ऐसे ही मामलों के लिए विवेकाधीन है क्या। क्या ेक भी आपराधिक पृष्ठभूमि के विधान पार्षद के मामले में उन्होंने कोई फरमान जारी किया है ?
मिस्र के तहरीर चौक पर छिड़ी जंग फेसबुक की आग थी और वहां की सरकार ने तो अपने सुरक्षा तंत्र तक को फेसबुक के सहारे युवाओं के संपर्क में रहने को कहा था। वित्तीय झंझावात के कारण 2008 से भीषण उथल-पुथल का सामना कर रहे आईस लैंड में इन दिनों संविधान संशोधन की कवायद चल रही है। नीतीश जी, आपको पता ही होगा कि वहां 25 सदस्यीय परिषद के जिम्मे संविधान संशोधन का उपक्रम चल रहा है। इसीके साथ इंटरनेट के जरिए सभी आईसलैंडवासियों को संशोधन की प्रक्रिया में आनलाईन भागीदारी का विकल्प दिया गया है। और शासन का आदेश था कि जून के अंत तक आई वाजिब सलाह को परिषद द्वारा अनुमोदित कर प्रारूप में शामिल कर लिया जाए। लेकिन नीतीश जी आप फेसबुक पर असहमति का धीमा स्वर भी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। क्या मायावती का ‘प्रतिमा’ प्रेम और आपका ‘छवि’ प्रेम कहीं से भी अलग है? हालांकि सबकुछ होते हुए भी मायावती ने अभी तक ऐसा रुख तो नहीं अपनाया है। क्या फेसबुक को फेस नहीं कर पाना आपको कठमुल्लावादी पाक हुकूमत के करीब नहीं ले जाता जहां अभी-अभी लाहौर उच्च न्यायालय ने प्रशासन को फेसबुक पर बंदिश लगाने का आदेश दिया है। फेसबुक समेत वैसे सभी सोशल नेटवर्किंग साईट की पहुंच पर आईटी मंत्रालय को रोक लगाने का फरमान दिया गया है जो मजहबी नफरत फैलाने में शामिल हैं। (मजहबी नफरत को देखिए- फेसबुक पर पैगंबर मोहम्मद की आकृतियों वाली स्पर्द्धा आयोजित करने का आरोप है। याचिकाकर्ता वकील मुहम्मद अजहर का मानना है कि इससे इस्लाम बदनाम होता है) फरमान देनेवाले न्यायाधीश शेख अजमत सईद ने छह अक्तूबर तक इस बाबत रिपोर्ट देने को कहा है। नीतीश जी, बहुत कोसते होंगे आप यहां की व्यवस्था को जिसमें आपको पाकिस्तान जैसी वह आजादी नसीब नहीं। क्या आपको मालूम नहीं कि प्रेमकुमार मणि को लेकर जो भी विवाद हुआ उसने कितनी खिन्नता पैद की है। क्या आप इससे उत्पन्न परिदृश्य से अनजान हैं। कौन सी वजह है कि कोई यह न माने कि मुसाफिर या अरुण के मामले से आप अलग हैं। नीतीश जी राज्य सत्ता की सुविधा है तो आप आक्सीजन के सिलिंडर को आऊट आफ मार्केट कर सकते हैं, पर हवा पर बैन नहीं लगा सकते।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

लेखक भाषा का आदिवासी है, लेकिन उदय प्रकाश जी आप ?

(उदय प्रकाश के ब्लाग पर 22 जुलाई के पोस्ट "लेखक भाषा का आदिवासी है" को पढ़कर लिखा गया। दरअसल यह साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए स्वीकार वक्तव्य था। यह पोस्ट उनके ब्लाग पर 24 अगस्त को किया था।)
पहले तो यह कह दूं कि मैं जिस उदय प्रकाश को जानता हूं वह अबूतर-कबूतर से शुरू होता है, जबकि इससे पहले कविता ‘सुनो कारीगर’ से काफी चर्चित हो चुके थे। और उसके बाद तो तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, मोहनदास, मेंगोसिल, वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ और भी न जाने कहां-कहां किन-किन गलियों और राजमार्ग होते हुए हमारे उदय प्रकाश का सृजन हुआ। हम जिस उदय प्रकाश को जानते हैं वह किसी भी साहित्य अकादमी से ऊपर है। उदय प्रकाश जी आप तो खुद हिंदुस्तान दैनिक के साथ एक साक्षात्कार में कह चुके हैं- आप कैमरा जहां रखते हैं, वहीं से उसका फ्रेम तैयार हो जाता है। तो फिर उस राज्य सत्ता के लिए प्रशंसा के शब्द कैसे निकले जिस राज्यसत्ता को आप भी आततायी मानते हैं। प्रतिबद्धता सिर्फ रचनाओं से ही नहीं दीखाने की चीज नहीं, जीने की चीज है। आखिर अशोक वाजपेयी ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिया जानेवाला सम्मान ठुकराया तो ? यह अलग बहस का विषय हो सकता है कि उन्होंने अपने इस कदम से क्या खारिज किया है और किसे आवाज दी है। पर इतना तो है ही कि संस्कृतिकर्मी अपनी स्वायत्तता खुद ही सिरजता है। ऐसे में व्यावहारिक तौर पर प्रतिबद्धता दीखाने के मौके गंवाना हमारी विचारधारा को ही व्यक्त्त करता है। आपने खुद ही ‘मोहन दास’ को दिए गए सम्मान के लिए अपने वक्तव्य में कहा है - कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता। क्या इस मौके पर औपचारिक वक्तव्य देने के लिए आपकी असमंज और दुविधा का हिस्सा यह भी तो रहा होगा। राज्यसत्ता से नाखुश संस्कृतिकर्मी इससे संरक्षण की अपेक्षा जैसे ही पालता है, वैसे ही संस्कृति की स्वायत्तता का खंडन करता है। गाली भी दें और कहें शाल भी ओढ़ाओ। यह कैसे हो सकता है। इस शासन का यह व्यवहार अचरज का विषय नहीं। आखिर प्रतिरोधी चेतना शासन से सम्मानित भी तो नहीं होगी। चोर से सम्मानित होना कहीं न कहीं चोरी को मंजूरी देने के बराबर ही है। मैं कवि नहीं हूं। इधर कथादेश के जून (2011) अंक में मेरी कुछ कविताएं है। उनमें से एक कविता ‘यह वक्त’ देखना बड़ा मौजूं होगा।

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

तहखाने से

लड़की

जैसे हम अपने तलुए देखते हैं
उसकी जांघें सहलाते हैं
नितम्बों को थपथपाते हैं खुले में
अपने स्तन के घाव का दर्द
उसकी आँखों में दिखना तो दूर
पीठ के खरोंच तक नहीं देख सकती

खुले में यह सोचकर वह सिहर उठती है वह
क्योंकि वह मल्लिका शेरावत और राखी सावन्त नहीं

अपनी पीठ की खरोंच तक देखने के लिए
खिड़की-दरवाजे बना लेती है अंगोपांग को
और आँखें चिपक जाती हैं दसों दिशाओं पर
खतों में कलेजा’ को झोंककर चूल्हे पर रसोई बनाती है
तो धुआँ और चेहरे के बीच
पिघलती बर्फ नहीं दिखती

अपनी नागरिकताओं से वंचित
वह नहीं बोल पाती अपनी जबान
अपनी हँसी नहीं हँस पाती
कब का भूल चुकी है अपना रोना
अकेले में खुद को खटखटाकर
खौफनाक गलियों से गुजरती है वह


माँ की शिक्षा

माँओं ने हमें
क ल म, क म ल और न जाने कितने शब्द
खाने को भूलकर नहाने को टालकर
इसलिए नहीं सिखाये होंगे कि
हम किसी के दिलो-दिमाग में सुराख करें कलम से
कमल से हम किसी मूरत को खरोंचें
और दूध पीकर खून बहाएँ

माँओं ने नहीं सोचा होगा
त्याग और धैर्य, कष्ट और तप से सींचे गये असंख्य शब्द
उसी के शरीर पर कोड़े की तरह पड़ेंगे

अपने खून से सींचे गये, पोसे गये शब्दों को
जब आग में झुलसते देखती होगी माँएं
तो क्या गुजरता होगा, माँएं ही जानती हैं!
पढ़े-लिखे बड़े बच्चों को यह समझ न आएगी

हमारे छुटपन में सिखाये गये शब्द ही हैं
कभी हिजड़े उन्हें ले जाते हैं अपनी गली
उनसे खेलते-ठठाते हैं
तो कभी खद्दरधारी मसखरा करते हैं
उन शब्दों का गला घोंटते हैं
जैसे मूक मजदूरों का बोनस, तनख्वाह हो

माँएं किस तरह अबूझ लगने वाले शब्दों को
हमारे स्मृतिगर्भ में डालती हैं
यह उसके आँसू, हँसी या मौन में छिपा है

चुप्पी की गहराई में तैरते
खुशी की हवा में लहराते
अबूझ शब्दों ने खोली
अपनी अर्थ पेटियाँ
माँओं के सिखाये गये असंख्य शब्द
उनके ही बदन पर कोड़े की तरह बरसते हैं

 माँएं ही हैं जो
आज भी हमें कलम, कमल, प्रेम और न जाने कितने शब्द
खाने में लगी हैं


काबुल से बगदाद

काबुल और बगदाद से खुली गाड़ी
कहाँ रुकेगी
यूएनओ के ढहते गुम्बद से आती है फुसफुसाहट

बहुत भोले हैं वे जिन्हें इस गाड़ी का
धुआँ दूसरे किसी देश के किसी प्रान्त के किसी गाँव में नहीं दिखता
कुली का काम पा जाने के लालच में उस धुएँ का प्रदूषण नहीं दिखता
नहीं जानते कि यह गाड़ी
रेडियो वेव के वेग से चलती है

शायद यह धुआँ ही इतना छा गया कि पार का नजारा
नहीं दिखता कमजोर आँखों को

वे नहीं जानते
कि यह गाड़ी पटरी पर नहीं चलती
इसलिए जितना डर बैंकों के लुट जाने का है
उतनी ही आशंका खेत-खलिहानों के रौंदें जाने की भी है
कभी भी कुचली जा सकती है पेड़ के नीचे चलती पाठशाला
और कभी भी पाँच सितारा होटल मिट्टी के ढेर में बदल सकता है
हारमोनियम और मृदंग पर हाँफते चौता और
रघुपति राघव... कभी भी गुम हो सकते हैं इक्वलाइजर में
और कभी भी जेनिफर लोपेज, ब्रिटनी स्पीयर बनती बालाएँ मिट सकती हैं

खतरा जब एक जैसा हो हर जगह
तो बचने के अलग-अलग रास्ते
और भी खतरनाक हो जाते हैं


यह वक्त


यह वक्त
गोल-मटोल बात कर निकल जाने का नहीं.

यह वक्त
 सभी व्यवस्था में झक-झक सफेद बने रहने का नहीं.

सन्त और नादान बनकर
साहित्य अकादमी बटोरने का भी वक्त नहीं है यह.

ये बहुत नादान चतुर हैं
जो किसी का नाम लेकर बात नहीं करते
किसी पर उंगली उठाकर किसी का निशाना नहीं बनते.

हमारे अभाग्यों और कष्टों का कारण
कौन बतायेगा?

उस पर उंगली उठानी ही होगी
गाली देनी ही होगी.
कालर पकड़ना ही होगा

सिर्फ प्रधानमंत्रियों-मुख्यमंत्रियों को
गाली देना काफी नहीं

हमारे कष्ट और अभाग्यों की शुरुआत
हमारे प्रबन्धक से है, प्रशासक से है
हमारे मुखिया से है, विधायक से है, सांसद से है
हैड मास्टर से है, सम्पादक से है
डाक्टर से, इन्जीनियर से है.
इन्हें कौन कर्मचारी, मतदाता, शिक्षक, पत्रकार, मरीज
गाली देगा?
कौन पकड़ेगा इनकी कालर?
सड़क पर खदेड़ेगा इन्हें कौन?
थानेदारों को जेल में ठूसेगा कौन?
कौन सजा सुनाएगा न्यायाधीशों को?

जब राष्ट्रपति को गाली देना आसान हो जाए
इसका मतलब मुखिया का बेहद ताकतवर हो जाना है

यह वक्त है वही.

कौन सिल रहा है इनकी जबान?
कौन बोल रहा है इनकी जबान से?

हम सभी जिस वक्त के सुअरबाड़े में रहते हैं
वहाँ के गंधाते चरवाहे को ढूँढ़ना होगा.

यह वक्त
जनतंत्र को शौचालय बनानेवालों को
माला से लादने का नहीं है

जनतंत्र के इस सार्वजनिक मूत्रालय में
कोई अपने शब्द पकड़कर
कोई अपने फरमान लेकर
कोई अपनी वर्दी लेकर
तो कोई अपनी लाल बत्ती लेकर
चला आता है मूतने.

नंगे-भूखे मरनेवालों की भाषा वह नहीं
महंगाई-बेकारी से बलात्कृत सपनों
के गर्भपात की वह भाषा नहीं

जिस भाषा में लिखकर कोई
झटक ले जाता है अकादमी
और कोई शिखर सम्मान
उसकी कलम को कौन तोड़ेगा?
जो गूंगों की स्याही सोख रहा है
जो फैला रहा है स्याही उनकी रातों में
जो उनकी जबान से छेड़खानी करता है.

कुर्सी को कुर्सी और लाठी को लाठी
पैरवी को पैरवी और घूस को घूस
हत्या को हत्या और लाल को लाल
नहीं कह सकनेवाली भाषा
कवि की भाषा नहीं,
वह बलात्कारी का स्वांग है.

यह वक्त
स्वांग करने वालों का नहीं
उनके मेकअप खरोंचने का है. 

(देवेंद्र जी, ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद ! ये सभी कविताएं मेरी हैं जो कथादेश के जून 2011 वाले अंक में प्रकाशित हैं। )

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

साख में सुराख !

