हमसफर

गुरुवार, 31 मार्च 2011

कितनों की बलि चाहिए मनरेगा ?

रामदेव विश्वबंधु


(दलित विमर्श, पंचायती राज व चुनाव सुधार के लिए फकीराना अंदाज में यायावर बने फिरनेवाले रामदेव जी लगातार अपने निजी जीवन को असहाय करने में लगे हैं। देश भर में घूम-घूम कर मंचों-अभियानों में शिरकत से उनका जी नहीं भरता। फिलहाल विश्वबंधु ग्राम स्वराज अभियान के प्रदेश संयोजन का भार संभालते हैं। किसी विषय पर बुलवाने के लिए आपका एक आग्रह काफी होगा, पर सालों रटते रहने पर एक पन्ना भी वे लिखकर नहीं देनेवाले। पलामू में नरेगा के सोशल आडिट के फलस्वरूप ग्राम स्वराज अभियान के कार्यकर्ता नियामत को उस नेक्सस की बलि चढ़ जानी पड़ी जो तंत्र पोषित है। इस पर लिखने के लिए माडरेटर के अड़ जाने पर उनके सामने कोई विकल्प नहीं था। हालांकि यह राइट अप मेल पर पांच मार्च 2011 को ही हाजिर था। अब जाकर यह तय हुआ कि इसे समधर्मियों को शेयर कने दिया जाए। यह आलेख आत्महंता को मिलने के बाद नौ मार्च को प्रभात खबर में छपा। टिप्पणी आमंत्रित है।)

आखिर कितने लोगों की बलि लेकर मनरेगा अपनी मंजिल पहुंचेगा। मजदूरी मांगने पर मजबूरों की पिटाई होती है। देर से मजदूरी के भुगतान के सवाल पर कभी-कभी मजदूर को आत्मदाह करना होता है। सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया जो मनरेगा को जवाबदेह और पारदर्शी बनाती है, इस प्रक्रिया से भी बिचौलियों-ठेकेदारों का मीटर उठता है। अधिकारियों-कर्मचारियों के कान खड़े हो जाते हैं। जमीनी कार्यकर्ता जो ग्रामीणों को योजनाओं की जानकारी एवं कानूनी बात बताते हैं, उन्हें ठेकेदारों द्वारा कहा जाता है कि ये लोग बरगला रहे हैं। इनकी भाषा में यह बरगलाना है तो हमारी भाषा में जन जागरूकता और जन शिक्षण।

शोषण-दमन, भ्रष्टाचार और सरकारी अनियमितता को उजागर करने पर इस दस वर्षीय राज्य में लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। ग्राम स्वराज अभियान और प्रो. ज्यां द्रेज के सहयोगी रहे ललित मेहता की 14 मई 2006 को बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। ठीक यही हस्र हुआ लातेहार जिला के मनिका प्रखंड के जेरुवा के नियामत का। ग्राम स्वराज अभियान के जमीनी और समर्पित कार्यकर्ता भूखन-नियामत की जोड़ी में से एक नियामत अंसारी को मार्च 2011 की शाम नक्सली उनके गांव से उठाकर ले गए और बेरहमी से पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। यह घटना अचानक नहीं घटी। तीन साल पहले से ही ठेकेदारों और नक्सलियों की ओर से जान से मार देने की धमकी दी जा रही थी। 16 अक्टूबर 2008 को भी उन्हें घेरा गया था। 2 साल पहले वन विभाग ने भूखन-नियामत पर झूठा मुकदमा कर दिया था। इससे उन्हें एक सप्ताह जेल में ही रहना पड़ा था। पिछले साल अगस्त माह में नक्सलियों ने भूखन-नियामत के घरों पर ताला जड़ दिया था। कई बार इन दोनों को धमकी मिली थी। कई बार भागकर जान बचानी पड़ी। सरकार और पूरे प्रशासनिक हलके को इसकी जानकारी है, परंतु कोई कार्रवाई नहीं की गई। दरअसल माफिया, ठेकेदार, अधिकारियों और नक्सलियों का गठजोड़ सरकार के नियंत्रण से बाहर है। वे जो चाहते हैं, वही होता है।

सवाल यह उठता है कि भ्रष्टाचार, शोषण और अनियमितता के खिलाफ कौन बोलेगा। जो बोलता है उसे मौत की नींद सुला दी जाती है। ग्राम स्वराज अभियान के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर मनरेगा लागू करने और सामाजिक सिुरक्षा योजनाओं का सामाजिक अंकेक्षण आदि काम करते रहते हैं। यही बिचौलियों, ठेकेदारों को नागवार गुजरता है। पिछले साल से ही धमकी देनेवाले ठेकेदारों के नाम प्रशासन को बता दिया गया था, परंतु अंत-अंत कर कार्रवाई नहीं हुई थी। नियामत के रिश्तेदार की ओर से की गई प्राथमिकी में नामजद अभियुक्तों में अबतक सिर्फ एक ही अभियुक्त की गिरफ्तारी हुई है। अब यह जगजाहिर हो रहा है कि नक्सली भी ठेकेदारों से लेवी लेकर उस हिसाब से काम करते हैं। आखिर नक्सलियों का सिद्धांत क्या है, वे क्या चाहते हैं ? ठेकेदारों-बिचौलियों का राज या कानून का राज ?  गरीब, ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता अपने गांव के लोगों को शिक्षित करता है। योजनाओं को विधिवत लागू करने का प्रशिक्षण देता है। उसे पैसे लेकर उठा लिया जाता है। एक तरह से नक्सली भी एक तरह के ठेकेदार ही हो गए हैं। यह ठीक है कि पलामू प्रमंडल में नक्सलियों के कई ग्रुप हैं। वे आपस के जानी दुश्मन हैं। पैसे के खेल और बंदरबांट ने सभी को अपने आगोश में ले लिया है। आखिर अब कौन सा मुंह लेकर जनता के बीच जाएंगे ? फ्रांसिस इंदवार और बिहार में मारे गए टेटे का कसूर क्या था ? आनेवाले दिनों में नक्सलियों को इन सवालों से दो-चार होना होगा। नियामत का कसूर क्या था? यदि कसूर था तो उसे जनता के सामने लाया क्यूं नहीं? नियामत की हत्या लोकतंत्र की हत्या है। विकास, अमन पसंद करनेवालों की ख्वाहिश ही हत्या है। सरकार को, प्रशासन को जवाब देना होगा। जनता को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी। शायद यदि हूल (क्रांति) हो तो ये ठेकेदार बने नक्सली क्या करेंगे? इस हत्या ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के मनोबल को तोड़ने की कोशिश है। शासन-प्रशासन यह जान ले कि ग्राम स्वराज अभियान के और भी कार्यकर्ता शहीदी जत्थे में शामिल होने को तैयार हैं। सूची भी दी जा सकती है।

(यह ठीक है कि नियामत जैसे लोग जनतंत्र की ताकत हैं तो नक्सलवाद भी तो जनतंत्र विरोधी नहीं है। व्यवस्था विरोध का मतलब कतई जनतंत्र विरोध से नहीं लेना चाहिए। जहां तक नियामत जैसे निरीह-भोले सामाजिक कार्यकर्ता की हत्या से उजागर हुई दुरभिसंधि का सवाल है तो यह नक्सलवाद में आए भटकाव का संकेत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह भटकाव नक्सलवाद का अंदरूनी संकट है और वहां भी इस पर शिद्दत से कामरेड सोच रहे हैं। अंतर्विरोधों से नहीं उबरने पर छोटा घाव भी कैंसर बन सकता है, इसे हमारे कामरेड बखूबी समझते हैं। इस नाते पूरे नकस्लवादी आंदोलन को कठघरे में नहीं लिया जा सकता है। -मोडरेटर)

लेखक से r_vishwabandhu@yahoo.co.in तथा 09334363559 पर जाकर संपर्क साधा जा सकता है।

वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता में जन की हैसियत

पुष्पराज

(एक हैं पुष्पराज। जेएनयू में प्रो. रह चुके प्रो. ईश्वरी प्रसाद की उधारी से कहें तो घुमंतू पत्रकार। कुलदीप नैयर उन्हें प्रतिबद्धता और साहस से भरा मानते हैं तो प्रभाष जोशी उन्हें पत्रकारिता को सामाजिक बदलाव की दुधारी तलवार माननेवाले पत्रकारों की खत्म हो रही प्रजाति मानते थे। नामवर उन्हें खबरों के संसार का अपना संजय घोषित कर चुके हैं। हां, भारतीय पत्रकारिता में तेवर और तमीज, धार और धारा को जिंदा रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं पुष्पराज। कहना नहीं होगा कि पत्रकारिता की जिस मिशनरी धार को मठाधीशी सरोकारों या सत्ताओं को साधने में खत्म किया जा रहा है, पुष्पराज उसके झंडाबरदार हैं। सिंगुर-नंदीग्राम को जीने-भोगने के बाद नंदीग्राम डायरी नाम से एक किताब भी पेगुइन बुक्स से आ चुकी है। काफी चर्चा में रही। दंडकारण्य से लेकर नंदीग्राम और सिंगूर से लेकर मड़वन (मुजफ्फपुर का वह गांव जहां एस्बेस्टस कारखाने के विरोध में आंदोलन उठा) तक में उन्हें आप पा सकते हैं। वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता की सीमाएं हैं, पर सहुलियतें और खूबियां भी हैं। हमें सरोकारों को ऊपर रखकर माध्यम की सहुलियतों व खूबियों से ही वास्ता रखना (रणनीतिक तौर पर) चाहिए। कई बार गरमागरम बहस हो चुकी है उनसे। किसी सिलसिलें में साल 2009 में कुछ दिनों के लिए हम जमिंदोज थे, तब भी। इत्तफाक क्या कहिए कि डीवीसी घोटाला का कंटेंट भी हमारी बहसों-मुबाहसों के जिक्र में था। और देखता हूं कि इसके कुछ ही दिन बाद मियां खरामां-खरामां हाजिर हैं परदफाश डाट काम लेकर। मेरे लिए चकित और खुश होने के अवसर से ज्यादा यह सोचने का मौका है। मैं चाहूंगा कि हमारे साथी उनकी इस नई पेशकश को देखें और टिप्पणी दें- )

सवाल यह है कि पैदल भारत की पत्रकारिता करनेवाले एक कलम मजदूर को वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता जैसे चमत्कृत (चमत्कारी) विषय पर किस तरह सोचना चाहिए। जिस इलाके से आप दूर रहते हैं, उसके बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। हमने वर्चुअल माध्यम को कल तक इंटरनेट की धमनियों से होकर प्रकट होनेवाली वेबपत्रकारिता की तरह देखा है। हिंदी में ‘वर्चुअल स्पेस की पत्रकारिता’ के कई अर्थ सामने आए हैं। काल्पनिक यथार्थ की पत्रकारिता, करीब-करीब लगभग वैसा ही जैसा वर्णित, परंतु पूर्णतः नहीं की पत्रकारिता। एक युवा पत्रकार ने आभासी दुनिया की पत्रकारिता कहा। आग का एक गोला देखने में अग्निपुंज, हाथ में लिया तो कुछ भी नहीं। खुशबू का एक टुकड़ा, उठाया तो कुछ भी नहीं। पानी से भरा घड़ा, प्यास बढ़ी तो न ही घड़ा, न ही पानी। इस विषय के वास्तविक अर्थ के अनुकूल ही मैंने इसे शुरू से देखा है।

मैं अपने विषय से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए यदा-कदा इंटरनेट का उपयोग जरूर कर रहा हूं, पर मेरे पास 15 वर्षों की पत्रकारिता से इतनी कमाई संचित नहीं हो पाई कि मैं एक कंप्यूटर खरीद सकूं। मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि मेरे पास कंप्यूटर उपलब्ध हो जाए तब भी मैं इस माध्यम से अपने देश के सबसे कमजोर के हक में कुछ भी नहीं कर पाऊंगा। बाजार में उपलब्ध साइबर कैफे के भरोसे काम करना बहुत खर्चीला है। एक घंटा इंटरनेट उपयोग करने का खर्च एक वक्त का भोजन या आधा लीटर दूध के बराबर है। बहुत ही मुश्किल से अपने लिए छपने की जगह ले पाना, बहुत कम पैसे में जीवन जीने की जतन करने वाला हिंदी का एक कलम मजदूर अपना पेट काटकर इंटरनेट सेवा तो प्राप्त नहीं करेगा ना। जो मेरे लिए युक्तिसंगत नहीं है, उस माध्यम से आप देश के आम जन की पत्रकारिता का दावा किस तरह कर सकते हैं। इस माध्यम से एक खास वर्ग का इंटरटेनमेंट हो सकता है, जनहित की पत्रकारिता कतई नहीं।
2009 के मई माह में मैंने केंद्र सरकार के एक प्रतिष्ठित मंत्रालय की देखरेख में, देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने की शिरकत से हुए घोटाले के विरुद्ध ‘परदाफाश डाट ब्लागस्पाट’ नामक एक ब्लाग मित्रों की मदद से बनाया। हमारी समझ थी कि देश की मुख्यधारा की मीडिया जिस मुद्दे को अछूत मान रही है, एक ब्लाग के रूप में प्रकट होने से मुद्दा अपना रास्ता ले लेगा। इस ब्लाग का अंग्रेजी रूपांतरण स्कैम डाट काम के नाम से आया। हिंदी ब्लाग पर मुश्किल से 20 पाठकों की प्रतिक्रिया आई। भारतीय ब्लागरों की दुनिया में लगभग सभी बड़े सरताजों के पास ईमेल लिक मेल भेजे गए थे। इनमें कई मीडिया प्रतिष्ठानों के रायबहादुर भी थे। परदाफाश ब्लाग के सामने आने से परदा नहीं उठा। 5 हजार करोड़ की भ्रष्टाचारिणी दुल्हन परदे के भीतर ही रह गई। हमने हार नहीं मान ली। यह एक अनुभव था। भारतीय ब्लागरों के मुद्दे अलग हैं। वे सब बुद्धिजीवी हैं, पर अपनी सुविधा के विवेक से अपने किस्म की बहसें छेड़ते हैं। हम मानते हैं, जितना समय, शक्ति, भरोसा हमने ब्लाग पर खर्च किया, इतने में हम हजार पुस्तिका तो जरूर छापकर बांट सकते थे। हम पर्चा बांटकर भी हजारों लोगों से संवाद कर सकते थे।
जिस माध्यम से अपनी बात रखते हुए आप मूल्य, नीति-नैतिकता और जन की उपेक्षा करते हैं, उस माध्यम के बारे में मगजमारी का नतीजा क्या होगा। पहली बार एक अंग्रेजी अखबार के वेबसाईट पर अपनी तस्वीर, अपनी लिखाई को देखकर मैं भी चकित हुआ था। लेकिन अपने लिखे को सीसे पर चमकते हुए रंगीन छटाओं में देखने का लुत्फ किस तरह की आत्ममुग्धता है। इस माध्यम ने लिखने वालों को लिखने के लिए कागज, कलम-स्याही के मूल रिश्ते से अलग करने की कोशिश की है। हम यंत्र के साथ एकाकार होकर यांत्रिक हो सकते हैं, मानवीय कदापि नहीं। यांत्रिक मानस का विवेक साहित्य, संस्कृति, पत्रकारिता के एक-एक आइकान को खारिज करने में लगे तो क्या यंत्र अपनी सुविधा के नए आइकान तैयार कर लेगा।
ब्लाग-वेबसाइट की दुनिया के कर्ताधर्ता इस माध्यम को प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के समानांतर वैकल्पिक मीडिया की तरह पेश कर रहे हैं। दावों के अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन जिस माध्यम को समूह नहीं व्यक्ति संचालित करता है, उसमें व्यक्ति के निजी स्वार्थ, व्यक्तिगत कुंठा, अपनी आकाक्षाएं ज्यादा प्रबल हो जाती हैं। मानवीय गरिमा की छाती पर प्रोफेशनल यश का भूत सवार होना घातक है। हिंदी के ज्यादातर ब्लाग यशोकामियों के, यशाखेट के अड्डे साबित हो रहे हैं। कुछ ब्लागों ने भारतीय पत्रकारिता के आईकान प्रभाष जोशी के खिलाफ हजार-हजार बार ब्राह्मण-ब्राह्मण का शोर मचाया। ब्राह्मण की कोख से पैदा होना अगर अपराध था तो क्या उन्हें इस अपराधबोध में आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी। किसी भी भारतीय नागरिक को जाति सूचक संज्ञा से संबोधित करना सभ्य भारतीय समाज की परंपरा नहीं नहीं हो सकती तो भारतीय अपराध संहिता में संवैधानिक अपराध है। दरअसल वर्चुअल स्पेस में इतनी सहूलियत है कि आप झांककर देख लीजिये कोई बीमार तड़प रहा है और उसकी असहाय स्थिति में हाथ लगाये बिना, उन्ही हाथो से कोई मेल चस्पां कर दीजिए। .ऐसे में वर्चुअल स्पेस से फैलते अमानुषिक संस्कृति पर बहस भी ठीकाने नहीं लग सकती। नामवर सिंह महान या घंटा... की वोटिंग कराई गई। घंटा का देशज मतलब घंटी नहीं, शरीर का खास हिस्सा है, जिसे हूबहू लिखना इस समय असंगत होगा। एक ब्लागर ने एक विद्रोही कवि को नीचा दिखाने के लिए लिखा - वे पहले गोली दागते थे, अब मूत रहे हैं। ब्लागरों ने पत्रकारिता और साहित्य के आईकानों को गालियां देकर चर्चा में आने की खूब कोशिशें कीं। नामे-नाम कि कुनामे नाम, ऐसे ब्लागरों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई नहीं होने से वे ज्यादा ताकत से गंदगी फैलाते रहे।
ब्लागरों की भीड़ में कुछ ब्लाग ऐसे भी हैं, जिनसे पत्रकारिता की दुनिया की अंतर्कथाएं बाहर आ रही हैं। भड़ास4मीडिया मीडिया महकमे की खबर के लिए लोकप्रिय हुआ है। ब्वाइस आफ जर्नलिस्ट की भूमिका सकारात्मक है। स्टार पत्रकार पुण्यप्रकाश वाजपेयी और जाने-माने कथाकार उदय प्रकाश का ब्लाग सम्मान के साथ पढ़ा जा रहा है। पूंजी घरानों की पूंजी से नियंत्रित मीडिया ने जिस सत्य को दबाने की कोशिश की है, उसे इस वर्चुअल स्पेस से कहने की कोशिश तब सार्थक हो सकती है, जब भारत का हर आदमी साक्षर हो जाए। हर साक्षर गरीबी रेखा से ऊपर उठ चुका हो। हर भारतीय नागरिक के पास अपने हिस्से का स्पेस, वर्चुअल दुनिया में उतना ही उपलब्ध हो, जितना कि मीडिया घोषित किसी महानायक अमिताभ बच्चन के लिए। क्या इस मायावी लोक में सबसे अंतिम आदमी और सबसे अगले आदमी के कद को एक तरह देखने की कोशिश कभी की जाएगी ?

