माँओं ने हमें
अबूझ शब्दों ने खोली
खाने में लगी हैं
बाबरी मस्जिद मामले में मालिकाने को लेकर आये फैसले पर एक नज़्म...
मुकुल सरल
दिल तो टूटा है बारहा लेकिन
एक भरोसा था वो भी टूट गया
किससे शिकवा करें, शिकायत हम
जबकि मुंसिफ ही हमको लूट गया
ज़लज़ला याद दिसंबर का हमें
गिर पड़े थे जम्हूरियत के सुतून
इंतज़ामिया, एसेंबली सब कुछ
फिर भी बाक़ी था अदलिया का सुकून
छै दिसंबर का ग़िला है लेकिन
सितंबर तो चारागर था मगर
ऐसा सैलाब लेके आया उफ!
डूबा सच और यकीं, न्याय का घर
उस दिसंबर में चीख़ निकली थी !
आह ने आज तक सोने न दिया
ये सितंबर तो सितमगर निकला
इस सितंबर ने तो रोने न दिया
(इंतज़ामिया- कार्यपालिका, एसेंबली- विधायिका, अदलिया- न्यायपालिका, चारागर- इलाज करने वाला,चिकित्सक)
जनज्वार डाट काम के ६ अक्तूबर के उक्त पोस्ट को देखने के बाद १५ अक्तूबर को प्रतिक्रिया -
मैं नहीं कहता कि मैं कोई वाम का झंडाबरदार हूं। विचारधारा की प्रतिबद्धता एक हद के बाद के बाद अवाम को , जीवन को पीछे छोड़ देती है और पार्टी आगे आ जाती है। लब्बोलुआब यह कि मुसलमान को इस जनतांत्रिक देश में वे सब हक हैं जो इसके नागरिक को। इसी तरह उसका फर्ज होता है कि वह राष्ट्रीय मूल्यों को आम नागरिक की तरह मंजूर करे और अमल में लाए। यह इस मुल्क की महानता नहीं तो और क्या कि कभी के आक्रांता (क्योंकि उनको उनपर गौरव है) के वंशजों को यहां के धार्मिक प्रतीक बन चुके राम को अपनी जन्मभूमि से बेदखल करने का हक मिला हुआ है। अदालत है कि सभी पुरातात्विक सबूतों को किनारे करते हुए आस्था के आधार पर फैसला सुना देता है। अपनी जन्मभूमि तलाशने के लिए राम को दर-दर भटकने को छोड़ दिया जाता है। अदालत के सामने सबूत हैं कि हिंदू ढांचे पर ही मस्जिद बनी है। कुरआन के मुतल्लिक हवाला भी दिया गया है कि हड़पी या गैर स्वामित्व वाली जमीन पर इबादत करना नापाक है। दारूल-उलूम से लेकर देवबंद और कांग्रेस के कासिम अंसारी तक कह चुके हैं कि मस्जिद एक किमी दूर भी बने तो हर्ज क्या (शायद उन्होने यह तंजिया कहा हो)। ऐसे में साहबान हम किस बात को प्रोमोट कर रहे हैं। क्या मुल्क के बंटवारे में आगे रहनेवाली मुस्लिम लीग के साथ आजाद मुल्क में उसके सहारे चुनाव लड़नेवाली कांग्रेस ऐसे में कहां गलत है। ऐसे में कहां गलत है कि आजादी की लड़ाई में कम्यूनिस्टों ने मुल्क के साथ घात किया। क्या बुरा है कि इस मुल्क के लिए आजादी की लड़ाई में हीरो माने जानेवाले सुभाष चंद्र बोष को अंग्रेज को सुपूर्द करने की संधि कर ली युद्ध का भगोड़ा मानकर। हंसुआ-हथौड़ा के बल पर मुट्ठी-भर लोग संसद पहुंचकर करोड़ों की जनता को सांप्रदायिक कहने को आजाद हैं। वाम के परदे में प्रगतिशीलता के फार्मूले में भारतीयता को, यहां के आदर्श-मूल्य, जनभावना को जमकर कोसने की आजादी जिस वाम में थी, उसी की राह चलकर सेकुलरवाद का मोर्चा मजबूत हुआ है। आप मेरे ब्लाग ww.aatmahanta.blogspot.com पर जाएं और कहें कि क्या मैं केसरिया हूं या लाल? हार्वर्ड फास्ट से लेकर माओ तक को खंगाल लें क्या उन्होंने कभी घिसे-पिटे पार्टी लेखन की वकालत की। आप अपनी साइट पर यह क्या कर रहे हैं। कोई बताए