अन्ना के लिए अब चौकन्नेपन की जरूरत

आंदोलन का खर्च कहां से आया, जांच हो : दिग्विजय सिंह

केवल लोकपाल से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा। - कपिल सिब्बल, केंद्रीय मंत्री
जितनी मर्जी हो लोकपाल बना लो भ्रष्टाचार बिल्कुल ही नहीं समाप्त होगा। जिसने भूख हड़ताल की है चाहे उसे लोकपाल बना दो तो भी कुछ नहीं होगा। - प्रकाश सिंह बादल, पंजाब के मुख्यमंत्री
आखिर संसद में तो आना ही है। - रामपाल यादव, समाजवादी पार्टी सुप्रीमो पुत्र सांसद
क्या हजारे महात्मा गांधी, जेपी या गौतम बुद्ध से भी बड़े हैं, जो राजनेताओं को बुरा बता रहे हैं। केवल राजनेताओं को कोसने से देश का सिस्टम नहीं बदल सकता। - अमर सिंह
भाजपा ने ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे पहले मुहिम छेड़ी थी– राजनाथ सिंह,वरिष्ठ भाजपा नेता
हाल के दिनों में नेताओं के खिलाफ जिस तरह से मुहिम चलाई जा रही है वह लोकतंत्र के खिलाफ है। नेताओं के खिलाफ जो लोग शक का वातावरण बना रहे हैं वह लोकतंत्र का अपमान कर रहे हैं। - आडवाणी
अगर नेता अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभाते तो उन्हें आंदोलन करने की जरूरत नहीं पड़ती – अन्ना

हम बात शुरू करते हैं 10 अप्रैल 2011 को केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के उस बयान से जिसमें उन्होंने बिल पास कराने में भाजपा से पुरजोर सहयोग की अपील की है। उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष सहयोग करता है तो संप्रग सरकार संसद के अगले सत्र में लोकपाल विधेयक पेश करने और पारित करने को तैयार है। संसद के अगले सत्र में लोकपाल विधेयक पारित करने की आडवाणी की मांग पर उन्होंने यह बात कही थी। उन्होंने कहा कि मैं वास्तव में इस सुझाव का स्वागत करता हूं। यदि वह (आडवाणी) अपने सदस्यों को राजी कर लेते हैं तो हमें इसे बिना स्थाई समिति के पास भेजे पारित करने में खुशी होगी। लेकिन किसी मंच से घोषणा करने के बदले यह सुनिश्चित करें कि लोकसभा और राज्यसभा में उनके सदस्य हमारे साथ सहयोग करें। यह उस कांग्रेस का स्वर है जिस कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की सफलता लोकतंत्र के लिए प्राणदायक है, बल्कि उसके लिए अब मसला हो गया है कि अभियान कैसे और क्यों सफल हुआ। आखिर अभियान में हुए खर्च की जांच की मांग क्यों।

लोकपाल विधेयक को नाकाफी माननेवाले मंत्री कपिल सिब्बल वाली सरकार में ही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी यदि भाजपा से उम्मीद करते हैं कि वह बेखटके बिल को पारित कराने में आंख मूंद कर मदद करे तो यह उनका अबोध भोलापन ही होगा कि श्रेय की लड़ाई में वह (भाजपा) सबसे पीछे रहना कबूल ले। यह वही सिब्बल हैं जिन्हें आईटी मंत्री बनने के बाद 2 जी स्कैम में कुछ दीखा ही नहीं, आरोप फिजूल लगे। समिति में उनकी शिरकत एक सियासी एजेंडे को पूरा करने के लिए किया गया नहीं लगता है क्या।
अपनी सदिच्छा जो भाजपा यह बोल कर प्रकट कर रही हो कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम पहले उसी ने शुरू की थी और अन्ना का रुख लोकतंत्र विरोधी और लोकतंत्र के लिए अपमानजनक है। आडवाणी यह इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उनके अनुसार सिर्फ नेता ही लोकतंत्र के वफादार सिपाही हैं और उन्हीं से लोकतंत्र की पहचान है। नेता का अपमान यानी लोकतंत्र का अपमान। क्या जिस अमर सिंह के वे धुर विरोधी हैं उनसे उनका सुर नहीं मिलता जो कहते हैं कि नेताओं को गाली देने से सिस्टम नहीं बदल सकता। यह रुख किस सियासी पार्टी से नहीं मिलता। तुर्रा यह कि कांग्रेस नुकसान की भरपाई इसी भाजपा के सहयोग की बदौलत करने की सोच रही है। सवाल यह है कि वह आडवाणी या भाजपा को नहीं जानते कि वह अन्ना के अभियान के प्रति क्या रुख रखते हैं। वे जानते हैं कि भाजपा मदद को सामने आ नहीं सकती तो क्यों न गेंद उसीके पाले में दे दें। आजमाना जरूरी ही था तो सरकार प्रारूप समिति में भाजपा के जिम्मेवार-समझदार कानूनविदों को जगह तो देकर देखती। आखिर पं. नेहरू ने संघ के श्यामाप्रसाद मुखर्जी को मंत्रिमंडल में रखा था या नहीं। यह अलग बात है कि उसी कांग्रेस पर उन्हें मार डालने के भी आरोप हैं।
समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो पुत्र सांसद अखिलेश यादव हों या राजद सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह, वे इस बिल के संसद में आने का इंतजार कर रहे हैं। जैसे इसे पारित करना और लंबित करना उनके बस में हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तारीक अनवर व नवाब मलिक की खीझ तो फिर भी समझी जा सकती है कि अन्ना मसले पर विचार के लिए बने ग्रुप औफ मिनिस्टर से उनके सुप्रीमो को न सिर्फ इस्तीफा देना पड़ा था, बल्कि नौबत तो सरकार से इस्तीफे की मांग तक आ जाती। सियासी पार्टियों का दावा है कि वे एक अदना सा चुनाव लड़कर दिखा दें। जैसे लोकतंत्र पर भरोसा साबित करने के लिए चुनाव का बिल्ला लगाना जरूरी हो गया है। इस तरह तो सवा अरब की आबादी में लोकतंत्र पर सबसे अधिक भरोसा रखनेवालों में वे 300 करोड़पति और 150 अपराधी सबसे आगे आएंगे जो आज संसद में कुंडली मार कर बैठे हैं। जिस तंत्र ने पूंजीपति-अपराधी को संसद में आसानी से प्रवेश कराया है उस भ्रष्ट चुनाव प्रणाली पर उनका भरोसा उन्हें इतना लाऊड कर रहा है तो आश्चर्य क्या। अन्यथा क्या बिसात कि वे अन्ना को एक वार्ड का भी चुनाव लड़ने को ललकारते। ऐसा लगता है जैसे चुनाव रूपी ब्रह्मा ने रक्तबीजरूपी नेताओं को अमरता का वरदान दे दिया है और उनका खून भी कहीं गिरेगा तो वह सांसद-विधायक ही होगा। आखिर हो भी यही रहा है कि नेता पिता या पति के मर जाने पर पत्नी-पुत्र नेता चुन लिए जाते हैं। क्या वे नहीं जानते कि इस जनतंत्र में लोकप्रियता और चुनावी सामर्थ्य दोनों एक नहीं। जिन लोगों ने कलाम को दुबारा राष्ट्रपति बनने से रोका, उन्हीं की जमात ने शेषण जैसे व्यक्ति के लिए संसद में प्रवेश सपना कर दिया। क्या वे नहीं जानते कि करोड़ों दिलों पर राज करनेवाले सचिन किसी क्षेत्र विशेष से अपने दम पर कोई चुनाव शायद ही जीत पाएं जब तक कि इस राजनीति को वे गवारा न हों। क्या इस बिना पर उनकी हैसियत घट जाएगी। किसी टुच्चे नेता से भी वे गए-बीते हो जाएंगे। क्या 150 अपराधी-300 करोड़पति को संसद में पनाह देनेवाली यही राजनीति यदि चरित्र-साधना, अभियानी जुनून की हिफाजत का पैमाना इस चुनाव को बनाएगी। क्या वे बताएंगे कि इस चुनावी पैमाने पर कितने पद्म सम्मान और भारत रत्न दिए जाते हैं।
अभियान को व्यर्थ बतानेवाले यह बखूबी जानते हैं कि एकबार अन्ना अपने मुहिम में सफल हो गए तो पब्लिक उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी। ऐसे में सुर्खाब के इस पर को उड़ने के पहले ही कतर दिया जाना चाहिए। यही कारण है कि विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए होनेवाली चर्चा की रिकार्डिंग के प्रस्ताव का विरोध किया गया है।
तात्कालिक सरोकारों में लिपटी सत्ता की राजनीति को इसका अंदाजा नहीं कि अन्ना को जनतंत्र के लिए नया खलनायक साबित करने की कोशिश उन्हें कितनी महंगी पड़ सकती है। अपने निकम्मेपन और सड़ांध को छिपाने के लिए की जा रही मरहमपट्टी और भी सड़ांध बढ़ाएगी। लेकिन यह जरूरी होगा कि अन्ना अभियान से लोगों को जोड़ने में सतर्कता बरतें और जवाबी वार से बचें। अन्यथा न जाने वाकपटु नेता किस शब्दजाल में उन्हें उलझाकर अभियान को मोड़ने या डाइल्यूट करने का काम करने लगें।
भ्रष्ट नेता, मंत्री, अधिकारी को फांसी पर चढ़ाए जाने की बात जिन्हें कड़वी लगी उनमें कोई नेता अकेले नहीं। योग गुरू स्वामी रामदेव को भी कम मिर्ची नहीं लगी। उन्हें लग रहा कि कालेधन की देश में वापसी और भ्रष्टाचार को लेकर उनका देश भर में छेड़ा गया अभियान फिस्स कर गया। करोड़ों भक्तों और योग विश्वासियों को उन्होंने अपनी जेब का सिक्का मान लिया था तभी तो उन्हें यह मुगालता हो गया था कि अब वे मुल्क पर छा जानेवाली पार्टी बनाकर सत्ता पर दुग्धधवल छवि के लोगों को बिठा देंगे। योग को लेकर जुटे सारे भक्त जैसे उनकी जेब के सिक्का हों बस उस जेब से इस जेब में डालना भर है। उन्हें यह समझना चाहिए कि लाखों की भीड़ एकत्र करनेवाले रामदेव ऐसा मंजर क्यों पैदा नहीं कर सके। स्वामीजी, दरअसल अपने शिविरों व दवा दुकानों में जानेवाले बीमार श्रद्धालुओं से कालेधन व भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का संकल्प पत्र भरवा लेने से आंदोलन नहीं हो जाता। जिस योग को कहा जाता है कि यह चित्त-वृत्तियों का निरोध है (योगश्चित्तवृत्ति निरोधः- पतंजलि सूत्र) क्या उन्होंने सूत्र को इसी रूप में रहने दिया है? क्या सार्वजनिक स्थलों पर योग का प्रदर्शन कर वे भीड़ को ध्यान की ओर अग्रसर कर पा रहे हैं या यह काम वह अपनी सीडी से कर-करवा रहे हैं। क्या योग आसक्ति और लिप्तताएं पैदा करता है ! अपनी उम्र का सारा हिस्सा जिस किरण बेदी ने निर्लिप्त – निष्काम भाव से बेहद मर्यादित ढंग से जिम्मेवारियां निभाने में बिताया, कहीं भी कोई लस्ट नहीं रहा, न ही दिखा, उस किरण बेदी तक को असंतोष से भर भटकाने का प्रयास किया उन्होंने। लेकिन जब योगबाबा रामदेव उनसे प्रारूप समिति में शामिल नहीं किए जाने की कैफियत मांगते हैं तो क्या इसे उनमें आसक्ति-असंतोष-क्षोभ की किरण जगाने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। साफ शब्दों में क्या नहीं कहें कि जो किरण उनके प्रति भी श्रद्धावान रहीं, उनकी नजर में उस श्रद्धा को खोने का काम नहीं कर रहे। यह तो उन किरण बेदी की श्रेष्ठता है कि उन्होंने कहा कि समिति में कौन शामिल होगा, नहीं होगा यह उनका मसला नहीं। यह तय करनेवाली वह कोई नहीं होतीं। उनका मकसद तो सिर्फ अभियान को मुकाम तक ले जाने का था, उसमें वह लगी रहीं। और काम उसी दिशा में हो रहा है। बाबा कहते हैं कि 121 करोड़ लोगों की श्रद्धा का सवाल है यह। जिस भ्रष्टाचार ने समाज में जड़ जमा ली है उस समस्या को बाबा कहते हैं कि यह सोशल प्राब्लम नहीं, पालिटिकल प्राब्लम है। क्या उनका इशारा इस ओर तो नहीं कि स्वैच्छिक संस्थाओं को इससे दूर रखा जाए। 
जो हवा बन रही है वह अन्ना की राह में नए झंझावात पैदा करने की कोशिश करनेवाली है। वे नहीं जानते कि क्षुद्र और टुच्चे तात्कालिक कारणों से अभियान में शामिल लोगों में यदि फूट डालने की कोशिश हुई तो संसद में बैठे 300 से अधिक करोड़पति और 150 से अधिक आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग क्या इसे आसानी से पचा लेंगे ? जो संविधान इतनी जटिलताओ को पोषित कर रहा है, उसके लिए बनी संविधान सभा का स्वरूप देखेंगे तो आपको आज की स्थिति का हस्र समझ में आ जाएगा। यह सभा उन प्रान्तीय विधानमंडल के सदस्यों से बनी थी, जिनका चुनाव देश की कुल वयस्क आबादी के मात्र 11.5 प्रतिशत हिस्से से बने निर्वाचक मण्डल से हुआ था। मुट्ठी भर चुने गये प्रतिनिधियों को छोड़ बाकी समृद्ध सामंतों-कुलीनों के नुमाइंदे थे। इनमें चुने गये नुमाइंदों के अलावे उसमें राजाओं-नवाबों के चुने गए नुमाइंदे भी थे। हमें तभी सोचना चाहिए था कि वे कैसा संविधान बनाएंगे। क्या आज की संसद इससे अलग है? क्या एक बार फिर संविधान पर  गौर करने का वक्त नहीं आ गया है। यह साबित करना होगा कि यह लड़ाई का एक अध्याय है पूरी किताब बाकी है। आमूल बदलाव की लड़ाई जब कभी भी होती है तो यथास्थितिवादियों के लिए यह बेहद असुविधाजनक वक्त होता है। जिस तरह शोषण बढ़ने पर सामंतों के प्रति क्षोभ-असंतोष को बड़े फलक पर संघनित-एकत्र होने का अवसर लाता है, कुछ उसी तरह बदलाव का प्रहार जितना कठोर होगा यथास्थितिवादियों में एकजुट होने की विकलता भी उतनी ही अधिक होगी। अपनी हैसियत और औकात को छोड़ अवाम के साथ होना उनके लिए आसान नहीं। यह शत्रु वर्ग को चिह्नित कर अभियान को जारी रखने का वक्त है और कठोर वक्त है। एक तरह से सत्ता पक्ष, विपक्ष सभी अपनी एकजुटता से अन्ना हजारो को मुगालते पालने से दूर रह अगली रणनीति बनाने को मजबूर कर रहे हैं।

अथ मुख्य आर्थिक सलाहकारोवाच -

अब थोड़ा हाकिमों के हलके में झांककर देख लेना दिलचस्प होगा कि उनपर क्या लोट रहा है। वे किस तरह इस अभियान को अभी से नाकाम करने की जुगत भिड़ाने में लगे हैं। वे बड़े ही साजिशन सोचते हैं कि आप निर्णय ही नहीं लेंगे तो गलती की संभावनाएं नहीं होगी। उनका मानना है कि आरटीआई और लोकपाल को प्रभावी बनाने के लिए व्यापक पैमाने पर प्रशासनिक सुधार को अंजाम देकर ही भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु घूस को संस्थागत रूप देने की सलाह देते हैं। पिछले दिनों बिजनेस स्टैंडर्ड के साथ एक बातचीत में उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार संबधी कानूनों में उत्पीड़न के जरिए ली जानेवाली रिश्वत तथा प्रणालीगत रिश्वत में अंतर किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि आम नागरिकों को वैधानिक सेवा के एवज में ली गई रिश्वत ही उत्पीड़न वाली रिश्वत है। ये बातें तब सामने आ रही हैं जब अन्ना हजारे का अभियान अपने चरम पर है।
उन्होंने उदाहरण से इसे और स्पष्ट किया – देश के अनेक नागरिकों को ड्राइविंग लाइसेंस के लिए रिश्वत देनी होती है। यह रिश्वत नहीं देने पर भी लाइसेंस मिलेगा तो जरूर, पर अनावश्यक विलंब से। ऐसे मामले में कानून की प्रवर्तक संस्थाओं को श्री बसु की सलाह है कि रिश्वत देनेवाले को आरोपी के रूप में नहीं देखना चाहिए। इस बाबत उपचारात्मक उपायों पर विचार करना चाहिए। सिर्फ प्रणालीगत रिश्वत के मामलों में ही रिश्वत लेने और देनेवालों को आरोपी बनाना चाहिए। क्योंकि ऐसी रिश्वत से व्यवस्था को तोड़ने-मरोड़ने और वित्तीय अनुग्रह हासिल करने की कोशिश की जाती है। 

गुरुवार, 31 मार्च 2011

कितनों की बलि चाहिए मनरेगा ?