शनिवार, 19 मार्च 2011

अस्मिताएं विलीन हो जाएंगी और बचेगा सिर्फ जीवन

ग्लोबल हो रही दुनिया में बाजार एमएनसी से पटते जा रहे हैं तो दूसरी ओर सहुलियत के जाल में लिपटे बाजार की नई-नई मोहक-हसीन अधीनताएं अस्मिताओं को निगलती जा रही है। बड़ी अर्थव्यवस्थाएं विकासशीलों को इस कदर लाचार कर दे रही हैं कि उनकी अस्मिताएं खुद ब खुद विलीन होती जाएंगी। बाजार के प्रभुत्व के सामने शेष सारे नीति-सिद्धांत क्षणभंगुर होते जा रहे हैं या उसके फार्मेट को तय कर रहे हैं। यह एक स्थिति है जो कुछ दिनों तक ही कायम रहनेवाली। लेकिन इस अवधि को ही जीवन का विस्तार माननेवाले यह भूल करेंगे कि बाजार को जीवन की नियति मान अपनी दिशा बदल लें।

भारत जैसे मुल्क में स्थिति दूसरी तरह से बदल रही है। राष्ट्र, धर्म-अध्यात्म, इतिहास, संस्कृति के प्रति बहुसंख्यकों के सहज अनुराग दुराग्रह में बदल जाएंगे। वे सारे अनुराग आजादी के बाद चुनावी रौ में क्रमशः पाखंड में बदलते जा रहे हैं, तो अल्पसंख्यकों में कट्टरता कवच बनती जा रही है। पाखंड पहले खुद के प्रति क्रूर और हिंस्र (तप-व्रत) बनाता है फिर वह समय-समाज के प्रति अनुत्तरदायी (संघ-मठ) बनाकर उसका अनिष्ट करने को तत्पर करता है। दूसरी ओर कट्टरता पहले समय-समाज के प्रति अनुत्तरदायित्व बनाकर (राष्ट्र नहीं, धर्म सर्वोपरि) फिर अंततः खुद का अनिष्ट (फिदायीन) करने को लालायित-प्रेरित-उत्साहित करती है।

आखिर ऐसा क्या है जो बाबरी मस्जिद को तोड़कर मिल जाएगा और ताजमहल कैसे इस मुल्क की अस्मिता पर चार चांद लगाता रहा है ? बाबरी मस्जिद को किसी भी कीमत पर हासिल करने की जिद पाले भक्तजनों में से कौन यह बताएगा कि ताजमहल को देखकर वह बर्बर हाथ क्यों नहीं दीखता जो हजारों अद्भुत कारीगरों के खून से सना है। आखिर यह किस कला के प्रति कैसा अऩुराग था जो प्रेम के आगोश में जाकर खूनी हो गया और हम अंधों को सिर्फ उत्कट प्रेम की मनोरम कल्पना का अद्भुत संसार ही नजर आता है। क्या यह ताजमहल हमें अपनों के प्रति उदासीन रखकर क्रूर और हिंस्र बने रहना तो नहीं सिखाता रहा है ? इस आड़ में पीड़कों-प्रताड़कों के प्रति विरोधी भावों का शमन भी तो हो जाता है। कला के प्रति अनुराग जो उत्कट प्रेम के प्रति श्रद्धांजलि में व्यक्त हुआ है, क्या सचमुच वह प्रेम था। क्या प्रेम की परिणति इतनी क्रूरता और हिंसा में होती है।

क्या वे कारीगर जो 20 हजार से अधिक की तादाद में थे उनका खून देसी सैलानियों के खून नहीं खौलाता तो संवेदना, समझदारी और राष्ट्रीयता को ले मर-मिटने की कसम खानेवालों को ढोंगी नहीं तो क्या कहा जा सकता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अंग्रेजों को यह पसंद है तो हमें क्यों नहीं। अन्यथा हम जाहिल समझे जाएंगे। नहीं, ताजमहल को तेजोमहालय का विकृत रूप बताकर उसे मंदिर साबित करने की जिद (पीएन ओक Purushottam Nagesh Oak) पालनेवाले जैसे लोग भी तो थे। 1828 से 1835 के बीच दो बार जिस ताजमहल को नीलाम कर उसके कीमती पत्थरों, रत्नों, नगों को इंग्लैंड ले जाने की जिस कोशिश को उसी इंग्लैंड की जनता और संसद ने नाकाम कर दिया तो इस देश में फिरंगियों से बड़े दीवाने भी रहे हैं, तभी तो ऐसा ताजमहल इस मुल्क में बचा रहा है। तो इसका मतलब है कि उस मुल्क में बाबरी मस्जिद के जीर्णोद्धार की जिद फितुर ही रहे। संवेदना, करुणा, धर्मपरायणता, राष्ट्रभक्ति, ऐतिहासिक चेतना को भुलाने की भी ढेरों युक्तियां यहां मौजूद है। सारी मार को भूलकर उन महिमामंडित प्रहारों पर मुग्ध होते रहने के ढेरों आसार हैं यहां। जो घाव दिए उसे श्रृंगार का रूप देकर मनोरम बना दिया गया है। विकृति का भोग और भोग का बाजार !