आज तक किसी प्रगतिशील दल या संगठन के झंडाबरदार ने कश्मीर के अल्पसंख्यकों पर कुछ भी बोला। इस पर वे ठीक उसी तरह चुप रहे जैसे अफगानिस्तान व पाकिस्तान के अल्पसंख्यक उत्पीड़नों पर चुप रहते हैं। मैं यहां के अल्पसंख्यकों को पीड़ित-शासित रहने को शापित नहीं मानता, पर इतनी तो खुद्दारी होनी ही चाहिए कि आपमें से कोई खुलकर इन मसलों पर बोले। इस तरह की बकवासों को छाप कर किस तरह की काव्य समृदि दे रहे हैं और कैसी जागरुकता और संवेदना के पक्ष में चीजों को ले जा रहे हैं।
(देश भर में औद्योगीकरण के नाम पर विस्थापन का जो खेल चल रहा है, नर्मदा, सिंगूर व नंदीग्राम उसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इस क्रम में भरी-पूरी आबादी को अमानवीय उत्पीड़न से गुजरना पड़ रह है। मानवता के नाते और भावी चुनौतियों के बरक्स विस्थापित हो रहे लाचार लोगों के दर्द को सुनना-समझना जरूरी हो जाता है। इसी आलोक में हम हिंदी कवि कुमार अंबुज का एक पत्र दे रहे हैं। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के क्रम में हिंदी कवि कुमार अंबुज ने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक मार्मिक पत्र लिखा था। बेहद यादगार यह पत्र किसी राजकीय रिकार्ड में हो कि न हो, पर माडरेटर को लगता है कि यह 20 वीं सदी के खूबसूरत पत्रों में शुमार किया जा सकता है। विकास के निर्बंध-स्वेच्छाचारी माडल में बड़े बांधों से हो रहे विस्थापन के खिलाफ एक करुण आवाज है यह।
इस पत्र के मिलने का एक प्रसंग पाठकों के साथ शेयर करना चाहता हूं। ज्ञान दा (पहल संपादक और कथाकार ज्ञानरंजन) एक-एक चीज का बड़ा ही सार्थक इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने मुझे एक पत्र कुमार अंबुज के किसी पत्र के पीछे के सादा हिस्से में लिखा गया था। पत्र के इस मार्मिक अंश से पूरे पत्र को पाने की इच्छा हुई। पत्र में लिखे पते पर संपर्क करने पर कुमार अंबुज का बड़ा ही आत्मीयता भरा पत्र मय इस अनुरोध के मिला कि अखबार में छापूं तो उसकी प्रतियां ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’, मेधा पाटेकर, वाणी प्रकाशन को भी भेजूं। मैंने वैसा ही किया। इस बात को कम से कम 11 साल हो गए। - माडरेटर)
परछाईं,13 राधा कालोनी, गुना, मध्य प्रदेश
17.08.1999
आदरणीय श्री दिग्विजय सिंह जी,
मुझे एक लेखक के रूप में यह पत्र इसलिए लिखना पड़ रहा है कि मेरी यह जिम्मेवारी है कि मैं समाज और जनता के बीच उस आवाज को तेज करूं जिसकी आप लगातार अनसुनी कर रहे हैं। इसलिए आपको याद दिलाने की धृष्टता कर रहा हूं कि आप शासन प्रमुख और जनतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए जनप्रतिनिधि होने के नाते, नर्मदा बचाओ आंदोलन और बड़े बांधों के संदर्भ में समुचित जिम्मेवारी और संवेदनशीलता से काम नहीं ले रहे हैं।
कोई भी आदमी राजनीतिक होने या तकनीकी होने से पहले एक मनुष्य होता है और वही उसकी सबसे बड़ी जरूरत है। आप सहमत होंगे कि तमाम राजनीतिक उपादान और विकास के नियम भी अंततः अपनी श्रेष्ठता और सफलता इसीमें निहित पाते हैं कि एक मनुष्य का मनुष्य और उसकी प्राकृतिक स्वतंत्रता को उजाड़े बिना ही एक विकसित समाज का, राष्ट्र का निर्माण कर सकें।