रामदेव विश्वबंधु


(दलित विमर्श, पंचायती राज व चुनाव सुधार के लिए फकीराना अंदाज में यायावर बने फिरनेवाले रामदेव जी लगातार अपने निजी जीवन को असहाय करने में लगे हैं। देश भर में घूम-घूम कर मंचों-अभियानों में शिरकत से उनका जी नहीं भरता। फिलहाल विश्वबंधु ग्राम स्वराज अभियान के प्रदेश संयोजन का भार संभालते हैं। किसी विषय पर बुलवाने के लिए आपका एक आग्रह काफी होगा, पर सालों रटते रहने पर एक पन्ना भी वे लिखकर नहीं देनेवाले। पलामू में नरेगा के सोशल आडिट के फलस्वरूप ग्राम स्वराज अभियान के कार्यकर्ता नियामत को उस नेक्सस की बलि चढ़ जानी पड़ी जो तंत्र पोषित है। इस पर लिखने के लिए माडरेटर के अड़ जाने पर उनके सामने कोई विकल्प नहीं था। हालांकि यह राइट अप मेल पर पांच मार्च 2011 को ही हाजिर था। अब जाकर यह तय हुआ कि इसे समधर्मियों को शेयर कने दिया जाए। यह आलेख आत्महंता को मिलने के बाद नौ मार्च को प्रभात खबर में छपा। टिप्पणी आमंत्रित है।)

आखिर कितने लोगों की बलि लेकर मनरेगा अपनी मंजिल पहुंचेगा। मजदूरी मांगने पर मजबूरों की पिटाई होती है। देर से मजदूरी के भुगतान के सवाल पर कभी-कभी मजदूर को आत्मदाह करना होता है। सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया जो मनरेगा को जवाबदेह और पारदर्शी बनाती है, इस प्रक्रिया से भी बिचौलियों-ठेकेदारों का मीटर उठता है। अधिकारियों-कर्मचारियों के कान खड़े हो जाते हैं। जमीनी कार्यकर्ता जो ग्रामीणों को योजनाओं की जानकारी एवं कानूनी बात बताते हैं, उन्हें ठेकेदारों द्वारा कहा जाता है कि ये लोग बरगला रहे हैं। इनकी भाषा में यह बरगलाना है तो हमारी भाषा में जन जागरूकता और जन शिक्षण।

शोषण-दमन, भ्रष्टाचार और सरकारी अनियमितता को उजागर करने पर इस दस वर्षीय राज्य में लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। ग्राम स्वराज अभियान और प्रो. ज्यां द्रेज के सहयोगी रहे ललित मेहता की 14 मई 2006 को बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। ठीक यही हस्र हुआ लातेहार जिला के मनिका प्रखंड के जेरुवा के नियामत का। ग्राम स्वराज अभियान के जमीनी और समर्पित कार्यकर्ता भूखन-नियामत की जोड़ी में से एक नियामत अंसारी को मार्च 2011 की शाम नक्सली उनके गांव से उठाकर ले गए और बेरहमी से पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। यह घटना अचानक नहीं घटी। तीन साल पहले से ही ठेकेदारों और नक्सलियों की ओर से जान से मार देने की धमकी दी जा रही थी। 16 अक्टूबर 2008 को भी उन्हें घेरा गया था। 2 साल पहले वन विभाग ने भूखन-नियामत पर झूठा मुकदमा कर दिया था। इससे उन्हें एक सप्ताह जेल में ही रहना पड़ा था। पिछले साल अगस्त माह में नक्सलियों ने भूखन-नियामत के घरों पर ताला जड़ दिया था। कई बार इन दोनों को धमकी मिली थी। कई बार भागकर जान बचानी पड़ी। सरकार और पूरे प्रशासनिक हलके को इसकी जानकारी है, परंतु कोई कार्रवाई नहीं की गई। दरअसल माफिया, ठेकेदार, अधिकारियों और नक्सलियों का गठजोड़ सरकार के नियंत्रण से बाहर है। वे जो चाहते हैं, वही होता है।

सवाल यह उठता है कि भ्रष्टाचार, शोषण और अनियमितता के खिलाफ कौन बोलेगा। जो बोलता है उसे मौत की नींद सुला दी जाती है। ग्राम स्वराज अभियान के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर मनरेगा लागू करने और सामाजिक सिुरक्षा योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण आदि काम करते रहते हैं। यही बिचौलियों, ठेकेदारों को नागवार गुजरता है। पिछले साल से ही धमकी देनेवाले ठेकेदारों के नाम प्रशासन को बता दिया गया था, परंतु अंत-अंत कर कार्रवाई नहीं हुई थी। नियामत के रिश्तेदार की ओर से की गई प्राथमिकी में नामजद अभियुक्तों में अबतक सिर्फ एक ही अभियुक्त की गिरफ्तारी हुई है। अब यह जगजाहिर हो रहा है कि नक्सली भी ठेकेदारों से लेवी लेकर उस हिसाब से काम करते हैं। आखिर नक्सलियों का सिद्धांत क्या है, वे क्या चाहते हैं ? ठेकेदारों-बिचौलियों का राज या कानून का राज ?  गरीब, ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता अपने गांव के लोगों को शिक्षित करता है। योजनाओं को विधिवत लागू करने का प्रशिक्षण देता है। उसे पैसे लेकर उठा लिया जाता है। एक तरह से नक्सली भी एक तरह के ठेकेदार ही हो गए हैं। यह ठीक है कि पलामू प्रमंडल में नक्सलियों के कई ग्रुप हैं। वे आपस के जानी दुश्मन हैं। पैसे के खेल और बंदरबांट ने सभी को अपने आगोश में ले लिया है। आखिर अब कौन सा मुंह लेकर जनता के बीच जाएंगे ? फ्रांसिस इंदवार और बिहार में मारे गए टेटे का कसूर क्या था ? आनेवाले दिनों में नक्सलियों को इन सवालों से दो-चार होना होगा। नियामत का कसूर क्या था? यदि कसूर था तो उसे जनता के सामने लाया क्यूं नहीं? नियामत की हत्या लोकतंत्र की हत्या है। विकास, अमन पसंद करनेवालों की ख्वाहिश ही हत्या है। सरकार को, प्रशासन को जवाब देना होगा। जनता को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। शायद यदि हूल (क्रांति) हो तो ये ठेकेदार बने नक्सली क्या करेंगे? इस हत्या ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने की कोशिश है। शासन-प्रशासन यह जान ले कि ग्राम स्वराज अभियान के और भी कार्यकर्ता शहीदी जत्थे में शामिल होने को तैयार हैं। सूची भी दी जा सकती है।

(यह ठीक है कि नियामत जैसे लोग जनतंत्र की ताकत हैं तो नक्सलवाद भी तो जनतंत्र विरोधी नहीं है। व्यवस्था विरोध का मतलब कतई जनतंत्र विरोध से नहीं लेना चाहिए। जहां तक नियामत जैसे निरीह-भोले सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या से उजागर हुई दुरभिसंधि का सवाल है तो यह नक्सलवाद में आए भटकाव का संकेत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह भटकाव नक्सलवाद का अंदरूनी संकट है और वहां भी इस पर शिद्दत से कामरेड सोच रहे हैं। अंतर्विरोधों से नहीं उबरने पर छोटा घाव भी कैंसर बन सकता है, इसे हमारे कामरेड बखूबी समझते हैं। इस नाते पूरे नकस्लवादी आंदोलन को कठघरे में नहीं लिया जा सकता है। -मोडरेटर)

लेखक से r_vishwabandhu@yahoo.co.in तथा 09334363559 पर जाकर संपर्क साधा जा सकता है।

वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता में जन की हैसियत

पुष्पराज

(एक हैं पुष्पराज। जेएनयू में प्रो. रह चुके प्रो. ईश्वरी प्रसाद की उधारी से कहें तो घुमंतू पत्रकार। कुलदीप नैयर उन्हें प्रतिबद्धता और साहस से भरा मानते हैं तो प्रभाष जोशी उन्हें पत्रकारिता को सामाजिक बदलाव की दुधारी तलवार माननेवाले पत्रकारों की खत्म हो रही प्रजाति मानते थे। नामवर उन्हें खबरों के संसार का अपना संजय घोषित कर चुके हैं। हां, भारतीय पत्रकारिता में तेवर और तमीज, धार और धारा को जिंदा रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं पुष्पराज। कहना नहीं होगा कि पत्रकारिता की जिस मिशनरी धार को मठाधीशी सरोकारों या सत्ताओं को साधने में खत्म किया जा रहा है, पुष्पराज उसके झंडाबरदार हैं। सिंगुर-नंदीग्राम को जीने-भोगने के बाद नंदीग्राम डायरी नाम से एक किताब भी पेगुइन बुक्स से आ चुकी है। काफी चर्चा में रही। दंडकारण्य से लेकर नंदीग्राम और सिंगूर से लेकर मड़वन (मुजफ्फपुर का वह गांव जहां एस्बेस्टस कारखाने के विरोध में आंदोलन उठा) तक में उन्हें आप पा सकते हैं। वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता की सीमाएं हैं, पर सहुलियतें और खूबियां भी हैं। हमें सरोकारों को ऊपर रखकर माध्यम की सहुलियतों व खूबियों से ही वास्ता रखना (रणनीतिक तौर पर) चाहिए। कई बार गरमागरम बहस हो चुकी है उनसे। किसी सिलसिलें में साल 2009 में कुछ दिनों के लिए हम जमिंदोज थे, तब भी। इत्तफाक क्या कहिए कि डीवीसी घोटाला का कंटेंट भी हमारी बहसों-मुबाहसों के जिक्र में था। और देखता हूं कि इसके कुछ ही दिन बाद मियां खरामां-खरामां हाजिर हैं परदफाश डाट काम लेकर। मेरे लिए चकित और खुश होने के अवसर से ज्यादा यह सोचने का मौका है। मैं चाहूंगा कि हमारे साथी उनकी इस नई पेशकश को देखें और टिप्पणी दें- )

सवाल यह है कि पैदल भारत की पत्रकारिता करनेवाले एक कलम मजदूर को वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता जैसे चमत्कृत (चमत्कारी) विषय पर किस तरह सोचना चाहिए। जिस इलाके से आप दूर रहते हैं, उसके बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। हमने वर्चुअल माध्यम को कल तक इंटरनेट की धमनियों से होकर प्रकट होनेवाली वेबपत्रकारिता की तरह देखा है। हिंदी में ‘वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता’ के कई अर्थ सामने आए हैं। काल्पनिक यथार्थ की पत्रकारिता, करीब-करीब लगभग वैसा ही जैसा वर्णित, परंतु पूर्णतः नहीं की पत्रकारिता। एक युवा पत्रकार ने आभासी दुनिया की पत्रकारिता कहा। आग का एक गोला देखने में अग्निपुंज, हाथ में लिया तो कुछ भी नहीं। खुशबू का एक टुकड़ा, उठाया तो कुछ भी नहीं। पानी से भरा घड़ा, प्यास बढ़ी तो न ही घड़ा, न ही पानी। इस विषय के वास्तविक अर्थ के अनुकूल ही मैंने इसे शुरू से देखा है।

मैं अपने विषय से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए यदा-कदा इंटरनेट का उपयोग जरूर कर रहा हूं, पर मेरे पास 15 वर्षों की पत्रकारिता से इतनी कमाई संचित नहीं हो पाई कि मैं एक कंप्यूटर खरीद सकूं। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि मेरे पास कंप्यूटर उपलब्ध हो जाए तब भी मैं इस माध्यम से अपने देश के सबसे कमजोर के हक में कुछ भी नहीं कर पाऊंगा। बाजार में उपलब्ध साइबर कैफे के भरोसे काम करना बहुत खर्चीला है। एक घंटा इंटरनेट उपयोग करने का खर्च एक वक्त का भोजन या आधा लीटर दूध के बराबर है। बहुत ही मुश्किल से अपने लिए छपने की जगह ले पाना, बहुत कम पैसे में जीवन जीने की जतन करने वाला हिंदी का एक कलम मजदूर अपना पेट काटकर इंटरनेट सेवा तो प्राप्त नहीं करेगा ना। जो मेरे लिए युक्तिसंगत नहीं है, उस माध्यम से आप देश के आम जन की पत्रकारिता का दावा किस तरह कर सकते हैं। इस माध्यम से एक खास वर्ग का इंटरटेनमेंट हो सकता है, जनहित की पत्रकारिता कतई नहीं।
2009 के मई माह में मैंने केंद्र सरकार के एक प्रतिष्ठित मंत्रालय की देखरेख में, देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने की शिरकत से हुए घोटाले के विरुद्ध ‘परदाफाश डाट ब्लागस्पाट’ नामक एक ब्लाग मित्रों की मदद से बनाया। हमारी समझ थी कि देश की मुख्यधारा की मीडिया जिस मुद्दे को अछूत मान रही है, एक ब्लाग के रूप में प्रकट होने से मुद्दा अपना रास्ता ले लेगा। इस ब्लाग का अंग्रेजी रूपांतरण स्कैम डाट काम के नाम से आया। हिंदी ब्लाग पर मुश्किल से 20 पाठकों की प्रतिक्रिया आई। भारतीय ब्लागरों की दुनिया में लगभग सभी बड़े सरताजों के पास ईमेल लिक मेल भेजे गए थे। इनमें कई मीडिया प्रतिष्ठानों के रायबहादुर भी थे। परदाफाश ब्लाग के सामने आने से परदा नहीं उठा। 5 हजार करोड़ की भ्रष्टाचारिणी दुल्हन परदे के भीतर ही रह गई। हमने हार नहीं मान ली। यह एक अनुभव था। भारतीय ब्लागरों के मुद्दे अलग हैं। वे सब बुद्धिजीवी हैं, पर अपनी सुविधा के विवेक से अपने किस्म की बहसें छेड़ते हैं। हम मानते हैं, जितना समय, शक्ति, भरोसा हमने ब्लाग पर खर्च किया, इतने में हम हजार पुस्तिका तो जरूर छापकर बांट सकते थे। हम पर्चा बांटकर भी हजारों लोगों से संवाद कर सकते थे।
जिस माध्यम से अपनी बात रखते हुए आप मूल्य, नीति-नैतिकता और जन की उपेक्षा करते हैं, उस माध्यम के बारे में मगजमारी का नतीजा क्या होगा। पहली बार एक अंग्रेजी अखबार के वेबसाईट पर अपनी तस्वीर, अपनी लिखाई को देखकर मैं भी चकित हुआ था। लेकिन अपने लिखे को सीसे पर चमकते हुए रंगीन छटाओं में देखने का लुत्फ किस तरह की आत्ममुग्धता है। इस माध्यम ने लिखने वालों को लिखने के लिए कागज, कलम-स्याही के मूल रिश्ते से अलग करने की कोशिश की है। हम यंत्र के साथ एकाकार होकर यांत्रिक हो सकते हैं, मानवीय कदापि नहीं। यांत्रिक मानस का विवेक साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता के एक-एक आइकान को खारिज करने में लगे तो क्या यंत्र अपनी सुविधा के नए आइकान तैयार कर लेगा।
ब्लाग-वेबसाइट की दुनिया के कर्ताधर्ता इस माध्यम को प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के समानांतर वैकल्पिक मीडिया की तरह पेश कर रहे हैं। दावों के अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन जिस माध्यम को समूह नहीं व्यक्ति संचालित करता है, उसमें व्यक्ति के निजी स्वार्थ, व्यक्तिगत कुंठा, अपनी आकाक्षाएं ज्यादा प्रबल हो जाती हैं। मानवीय गरिमा की छाती पर प्रोफेशनल यश का भूत सवार होना घातक है। हिंदी के ज्यादातर ब्लाग यशोकामियों के, यशाखेट के अड्डे साबित हो रहे हैं। कुछ ब्लागों ने भारतीय पत्रकारिता के आईकान प्रभाष जोशी के खिलाफ हजार-हजार बार ब्राह्मण-ब्राह्मण का शोर मचाया। ब्राह्मण की कोख से पैदा होना अगर अपराध था तो क्या उन्हें इस अपराधबोध में आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी। किसी भी भारतीय नागरिक को जाति सूचक संज्ञा से संबोधित करना सभ्य भारतीय समाज की परंपरा नहीं नहीं हो सकती तो भारतीय अपराध संहिता में संवैधानिक अपराध है। दरअसल वर्चुअल स्पेस में इतनी सहूलियत है कि आप झांककर देख लीजिये कोई बीमार तड़प रहा है और उसकी असहाय स्थिति में हाथ लगाये बिना, उन्ही हाथो से कोई मेल चस्पां कर दीजिए। .ऐसे में वर्चुअल स्पेस से फैलते अमानुषिक संस्कृति पर बहस भी ठीकाने नहीं लग सकती। नामवर सिंह महान या घंटा... की वोटिंग कराई गई। घंटा का देशज मतलब घंटी नहीं, शरीर का खास हिस्सा है, जिसे हूबहू लिखना इस समय असंगत होगा। एक ब्लागर ने एक विद्रोही कवि को नीचा दिखाने के लिए लिखा - वे पहले गोली दागते थे, अब मूत रहे हैं। ब्लागरों ने पत्रकारिता और साहित्य के आईकानों को गालियां देकर चर्चा में आने की खूब कोशिशें कीं। नामे-नाम कि कुनामे नाम, ऐसे ब्लागरों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई नहीं होने से वे ज्यादा ताकत से गंदगी फैलाते रहे।
ब्लागरों की भीड़ में कुछ ब्लाग ऐसे भी हैं, जिनसे पत्रकारिता की दुनिया की अंतर्कथाएं बाहर आ रही हैं। भड़ास4मीडिया मीडिया महकमे की खबर के लिए लोकप्रिय हुआ है। ब्वाइस आफ जर्नलिस्ट की भूमिका सकारात्मक है। स्टार पत्रकार पुण्यप्रकाश वाजपेयी और जाने-माने कथाकार उदय प्रकाश का ब्लाग सम्मान के साथ पढ़ा जा रहा है। पूंजी घरानों की पूंजी से नियंत्रित मीडिया ने जिस सत्य को दबाने की कोशिश की है, उसे इस वर्चुअल स्पेस से कहने की कोशिश तब सार्थक हो सकती है, जब भारत का हर आदमी साक्षर हो जाए। हर साक्षर गरीबी रेखा से ऊपर उठ चुका हो। हर भारतीय नागरिक के पास अपने हिस्से का स्पेस, वर्चुअल दुनिया में उतना ही उपलब्ध हो, जितना कि मीडिया घोषित किसी महानायक अमिताभ बच्चन के लिए। क्या इस मायावी लोक में सबसे अंतिम आदमी और सबसे अगले आदमी के कद को एक तरह देखने की कोशिश कभी की जाएगी ?