बाबरी मस्जिद का मसला उठानेवालों के लिए तो यह भी एक मुद्दा होना चाहिए। दरअसल आजादी के बाद मुल्क में कोई भी पार्टी नहीं रही जिसके लिए नीति-सिद्धांत का कोई महत्व रहा। न्यूआंस वैल्यू (नुकसान करने की क्षमता) तय करता है कि वोट के बाजार में किसकी कितनी कीमत होगी। और यहीं से पार्टी अपने छद्म आवरण को अपना शरीर बताती है और हम रिझते रहते हैं उसके चोला पर।

क्या आपने कभी सोचा है कि भाजपा जैसी व्यापक जनाधार वाली पार्टी सांप्रदायिक और राष्ट्रद्रोहियों को पनाह देनेवाली पार्टियां सेकुलर कैसे हो गईं ? क्या ऐसा कहकर (कहनेवाले की जमात में राजनेता से लेकर कथित वाम लेखक, मीडियाकर्मी सभी शामिल हैं) कहीं मुल्क की बहुत बड़ी आबादी (भाजपा के मतदाता रहे हैं) को तो सांप्रदायिक नहीं ठहराया जा रहा ? आखिर भाजपा को सांप्रदायिक ठहराकर उसके मतदाता को ही तो यह तमगा दिया जाता है ! आखिर किसी पार्टी या संगठन या व्यक्ति को यह हक किसने दिया कि वह मुल्क के इतने बड़े अवाम के लिए इतनी बड़ी गाली दे ? और तुर्रा यह कि राष्ट्रीय गरिमा पर इस आघात से कहीं चूं तक नहीं होता। हमें समझना चाहिए कि किसी पार्टी का किसी विचारधारा - सिद्धांत से कोई सरोकार नहीं रहा। एक ही सिद्धांत और विचारधारा है और वह है वोट पर कब्जादारी। अन्यथा क्या कारण है कि 1991 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार में आए आर्थिक सुधार के नाम पर बाजारीकरण, भूमंडलीकरण, निजीकरण का सर्वाधिक मुखर विरोधी रहे मीडिया उसकी रखैल हो गया और एनडीए उसका पोषक। एनडीए सरकार में 1999 में पहली बार विनिवेश मंत्रालय बना था और बड़े लिक्खार अरुण शौरी उसके मंत्री बने थे। उस दौरान हुए विनिवेशों का आकलन बाकी है।

क्या सिर्फ दलित होने से रामविलास पासवान का जुर्म जुर्म नहीं रहा ! रुग्ण घोषित उर्वरक इकाइयों के पुनरुद्धार के नाम पर देश भर में जो खेल रामविलास पासवान ने खेला भोली जनता को देश भर में घूम-घूम कर छला और उर्वरक-रसायन-इस्पात मंत्रालय में रहकर चुनावी बाजार बनाने भर के लिए देशभर में विज्ञापन में पैसे लुटाए उसका अपना अलग ही किस्सा है। बरौनी में बंद खाद कारखाना के दुबारा खुलने के नाम पर उसका उदघाटन तक कर दिया। उस दौरान मीडिया भी उनकी मूत और थूक को बाजार का गंगाजल मानकर पीता रहा। (शौरी और पासवान के कार्यकाल की तफ्तीश कई स्पेक्ट्रम घोटालों का राजफाश करनेवाला साबित होगा।)

जितनी और जैसी घिनौनी और मारक स्थितियों में रहकर जीवन बचाकर चलना मुश्किल हो रहा है उसमें प्रतिरोधी चेतना जिस तरह संघनित होंगी उससे ऐसा लगता है जैसे बहुत जल्द मुल्क की अस्मिताओं का विलोप हो जाएगा। हम सिर्फ और सिर्फ मनुष्य बनकर रहना पसंद करेंगे। यह तथ्य है कि जिस तरह मनुष्य हमेशा नर और मादा बनकर नहीं जीता, उसी तरह वह हमेशा हिंदू-मुसलमान बनकर जीना पसंद नहीं करता और न ही हर पल उसके लिए हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी-ब्रिटिश बनकर जीना मुनासिब होता है। उसकी इंद्रीय और चेतना के स्तर और विस्तार उसके इस स्वरूप को तय करते हैं कि किस पलड़े में उसका कितना हिस्सा बीतता है। और मनुष्य होने या मनुष्य बने रहने या मनुष्य के रूप में उसका विकास भी इसी से तय होता है। दरअसल जीवन इसलिए है कि संवेदना है। और इसीलिए सभ्यता है। हमें यह मुगालता छोड़ देनी चाहिए कि सभ्यता इसलिए है कि हमारे पास उन्नत अर्थव्यवस्था और हाई फाई टेकनोलाजी है। ये सब तो एक न एक दिन संकट ही रचते है या युद्ध और संघर्ष के रूप में या फिर हादसों के रूप में तबाही रचकर।