एकलेखक के नाते मेरी दिलचस्पी बांध की तकनीक में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उससे मनुष्य तो नहीं उजड़ जाएगा। बड़े बांधों से जिन लोगों तक लाभ पहुंचेगा उसकी गणना को मैं नहीं जानता, बांध के सवाल पर पीछे हटने से सरकारों को कितना नफा-नुकसान होगा उसे भी मैं नहीं जानता और न ही जानना चाहता हूं क्योंकि मैं मनुष्य को जानता हूं। मेरा सारा सरोकार जनता से है। जानना होगा तो जानना चाहूंगा कि क्या बड़े बांध बनने से एक आदमी भी विस्थापित नहीं होगा ? एक आबादी भी डूब में नहीं आएगी ? इसलिए एक मनुष्य की तरह से, उसीकी तरफ से मैं यह पूछने के लिए विवश हूं कि उजाड़ फैलाकर आप कैसी हरियाली चाहते हैं ? क्या आप गांव-शहर बसने की ऐतिहासिक प्रक्रिया और परंपरा के बारे में जराभी विचार करना चाहते हैं ? एक गांव बसने में जितना मानवीय प्रयास, कष्ट, उल्लास और जिजीविषा शामिल होती है उसकी तौल में आप विकास का कौन पक्ष पलड़े में रखना चाहते हैं ? प्रश्न यह भी है कि एक मनुष्य की भावुकता, उसकी संवेदना, आत्मीयता और उसके संताप को आप किस निगाह से देखते हैं ? और आप विकास को किस तरह से देखते हैं ? विनाश के साथ विकास कैसे हो सकता है ? तकनीकों को, विकास के औजारों को मनुष्यों के शवों के ऊपर स्थापित नहीं किया जा सकता है। यह सभ्यता के विनाश का रास्ता है।
एक न्यायाधीश, एक वैज्ञानिक और एक यंत्री क्या कहता है, इसके बरक्स यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह सुना जाए कि एक विस्थापित हुआ आदमी क्या कहता है। उसकी आवाज से प्रामाणिक कुछ नहीं हो सकता। यह संसद, प्रशासन और न्यायालय यदि उजड़ते हुए आदमी की आवाज को कैद करने के लिए काम करेंगे तो यह हमारे समय की सबसे बड़ी अमानवीयता और ऐतिहासिक भूल होगी।
एक गांव, एक आदमी और एक शहर जब डूब में आता है तो वह मानचित्र पर एक निशान मिट जाने भर की घटना नहीं है। इसके साथ वे गलियां भी डूबती हैं जो कई आदमियों के, कई सालों तक एक साथ चलने से, व्यवहार करने से बनती हैं। वे पेड़, वे वनस्पतिय़ां डूब जाती हैं जो आपसे एक जीवित मनुष्य की तरह बर्ताव करती रहीं और दुख, सुख रोग-शोक में काम आती रहीं। वह चंद्रमा, वे तारे और वह सूर्य भी डूब जाता है जो सिर्फ उसी गांव से, उसी कोण से और उसी जगह से इतना आत्मीय और सुंदर दीख सकता था। दिशाएं डूब जाती हैं और वे घर डूब जाते हैं जिनमें जन्म हुआ, जिनकी खिड़कियों से दुनिया को देखने का काम शुरू हुआ और जिनमें गाने गाए गए, उत्सव मने, जिनकी छाया में विपत्तियां झेलीं जिनके सीने से लग रोना रोया, जिनकी मुंडेरों पर सुबह का स्पर्श देखकर सुंदरता का पहला सबक सीखा और जिनमें विलाप हुआ और जिनकी दीवारों के सहारे फिर से खड़े होकर जीवन में वापसी हुई। एक गांव जब डूबता है तो मनुष्यों केवे तमाम संबंध और एक परंपरा ही डूब जाती है जो गांव में पीढ़ियों तक रहकर ही संभव हो पाती हैं। कुओं, खेतों, ढूहों और चौपालों का डूब जाना क्या सिर्फ अजीवित चीजों का डूब जाना है ? क्या हमारी स्मृतियों का डूब जाना एक साधारण और उपेक्षणीय घटना हो सकती है?