शनिवार, 19 मार्च 2011

अस्मिताएं विलीन हो जाएंगी और बचेगा सिर्फ जीवन

ग्लोबल हो रही दुनिया में बाजार एमएनसी से पटते जा रहे हैं तो दूसरी ओर सहुलियत के जाल में लिपटे बाजार की नई-नई मोहक-हसीन अधीनताएं अस्मिताओं को निगलती जा रही है। बड़ी अर्थव्यवस्थाएं विकासशीलों को इस कदर लाचार कर दे रही हैं कि उनकी अस्मिताएं खुद ब खुद विलीन होती जाएंगी। बाजार के प्रभुत्व के सामने शेष सारे नीति-सिद्धांत क्षणभंगुर होते जा रहे हैं या उसके फार्मेट को तय कर रहे हैं। यह एक स्थिति है जो कुछ दिनों तक ही कायम रहनेवाली। लेकिन इस अवधि को ही जीवन का विस्तार माननेवाले यह भूल करेंगे कि बाजार को जीवन की नियति मान अपनी दिशा बदल लें।

भारत जैसे मुल्क में स्थिति दूसरी तरह से बदल रही है। राष्ट्र, धर्म-अध्यात्म, इतिहास, संस्कृति के प्रति बहुसंख्यकों के सहज अनुराग दुराग्रह में बदल जाएंगे। वे सारे अनुराग आजादी के बाद चुनावी रौ में क्रमशः पाखंड में बदलते जा रहे हैं, तो अल्पसंख्यकों में कट्टरता कवच बनती जा रही है। पाखंड पहले खुद के प्रति क्रूर और हिंस्र (तप-व्रत) बनाता है फिर वह समय-समाज के प्रति अनुत्तरदायी (संघ-मठ) बनाकर उसका अनिष्ट करने को तत्पर करता है। दूसरी ओर कट्टरता पहले समय-समाज के प्रति अनुत्तरदायित्व बनाकर (राष्ट्र नहीं, धर्म सर्वोपरि) फिर अंततः खुद का अनिष्ट (फिदायीन) करने को लालायित-प्रेरित-उत्साहित करती है।

आखिर ऐसा क्या है जो बाबरी मस्जिद को तोड़कर मिल जाएगा और ताजमहल कैसे इस मुल्क की अस्मिता पर चार चांद लगाता रहा है ? बाबरी मस्जिद को किसी भी कीमत पर हासिल करने की जिद पाले भक्तजनों में से कौन यह बताएगा कि ताजमहल को देखकर वह बर्बर हाथ क्यों नहीं दीखता जो हजारों अद्भुत कारीगरों के खून से सना है। आखिर यह किस कला के प्रति कैसा अऩुराग था जो प्रेम के आगोश में जाकर खूनी हो गया और हम अंधों को सिर्फ उत्कट प्रेम की मनोरम कल्पना का अद्भुत संसार ही नजर आता है। क्या यह ताजमहल हमें अपनों के प्रति उदासीन रखकर क्रूर और हिंस्र बने रहना तो नहीं सिखाता रहा है ? इस आड़ में पीड़कों-प्रताड़कों के प्रति विरोधी भावों का शमन भी तो हो जाता है। कला के प्रति अनुराग जो उत्कट प्रेम के प्रति श्रद्धांजलि में व्यक्त हुआ है, क्या सचमुच वह प्रेम था। क्या प्रेम की परिणति इतनी क्रूरता और हिंसा में होती है।

क्या वे कारीगर जो 20 हजार से अधिक की तादाद में थे उनका खून देसी सैलानियों के खून नहीं खौलाता तो संवेदना, समझदारी और राष्ट्रीयता को ले मर-मिटने की कसम खानेवालों को ढोंगी नहीं तो क्या कहा जा सकता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अंग्रेजों को यह पसंद है तो हमें क्यों नहीं। अन्यथा हम जाहिल समझे जाएंगे। नहीं, ताजमहल को तेजोमहालय का विकृत रूप बताकर उसे मंदिर साबित करने की जिद (पीएन ओक Purushottam Nagesh Oak) पालनेवाले जैसे लोग भी तो थे। 1828 से 1835 के बीच दो बार जिस ताजमहल को नीलाम कर उसके कीमती पत्थरों, रत्नों, नगों को इंग्लैंड ले जाने की जिस कोशिश को उसी इंग्लैंड की जनता और संसद ने नाकाम कर दिया तो इस देश में फिरंगियों से बड़े दीवाने भी रहे हैं, तभी तो ऐसा ताजमहल इस मुल्क में बचा रहा है। तो इसका मतलब है कि उस मुल्क में बाबरी मस्जिद के जीर्णोद्धार की जिद फितुर ही रहे। संवेदना, करुणा, धर्मपरायणता, राष्ट्रभक्ति, ऐतिहासिक चेतना को भुलाने की भी ढेरों युक्तियां यहां मौजूद है। सारी मार को भूलकर उन महिमामंडित प्रहारों पर मुग्ध होते रहने के ढेरों आसार हैं यहां। जो घाव दिए उसे श्रृंगार का रूप देकर मनोरम बना दिया गया है। विकृति का भोग और भोग का बाजार !

बाबरी मस्जिद का मसला उठानेवालों के लिए तो यह भी एक मुद्दा होना चाहिए। दरअसल आजादी के बाद मुल्क में कोई भी पार्टी नहीं रही जिसके लिए नीति-सिद्धांत का कोई महत्व रहा। न्यूआंस वैल्यू (नुकसान करने की क्षमता) तय करता है कि वोट के बाजार में किसकी कितनी कीमत होगी। और यहीं से पार्टी अपने छद्म आवरण को अपना शरीर बताती है और हम रिझते रहते हैं उसके चोला पर।

क्या आपने कभी सोचा है कि भाजपा जैसी व्यापक जनाधार वाली पार्टी सांप्रदायिक और राष्ट्रद्रोहियों को पनाह देनेवाली पार्टियां सेकुलर कैसे हो गईं ? क्या ऐसा कहकर (कहनेवाले की जमात में राजनेता से लेकर कथित वाम लेखक, मीडियाकर्मी सभी शामिल हैं) कहीं मुल्क की बहुत बड़ी आबादी (भाजपा के मतदाता रहे हैं) को तो सांप्रदायिक नहीं ठहराया जा रहा ? आखिर भाजपा को सांप्रदायिक ठहराकर उसके मतदाता को ही तो यह तमगा दिया जाता है ! आखिर किसी पार्टी या संगठन या व्यक्ति को यह हक किसने दिया कि वह मुल्क के इतने बड़े अवाम के लिए इतनी बड़ी गाली दे ? और तुर्रा यह कि राष्ट्रीय गरिमा पर इस आघात से कहीं चूं तक नहीं होता। हमें समझना चाहिए कि किसी पार्टी का किसी विचारधारा - सिद्धांत से कोई सरोकार नहीं रहा। एक ही सिद्धांत और विचारधारा है और वह है वोट पर कब्जादारी। अन्यथा क्या कारण है कि 1991 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार में आए आर्थिक सुधार के नाम पर बाजारीकरण, भूमंडलीकरण, निजीकरण का सर्वाधिक मुखर विरोधी रहे मीडिया उसकी रखैल हो गया और एनडीए उसका पोषक। एनडीए सरकार में 1999 में पहली बार विनिवेश मंत्रालय बना था और बड़े लिक्खार अरुण शौरी उसके मंत्री बने थे। उस दौरान हुए विनिवेशों का आकलन बाकी है।

क्या सिर्फ दलित होने से रामविलास पासवान का जुर्म जुर्म नहीं रहा ! रुग्ण घोषित उर्वरक इकाइयों के पुनरुद्धार के नाम पर देश भर में जो खेल रामविलास पासवान ने खेला भोली जनता को देश भर में घूम-घूम कर छला और उर्वरक-रसायन-इस्पात मंत्रालय में रहकर चुनावी बाजार बनाने भर के लिए देशभर में विज्ञापन में पैसे लुटाए उसका अपना अलग ही किस्सा है। बरौनी में बंद खाद कारखाना के दुबारा खुलने के नाम पर उसका उदघाटन तक कर दिया। उस दौरान मीडिया भी उनकी मूत और थूक को बाजार का गंगाजल मानकर पीता रहा। (शौरी और पासवान के कार्यकाल की तफ्तीश कई स्पेक्ट्रम घोटालों का राजफाश करनेवाला साबित होगा।)

जितनी और जैसी घिनौनी और मारक स्थितियों में रहकर जीवन बचाकर चलना मुश्किल हो रहा है उसमें प्रतिरोधी चेतना जिस तरह संघनित होंगी उससे ऐसा लगता है जैसे बहुत जल्द मुल्क की अस्मिताओं का विलोप हो जाएगा। हम सिर्फ और सिर्फ मनुष्य बनकर रहना पसंद करेंगे। यह तथ्य है कि जिस तरह मनुष्य हमेशा नर और मादा बनकर नहीं जीता, उसी तरह वह हमेशा हिंदू-मुसलमान बनकर जीना पसंद नहीं करता और न ही हर पल उसके लिए हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी-ब्रिटिश बनकर जीना मुनासिब होता है। उसकी इंद्रीय और चेतना के स्तर और विस्तार उसके इस स्वरूप को तय करते हैं कि किस पलड़े में उसका कितना हिस्सा बीतता है। और मनुष्य होने या मनुष्य बने रहने या मनुष्य के रूप में उसका विकास भी इसी से तय होता है। दरअसल जीवन इसलिए है कि संवेदना है। और इसीलिए सभ्यता है। हमें यह मुगालता छोड़ देनी चाहिए कि सभ्यता इसलिए है कि हमारे पास उन्नत अर्थव्यवस्था और हाई फाई टेकनोलाजी है। ये सब तो एक न एक दिन संकट ही रचते है या युद्ध और संघर्ष के रूप में या फिर हादसों के रूप में तबाही रचकर।

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मुल्क को सर्वाधिक नुकसान आजादी और संविधान से