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

मुल्क को सर्वाधिक नुकसान आजादी और संविधान से

यह मुल्क कब आजाद हुआ ? कोई बच्चा इसका उत्तर नहीं दे तो कहेंगे कि वह अभी बड़ा नहीं हुआ। किशोर जब इसका उत्तर नहीं दे तो कहते हैं कि उसका जीके अभी कमजोर है। कोई युवक इस सवाल पर चुप रहे तो कहेंगे कि उसे देश-दुनिया की खबर ही नहीं, तो कौन सी जिम्मेवारी के प्रति वह इंसाफ करेगा। और जब एक प्रबुद्ध इसका उत्तर न दे तो आप क्या कहेंगे ? यही न कि वह पाकपरस्त है, पश्चिमी आबोहवा में रंगा है, आतंकी है-नक्सली है। कोसने के लिए आपकी झोली में ढेरों अलफाज होंगे। मैं कहूंगा कि यदि यह मुल्क 15 अगस्त 1947 को आजाद कहा जाता है तो मेरा सवाल है कि यह गुलाम ही कब हुआ था ? सनातनियों की शाश्वतता की शब्दावली में नहीं कि अजर-अमर आत्मा किसी के अधीन नहीं होती। आभासी पराधीनता तो एक चोला है जो देश-दुनिया के हिसाब से बदलता है। यह आत्मा कभी अमरीका में तो कभी अफगानिस्तान में, कभी हिंदु्स्तान में तो कभी अजरबैजान में चोला धारण करती रहती है। इसलिए इसकी कोई धरती नहीं और यह कहीं की नागरिक नहीं। हे अज्ञानी, जड़मति सुजान ! आत्मा को परिधि में खींचकर ब्रह्म को सिकोड़ते क्यों हो ? नहीं। मेरा कहना यह नहीं। मैं कहता हूं कि क्या भारत कहलानेवाली धरती यही है। और यही है तो शेष भूखंड कहां चले गए। अबतक सभी अनुष्ठानों में ‘भारतवर्षे, भरतखंडे’ का वह भूखंड कहां गया जिसकी अर्चना अनायास अभी भी घरों में होती है। कब-कब किन्होंने गुलाम बनाया और कौन गुलाम बने ? क्या वे आक्रांता अब इस भूखंड से चले गए ? कब-कब यह भूखंड आजाद हुआ और कौन आजाद हुए या कौन आजाद किए गए ? जिनके लिए आजादियां थीं क्या उन्हें नसीब हुईं ? गुलामी-आजादी की बात होगी तो पूरे संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में। आजादी को परिभाषित करने के कोई देशकाल और उसके मानक तो होंगे ?क्या आर्य हमलावर नहीं थे ? तुर्क और तातार क्या थे ? सिर्फ अंग्रेजों ने ही इसे गुलाम बनाया था? गांधी को क्या हक कि वह फिरंगी को तो भगाए और शेष हमलावरों का घर घोषित कर दे इसे ? क्या यह घर उनका था ?आखिर फिरंगी को भगाने और शेष को बसाने का हक उन्हें किसने दिया ? भगत सिंह ने अपना जीवन क्यूं कुर्बान किया ? भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाए जाने के (23 मार्च 1931 को) छह दिन बाद गांधी जी ने यंग इंडिया में अपने एक लेख से जता दिया था कि भारतीय भगत सिंह को कैसे लें। अंश है......भगत सिंह जीना नहीं चाहते थे। उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया। यहां तक कि अपील भी दाखिल नहीं की।...उन्होंने असहायता के चलते और अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लिया। भगत सिंह ने लिखा था, “मुझे युद्ध करते हुए गिरफ्तार किया गया है। मेरे लिए फांसी का फंदा कोई मतलब नहीं। मुझे तोप के मुंह में रखकर उड़ा दो।” इन नायकों ने मौत के डर को जीत लिया था। आइये हम उनकी बहादुरी को शत्-शत् प्रणाम करें। लेकिन हमें उनके काम की नकल नहीं करनी चाहिए।...हमें कभी भी उनकी गतिविधियों का प्रतिपालन नहीं करना चाहिए। अब मैं कहता हूं कि अंग्रेज यही तो चाहते थे। फांसी से उनकी मुक्ति के लिए दो लाख नागरिकों ने अपील की थी और दूर क्यों जाएं, इसके लिए कांग्रेस का भारी अंदरूनी दबाव भी था। इस सबके बावजूद इस मसले से उदासीन रहते हुए अहिंसक गांधी का रुख उनके प्रति क्रूर-कठोर ही बना रहा। वहीं सुभाष ने फांसी के दिन शहादत को सलाम करने के लिए दिल्ली में जनसभा तक की। कहा तो जाता है कि इस सभा को रुकवाने के लिए इरविन ने गांधी को पत्र भी लिखा था। आखिर गांधी का प्रभाव और रुख देखकर ही तो पत्र लिखा होगा इरविन ने। और नेता जी सुभाष को देश निकाला क्यों झेलना पड़ा या जिस मुल्क की आजादी के लिए सबकुछ न्यौच्छावर किया उसी मुल्क के आजाद होने पर वहीं उन्हें छद्मवेशी होकर क्यों रहना पड़ा ? क्या स्वतंत्रता संग्राम इनसे परिभाषित नहीं होता ? संग्राम में ताकतवर होते गए इन सेनानियों की ऐसी उपेक्षा से ही स्वतंत्रता के मान-मूल्यों को उपर ले जाया जा सकता है क्या ? थोड़ा ठहरकर आप आजादी की भगत सिंह की परिकल्पना पहले आप देखें –हम यह स्पष्ट घोषणा करें कि लड़ाई जारी है। और यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी, जब तक हिन्दुस्‍तान के मेहनतकश इंसानों और यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा का कुछ चुने हुए लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहेगा। ये शोषक केवल ब्रिटिश पूँजीपति भी हो सकते हैं, ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी एक साथ भी हो सकते हैं, और केवल हिन्दुस्‍तानी भी। शोषण का यह घिनौना काम ब्रिटिश और हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही मिलकर भी कर सकती है, और केवल हिन्दुस्‍तानी अफसरशाही भी कर सकती है। इनमें कोई फर्क नहीं है। यदि तुम्हारी सरकार हिन्दुस्‍तान के नेताओं को लालच देकर अपने में मिला लेती है, और थोड़े समय के लिए हमारे आंदोलन का उत्‍साह कम भी हो जाता है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि हिन्दुस्‍तानी आंदोलन और क्रांतिकारी पार्टी लड़ाई के गहरे अँधियारे में एक बार फिर अपने-आपको अकेला पाती है, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लड़ाई फिर भी जारी रहेगी। लड़ाई फिर से नये उत्‍साह के साथ, पहले से ज्यादा मुखरता और दृढ़ता के साथ लड़ी जाएगी। लड़ाई तबतक लड़ी जाएगी, जबतक सोशलिस्ट रिपब्लिक की स्थापना नहीं हो जाती। लड़ाई तब तक लड़ी जाएगी, जब तक हम इस समाज व्यवस्था को बदल कर एक नयी समाज व्यवस्था नहीं बना लेते। ऐसी समाज व्यवस्था, जिसमें सारी जनता खुशहाल होगी, और हर तरह का शोषण खत्‍म हो जाएगा। एक ऐसी समाज व्यवस्था, जहाँ हम इंसानियत को एक सच्ची और हमेशा कायम रहने वाली शांति के दौर में ले जाएँगे……… पूँजीवादी और साम्राज्यवादी शोषण के दिन अब जल्द ही खत्‍म होंगे। यह लड़ाई न हमसे शुरू हुई है, न हमारे साथ खत्‍म हो जाएगी। इतिहास के इस दौर में, समाज व्यवस्था के इस विकृत परिप्रेक्ष्‍य में, इस लड़ाई को होने से कोई नहीं रोक सकता। हमारा यह छोटा सा बलिदान, बलिदानों की श्रृंखला में एक कड़ी होगा। यह श्रृंखला मि. दास के अतुलनीय बलिदान, कॉमरेड भगवतीचरण की मर्मांतक कुर्बानी और चंद्रशेखर आजाद के भव्य मृत्युवरण से सुशोभित है। (फांसी पर चढ़ने के दिन 20 मार्च 1931 से तीन दिन पहले भगत सिंह द्वारा पंजाब के गवर्नर को लिखे पत्र का अंश)भगत सिंह ने क्यों कहा था कि कांग्रेस का आंदोलन आख़िर में एक समझौते में तब्दील हो जाएगा। और कि कांग्रेस की लड़ाई 16 आने में एक आने की लड़ाई है और वह भी उसे नसीब नहीं होगी। क्या वह कांग्रेस ऐसे भगत सिंह व सुभाष की आजादी की अवधारणा को पुख्ता करने की भूल करेगी ? गांधी के चेलों ने उन्हें अजर-अमर रखने को इन जैसे सेनानियों को फेल साबित करने के लिए कई मोर्चे खोल रखे हैं।साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल... क्या है ।