सवाल ये भी है कि क्या आप एक आंदोलन को सिर्फ एक विरोध की तरह देखते हैं ? क्या कोई आंदोलन आपके लिए महज एक सामाजिक बाधा है? जब आंदोलनकारी चढ़ते हुए पानी में मृत्यु की परवाह किए बिना खड़ा रहता है तो क्या यह एक जिद भर है ? जो बुद्धिजीवी और समाजसेवी लोग आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं क्या यह उनके लिए शगल है ? क्या नर्मदा और नदियों को बचाने का जिम्मा आंदोलनकारियों और समाजसेवियों का ही है, शासन का नहीं ? सरकार का प्रमुख होने के नाते इन सवालों पर चलताऊ तरीके से निष्कर्ष निकाल लेना घातक होगा। संभव है कि आंदोलन की ऊष्मा और उसकी ताकत को शासन-प्रशासन के जरिए एक दिन परास्त भले ही कर दिया जाए लेकिन उसके बीज मर नहीं सकते। मनुष्य की निराशा सबसे ताकतवर और दुस्साहसिक होती है। सबसे ज्यादा हिंसक और सबसे ज्यादा विध्वंसक। आपको चाहिए कि आपके राज्य में कोई मनुष्य इतना निराश न हो जाए कि वह सृजनात्मकता का, प्रेम का रास्ता छोड़कर अन्य किसी नकारात्मक रास्ते पर चला जाए, यह हार-जीत का, जय-पराजय का मामला नहीं है। और यदि है भी तो जनता की जीत में ही लोकतंत्र की राज्य की जीत शामिल है। बातचीत के लिए प्रस्तुत होने और समाधान के लिए प्रस्तुत होने में गहरा फर्क है।
एक डूबते हुए गांव के निवासी का विस्थापित होना, गांव से शहर में पढ़ने-लिखने, नौकरी करने गए आदमी के विस्थापित होने जैसा नहीं है। डूब में आ रहे गांव के निवासियों के लिए, यह प्रलय आने जैसा है। उनके संसार को नष्ट किए जाने जैसा है। उसे देशनिकाला देने जैसा है। उसीकी अनुभूति और कष्ट को शब्दों में अभिव्यक्त करना लगभग असंभव है है। इसलिए उसे राजनीतिक चेष्टाओं और कानूनी शब्दावली से समझने का प्रयास भी हास्यास्पद भी है और दारुण भी। पुनर्वास का अर्थ इतना सीमित नहीं हो सकता कि आप एक बीघा जमीन की जगह एक बीघा जमीन दे दें। क्या डाल से तोड़ दिए गए पत्ते का पुनर्वास संभव है ? जबकि हद यह कि हजारों परिवार उजड़ चुके हैं। उनकी बलि दे दी गई है। उनका न्यूनतम पुनर्वास भी नहीं हुआ है। और हजारों परिवार इन्हीं हालातों का शिकार होनेवाले हैं।
मैं कहना चाहता हूं कि आप विकास के वैकल्पिक माध्यमों और तरीकों पर ध्यान दें। अभी सिर्फ धन की बर्बादी हुई है जिसका मूल्य मनुष्यों के जीवन के आगे कुछ भी नहीं है। यह घोषणा अविलंब की जाए कि बड़े बांधों का निर्माण तत्काल रोका जाएगा और अन्य विकल्पों को सामने लाकर, विचार कर अमल किया जाएगा। जो लोग बेघर, बेगांव हो चुके हैं उनकी पुनर्वास समस्या का तुरंत हल किया जाए और आगे इस बर्बादी को एकदम रोक दिया जाए। यह कितना भयावह और क्रूर दृश्य है कि संपन्न, खाते-पीते खुशहाल लोगों को एक विपन्न, नारकीय जीवन में धकेल दिया जाए।
इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि जब-जब जनपक्षधरता के आंदोलन को नकारा जाता है, उसकी उपेक्षा की जाती है उनकी उग्रता विकट हो जाती है। इतिहास ऐसे ही उदाहरणों से भरा पड़ा है। जब शासनतंत्र गफिल होने लगता है तो यह समाज में एक बड़े संकट की सूचना होती है। आप एक विचारशील व्यक्ति की तरह इन बिंदुओं पर विचार करें और अविलंब बड़े बांध बनाने, ऊंचे बांध बनाने की शासकीय प्रतिज्ञा को तोड़ दें। यही एक बेहतर विकास का रास्ता होगा।
हमारे प्रदेश के पड़ोसी राज्यों, महाराष्ट्र और गुजरात शासन से बात करने के लिए आपसे अधिक सक्षम व्यक्ति कौन हो सकता है। यदि आप बड़े बांधों और विस्थापन के कष्ट को समझते हैं तो इससे अधिक सौभाग्य, डूब में आ रहे लोगों का और क्या हो सकता है ? क्योंकि तब आपकी दूरदर्शिता, संवेदनशीलता और कूटनीतिक निपुणता का लाभ विनाश के कगार पर खड़े लाखों लोगों को मिल जाएगा। और इसकी उम्मीद आपसे करना उचित ही है क्योंकि आप जिस जगह हैं वहां आपसे संरक्षण की अपेक्षा सहज और अधिकारपूर्ण है।
मुझे आशा है कि आप इस पत्र को जिम्मेवारी और गंभीरता से लेने की कृपा करेंगे।
शुभकामनाओं के साथ,
कुमार अंबुज,
सेवा में,
श्री दिग्विजय सिंह,
मुख्यमंत्री,
म.प्र. शासन, भोपाल। (सौजन्य पत्र लेखक)
(हंस-राष्ट्रीय सहारा के ज्ञानरंजन के खिलाफ विषवमन वाले प्रकरण पर 25 मई-2003 को लिखा गया था)
संस्कृति (मीडिया समेत) और बाजार ये सत्ता के दो उत्तरआधुनिक खंभे हैं और ये खंभे जिनके पास हों तो वह अपनी सत्ता का दुर्ग बना ही लेता है। इन दिनों पहल पर आक्षेपों, आरोपों की जो बौछार हो रही है इन्हीं दुर्गों से। लेकिन ये बेहद सशंकित भी होते हैं और भयभीत भी अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं के कारण। पूंजी के पोषक सत्ता प्रतिष्ठानों की इन्हीं मनोरचना के लिए बादल राग में बहुत पहले निराला ने कहा था – ‘अट्टालिका नहीं है रे, आतंक भवन’ में व्यापारियों के दाम और संस्कृति विभाग के खजाने के दम पर निकल रहे पत्र-पत्रिका व अलभ्य आयोजनों के प्रभुओं को अपना पीएफ झोंक कर कर्ज से लद कर तीन दशक से निकल रही पत्रिका पहल का मर्म समझ में न आए तो ताज्जुब क्या। वामपंथी आंदोलनों की जो ट्रेजेडी रही है, कुछ-कुछ वही वजह रही है ज्ञानरंजन पर इस हमले की पहल। हमलों के पीछे निहित मकसद तथा उसके संयोग से ही यह संगठित और सुनियोजित हो जाते हैं। पहल ने यदि राजेंद्र यादव घराने को छापा है तो मुद्राराक्षस को भी और समीक्षा पुरुष नामवर के लिए सदैव विशेष सम्मान भाव रखा। एक भारी-भरकम विशेषांक तक निकाला। प्रमुखता के साथ उनके व्याख्यान छापे। शायद ही किसी पत्रिका ने नामवर सिंह को केंद्रित कर ऐसा कोई आयोजन किया। यह अलग बात है कि उन्हें हिंदी का अंतिम आलोचक साबित करने वाले सिवाए उपाधि वितरण