यह मुल्क कब आजाद हुआ ? कोई बच्चा इसका उत्तर नहीं दे तो कहेंगे कि वह अभी बड़ा नहीं हुआ। किशोर जब इसका उत्तर नहीं दे तो कहते हैं कि उसका जीके अभी कमजोर है। कोई युवक इस सवाल पर चुप रहे तो कहेंगे कि उसे देश-दुनिया की खबर ही नहीं, तो कौन सी जिम्मेवारी के प्रति वह इंसाफ करेगा। और जब एक प्रबुद्ध इसका उत्तर न दे तो आप क्या कहेंगे ? यही न कि वह पाकपरस्त है, पश्चिमी आबोहवा में रंगा है, आतंकी है-नक्सली है। कोसने के लिए आपकी झोली में ढेरों अलफाज होंगे। मैं कहूंगा कि यदि यह मुल्क 15 अगस्त 1947 को आजाद कहा जाता है तो मेरा सवाल है कि यह गुलाम ही कब हुआ था ? सनातनियों की शाश्वतता की शब्दावली में नहीं कि अजर-अमर आत्मा किसी के अधीन नहीं होती। आभासी पराधीनता तो एक चोला है जो देश-दुनिया के हिसाब से बदलता है। यह आत्मा कभी अमरीका में तो कभी अफगानिस्तान में, कभी हिंदु्स्तान में तो कभी अजरबैजान में चोला धारण करती रहती है। इसलिए इसकी कोई धरती नहीं और यह कहीं की नागरिक नहीं। हे अज्ञानी, जड़मति सुजान ! आत्मा को परिधि में खींचकर ब्रह्म को सिकोड़ते क्यों हो ? नहीं। मेरा कहना यह नहीं। मैं कहता हूं कि क्या भारत कहलानेवाली धरती यही है। और यही है तो शेष भूखंड कहां चले गए। अबतक सभी अनुष्ठानों में ‘भारतवर्षे, भरतखंडे’ का वह भूखंड कहां गया जिसकी अर्चना अनायास अभी भी घरों में होती है। कब-कब किन्होंने गुलाम बनाया और कौन गुलाम बने ? क्या वे आक्रांता अब इस भूखंड से चले गए ? कब-कब यह भूखंड आजाद हुआ और कौन आजाद हुए या कौन आजाद किए गए ? जिनके लिए आजादियां थीं क्या उन्हें नसीब हुईं ? गुलामी-आजादी की बात होगी तो पूरे संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में। आजादी को परिभाषित करने के कोई देशकाल और उसके मानक तो होंगे ?क्या आर्य हमलावर नहीं थे ? तुर्क और तातार क्या थे ? सिर्फ अंग्रेजों ने ही इसे गुलाम बनाया था? गांधी को क्या हक कि वह फिरंगी को तो भगाए और शेष हमलावरों का घर घोषित कर दे इसे ? क्या यह घर उनका था ?आखिर फिरंगी को भगाने और शेष को बसाने का हक उन्हें किसने दिया ? भगत सिंह ने अपना जीवन क्यूं कुर्बान किया ? भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाए जाने के (23 मार्च 1931 को) छह दिन बाद गांधी जी ने यंग इंडिया में अपने एक लेख से जता दिया था कि भारतीय भगत सिंह को कैसे लें। अंश है......भगत सिंह जीना नहीं चाहते थे। उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया। यहां तक कि अपील भी दाखिल नहीं की।...उन्होंने असहायता के चलते और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लिया। भगत सिंह ने लिखा था, “मुझे युद्ध करते हुए गिरफ्तार किया गया है। मेरे लिए फांसी का फंदा कोई मतलब नहीं। मुझे तोप के मुंह में रखकर उड़ा दो।” इन नायकों ने मौत के डर को जीत लिया था। आइये हम उनकी बहादुरी को शत्-शत् प्रणाम करें। लेकिन हमें उनके काम की नकल नहीं करनी चाहिए।...हमें कभी भी उनकी गतिविधियों का प्रतिपालन नहीं करना चाहिए। अब मैं कहता हूं कि अंग्रेज यही तो चाहते थे। फांसी से उनकी मुक्ति के लिए दो लाख नागरिकों ने अपील की थी और दूर क्यों जाएं, इसके लिए कांग्रेस का भारी अंदरूनी दबाव भी था। इस सबके बावजूद इस मसले से उदासीन रहते हुए अहिंसक गांधी का रुख उनके प्रति क्रूर-कठोर ही बना रहा। वहीं सुभाष ने फांसी के दिन शहादत को सलाम करने के लिए दिल्ली में जनसभा तक की। कहा तो जाता है कि इस सभा को रुकवाने के लिए इरविन ने गांधी को पत्र भी लिखा था। आखिर गांधी का प्रभाव और रुख देखकर ही तो पत्र लिखा होगा इरविन ने। और नेता जी सुभाष को देश निकाला क्यों झेलना पड़ा या जिस मुल्क की आजादी के लिए सबकुछ न्यौच्छावर किया उसी मुल्क के आजाद होने पर वहीं उन्हें छद्मवेशी होकर क्यों रहना पड़ा ? क्या स्वतंत्रता संग्राम इनसे परिभाषित नहीं होता ? संग्राम में ताकतवर होते गए इन सेनानियों की ऐसी उपेक्षा से ही स्वतंत्रता के मान-मूल्यों को उपर ले जाया जा सकता है क्या ? थोड़ा ठहरकर आप आजादी की भगत सिंह की परिकल्पना पहले आप देखें –हम यह स्पष्ट घोषणा करें कि लड़ाई जारी है। और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हिन्दुस्‍तान के मेहनतकश इंसानों और यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा का कुछ चुने हुए लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहेगा। ये शोषक केवल ब्रिटिश पूँजीपति भी हो सकते हैं, ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी एक साथ भी हो सकते हैं, और केवल हिन्दुस्‍तानी भी। शोषण का यह घिनौना काम ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही मिलकर भी कर सकती है, और केवल हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही भी कर सकती है। इनमें कोई फर्क नहीं है। यदि तुम्हारी सरकार हिन्दुस्‍तान के नेताओं को लालच देकर अपने में मिला लेती है, और थोड़े समय के लिए हमारे आंदोलन का उत्‍साह कम भी हो जाता है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हिन्दुस्‍तानी आंदोलन और क्रांतिकारी पार्टी लड़ाई के गहरे अँधियारे में एक बार फिर अपने-आपको अकेला पाती है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लड़ाई फिर भी जारी रहेगी। लड़ाई फिर से नये उत्‍साह के साथ, पहले से ज्यादा मुखरता और दृढ़ता के साथ लड़ी जाएगी। लड़ाई तबतक लड़ी जाएगी, जबतक सोशलिस्ट रिपब्लिक की स्थापना नहीं हो जाती। लड़ाई तब तक लड़ी जाएगी, जब तक हम इस समाज व्यवस्था को बदल कर एक नयी समाज व्यवस्था नहीं बना लेते। ऐसी समाज व्यवस्था, जिसमें सारी जनता खुशहाल होगी, और हर तरह का शोषण खत्‍म हो जाएगा। एक ऐसी समाज व्यवस्था, जहाँ हम इंसानियत को एक सच्ची और हमेशा कायम रहने वाली शांति के दौर में ले जाएँगे……… पूँजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण के दिन अब जल्द ही खत्‍म होंगे। यह लड़ाई न हमसे शुरू हुई है, न हमारे साथ खत्‍म हो जाएगी। इतिहास के इस दौर में, समाज व्यवस्था के इस विकृत परिप्रेक्ष्‍य में, इस लड़ाई को होने से कोई नहीं रोक सकता। हमारा यह छोटा सा बलिदान, बलिदानों की श्रृंखला में एक कड़ी होगा। यह श्रृंखला मि. दास के अतुलनीय बलिदान, कॉमरेड भगवतीचरण की मर्मांतक कुर्बानी और चंद्रशेखर आजाद के भव्य मृत्युवरण से सुशोभित है। (फांसी पर चढ़ने के दिन 20 मार्च 1931 से तीन दिन पहले भगत सिंह द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र का अंश)भगत सिंह ने क्यों कहा था कि कांग्रेस का आंदोलन आख़िर में एक समझौते में तब्दील हो जाएगा। और कि कांग्रेस की लड़ाई 16 आने में एक आने की लड़ाई है और वह भी उसे नसीब नहीं होगी। क्या वह कांग्रेस ऐसे भगत सिंह व सुभाष की आजादी की अवधारणा को पुख्ता करने की भूल करेगी ? गांधी के चेलों ने उन्हें अजर-अमर रखने को इन जैसे सेनानियों को फेल साबित करने के लिए कई मोर्चे खोल रखे हैं।साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल... क्या है ।याजन गण मन अधिनायक जय हो भारत भाग्य विधाता... के माध्यम से ब्रिटिश आक्रांता को आक्रांता ही न रहने देना चाह रहे हों तो फिर किसकी गुलामी, किसकी आजादी !ऐसा लगता है कि आजादी की लड़ाई का केंद्र प्रवृत्ति से लड़ने की बजाए रंग और लोग से लड़ना तक नहीं रह गया था। प्रवृत्ति से लड़ाई होती तो अंग्रेज भी जाते और अंग्रेजियत भी। इसीलिए गुलाम करने और रखने की प्रवृत्तियां नित सशक्त होती गईं। इसीलिए गुलामी का बैक्टीरिया हर बार रंग-भेस-भेद बदलकर और ताकतवर होकर अजेय अंदाज में अवतरित होता रहा और हमें मुरीद बनाता रहा। आईआईएम के स्नातक और अंग्रेजी उपन्यास जगत में तहलका की तरह प्रवेश करनेवाले चेतन भगत की मानें तो अंग्रेजी भाषा नहीं एक कौशल है। (धनबाद के आईएसएम में मैनेजमेंट फेयर में अतिथि वक्ता के रूप में अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा था।) आखिर किसने कहा कि हिंदी या बांग्ला या उर्दू भषा कौशल नहीं है। बढ़ईगीरी भी कौशल है और अभिव्यक्ति कला भी कौशल है। लेकिन भगत जी के भीतर का वह संक्रमण बोल रहा है जो गुलामी का बैक्टीरिया ही है। और अंत में इसका समाहार ‘दुनिया के पूंजीपति एक हो’ (भूमंडलीकरण) में हो जाता है। जब ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा बुलंद हुआ था, तब तो हम छद्मवेषी हो गए थे। सोवियत रूस सा समाज चाहते थे और अमरीका सी अर्थव्यवस्था। दोनों ही धारा साम्राज्य के विस्तार की अलग धारा थी। व्यक्ति स्वातंत्र्य की तुष्टि जिसमें होगी, अंततः वही काम होगा। व्यक्ति आजादी चाहता है और अपने अस्तित्व और भविष्य के लिए समाज को संगठन की जरूरत होती है। आखिर राष्ट्र से छिटका हुआ समाज और समाज से दूर होते परिवार ही जब विघटित हो रहे तो अब तो सिर्फ व्यक्ति के विघटन की बारी है, जो कि शुरू हो चुकी है। हम अपने मताधिकार का प्रयोग जैसे करते हैं, वह तो यही दर्शाता है। ऐसा लगता है गुलाम रहने की प्रवृत्ति यहां की मूल और सहज वृत्ति है। स्वाभाविक संवेग-वृत्तियों के खिलाफ चलकर किसी अभियान को अधिक देर और दूर तक नहीं ले जाया जा सकता है। जर्मनी का एकीकरण, सोवियत संघ का विघटन, थ्येनआनमन चौक से होते हुए चीन का रूपांतरण, मिस्र में होस्नी मुबारक का तख्तापलट, लिबिया में गद्दाफी के खिलाफ बगावत आदि-आदि इसी के तो उदाहरण हैं। लेकिन भारत का उदाहरण अलग है। हर लड़ाई के बाद बाद वह एक गुलामी से दूसरी गुलामी में प्रवेश करता रहा है। या कहें कि नई (नाजुक, कमसीन, हसीन) गुलामियों के लिए वह लड़ाइयां लड़ता रहा है। सोवियत संघ का विघटन हुआ, पर यहां पश्चिम बंगाल में बोडोलैंड की मांग अनसुनी रह गई। और अब तो वहां के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने खुलेआम कह डाला है कि उनकी मांग कभी नहीं पूरी होनेवाली। दूसरी ओर भारत में नक्सलवाद (माओवाद) को राज्य विरोधी – व्यवस्था विरोधी कहनेवाले मार्क्सवादी नेपाल में माओवाद की चरणवंदना करते हैं।इस देश में संग्रामियों का दमन करनेवालों और स्वतंत्रता संग्राम के विरोधियों का सम्मान हुआ तो क्या हुआ। आजादी के बाद से गठित सभी मंत्रिमंडल में कौन पूजे गए ? क्या सबके सब स्वतंत्रता की आत्मा की रक्षा करनेवाले थे ? अब जरा भारतीय संघ के सेकुलर ढांचे में दलितों के मसीहा कहे जानेवाले बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के उच्चाशयों को देखें : -हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं । साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है । मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते । (डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१)गुलाम देश में रियासतों के रहमोकरम पर पढ़ाई, अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी और दलितों के उद्धार (कदाचित एक पृथक दलितिस्तान) के लिए नित नई लड़ाई छेड़नेवाले भीमराव अंबेदकर को भारतीय संघ के सेकुलर ढांचे पर इस तरह का प्रहार करने के बावजूद कैसे और किन अर्थों में सेनानी माना जाए, जिसने कभी भी हथकड़ी में जकड़े किसी बंदी तक से भेंट भी नहीं की ? राजा भोज के वंशज साहबजादा सिंह के पुत्र बाबू वीर कुंवर सिंह जिनके सभी नाते-रिश्तेदार नामी जागीरदार रहे और जिनके नामों से ही सामंतवाद की बू दीखती है, आखिर कैसे संग्रामी हो गए। यह बात पल्ले नहीं पड़ती कि 80 साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम की कमान ले लड़ाई में कैसे कूदे। 80 साल की उम्र तक ऐसा उग्र सेनानी फिरंगियों की नजर से कैसे बचा रहा ? क्या किसी भी गुलाम देश में लड़ाकू योद्धा को इतनी लंबी उम्र मिल सकती है ? हां, मिलती है नेल्सन मंडेला की तरह जेल में सड़ते रहकर या फिर एक सिद्धांत के तहत आंदोलन को नर्म – नाजुक स्तर पर रखने के लिए बड़ी आबादी को अपने पीछे पागल बना रखने के लिए महात्मा गांधी जैसों को बाहर रखकर। या फिर दलाई लामा की तरह दर ब बदर रहने की नियति झेलकर।विलय के सिद्धांत के खात्मे के लक्ष्मीबाई के आग्रह के साथ अंग्रेज हुकूमत को यह प्रस्ताव कि वे ऐसा करते हैं तो 1857 के संग्राम में वह (झांसी की रानी) उनके साथ होगी। यदि ये लोग संग्रामी थे तो एक पल के लिए ठहरकर सोचना होगा कि फिर नेताजी सुभाष और भगत सिंह क्या कर रहे थे। आजादी और शहादत की इसी सोशल मैपिंग का नतीजा है कि आज गली-चौराहे ऐसे ‘शहीदों’ के नाम सुपुर्द कर दिए गए हैं जो या तो गैंगवार में या किसी सियासी रंजिश में मारे गए या फिर मुठभेड़ में मारे गए माफिया सरगना थे। होना तो यह चाहिए था कि स्वतंत्रता संग्राम से अर्जित मान-मूल्यों की गरिमा या मर्यादा से खिलवाड़ करते इस शहीद-शहीद खेल को प्रतिबंधित करते हुए शहीद शब्द का दुरुपयोग राष्ट्रीय मर्यादा और गरिमा के विरुद्ध अपराध घोषित किया जाता। एक वाकया है कि एक बार औरंगाबाद के नगर भवन में अंग्रेजों की गोली से छलनी हुए शहीद की प्रतिमा प्रमुखता के साथ लगाए जाने के प्रस्ताव आया था। औरंगाबाद इस शहीद का गृह जिला था। बाद में नगर भवन में बिहार के मुख्यमंत्री रहे अनुग्रह नारायण सिंह की प्रतिमा केंद्रीय स्थल पर लगाई गई और शहीद की प्रतिमा एक कोने में लगा दी गई। शहीद की एक प्रतिमा शहर के रमेश चौक पर लगी है। दोनों ही स्थानों पर प्रतिमाएं धूल-धूसरित है। जिला के ओबरा के खरांटी में सालों पहले बना स्मारक अब उपेक्षित है। गोह प्रखंड में चौक पर स्थापित इनकी एक प्रतिमा गाड़ियों के धक्के से क्षतिग्रस्त हो गई है। यह शहीद और कोई नहीं बिहार सचिवालय पर स्थापित जिन सात शहीदों की प्रतिमा है, उन्हीं में सबसे छोटे जगतपति सिन्हा हैं। गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रभाव में पटना में 11 अगस्त 1942 की सुबह सचिवालय पर सात सेनानियों की जो टोली तिरंगा फहराते हुए जिलाधीश डब्ल्यू जी आर्थर के हुक्म पर हुई फायरिंग में शहीद हुई थी, उसी टोली के सबसे छोटे सदस्य ये थे। यह तो है शहीदों को हमारे समय-समाज का नमन !
यह आजादी ही है जिसने हमें गैर जिम्मेवार होकर गौरव हासिल करना सिखाया। किसी भी चीज की वास्तविक कीमत अदा किए बिना उसे हासिल करने की जिद पूरी होने लगे तो आप गैरजिम्मेवार नहीं तो क्या बनेंगे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने बखूबी इसका ख्याल किया ! आखिर यह भी गौर करना होगा कि संविधान सभा उन प्रान्तीय विधानमण्डल के सदस्यों से बनी थी, जिनका चुनाव देश की कुल वयस्क आबादी के मात्र 11.5 प्रतिशत हिस्से से बने निर्वाचक मण्डल से हुआ मुट्ठी भर चुने गये प्रतिनिधियों को छोड़ बाकी सम्पत्तिशाली कुलीनों के प्रतिनिधि थे। इनमें चुने गये प्रतिनिधियों के अतिरिक्त उसमें राजाओं-नवाबों के मनोनीत प्रतिनिधि थे। ऐसे संविधान से हम क्यों यह अपेक्षा कर लेते हैं कि वह भगत सिंह के सपनों के अनुसार सोशलिस्ट रिपब्लिक यानी 42 वें संशोधन के मुताबिक समाजवादी गणतंत्र हो। क्या संविधान सभा की प्रकृति ऐसी थी कि संविधान की आत्मा में यह समाहित हो सके। 2004 के चुनावों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 128 लोग सांसद चुने गए थे जबकि 2009 में यह संख्या 150 हो गई। इसी तरह 2009 की लोकसभा में 300 करोड़पति सांसद आए हैं, जबकि 2004 की लोकसभा में ऐसे 154 सांसद थे। क्या यह एकबारगी हो गया।
जिम्मेवारी के बोध से कटे भारतीयों में कर्तव्य की रही-सही चेतना को कुंद करने का सार्थक प्रयास हुआ इसके माध्यम से। संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख तो हुआ, पर यह अधिकार कुछ कर्तव्यों के निर्वाह से हासिल होते हैं यह बताने की जरूरत नहीं। पाबंदी नहीं। अधिकार के लिए याचिकाएं असंख्य पड़ीं। नए-नए अधिकारों का सृजन हुआ। आरटीआई, काम का अधिकार, आरटीई। लेकिन कर्तव्य ? सिर्फ आप इस धऱती पर जनम गए हों। बस्स। संविधान बनने के 26 सालों बाद शासकीय गरज से संविधान के 42 वें संशोधन में एक अध्याय के रूप में मूल कर्तव्य जोड़े गए। पहली बार अधिकारों से छेड़छाड़ हुई। इतने और ऐसे संशोधन के पैकेज लाया गया कि यह संशोधन मिनी संविधान कहा जाने लगा। यह अलग बात है कि 1978 में 44 वें संशोधन से बहुत कुछ निरस्त कर दिए गए। पहली बार संविधान को खिलौने की औकात में लाने की कोशिश हुई। क्या सेनानियों ने आजादी का जो हक दिया उसे यूं ही कुर्बानियों को भूल जाने के लिए। सामान्य बातचीत में और अपने करीब डेढ़ दशक की पत्रकारिता और अध्यापन के अनुभव में राजनीति शास्त्र का एक भी व्याख्याता, सामाजिक अध्ययन का एक भी शिक्षक, एक भी सामाजिक कार्यकता, कोई अधिकारी या नेता नहीं मिला जिसे बखूबी इसका पता हो या दस कर्तव्यों को सिलसिलेवार गिना दें। ऐसा एकबारगी नहीं हुआ। अधिकारवाद कहीं न कहीं भोगवाद में उत्स पाता है और जिसकी जड़ बर्बरता में होती है, वह हमारे जीन में है। कोई भी गलत रास्ता सही जगह नहीं जाता। और यही कारण है कि कर्तव्यबोध की इस क्षति ने देश में नागरिक बोध को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। राज्य का कर्तव्य नागरिक का अधिकार और नागरिक का कर्तव्य राज्य का अधिकार। लेकिन व्यवस्था की उदासीनताओं और कुछ हमारे भीतर की जीन ने संगिठत लड़ाई को कभी परिवर्तनकारी आंदोलन (छात्र आंदोलन) या समांतर व्यवस्था के लिए (नक्सलवाद) सक्रिय किया है। भद्रजन की भाषा में एक रिएक्टर के रूप में प्रकट होता है तो दूसरा एटम बम के रूप में। दरअसल जो क्षेत्र विकास से दूर या अछूते रहे या रखे गए वहां शोषण की चक्की फ्रिक्शनलेस हो आसानी से चली। जंगलों या सुदूर पिछड़े इलाकों में इस आंदोलन के जाने का कारण एक तो यह था, दूसरे माओ की थियरी भी गांव से शहर की ओर बढ़ने की थी। शोषण व अन्याय को नियति न मानकर जिन्होंने सामाजिक व्यवस्था में उसकी वजह देखी, उनकी लड़ाई तो व्यवस्था के खिलाफ होगी ही। विकास से लगातार उपेक्षित रखे गए या रखे जा रहे ऐसे उपेक्षितों का दंश संताप, क्षोभ, पीड़ा के गह्वर में जाकर क्या उन्हें संत रहने देगा। ऐसी अपेक्षा है तो फिर ...भारत में होनेवाली कुल मौतों में 8.1 प्रतिशत मौत डायरिया से होती है। डायरिया का एकमात्र कारण जलप्रदूषण है। इस डायरिया से वही तबका आक्रांत होता है जो कामगार-दिहाड़ी है। एक बार डायरिया हुआ तो कम से कम सप्ताह भर की छुट्टी। अब इसे बीपीएल के मानव दिवस से गुणा करके देखें कि जीडीपी का कितना नुकसान है। स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति व्यय 119 डालर जो कि दुनिया में सबसे कम है। और संयुक्त राष्ट्र संघ का आकलन है कि स्वास्थ्य पर खर्च की वजह से हर साल 2 प्रतिशत यानी 24 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। आखिर कष्ट का यह कंडेसेशन समाज को कहां ले जाएगा। क्या यह शोक-संताप क्षोभ का हिस्सा से बचा रह जाता होगा।क्या इसका जवाब किसी के पास है कि अपराध/भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी का कारण सिर्फ राजनीति और कानून की पोंगापंथी या आम नागरिक की भी उतनी ही भागीदारी भी है ? नागरिक उदासीनता से बननेवाले वैक्यूम आखिर कुछ तो लेकर आएगा। राजनीति का अपराधीकरण और नैतिक मूल्यों में गिरावट को जीवन व्यवहार का हिस्सा बना लेने के कारण अपराध का समाजीकरण (पुण्यप्रकाश वाजपेयी का टर्म) जिस तरह हुआ है, उस सबकी जड़ में कहीं न कहीं नागरिक बोध की क्षति प्रमुख है। इसे क्या कहेंगे कि संसद के दोनों सदनों में आजादी के बाद से अब तक लगातार आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। 1952 में संपन्न पहले आम चुनाव से लेकर अब तक के 15 आम चुनावों में भ्रष्टाचार एक मुद्दा रहा, पर 1989 को छोड़ कभी भी यह मुद्दा चुनाव प्रभावशाली नहीं रहा। इसका मतलब ही यह है कि जनमानस को इस मसले पर कोई भी पार्टी मोटिवेट नहीं कर सकी तो इसलिए कि जनतांत्रिक संस्थाओं व जनमानस दोनों ही ओर आग बराबर लगी हुई है। क्या ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान अपने मुकाम तक पहुंचेगा ? जिस संविधान प्रदत्त तंत्र की अधीनता के कारण 74 का आंदोलन, शेषण द्वारा छेड़ा गया चुनाव सुधार का अभियान आदि-आदि फिस्स कर गए लगभग वही हस्र इनके अभियान का होगा। अरुणाचल प्रदेश से कांग्रेस के सांसद निनाग ईरिंग ने जिस तरह बाबा रामदेव के साथ अभद्राचरण किया वह हस्र का छोटा नमूना है। आखिर रिफ्लेक्स एक्शन की तरह कांग्रेस के दिग्विजय सिंह का जो रुख रहा वह कहीं न कहीं रामदेव के अभियान के प्रति नाराजगी भी दर्शाता है। जिस गरीब जनता के मुल्क के 70 लाख करोड़ रुपए विदेशी बैंकों में जमा हों वह क्यों नहीं यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन अंगेस्ट करप्शन (यूएनसीएसी) का अनुमोदन करता है। इस आशय से संबंधित
संयुक्त राष्ट्र के संकल्प पर एक दस्तखत के सिवा 2005 के बाद सरकार ने इस मामले में कोई पहल नहीं की। यही तो वह मनोरचना है जो इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
कहीं न कहीं नागरिक बोध का नुकसान हमारी जीवनशैली को प्रभावित करती है, फिर व्यवहार का पैटर्न उस गिरफ्त में आता है और फिर पूरी की पूरी व्यवस्था इसका निवाला बन जाती है। कई व्यवहार से रिवाज तथा रिवाजों से विधि और फिर विधि के तानेबाने से संविधान फिर पूरी व्यवस्था बनती है। थूक फेकने से लेकर ट्रैफिक नियम व दफ्तरों में अपनी सुविधा के लिए बाबुओं के साथ डीलिंग। यह सब क्या है। एक समांतर व्यवस्था ही तो। ...