याजन गण मन अधिनायक जय हो भारत भाग्य विधाता... के माध्यम से ब्रिटिश आक्रांता को आक्रांता ही न रहने देना चाह रहे हों तो फिर किसकी गुलामी, किसकी आजादी !ऐसा लगता है कि आजादी की लड़ाई का केंद्र प्रवृत्ति से लड़ने की बजाए रंग और लोग से लड़ना तक नहीं रह गया था। प्रवृत्ति से लड़ाई होती तो अंग्रेज भी जाते और अंग्रेजियत भी। इसीलिए गुलाम करने और रखने की प्रवृत्तियां नित सशक्त होती गईं। इसीलिए गुलामी का बैक्टीरिया हर बार रंग-भेस-भेद बदलकर और ताकतवर होकर अजेय अंदाज में अवतरित होता रहा और हमें मुरीद बनाता रहा। आईआईएम के स्नातक और अंग्रेजी उपन्यास जगत में तहलका की तरह प्रवेश करनेवाले चेतन भगत की मानें तो अंग्रेजी भाषा नहीं एक कौशल है। (धनबाद के आईएसएम में मैनेजमेंट फेयर में अतिथि वक्ता के रूप में अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा था।) आखिर किसने कहा कि हिंदी या बांग्ला या उर्दू भषा कौशल नहीं है। बढ़ईगीरी भी कौशल है और अभिव्यक्ति कला भी कौशल है। लेकिन भगत जी के भीतर का वह संक्रमण बोल रहा है जो गुलामी का बैक्टीरिया ही है। और अंत में इसका समाहार ‘दुनिया के पूंजीपति एक हो’ (भूमंडलीकरण) में हो जाता है। जब ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ का नारा बुलंद हुआ था, तब तो हम छद्मवेषी हो गए थे। सोवियत रूस सा समाज चाहते थे और अमरीका सी अर्थव्यवस्था। दोनों ही धारा साम्राज्य के विस्तार की अलग धारा थी। व्यक्ति स्वातंत्र्य की तुष्टि जिसमें होगी, अंततः वही काम होगा। व्यक्ति आजादी चाहता है और अपने अस्तित्व और भविष्य के लिए समाज को संगठन की जरूरत होती है। आखिर राष्ट्र से छिटका हुआ समाज और समाज से दूर होते परिवार ही जब विघटित हो रहे तो अब तो सिर्फ व्यक्ति के विघटन की बारी है, जो कि शुरू हो चुकी है। हम अपने मताधिकार का प्रयोग जैसे करते हैं, वह तो यही दर्शाता है। ऐसा लगता है गुलाम रहने की प्रवृत्ति यहां की मूल और सहज वृत्ति है। स्वाभाविक संवेग-वृत्तियों के खिलाफ चलकर किसी अभियान को अधिक देर और दूर तक नहीं ले जाया जा सकता है। जर्मनी का एकीकरण, सोवियत संघ का विघटन, थ्येनआनमन चौक से होते हुए चीन का रूपांतरण, मिस्र में होस्नी मुबारक का तख्तापलट, लिबिया में गद्दाफी के खिलाफ बगावत आदि-आदि इसी के तो उदाहरण हैं। लेकिन भारत का उदाहरण अलग है। हर लड़ाई के बाद बाद वह एक गुलामी से दूसरी गुलामी में प्रवेश करता रहा है। या कहें कि नई (नाजुक, कमसीन, हसीन) गुलामियों के लिए वह लड़ाइयां लड़ता रहा है। सोवियत संघ का विघटन हुआ, पर यहां पश्चिम बंगाल में बोडोलैंड की मांग अनसुनी रह गई। और अब तो वहां के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने खुलेआम कह डाला है कि उनकी मांग कभी नहीं पूरी होनेवाली। दूसरी ओर भारत में नक्सलवाद (माओवाद) को राज्य विरोधी – व्यवस्था विरोधी कहनेवाले मार्क्सवादी नेपाल में माओवाद की चरणवंदना करते हैं।इस देश में संग्रामियों का दमन करनेवालों और स्वतंत्रता संग्राम के विरोधियों का सम्मान हुआ तो क्या हुआ। आजादी के बाद से गठित सभी मंत्रिमंडल में कौन पूजे गए ? क्या सबके सब स्वतंत्रता की आत्मा की रक्षा करनेवाले थे ? अब जरा भारतीय संघ के सेकुलर ढांचे में दलितों के मसीहा कहे जानेवाले बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के उच्चाशयों को देखें : -हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं । साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है । मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते । (डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५१)गुलाम देश में रियासतों के रहमोकरम पर पढ़ाई, अंग्रेजी हुकूमत की नौकरी और दलितों के उद्धार (कदाचित एक पृथक दलितिस्तान) के लिए नित नई लड़ाई छेड़नेवाले भीमराव अंबेदकर को भारतीय संघ के सेकुलर ढांचे पर इस तरह का प्रहार करने के बावजूद कैसे और किन अर्थों में सेनानी माना जाए, जिसने कभी भी हथकड़ी में जकड़े किसी बंदी तक से भेंट भी नहीं की ? राजा भोज के वंशज साहबजादा सिंह के पुत्र बाबू वीर कुंवर सिंह जिनके सभी नाते-रिश्तेदार नामी जागीरदार रहे और जिनके नामों से ही सामंतवाद की बू दीखती है, आखिर कैसे संग्रामी हो गए। यह बात पल्ले नहीं पड़ती कि 80 साल की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम की कमान ले लड़ाई में कैसे कूदे। 80 साल की उम्र तक ऐसा उग्र सेनानी फिरंगियों की नजर से कैसे बचा रहा ? क्या किसी भी गुलाम देश में लड़ाकू योद्धा को इतनी लंबी उम्र मिल सकती है ? हां, मिलती है नेल्सन मंडेला की तरह जेल में सड़ते रहकर या फिर एक सिद्धांत के तहत आंदोलन को नर्म – नाजुक स्तर पर रखने के लिए बड़ी आबादी को अपने पीछे पागल बना रखने के लिए महात्मा गांधी जैसों को बाहर रखकर। या फिर दलाई लामा की तरह दर ब बदर रहने की नियति झेलकर।विलय के सिद्धांत के खात्मे के लक्ष्मीबाई के आग्रह के साथ अंग्रेज हुकूमत को यह प्रस्ताव कि वे ऐसा करते हैं तो 1857 के संग्राम में वह (झांसी की रानी) उनके साथ होगी। यदि ये लोग संग्रामी थे तो एक पल के लिए ठहरकर सोचना होगा कि फिर नेताजी सुभाष और भगत सिंह क्या कर रहे थे। आजादी और शहादत की इसी सोशल मैपिंग का नतीजा है कि आज गली-चौराहे ऐसे ‘शहीदों’ के नाम सुपुर्द कर दिए गए हैं जो या तो गैंगवार में या किसी सियासी रंजिश में मारे गए या फिर मुठभेड़ में मारे गए माफिया सरगना थे। होना तो यह चाहिए था कि स्वतंत्रता संग्राम से अर्जित मान-मूल्यों की गरिमा या मर्यादा से खिलवाड़ करते इस शहीद-शहीद खेल को प्रतिबंधित करते हुए शहीद शब्द का दुरुपयोग राष्ट्रीय मर्यादा और गरिमा के विरुद्ध अपराध घोषित किया जाता। एक वाकया है कि एक बार औरंगाबाद के नगर भवन में अंग्रेजों की गोली से छलनी हुए शहीद की प्रतिमा प्रमुखता के साथ लगाए जाने के प्रस्ताव आया था। औरंगाबाद इस शहीद का गृह जिला था। बाद में नगर भवन में बिहार के मुख्यमंत्री रहे अनुग्रह नारायण सिंह की प्रतिमा केंद्रीय स्थल पर लगाई गई और शहीद की प्रतिमा एक कोने में लगा दी गई। शहीद की एक प्रतिमा शहर के रमेश चौक पर लगी है। दोनों ही स्थानों पर प्रतिमाएं धूल-धूसरित है। जिला के ओबरा के खरांटी में सालों पहले बना स्मारक अब उपेक्षित है। गोह प्रखंड में चौक पर स्थापित इनकी एक प्रतिमा गाड़ियों के धक्के से क्षतिग्रस्त हो गई है। यह शहीद और कोई नहीं बिहार सचिवालय पर स्थापित जिन सात शहीदों की प्रतिमा है, उन्हीं में सबसे छोटे जगतपति सिन्हा हैं। गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के प्रभाव में पटना में 11 अगस्त 1942 की सुबह सचिवालय पर सात सेनानियों की जो टोली तिरंगा फहराते हुए जिलाधीश डब्ल्यू जी आर्थर के हुक्म पर हुई फायरिंग में शहीद हुई थी, उसी टोली के सबसे छोटे सदस्य ये थे। यह तो है शहीदों को हमारे समय-समाज का नमन !