के और कुछ न किया। इसका मतलब यह नहीं कि पहल ने ऋणशोध की अपेक्षा करते हुए ऐसा किया है। हीन तो पहल ही रही। प्रगतिशील आकल्प में छपे जिस साक्षात्कार को बवाल का मूल बताया जा रहा है उसमें कहीं भी साथी पत्रिकाओं पर समझौतापरस्ती का आरोप नहीं। एक सहज अपेक्षाभाव के तहत ही वैसा कहा गया था कि उनसे अपेक्षा थी कि वे ऐसे नहीं करते। वैसे कथादेश का मंसूबा साफ था तो उसे पूरा साक्षात्कार साभार छाप देना था। परिप्रेक्ष्य से काटकर किसी के भी कथन के निहितार्थ विकृत किए जा सकते हैं। डालर में अपना शुल्क मांगना गुनाह है तो महामहिम अशोक वाजपेयी अपने बहुवचन और राजेंद्र यादव अपने हंस की कीमत डालर में क्यों छापते हैं। क्या बदनाम राकेश मंजुल की सोहबत से पहल या पहल संपादक की भूमिका या अवदान का अन्यथाकरण हो जाता है ? फिर तो जनाब मजदूरों के लिए समर्पित उस मार्क्स का क्या होगा जिनकी सोहबत अपने पूंजीपति फ्रेडरिख एंगेल्स से रही। कई कृतियों के तो वह सहलेखक रहे हैं। पिछड़ों के मसीहा लालू यादव का वंशवाद और मसखरेपन में निहित तानाशाही कहां छूट जाती है शिखर सम्मान लेते समय। अमूर्त लड़ाइयां लड़नेवालों के लिए ये पेचीदगियां बनी रहेंगी। बेहतर होता कि जिन हितैषियों को बदनामी का इलहाम रहता है वे साथियों को सतर्क किया करें बजाए कि छीछालेदर की स्थिति तैयार करने में हाथ बंटाएं। यदि सचमुच उनकी चिंता पहल को लेकर वाजिब होती तो वे आरोप-प्रत्यारोप से क्षोभ को घनीभूत नहीं होने देते। बेहतर होता कि दुश्मन ताकतों को हावी होने से रोकें संगठित होकर। अच्छा होता कि एक बार प्रायश्चित कर लेते। संस्कृति के सत्ता प्रतिष्ठानों पर काबिज ऐसे महाप्रभुओं के लिए राजेश जोशी की कविता ‘इन्होंने रंग उठाए’ के इस अर्थपूर्ण अंश को बार-बार गुनें-समझें –
उन्होंने रंग उठाए,
और आदमी को मार डाला
उन्होंने संगीत उठाया
और आदमी को मार डाला
उन्होंने शब्द उठाए
और आदमी को मार डाला।
बेहतर होता कि यह विवाद और कड़वाहट के पहले ही खत्म हो जाती।
(अगले पोस्ट में ज्ञानरंजन का पक्ष - सांस्कृतिक उपद्रव के उस्तादों का वितंडा)
ज्ञानरंजन के नाम को मानद उपाधि के लिए राजभवन से स्वीकृति न मिल सकी पहल के संपादक ज्ञानरंजन जी इस बात से न तो भौंचक हैं ओर न ही उत्तेजित जितना स्नेही साहित्यकार.इस घटना को बेहद सहजता से लिया.रानी दुर्गावती विश्व विद्यालय की प्रस्तावित मानद उपाधि सूची का हू-ब-हू अनुमोदित होकर वापस न आना कम से कम ज्ञानजी के लिए अहमियत की बात नहीं है. इस समाचार पर आज सुबह सवेरे ज्ञान जी से फोन पर संपर्क साधा तो समाचार को सहजता से लेने की बात कहते हुए ज्ञान जी ने कहा :-गिरीश अब तुम लोग ब्लागिंग की तरफ चले गए हो बेशक ब्लागिंग एक बेहतरीन विधा है किन्तु तुम को पढ़ना सुनना कई दिनों से नहीं हुआ.