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

घिसे-पिटे पार्टी लेखन का कोई मतलब नहीं

बाबरी मस्जिद मामले में मालिकाने को लेकर आये फैसले पर एक नज़्म...

मुकुल सरल

दिल तो टूटा है बारहा लेकिन

एक भरोसा था वो भी टूट गया

किससे शिकवा करें, शिकायत हम

जबकि मुंसिफ ही हमको लूट गया

ज़लज़ला याद दिसंबर का हमें

गिर पड़े थे जम्हूरियत के सुतून

इंतज़ामिया, एसेंबली सब कुछ

फिर भी बाक़ी था अदलिया का सुकून

छै दिसंबर का ग़िला है लेकिन

सितंबर तो चारागर था मगर

ऐसा सैलाब लेके आया उफ!

डूबा सच और यकीं, न्याय का घर

उस दिसंबर में चीख़ निकली थी !

आह ने आज तक सोने न दिया

ये सितंबर तो सितमगर निकला

इस सितंबर ने तो रोने न दिया

(इंतज़ामिया- कार्यपालिका, एसेंबली- विधायिका, अदलिया- न्यायपालिका, चारागर- इलाज करने वाला,चिकित्सक)

जनज्वार डाट काम के ६ अक्तूबर के उक्त पोस्ट को देखने के बाद १५ अक्तूबर को प्रतिक्रिया -

मैं नहीं कहता कि मैं कोई वाम का झंडाबरदार हूं। विचारधारा की प्रतिबद्धता एक हद के बाद के बाद अवाम को , जीवन को पीछे छोड़ देती है और पार्टी आगे आ जाती है। लब्बोलुआब यह कि मुसलमान को इस जनतांत्रिक देश में वे सब हक हैं जो इसके नागरिक को। इसी तरह उसका फर्ज होता है कि वह राष्ट्रीय मूल्यों को आम नागरिक की तरह मंजूर करे और अमल में लाए। यह इस मुल्क की महानता नहीं तो और क्या कि कभी के आक्रांता (क्योंकि उनको उनपर गौरव है) के वंशजों को यहां के धार्मिक प्रतीक बन चुके राम को अपनी जन्मभूमि से बेदखल करने का हक मिला हुआ है। अदालत है कि सभी पुरातात्विक सबूतों को किनारे करते हुए आस्था के आधार पर फैसला सुना देता है। अपनी जन्मभूमि तलाशने के लिए राम को दर-दर भटकने को छोड़ दिया जाता है। अदालत के सामने सबूत हैं कि हिंदू ढांचे पर ही मस्जिद बनी है। कुरआन के मुतल्लिक हवाला भी दिया गया है कि हड़पी या गैर स्वामित्व वाली जमीन पर इबादत करना नापाक है। दारूल-उलूम से लेकर देवबंद और कांग्रेस के कासिम अंसारी तक कह चुके हैं कि मस्जिद एक किमी दूर भी बने तो हर्ज क्या (शायद उन्होने यह तंजिया कहा हो)। ऐसे में साहबान हम किस बात को प्रोमोट कर रहे हैं। क्या मुल्क के बंटवारे में आगे रहनेवाली मुस्लिम लीग के साथ आजाद मुल्क में उसके सहारे चुनाव लड़नेवाली कांग्रेस ऐसे में कहां गलत है। ऐसे में कहां गलत है कि आजादी की लड़ाई में कम्यूनिस्टों ने मुल्क के साथ घात किया। क्या बुरा है कि इस मुल्क के लिए आजादी की लड़ाई में हीरो माने जानेवाले सुभाष चंद्र बोष को अंग्रेज को सुपूर्द करने की संधि कर ली युद्ध का भगोड़ा मानकर। हंसुआ-हथौड़ा के बल पर मुट्ठी-भर लोग संसद पहुंचकर करोड़ों की जनता को सांप्रदायिक कहने को आजाद हैं। वाम के परदे में प्रगतिशीलता के फार्मूले में भारतीयता को, यहां के आदर्श-मूल्य, जनभावना को जमकर कोसने की आजादी जिस वाम में थी, उसी की राह चलकर सेकुलरवाद का मोर्चा मजबूत हुआ है। आप मेरे ब्लाग ww.aatmahanta.blogspot.com पर जाएं और कहें कि क्या मैं केसरिया हूं या लाल? हार्वर्ड फास्ट से लेकर माओ तक को खंगाल लें क्या उन्होंने कभी घिसे-पिटे पार्टी लेखन की वकालत की। आप अपनी साइट पर यह क्या कर रहे हैं। कोई बताए आज तक किसी प्रगतिशील दल या संगठन के झंडाबरदार ने कश्मीर के अल्पसंख्यकों पर कुछ भी बोला। इस पर वे ठीक उसी तरह चुप रहे जैसे अफगानिस्तान व पाकिस्तान के अल्पसंख्यक उत्पीड़नों पर चुप रहते हैं। मैं यहां के अल्पसंख्यकों को पीड़ित-शासित रहने को शापित नहीं मानता, पर इतनी तो खुद्दारी होनी ही चाहिए कि आपमें से कोई खुलकर इन मसलों पर बोले। इस तरह की बकवासों को छाप कर किस तरह की काव्य समृदि दे रहे हैं और कैसी जागरुकता और संवेदना के पक्ष में चीजों को ले जा रहे हैं।

सोमवार, 22 नवंबर 2010

डाल से तोड़े गए पत्ते का पुनर्वास नहीं होता

(देश भर में औद्योगीकरण के नाम पर विस्थापन का जो खेल चल रहा है, नर्मदा, सिंगूर व नंदीग्राम उसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इस क्रम में भरी-पूरी आबादी को अमानवीय उत्पीड़न से गुजरना पड़ रह है। मानवता के नाते और भावी चुनौतियों के बरक्स विस्थापित हो रहे लाचार लोगों के दर्द को सुनना-समझना जरूरी हो जाता है। इसी आलोक में हम हिंदी कवि कुमार अंबुज का एक पत्र दे रहे हैं। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के क्रम में हिंदी कवि कुमार अंबुज ने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक मार्मिक पत्र लिखा था। बेहद यादगार यह पत्र किसी राजकीय रिकार्ड में हो कि न हो, पर माडरेटर को लगता है कि यह 20 वीं सदी के खूबसूरत पत्रों में शुमार किया जा सकता है। विकास के निर्बंध-स्वेच्छाचारी माडल में बड़े बांधों से हो रहे विस्थापन के खिलाफ एक करुण आवाज है यह।
इस पत्र के मिलने का एक प्रसंग पाठकों के साथ शेयर करना चाहता हूं। ज्ञान दा (पहल संपादक और कथाकार ज्ञानरंजन) एक-एक चीज का बड़ा ही सार्थक इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने मुझे एक पत्र कुमार अंबुज के किसी पत्र के पीछे के सादा हिस्से में लिखा गया था। पत्र के इस मार्मिक अंश से पूरे पत्र को पाने की इच्छा हुई। पत्र में लिखे पते पर संपर्क करने पर कुमार अंबुज का बड़ा ही आत्मीयता भरा पत्र मय इस अनुरोध के मिला कि अखबार में छापूं तो उसकी प्रतियां ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’, मेधा पाटेकर, वाणी प्रकाशन को भी भेजूं। मैंने वैसा ही किया। इस बात को कम से कम 11 साल हो गए। - माडरेटर)