यह आजादी ही है जिसने हमें गैर जिम्मेवार होकर गौरव हासिल करना सिखाया। किसी भी चीज की वास्तविक कीमत अदा किए बिना उसे हासिल करने की जिद पूरी होने लगे तो आप गैरजिम्मेवार नहीं तो क्या बनेंगे। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने बखूबी इसका ख्याल किया ! आखिर यह भी गौर करना होगा कि संविधान सभा उन प्रान्तीय विधानमण्डल के सदस्यों से बनी थी, जिनका चुनाव देश की कुल वयस्क आबादी के मात्र 11.5 प्रतिशत हिस्से से बने निर्वाचक मण्डल से हुआ मुट्ठी भर चुने गये प्रतिनिधियों को छोड़ बाकी सम्पत्तिशाली कुलीनों के प्रतिनिधि थे। इनमें चुने गये प्रतिनिधियों के अतिरिक्त उसमें राजाओं-नवाबों के मनोनीत प्रतिनिधि थे। ऐसे संविधान से हम क्यों यह अपेक्षा कर लेते हैं कि वह भगत सिंह के सपनों के अनुसार सोशलिस्ट रिपब्लिक यानी 42 वें संशोधन के मुताबिक समाजवादी गणतंत्र हो। क्या संविधान सभा की प्रकृति ऐसी थी कि संविधान की आत्मा में यह समाहित हो सके। 2004 के चुनावों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 128 लोग सांसद चुने गए थे जबकि 2009 में यह संख्या 150 हो गई। इसी तरह 2009 की लोकसभा में 300 करोड़पति सांसद आए हैं, जबकि 2004 की लोकसभा में ऐसे 154 सांसद थे। क्या यह एकबारगी हो गया।
जिम्मेवारी के बोध से कटे भारतीयों में कर्तव्य की रही-सही चेतना को कुंद करने का सार्थक प्रयास हुआ इसके माध्यम से। संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख तो हुआ, पर यह अधिकार कुछ कर्तव्यों के निर्वाह से हासिल होते हैं यह बताने की जरूरत नहीं। पाबंदी नहीं। अधिकार के लिए याचिकाएं असंख्य पड़ीं। नए-नए अधिकारों का सृजन हुआ। आरटीआई, काम का अधिकार, आरटीई। लेकिन कर्तव्य ? सिर्फ आप इस धऱती पर जनम गए हों। बस्स। संविधान बनने के 26 सालों बाद शासकीय गरज से संविधान के 42 वें संशोधन में एक अध्याय के रूप में मूल कर्तव्य जोड़े गए। पहली बार अधिकारों से छेड़छाड़ हुई। इतने और ऐसे संशोधन के पैकेज लाया गया कि यह संशोधन मिनी संविधान कहा जाने लगा। यह अलग बात है कि 1978 में 44 वें संशोधन से बहुत कुछ निरस्त कर दिए गए। पहली बार संविधान को खिलौने की औकात में लाने की कोशिश हुई। क्या सेनानियों ने आजादी का जो हक दिया उसे यूं ही कुर्बानियों को भूल जाने के लिए। सामान्य बातचीत में और अपने करीब डेढ़ दशक की पत्रकारिता और अध्यापन के अनुभव में राजनीति शास्त्र का एक भी व्याख्याता, सामाजिक अध्ययन का एक भी शिक्षक, एक भी सामाजिक कार्यकता, कोई अधिकारी या नेता नहीं मिला जिसे बखूबी इसका पता हो या दस कर्तव्यों को सिलसिलेवार गिना दें। ऐसा एकबारगी नहीं हुआ। अधिकारवाद कहीं न कहीं भोगवाद में उत्स पाता है और जिसकी जड़ बर्बरता में होती है, वह हमारे जीन में है। कोई भी गलत रास्ता सही जगह नहीं जाता। और यही कारण है कि कर्तव्यबोध की इस क्षति ने देश में नागरिक बोध को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। राज्य का कर्तव्य नागरिक का अधिकार और नागरिक का कर्तव्य राज्य का अधिकार। लेकिन व्यवस्था की उदासीनताओं और कुछ हमारे भीतर की जीन ने संगिठत लड़ाई को कभी परिवर्तनकारी आंदोलन (छात्र आंदोलन) या समांतर व्यवस्था के लिए (नक्सलवाद) सक्रिय किया है। भद्रजन की भाषा में एक रिएक्टर के रूप में प्रकट होता है तो दूसरा एटम बम के रूप में। दरअसल जो क्षेत्र विकास से दूर या अछूते रहे या रखे गए वहां शोषण की चक्की फ्रिक्शनलेस हो आसानी से चली। जंगलों या सुदूर पिछड़े इलाकों में इस आंदोलन के जाने का कारण एक तो यह था, दूसरे माओ की थियरी भी गांव से शहर की ओर बढ़ने की थी। शोषण व अन्याय को नियति न मानकर जिन्होंने सामाजिक व्यवस्था में उसकी वजह देखी, उनकी लड़ाई तो व्यवस्था के खिलाफ होगी ही। विकास से लगातार उपेक्षित रखे गए या रखे जा रहे ऐसे उपेक्षितों का दंश संताप, क्षोभ, पीड़ा के गह्वर में जाकर क्या उन्हें संत रहने देगा। ऐसी अपेक्षा है तो फिर ...भारत में होनेवाली कुल मौतों में 8.1 प्रतिशत मौत डायरिया से होती है। डायरिया का एकमात्र कारण जलप्रदूषण है। इस डायरिया से वही तबका आक्रांत होता है जो कामगार-दिहाड़ी है। एक बार डायरिया हुआ तो कम से कम सप्ताह भर की छुट्टी। अब इसे बीपीएल के मानव दिवस से गुणा करके देखें कि जीडीपी का कितना नुकसान है। स्वास्थ्य पर प्रतिव्यक्ति व्यय 119 डालर जो कि दुनिया में सबसे कम है। और संयुक्त राष्ट्र संघ का आकलन है कि स्वास्थ्य पर खर्च की वजह से हर साल 2 प्रतिशत यानी 24 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। आखिर कष्ट का यह कंडेसेशन समाज को कहां ले जाएगा। क्या यह शोक-संताप क्षोभ का हिस्सा से बचा रह जाता होगा।क्या इसका जवाब किसी के पास है कि अपराध/भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी का कारण सिर्फ राजनीति और कानून की पोंगापंथी या आम नागरिक की भी उतनी ही भागीदारी भी है ? नागरिक उदासीनता से बननेवाले वैक्यूम आखिर कुछ तो लेकर आएगा। राजनीति का अपराधीकरण और नैतिक मूल्यों में गिरावट को जीवन व्यवहार का हिस्सा बना लेने के कारण अपराध का समाजीकरण (पुण्यप्रकाश वाजपेयी का टर्म) जिस तरह हुआ है, उस सबकी जड़ में कहीं न कहीं नागरिक बोध की क्षति प्रमुख है। इसे क्या कहेंगे कि संसद के दोनों सदनों में आजादी के बाद से अब तक लगातार आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। 1952 में संपन्न पहले आम चुनाव से लेकर अब तक के 15 आम चुनावों में भ्रष्टाचार एक मुद्दा रहा, पर 1989 को छोड़ कभी भी यह मुद्दा चुनाव प्रभावशाली नहीं रहा। इसका मतलब ही यह है कि जनमानस को इस मसले पर कोई भी पार्टी मोटिवेट नहीं कर सकी तो इसलिए कि जनतांत्रिक संस्थाओं व जनमानस दोनों ही ओर आग बराबर लगी हुई है। क्या ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान अपने मुकाम तक पहुंचेगा ? जिस संविधान प्रदत्त तंत्र की अधीनता के कारण 74 का आंदोलन, शेषण द्वारा छेड़ा गया चुनाव सुधार का अभियान आदि-आदि फिस्स कर गए लगभग वही हस्र इनके अभियान का होगा। अरुणाचल प्रदेश से कांग्रेस के सांसद निनाग ईरिंग ने जिस तरह बाबा रामदेव के साथ अभद्राचरण किया वह हस्र का छोटा नमूना है। आखिर रिफ्लेक्स एक्शन की तरह कांग्रेस के दिग्विजय सिंह का जो रुख रहा वह कहीं न कहीं रामदेव के अभियान के प्रति नाराजगी भी दर्शाता है। जिस गरीब जनता के मुल्क के 70 लाख करोड़ रुपए विदेशी बैंकों में जमा हों वह क्यों नहीं यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन अंगेस्ट करप्शन (यूएनसीएसी) का अनुमोदन करता है। इस आशय से संबंधित
संयुक्त राष्ट्र के संकल्प पर एक दस्तखत के सिवा 2005 के बाद सरकार ने इस मामले में कोई पहल नहीं की। यही तो वह मनोरचना है जो इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
कहीं न कहीं नागरिक बोध का नुकसान हमारी जीवनशैली को प्रभावित करती है, फिर व्यवहार का पैटर्न उस गिरफ्त में आता है और फिर पूरी की पूरी व्यवस्था इसका निवाला बन जाती है। कई व्यवहार से रिवाज तथा रिवाजों से विधि और फिर विधि के तानेबाने से संविधान फिर पूरी व्यवस्था बनती है। थूक फेकने से लेकर ट्रैफिक नियम व दफ्तरों में अपनी सुविधा के लिए बाबुओं के साथ डीलिंग। यह सब क्या है। एक समांतर व्यवस्था ही तो। ...