हां दादा वास्तव में अखबारों के पास हम जैसों को छापने के लिए जगह नहीं है और मेरा मोहभंग भी हो गया है.
"तो तुम लोगों को सुनु पडूँ कैसे कम से कम एक बार महीने में गोष्ठी तो हो "
भारत ब्रिगेड वेबसाईट पर उक्त का अंश पढ़ने के बाद- --
याद है एक बार मैं एक दैनिक के साहित्यिक परिशिष्ट संपादन के क्रम में हिंदी के तीन दिग्गज कथाकारो भीष्म साहनी, अमरकांत तथा ज्ञानरंजन पर आठ पन्ने का एक परिशिष्ट निकालना चाह रहा था। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में ऐसे आयोजनों से बचने को कहा था। फिर हरि भटनागर से संपर्क साधा उन्होंने कहा उनसे समय लेकर साक्षात्कार लेकर दूंगा। ज्ञान दा को भनक मिल गई होगी सो यह भी नहीं हुआ। परिशिष्ट निकला। चर्चा भी हुई। याद है एक बार मध्यप्रदेश शासन से वहां के संस्कृति परिषद का सचिव बनाया जा रहा था। माह भर के उधेड़बुन के बाद उन्होंने आफर को ठुकरा दिया। उन्हें लगा इससे महत्वपूर्ण है पहल का संपादन। इस पत्रिका को वह अपने खून-पसीने से सींच रहे थे। इसके प्रतिनिधित्व से जुड़े लोगों को अपनी पत्रिका के लिए विज्ञापन के अंबार रहते थे, पर पहल के नाम पर इनके पास टोटा होता था। एक बार कैसे न कैसे ज्ञानरंजन-नामवर का बड़ा बवेला मचा था। आचार्य नामवर के पक्ष के तरकश से एक से एक तीर दागे जा रहे थे। यह सब तब हुआ जब ज्ञान दा पहल में पहली बार नामवर पर बेहद महत्पूर्ण विशेषांक निकाल चुके थे। सालों से संचित उनके चरित्रहनन का भी प्रयास हुआ। उन्होंने बड़े ही बेलाग भाव में उसका स्पष्टीकरण भी दिया था। मैंने एक अंक में पूरे प्रकरण पर लिखते हुए उनके स्पटीकरण को छापा था। कभी किसी को पहल सम्मान देते तो सूचना होती थी, सम्मानित साहित्यकार से संबंधित कुछ रचनाएं और आग्रह (वे आदेश देने की हैसियत रखते थे) भी हो सके तो कुछ छाप दो। मैं अपने ज्ञान-विवेकानुसार उसे बरतता था। एक बार कवि अरुण कमल के पत्र से ज्ञात हुआ कि कवि राजेश जोशी अपने ऊपर केंद्रित अंक देखकर बहुत खुश थे। यह तो है यारबाश ज्ञान दा का मिजाज। यदि एक शासन ने उन्हें मानद उपाधि से वंचित ही कर दिया तो क्या ज्ञान दा का कुछ ले तो नहीं लिया। वह ऐसी चीजों के लिए बने भी नहीं हैं। मुझे संदेह है कि ऐसे शासन की अनुशंसा पर यह स्वीकार भी करते। लेकिन शासन के द्वारा यह बर्ताव ज्ञानानुरागियों के लिए ही नहीं, रचानाकार जमात के लिए घोर अपमानजनक है। इससे साफ दीखता है कि इस वटवृक्ष ने कैसी विचार-संस्कृति का बिरवा बोया है, शासन को इस ऐतिहासिक अवदान से कोई सरोकार नहीं। और ऐसे शासन का सरोकार होगा भी कैसे। इस शासन का यह व्यवहार अचरज का विषय नहीं। आखिर प्रतिरोधी चेतना शासन से सम्मानित भी तो नहीं होगी। चोर से सम्मानित होना कहीं न कहीं चोरी को मंजूरी तो देने के बराबर ही है। खुशी है कि ज्ञान दा एक धब्बे से बच गए। अन्यथा इसे शासन की अनुकंपा का रंग दे दिया जाता।