परछाईं,13 राधा कालोनी, गुना, मध्य प्रदेश
17.08.1999

आदरणीय श्री दिग्विजय सिंह जी,
मुझे एक लेखक के रूप में यह पत्र इसलिए लिखना पड़ रहा है कि मेरी यह जिम्मेवारी है कि मैं समाज और जनता के बीच उस आवाज को तेज करूं जिसकी आप लगातार अनसुनी कर रहे हैं। इसलिए आपको याद दिलाने की धृष्टता कर रहा हूं कि आप शासन प्रमुख और जनतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए जनप्रतिनिधि होने के नाते, नर्मदा बचाओ आंदोलन और बड़े बांधों के संदर्भ में समुचित जिम्मेवारी और संवेदनशीलता से काम नहीं ले रहे हैं।
कोई भी आदमी राजनीतिक होने या तकनीकी होने से पहले एक मनुष्य होता है और वही उसकी सबसे बड़ी जरूरत है। आप सहमत होंगे कि तमाम राजनीतिक उपादान और विकास के नियम भी अंततः अपनी श्रेष्ठता और सफलता इसीमें निहित पाते हैं कि एक मनुष्य का मनुष्य और उसकी प्राकृतिक स्वतंत्रता को उजाड़े बिना ही एक विकसित समाज का, राष्ट्र का निर्माण कर सकें।
एकलेखक के नाते मेरी दिलचस्पी बांध की तकनीक में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उससे मनुष्य तो नहीं उजड़ जाएगा। बड़े बांधों से जिन लोगों तक लाभ पहुंचेगा उसकी गणना को मैं नहीं जानता, बांध के सवाल पर पीछे हटने से सरकारों को कितना नफा-नुकसान होगा उसे भी मैं नहीं जानता और न ही जानना चाहता हूं क्योंकि मैं मनुष्य को जानता हूं। मेरा सारा सरोकार जनता से है। जानना होगा तो जानना चाहूंगा कि क्या बड़े बांध बनने से एक आदमी भी विस्थापित नहीं होगा ? एक आबादी भी डूब में नहीं आएगी ? इसलिए एक मनुष्य की तरह से, उसीकी तरफ से मैं यह पूछने के लिए विवश हूं कि उजाड़ फैलाकर आप कैसी हरियाली चाहते हैं ? क्या आप गांव-शहर बसने की ऐतिहासिक प्रक्रिया और परंपरा के बारे में जराभी विचार करना चाहते हैं ? एक गांव बसने में जितना मानवीय प्रयास, कष्ट, उल्लास और जिजीविषा शामिल होती है उसकी तौल में आप विकास का कौन पक्ष पलड़े में रखना चाहते हैं ? प्रश्न यह भी है कि एक मनुष्य की भावुकता, उसकी संवेदना, आत्मीयता और उसके संताप को आप किस निगाह से देखते हैं ? और आप विकास को किस तरह से देखते हैं ? विनाश के साथ विकास कैसे हो सकता है ? तकनीकों को, विकास के औजारों को मनुष्यों के शवों के ऊपर स्थापित नहीं किया जा सकता है। यह सभ्यता के विनाश का रास्ता है।
एक न्यायाधीश, एक वैज्ञानिक और एक यंत्री क्या कहता है, इसके बरक्स यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह सुना जाए कि एक विस्थापित हुआ आदमी क्या कहता है। उसकी आवाज से प्रामाणिक कुछ नहीं हो सकता। यह संसद, प्रशासन और न्यायालय यदि उजड़ते हुए आदमी की आवाज को कैद करने के लिए काम करेंगे तो यह हमारे समय की सबसे बड़ी अमानवीयता और ऐतिहासिक भूल होगी।
एक गांव, एक आदमी और एक शहर जब डूब में आता है तो वह मानचित्र पर एक निशान मिट जाने भर की घटना नहीं है। इसके साथ वे गलियां भी डूबती हैं जो कई आदमियों के, कई सालों तक एक साथ चलने से, व्यवहार करने से बनती हैं। वे पेड़, वे वनस्पतिय़ां डूब जाती हैं जो आपसे एक जीवित मनुष्य की तरह बर्ताव करती रहीं और दुख, सुख रोग-शोक में काम आती रहीं। वह चंद्रमा, वे तारे और वह सूर्य भी डूब जाता है जो सिर्फ उसी गांव से, उसी कोण से और उसी जगह से इतना आत्मीय और सुंदर दीख सकता था। दिशाएं डूब जाती हैं और वे घर डूब जाते हैं जिनमें जन्म हुआ, जिनकी खिड़कियों से दुनिया को देखने का काम शुरू हुआ और जिनमें गाने गाए गए, उत्सव मने, जिनकी छाया में विपत्तियां झेलीं जिनके सीने से लग रोना रोया, जिनकी मुंडेरों पर सुबह का स्पर्श देखकर सुंदरता का पहला सबक सीखा और जिनमें विलाप हुआ और जिनकी दीवारों के सहारे फिर से खड़े होकर जीवन में वापसी हुई। एक गांव जब डूबता है तो मनुष्यों केवे तमाम संबंध और एक परंपरा ही डूब जाती है जो गांव में पीढ़ियों तक रहकर ही संभव हो पाती हैं। कुओं, खेतों, ढूहों और चौपालों का डूब जाना क्या सिर्फ अजीवित चीजों का डूब जाना है ? क्या हमारी स्मृतियों का डूब जाना एक साधारण और उपेक्षणीय घटना हो सकती है?
सवाल ये भी है कि क्या आप एक आंदोलन को सिर्फ एक विरोध की तरह देखते हैं ? क्या कोई आंदोलन आपके लिए महज एक सामाजिक बाधा है? जब आंदोलनकारी चढ़ते हुए पानी में मृत्यु की परवाह किए बिना खड़ा रहता है तो क्या यह एक जिद भर है ? जो बुद्धिजीवी और समाजसेवी लोग आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं क्या यह उनके लिए शगल है ? क्या नर्मदा और नदियों को बचाने का जिम्मा आंदोलनकारियों और समाजसेवियों का ही है, शासन का नहीं ? सरकार का प्रमुख होने के नाते इन सवालों पर चलताऊ तरीके से निष्कर्ष निकाल लेना घातक होगा। संभव है कि आंदोलन की ऊष्मा और उसकी ताकत को शासन-प्रशासन के जरिए एक दिन परास्त भले ही कर दिया जाए लेकिन उसके बीज मर नहीं सकते। मनुष्य की निराशा सबसे ताकतवर और दुस्साहसिक होती है। सबसे ज्यादा हिंसक और सबसे ज्यादा विध्वंसक। आपको चाहिए कि आपके राज्य में कोई मनुष्य इतना निराश न हो जाए कि वह सृजनात्मकता का, प्रेम का रास्ता छोड़कर अन्य किसी नकारात्मक रास्ते पर चला जाए, यह हार-जीत का, जय-पराजय का मामला नहीं है। और यदि है भी तो जनता की जीत में ही लोकतंत्र की राज्य की जीत शामिल है। बातचीत के लिए प्रस्तुत होने और समाधान के लिए प्रस्तुत होने में गहरा फर्क है।
एक डूबते हुए गांव के निवासी का विस्थापित होना, गांव से शहर में पढ़ने-लिखने, नौकरी करने गए आदमी के विस्थापित होने जैसा नहीं है। डूब में आ रहे गांव के निवासियों के लिए, यह प्रलय आने जैसा है। उनके संसार को नष्ट किए जाने जैसा है। उसे देशनिकाला देने जैसा है। उसीकी अनुभूति और कष्ट को शब्दों में अभिव्यक्त करना लगभग असंभव है है। इसलिए उसे राजनीतिक चेष्टाओं और कानूनी शब्दावली से समझने का प्रयास भी हास्यास्पद भी है और दारुण भी। पुनर्वास का अर्थ इतना सीमित नहीं हो सकता कि आप एक बीघा जमीन की जगह एक बीघा जमीन दे दें। क्या डाल से तोड़ दिए गए पत्ते का पुनर्वास संभव है ? जबकि हद यह कि हजारों परिवार उजड़ चुके हैं। उनकी बलि दे दी गई है। उनका न्यूनतम पुनर्वास भी नहीं हुआ है। और हजारों परिवार इन्हीं हालातों का शिकार होनेवाले हैं।

मैं कहना चाहता हूं कि आप विकास के वैकल्पिक माध्यमों और तरीकों पर ध्यान दें। अभी सिर्फ धन की बर्बादी हुई है जिसका मूल्य मनुष्यों के जीवन के आगे कुछ भी नहीं है। यह घोषणा अविलंब की जाए कि बड़े बांधों का निर्माण तत्काल रोका जाएगा और अन्य विकल्पों को सामने लाकर, विचार कर अमल किया जाएगा। जो लोग बेघर, बेगांव हो चुके हैं उनकी पुनर्वास समस्या का तुरंत हल किया जाए और आगे इस बर्बादी को एकदम रोक दिया जाए। यह कितना भयावह और क्रूर दृश्य है कि संपन्न, खाते-पीते खुशहाल लोगों को एक विपन्न, नारकीय जीवन में धकेल दिया जाए।
इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि जब-जब जनपक्षधरता के आंदोलन को नकारा जाता है, उसकी उपेक्षा की जाती है उनकी उग्रता विकट हो जाती है। इतिहास ऐसे ही उदाहरणों से भरा पड़ा है। जब शासनतंत्र गफिल होने लगता है तो यह समाज में एक बड़े संकट की सूचना होती है। आप एक विचारशील व्यक्ति की तरह इन बिंदुओं पर विचार करें और अविलंब बड़े बांध बनाने, ऊंचे बांध बनाने की शासकीय प्रतिज्ञा को तोड़ दें। यही एक बेहतर विकास का रास्ता होगा।
हमारे प्रदेश के पड़ोसी राज्यों, महाराष्ट्र और गुजरात शासन से बात करने के लिए आपसे अधिक सक्षम व्यक्ति कौन हो सकता है। यदि आप बड़े बांधों और विस्थापन के कष्ट को समझते हैं तो इससे अधिक सौभाग्य, डूब में आ रहे लोगों का और क्या हो सकता है ? क्योंकि तब आपकी दूरदर्शिता, संवेदनशीलता और कूटनीतिक निपुणता का लाभ विनाश के कगार पर खड़े लाखों लोगों को मिल जाएगा। और इसकी उम्मीद आपसे करना उचित ही है क्योंकि आप जिस जगह हैं वहां आपसे संरक्षण की अपेक्षा सहज और अधिकारपूर्ण है।
मुझे आशा है कि आप इस पत्र को जिम्मेवारी और गंभीरता से लेने की कृपा करेंगे।

शुभकामनाओं के साथ,

कुमार अंबुज,

सेवा में,
श्री दिग्विजय सिंह,
मुख्यमंत्री,
म.प्र. शासन, भोपाल। (सौजन्य पत्र लेखक)

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

सामाजिक सरोकार कहीं भी निभाए जा सकते हैं – विनोद सिंह

-एक युवा विधायक के सरोकार-
(राजनीति का मतलब ही सत्ता से लिया जाता है और कला का मतलब ही साधना से लिया जाता है। एक क्षेत्र निहायत बहिर्मुखता से होकर भोग की ओर चला गया है तो दूसरा क्षेत्र सर्वथा अंतर्मुखताकी गली से होकर उदासी में निर्लिप्तता में चला जाता है। इस घोर बाजारवादी दौर में दोनों ही क्षेत्र में विपरीत उदाहरण देखने को मिलेंगे। लेकिन यह सोचना थोड़ा अचरज लग सकता है कि क्या कोई एक ही साथ दोनों कर्मों को साध सकता है। हमारे दौर में पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्या बांग्ला के नामचीन कवि हैं और कभी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके तथा फिलहाल में केद्र में कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कन्नड़ के कवि है। हम यहां कविता और राजनीति को एक साथ साधने की बात तो नहीं करेंगे, पर हमारा मकसद इसी से थोड़ा आगे चलकर यह देखना-जानना है कि कैसे कोई संस्कृतिकर्मी एक साथ अपनी कला व राजनीति को साध रहा है। ऐसे ही एक संस्कृतिकर्मी झारखंड विधानसभा में भाकपा माले के विधायक विनोद सिंह हैं। उनकी कला चेतना देखनी हो तो कोई शहीद महेंद्र सिंह की पुण्यतिथि के मौके पर बगोदर में (झारखंड के गिरिडीह जिला का हजारीबाग से सटा एक विधानसभा क्षेत्र) उनके कविता पोस्टरों को देखे। इसी संदर्भ में बेहद संभावनाशील मूर्तिकार रहे माले विधायक विनोद सिंह से हुई बातचीत का अंश प्रस्तुत है। )

झारखंड में सरकार के भविष्य को लेकर इन दिनों उहापोह तो नहीं रही, पर यह भी तय है कि जिंदा मेढ़क को लेकर कोई अधिक दिनों तक बहुमत में नहीं रह सकता है। जब पूरा सियासी माहौल सरकार गिराने-बनाने की जद्दोजहद से गंधा रहा हो तो वैसे में एक विधायक से संस्कृतिकर्म पर बातचीत के लिए मोहलत लेना एक ज्यादती कही जाएगी। ज्यादती राजनीतिक प्रतिबद्धता के संदर्भ में। सदन की गहमा-गहमी भरे माहौल में कैसे कोई एक विधायक से कला-संस्कृति, सामाजिक सरोकार और नागरिक चेतना पर बात करने के लिए वक्त लेने की सोचे। यह तो सिर्फ लेनिन ही हो सकते थे जो मजदूरों की बैठक में भी किसी कविता का सविस्तार जिक्र छेड़ देते और उसके निहितार्थों और सामाजिक अर्थवत्ता से लोगों को अवगत कराते। लेनिन तो नहीं, पर भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माले) के कर्मठ और प्रतिबद्ध विधायक के रूप में महेंद्र सिंह ने जैसा जीवन जीया पूरे राजनीतिक परिवेश के लिए संदेश से भरा है। उनकी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता और उसकी परिणतियां इतिहास हो गई हैं। बुद्धिजीवियों के बीच स्व. सिंह अपनी गंभीर सांस्कृतिक-साहित्यिक चेतना के लिए विशेष रूप से जाने जाते रहेंगे। हम यहां उन्हींके विधायक पुत्र विनोद सिंह की बात कर रहे हैं जो अपनी कला-संस्कृति संबंधी सक्रियताओं के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके विधायक पिता की जब गिरिडीह में नक्सलियों ने हत्या की थी, तबवे कला कम्यून में थे और कश्तूरी नाम की फिल्म के निर्माण में व्यस्त थे। आज भी वे अपने साथ के लोगों-परिचितों को कला-कम्यून में ले जाते हैं। दूसरों की तरह कला के नाम पर दोहन के लिए नहीं, वहां उनमें आम जीवन की कला के संस्कार से भरने के लिए। ऐसा इसलिए कि उनमें लोगों को कला-संस्कृति की चेतना से जोड़ने की भूख है। वे वहां तलाशते हैं आमजन की कला-संस्कृति की चेतना। अपने पिता से विरासत में मिले प्रतिरोध के संस्कार से लैस होकर विनोद सिंह जनता के बीच अपनी कला से प्रतिरोध की चेतना को एक नया आयाम दे रहे हैं। कविता पोस्टर और मूर्तिशिल्प से उन्होंने अपने गांव दुर्गीधवैया को लगभग पाट दिया है। गांव का एक हिस्सा तो जैसे कलाग्राम के अहसास से भर देता है। विरासत में पाया बौद्धिक संस्कार किन-किन रूपों में फल-फूल रहा है और कला चेतना की गहनता के साथ यथार्थ से उनके सरोकारों की सघनता का आज क्या हाल है, इसे जानने के लिए हमने उनसे बातचीत की। 2007 में पार्टी लाईन से हटकर विनोद सिंह संप्रग सरकार को बचे रहने के विरोध में थे। इससे जाहिर है कि उन दिनों विनोद काफी शिद्दत के साथ उधेड़बुन में थे। जाहिर है कि राजनीतिकर्म में वे काफी गहरे उतर चुके हैं। दूसरी बार जब वे विधान सभा के लिए चुन लिए गए तो पार्टी के एक हल्के में चर्चा थी बगोदर से किसी और को टिकट दिए जाने की और विरोधियों में भी इसे लेकर रणनीति बन रही थी। लेकिन जमीनी काम को दरकिनार किया जाना मुनासिब नहीं हुआ और जीत उसका प्रमाण बनी। कभी-कभी लगता है जैसे जनसरोकारों को लेकर वे किसी भी हद तक जा सकते हैं और विधायकी या गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई की उन्हें परवाह नहीं।

राजनीति बाध्यता है या अभियान, इस पर उनका कहना है कि राजनीति में आने से पहले मैं भले ही कला-संस्कृति में सीधे सक्रिय था, पर इसका मतलब यह नहीं कि वहां मेरा कोई सामाजिक सरोकार नहीं था। हां, यह अलग बात है कि सीधे राजनीति की तरह नहीं। कहीं न कहीं जो वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकार थे, शायद उन्हीं कारणों से राजनीति में भी रह गया। हां, यह बात जरूर है कि राजनीति में हमारे सामाजिक सरोकार सीधे हमारे कर्म को प्रभावित करते हैं। यहां प्रत्यक्षतः सामाजिक सरोकार राजनीति को प्रभावित करते हैं। कला में यह काम घुमाफिराकर होता है। और चूंकि इस सारी प्रक्रिया में शिल्पगत कौशल का बड़ा हाथ होता है, इसलिए बहुत बार कलाकार के सामाजिक सरोकार को रेखांकित करना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है। फिर भी मेरा मानना है कि राजनीति सामाजिक सरोकारों को सिद्ध करने का सीधा जरिया नहीं। आप कला में अपने सरोकारों को लेकर सीधे प्रवेश करते हैं, अभिव्यक्ति के लिए रूपों के चुनाव में, युक्तियों के चुनाव में सरोकार थोड़ा दब जाते हैं। रूप-वस्तु के द्वंद्व में यह अंडरकरेंट रह जाता है।

वे अपनी बात के विस्तार में जाकर कहते हैं कि राजनीति में आपकी संलग्नता बहुत बार सीधे नहीं हो पाती। तंत्र की बाध्यताएं आड़े आती हैं।

कला-संस्कृति, वैचारिक बहस की गुत्थम-गुत्थी में डूबे रहनेवाले विनोद सिंह क्या कुछ मिस नहीं कर रहे? इस पर विनोद जी का कहना है कि अब राजनीति में सीधे जुड़ने के बाद तो तरह-तरह की व्यस्तताएं और सक्रियताएं आ जाने से समय की घोर कमी आ गई है। पहले की तरह सक्रिय होकर उस क्षेत्र के लिए कुछ नहीं कर पाने की कसक तो है, पर उसकी भरपाई के लिए सृजनात्मक कार्यों में लगे रहने से खुशी मिलती है।

कला की गहन चेतना और यथार्थ के सघन सरोकारों से जुड़ा एक गंभीर कलाकार राजनीति में एलिएन (विजातीय) तो नहीं ? विनोद जी कहते हैं कि लगभग सभी लोग राजनीति को गाली देते हैं। कुछ लोग इसे एक गंदी नाली तक कह ते हैं। एक हद तक यह बात सही भी है और यह भी कि उसमें रहनेवाले कुछ लोग उसे और भी गंदी करते हैं। कभी-कभी शातिर सियासी कलाबाजियों से तो कभी बेहद फूहड़ता और टुच्चई से गंधा रहे इस माहौल में ऊब भी होती है। लेकिन ऊब कर वहां से निकल जाना इसका कोई उपाय नहीं। लगता है यह पलायन होगा और इससे अवांछितों को आसानी से जगह मिल जाएगी। वे कहते हैं कि अपनी प्रतिबद्धताओं और सरोकारों को बचाकर रखते हुए कुछ भी कर सका तो पाजिटिव ही होगा।

कला के प्रति आपकी जैसी गंभीर दिलचस्पी थी, क्या उसे देखते हुए अब आप उसके साथ न्याय कर पा रहे हैं (वह पैशन फैशन में तो कन्वर्ट नहीं हो गया?) छूटते ही विनोद जी कहते हैं पहले भी मैं कला के क्षेत्र में कोई बड़ा काम नहीं कर रहा था। कुछ साथी थे, जिनके प्रयास में मैं भी शामिल था। जहां तक कला के सरोकार की बात है तो आप जिस किसी भी क्षेत्र में हों वहां एक हद तक तो आपका सामाजिक सरोकार होता ही है। उन्हीं सरोकारों से प्रेरित होकर कलाकार भी अपना काम करता है। इसलिए राजनीति में आने के बाद ऐसी कोई बात नहीं कि यहां आते ही हमारे सरोकार बदल जाते हैं। जहां तक समाज के लिए कुछ करने की बात है, तो वह कहीं भी किया जा सकता है। यह तय होता है आपकी प्राथमिकता से।

राजनीति से सीधे जुड़ाव के बाद कला के क्षेत्र में पहले की तरह सक्रिय न रह पाने की कसक तो है ही, पर अभी भी कुछ न कुछ कर ही लेता हूं। यह अलग बात है कि पहले सी निरंतरता उसमें नहीं रही। इन दिनों राजनीति से हटकर क्या कुछ कर रहे हैं, इस जिज्ञासा पर वह अपने पढ़ने की भूख के बारे में बताते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों नेपाल पर लिखी एक किताब का हिंदी अनुवाद पढ़ा। जब कभी वक्त मिलता है उसे खंगाल लेता हूं।
क्या आप इसे मानेंगे कि कला (किसी भी संस्कृति कर्म ) के बजाए राजनीति सामाजिक बदलाव लाने के लिए एक कारगर जरिया है ? क्या यहीं कारण तो नहीं कि इसने शिद्दत से आपको बांध रखा है।

‘कश्तूरी’ का अनुभव कैसा रहा ? क्या इसे आप विस्तार देने की सोच है ?
फिल्म निर्माण बस एक अनुभव के लिए था। बहुत कुछ सीखा, जाना। लेकिन ऐसा नहीं कि यहां फुलस्टाप हो गया। इससे मिली सीख के आधार पर आगे भी कुछ करेंगे। यह फिल्म निर्माण के लिए फिल्म निर्माण कम और कलाकर्म के अनुभव के लिए अधिक था।

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

बाजार से फार्मूलाबाजी नहीं बचा सकती

मार्क्स, हीगेल, लोहिया, सुकरात, गांधी, काफ्का
सबपे भारी पड़ रहा है, फलसफा बाजार का।
- उर्दू शायर देवेंद्र गौतम
यह शेर अपने परिप्रेक्ष्य में बाजार की दिशा और उसकी सरपरस्ती की मंजूरी का आतंक बुनता है। अर्थ के विस्तार ने और फिर उसके दबाव ने चेतना को संकीर्ण किया। भोगवाद को बढ़ावा देनेवाले तंत्रों ने अपना हसीन जाल बुना। हम सिमटते गए उन जालों में। खोते गए खुद को। और इस तरह सांस्कृतिक तत्वों के लिए दुर्वह परिस्थितियों को हमने और हमारी उदासीनता ने मजबूत होने, हावी हो जाने दिया। सभी पढ़े-लिखे संवेदनशीलों ने इसे करीब से शब्दजगत में इस हलचल की रेकार्डिंग देखी-सुनी। सूचना के विस्फोट में संवेदनाएं बह गईं। आकस्मिक नहीं कि अखबार की तादाद बढ़ती गई और किताब सिमटती गई। गणित की भाषा में मस्तिष्क और हृदय, सूचना और संवेदना व्युत्क्रमानुपाती कही जाएंगी। इस दौरान संस्कृति के समक्ष भविष्य का संकट, अस्तित्व रक्षा का प्रश्न विकट वैताल बनकर खड़ा है। और एक फार्मूला विकसित हुआ कि बाजार में जगह बनाकर ही बचा जा सकता है। सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट के दर्शन में फिटनेस की यह शर्त चस्पां कर दी गई। जितनी सहूलियतों के साथ बाजार की महाठगिनी अपने नखदंत लेकर प्रकट हुई है उसके मुकाबले दोगले मीडिया और सत्ता के दलाल मठाधीशों की नपुंसकता किसी काम की नहीं। यह तो बाजार के बेडरूम में सज-धजकर पहुंची हुई कालगर्ल है। और राजनीति हरपल किसी भी बोलीपर नीलाम को तैयार...और जिस साहित्य के पास पाठकों का रोना हो भला वह किस फौज को लेगा अपने साथ। साम्राज्यवादी ताकत जब कभी संकट में पड़ती है तो वह किसी न अबूझ से लगते मोहक-दुरूह-पहेलीनुमा दर्शन लेकर प्रकट होती है। इतिहास का अंत, नई विश्वव्यवस्था, उत्तरआधुनिकता... क्या इस पर लट्टू होनेवाले विमर्श कार? या कारपोरेट वामपंथी या सजावट के लिए ड्राइंगरूम में विचार रखनेवाली गाड आफ स्माल थिंग्स ? क्या किसी राष्ट्रीय समझ के बगैर भी आपका काम चल जाएगा। आखिर किस राष्ट्रीय समझ और इस समझ के किस सातत्य का परिचय वह दे रही है ?

(प्रभात खबर की ओर से ‘संस्कृति और बाजारवाद’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी (2004-5) के संचालन के क्रम में संबोधन पर आधारित। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रामजी राय व विशिष्ट अतिथि संजीव थे। )

आखिर नामवर सठियाए तो क्या हुआ

(मोहल्ला में नामवर पर केंद्रित दिलीप मंडल के 9 जुलाई 2010 के पोस्ट यह कौन बोल रहा है? तोगड़िया या ठाकुर नामवर सिंह? पर प्रतिक्रिया – (29.10.2010) )
याद कीजिए जब निराला की कविताएं सिर्फ आलाप हुआ करती थीं, वह भी चूके थे। निराला की स्पर्द्धा में पंत की ग्रंथियां निराला की पैरोडी बनकर बहने लगी थी। हम बिहारी जिसे भसियाना कहते हैं उसे ही सठियाना भी कहते हैं। जब आप दुर्बल होते हैं तो छोटी-छोटी चीजों से परास्त होने लगते हैं। बैक्टीरिया से और आसक्ति से। आप रोगी होने लगते हैं, पर नहीं मानते कि इलाज की जरूरत है तो यहीं से हम भसियाते हैं। आखिर कितने दिनों तक नामवरीय कुहासा (यह संजीव का दिया हुआ शब्द है। याद हो कि न याद हो, उन्होंने कभी राष्ट्रीय सहारा में लिखा था) कायम रहेगा। फिलहाल याद कीजिए आचार्य प्रवर किसी भी व्याख्यान में अब विषय केंद्रित नहीं हो पाते। अध्ययन, अनुभव, दक्षता, मेधा पर कोई ऊंगली उठा नहीं सकता। पर ज्ञान के साथ संवेदना और विवेक की भी जरूरत पड़ती है। कम से कम उन्हें बताने की जरूरत नहीं। आखिर क्या वजह है कि अपने अंतरंग क्षणों में जिस विभूति नारायण राय के विवादास्पद बयान को वस्तुगत और सही ठहराते हैं, उसे सार्वजनिक रूप से कहने में उन्हें कौन रोकता है। इलियट की पंक्ति याद रहनी चाहिए प्रेजेंट इंफ्लुएंशेज द पास्ट। क्या इस बिना पर उन्हें नहीं कसा जाएगा कभी। याद है दूरदर्शन के सुबह-सबेरे कार्यक्रम में एक से एक गुलशन नंदा टाईप किताबों पर उनके अनमोल वचन प्रकटिया रहे थे। आखिर यह सब क्या है। मैं जानता हूं यह सब कहकर अपने कई मित्रों को नाराज कर रहा हूं, पर नाराजगी से बचने के लिए कोई गूंगा तो नहीं हो सकता ! कोई अपनी उपयोगिता खत्म हो जाने के बाद खुद को दुहराता रहता है या फिर खतरे – मुश्किल पैदा करता है। गांधी जी का हस्र हमारे सामने है। विवेकानंद अपनी भूमिका के बाद नहीं रहे। भगत सिंह नहीं रहे। सुभाष नहीं रहे। मंडेला रहे तो निर्लिप्त रहे। मान लीजिए कि आचार्य का समय अब नहीं रहा, लेकिन क्या इससे उनका अवदान कम हो जाएगा...लेकिन अपने अवदान की महत्ता बरकरार रखने की चिंता खुद में भी है, इससे कौन इनकार करेगा।
मुझे याद है और कोयलांचलवासियों को याद होगा कि नामवर के निमित्त की श्रृंखला में धनबाद के खनि विद्यापीठ में उनके सम्मान में एक आयोजन था। पूरे व्याख्यान में साहित्यकार की राजनीतिक प्रतिबद्धता को सर्वप्रमुख बताया था। उनकी कथनी का नतीजा में कहा जाना चाहिए कि राजनीति आगे और साहित्य पीछे। उनका स्पष्ट आग्रह था के लेखक पार्टी करे। उनकी नजरों में दुग्ध-धवल वामपंथी पार्टियां। उसमें संजीव और अरुण कमल भी पधारे थे। आचार्य प्रवर के व्याख्यान के बाद सवाल-जवाब का सत्र आय़ा। मैंने सहज जिज्ञासा की कि यदि लेखक राजनीति करेगा तो किसी न किसी पक्ष में होना उसकी बाध्यता होगी। ऐसे में क्या साहित्य दर्पण की भूमिका निभा पाएगा? घुमा-फिराकर उनकी बात राजनीतिक प्रतिबद्धता की अनिवार्यता पर टिकी थी। मैंने कहा कि साहित्य जब खुद ही प्रतिरोध की राजनीति है तो अलग से राजनीति की क्या जरूरत? छोटी सी जगह से उठा सवाल उनको कैसा लगा नहीं, पर उनका जवाब था कि अब तुम कुतर्क कर रहे हो।
इसी तरह अभी हिंदी के तर्पण (हिंदी दिवस व पखवाड़ा के लिए, यह उन्हीं की शब्दावली है, यह २९ सितंबर की बात है। मैंने १७ सितंबर के अपने पोस्ट में हिंदी दिवस की साठवीं बरसी पर मैंने हिंदी के पितरों को याद करनेके लिए पितृ पक्ष कहा था) में इस बार जब कोयलांचल आए तो मैंने किसी पल उनसे अपनी जिज्ञासा रखी कि आपने एक जगह अपने व्याख्यान में जिस रामविलास शर्मा को आचार्य कहकर संबोधित किया था उनके सिधार जाने पर 'इतिहास की शवसाधना नाम से रामविलास शर्मा की इतिहास चेतना को टार्गेट कर आलोचना पूरा एक अंक ही केंद्रित किया था। बात पल्ले नहीं पड़ी। इसपर उन्होंने कहा कि रामविलास जी चमरशौच कर रहे थे। हिदी में बहुत काम बाकी पड़ा था तो वेद पर अध्ययन करने लगे। जबकि संस्कृत का कोई खास अध्ययन उनका नहीं था। ठहरे अंग्रेजी के शिक्षक।
इसी तरह मैंने अपने ब्लाग में अजय तिवारी के बहाने टिप्पणी से एक अंश दे रहा हूं-
अपनी आलोचनाओं में अंतर्राष्ट्रीय रीडिंग रूम दिखानेवाले तो बहुतेरे हुए, पर पोलिश सौंदर्यशास्त्री जान पारांदोव्स्की वाला पन्ना किसी ने नहीं पलटा था। मुक्तिबोध ने बगैर किसी का हवाला दिए कला के जिन तीन क्षणों की बात की है, वह जान पारांदोव्स्की की अवधारणा है। ऐसा इस संदर्भ में इसलिए कह रहा हूं कि मुक्तिबोध पर गहन आलोचन-अध्ययन उन्होंने किया है। उन्होंने भी इस पर कुछ नहीं कहा।
ऐसा लगता है जैसे वर्ष 1957 में पुस्तक ‘नई कविता के प्रतिमान’ नहीं आती तो ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसा प्रतिमान गढ़ा भी जाता या नहीं, संदेह ही है।