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

घिसे-पिटे पार्टी लेखन का कोई मतलब नहीं

बाबरी मस्जिद मामले में मालिकाने को लेकर आये फैसले पर एक नज़्म...

मुकुल सरल

दिल तो टूटा है बारहा लेकिन

एक भरोसा था वो भी टूट गया

किससे शिकवा करें, शिकायत हम

जबकि मुंसिफ ही हमको लूट गया

ज़लज़ला याद दिसंबर का हमें

गिर पड़े थे जम्हूरियत के सुतून

इंतज़ामिया, एसेंबली सब कुछ

फिर भी बाक़ी था अदलिया का सुकून

छै दिसंबर का ग़िला है लेकिन

सितंबर तो चारागर था मगर

ऐसा सैलाब लेके आया उफ!

डूबा सच और यकीं, न्याय का घर

उस दिसंबर में चीख़ निकली थी !

आह ने आज तक सोने न दिया

ये सितंबर तो सितमगर निकला

इस सितंबर ने तो रोने न दिया

(इंतज़ामिया- कार्यपालिका, एसेंबली- विधायिका, अदलिया- न्यायपालिका, चारागर- इलाज करने वाला,चिकित्सक)

जनज्वार डाट काम के ६ अक्तूबर के उक्त पोस्ट को देखने के बाद १५ अक्तूबर को प्रतिक्रिया -

मैं नहीं कहता कि मैं कोई वाम का झंडाबरदार हूं। विचारधारा की प्रतिबद्धता एक हद के बाद के बाद अवाम को , जीवन को पीछे छोड़ देती है और पार्टी आगे आ जाती है। लब्बोलुआब यह कि मुसलमान को इस जनतांत्रिक देश में वे सब हक हैं जो इसके नागरिक को। इसी तरह उसका फर्ज होता है कि वह राष्ट्रीय मूल्यों को आम नागरिक की तरह मंजूर करे और अमल में लाए। यह इस मुल्क की महानता नहीं तो और क्या कि कभी के आक्रांता (क्योंकि उनको उनपर गौरव है) के वंशजों को यहां के धार्मिक प्रतीक बन चुके राम को अपनी जन्मभूमि से बेदखल करने का हक मिला हुआ है। अदालत है कि सभी पुरातात्विक सबूतों को किनारे करते हुए आस्था के आधार पर फैसला सुना देता है। अपनी जन्मभूमि तलाशने के लिए राम को दर-दर भटकने को छोड़ दिया जाता है। अदालत के सामने सबूत हैं कि हिंदू ढांचे पर ही मस्जिद बनी है। कुरआन के मुतल्लिक हवाला भी दिया गया है कि हड़पी या गैर स्वामित्व वाली जमीन पर इबादत करना नापाक है। दारूल-उलूम से लेकर देवबंद और कांग्रेस के कासिम अंसारी तक कह चुके हैं कि मस्जिद एक किमी दूर भी बने तो हर्ज क्या (शायद उन्होने यह तंजिया कहा हो)। ऐसे में साहबान हम किस बात को प्रोमोट कर रहे हैं। क्या मुल्क के बंटवारे में आगे रहनेवाली मुस्लिम लीग के साथ आजाद मुल्क में उसके सहारे चुनाव लड़नेवाली कांग्रेस ऐसे में कहां गलत है। ऐसे में कहां गलत है कि आजादी की लड़ाई में कम्यूनिस्टों ने मुल्क के साथ घात किया। क्या बुरा है कि इस मुल्क के लिए आजादी की लड़ाई में हीरो माने जानेवाले सुभाष चंद्र बोष को अंग्रेज को सुपूर्द करने की संधि कर ली युद्ध का भगोड़ा मानकर। हंसुआ-हथौड़ा के बल पर मुट्ठी-भर लोग संसद पहुंचकर करोड़ों की जनता को सांप्रदायिक कहने को आजाद हैं। वाम के परदे में प्रगतिशीलता के फार्मूले में भारतीयता को, यहां के आदर्श-मूल्य, जनभावना को जमकर कोसने की आजादी जिस वाम में थी, उसी की राह चलकर सेकुलरवाद का मोर्चा मजबूत हुआ है। आप मेरे ब्लाग ww.aatmahanta.blogspot.com पर जाएं और कहें कि क्या मैं केसरिया हूं या लाल? हार्वर्ड फास्ट से लेकर माओ तक को खंगाल लें क्या उन्होंने कभी घिसे-पिटे पार्टी लेखन की वकालत की। आप अपनी साइट पर यह क्या कर रहे हैं। कोई बताए आज तक किसी प्रगतिशील दल या संगठन के झंडाबरदार ने कश्मीर के अल्पसंख्यकों पर कुछ भी बोला। इस पर वे ठीक उसी तरह चुप रहे जैसे अफगानिस्तान व पाकिस्तान के अल्पसंख्यक उत्पीड़नों पर चुप रहते हैं। मैं यहां के अल्पसंख्यकों को पीड़ित-शासित रहने को शापित नहीं मानता, पर इतनी तो खुद्दारी होनी ही चाहिए कि आपमें से कोई खुलकर इन मसलों पर बोले। इस तरह की बकवासों को छाप कर किस तरह की काव्य समृदि दे रहे हैं और कैसी जागरुकता और संवेदना के पक्ष में चीजों को ले जा रहे हैं।

सोमवार, 22 नवंबर 2010

डाल से तोड़े गए पत्ते का पुनर्वास नहीं होता

(देश भर में औद्योगीकरण के नाम पर विस्थापन का जो खेल चल रहा है, नर्मदा, सिंगूर व नंदीग्राम उसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इस क्रम में भरी-पूरी आबादी को अमानवीय उत्पीड़न से गुजरना पड़ रह है। मानवता के नाते और भावी चुनौतियों के बरक्स विस्थापित हो रहे लाचार लोगों के दर्द को सुनना-समझना जरूरी हो जाता है। इसी आलोक में हम हिंदी कवि कुमार अंबुज का एक पत्र दे रहे हैं। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के क्रम में हिंदी कवि कुमार अंबुज ने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक मार्मिक पत्र लिखा था। बेहद यादगार यह पत्र किसी राजकीय रिकार्ड में हो कि न हो, पर माडरेटर को लगता है कि यह 20 वीं सदी के खूबसूरत पत्रों में शुमार किया जा सकता है। विकास के निर्बंध-स्वेच्छाचारी माडल में बड़े बांधों से हो रहे विस्थापन के खिलाफ एक करुण आवाज है यह।
इस पत्र के मिलने का एक प्रसंग पाठकों के साथ शेयर करना चाहता हूं। ज्ञान दा (पहल संपादक और कथाकार ज्ञानरंजन) एक-एक चीज का बड़ा ही सार्थक इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने मुझे एक पत्र कुमार अंबुज के किसी पत्र के पीछे के सादा हिस्से में लिखा गया था। पत्र के इस मार्मिक अंश से पूरे पत्र को पाने की इच्छा हुई। पत्र में लिखे पते पर संपर्क करने पर कुमार अंबुज का बड़ा ही आत्मीयता भरा पत्र मय इस अनुरोध के मिला कि अखबार में छापूं तो उसकी प्रतियां ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’, मेधा पाटेकर, वाणी प्रकाशन को भी भेजूं। मैंने वैसा ही किया। इस बात को कम से कम 11 साल हो गए। - माडरेटर)

परछाईं,13 राधा कालोनी, गुना, मध्य प्रदेश
17.08.1999

आदरणीय श्री दिग्विजय सिंह जी,
मुझे एक लेखक के रूप में यह पत्र इसलिए लिखना पड़ रहा है कि मेरी यह जिम्मेवारी है कि मैं समाज और जनता के बीच उस आवाज को तेज करूं जिसकी आप लगातार अनसुनी कर रहे हैं। इसलिए आपको याद दिलाने की धृष्टता कर रहा हूं कि आप शासन प्रमुख और जनतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए जनप्रतिनिधि होने के नाते, नर्मदा बचाओ आंदोलन और बड़े बांधों के संदर्भ में समुचित जिम्मेवारी और संवेदनशीलता से काम नहीं ले रहे हैं।
कोई भी आदमी राजनीतिक होने या तकनीकी होने से पहले एक मनुष्य होता है और वही उसकी सबसे बड़ी जरूरत है। आप सहमत होंगे कि तमाम राजनीतिक उपादान और विकास के नियम भी अंततः अपनी श्रेष्ठता और सफलता इसीमें निहित पाते हैं कि एक मनुष्य का मनुष्य और उसकी प्राकृतिक स्वतंत्रता को उजाड़े बिना ही एक विकसित समाज का, राष्ट्र का निर्माण कर सकें।
एकलेखक के नाते मेरी दिलचस्पी बांध की तकनीक में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उससे मनुष्य तो नहीं उजड़ जाएगा। बड़े बांधों से जिन लोगों तक लाभ पहुंचेगा उसकी गणना को मैं नहीं जानता, बांध के सवाल पर पीछे हटने से सरकारों को कितना नफा-नुकसान होगा उसे भी मैं नहीं जानता और न ही जानना चाहता हूं क्योंकि मैं मनुष्य को जानता हूं। मेरा सारा सरोकार जनता से है। जानना होगा तो जानना चाहूंगा कि क्या बड़े बांध बनने से एक आदमी भी विस्थापित नहीं होगा ? एक आबादी भी डूब में नहीं आएगी ? इसलिए एक मनुष्य की तरह से, उसीकी तरफ से मैं यह पूछने के लिए विवश हूं कि उजाड़ फैलाकर आप कैसी हरियाली चाहते हैं ? क्या आप गांव-शहर बसने की ऐतिहासिक प्रक्रिया और परंपरा के बारे में जराभी विचार करना चाहते हैं ? एक गांव बसने में जितना मानवीय प्रयास, कष्ट, उल्लास और जिजीविषा शामिल होती है उसकी तौल में आप विकास का कौन पक्ष पलड़े में रखना चाहते हैं ? प्रश्न यह भी है कि एक मनुष्य की भावुकता, उसकी संवेदना, आत्मीयता और उसके संताप को आप किस निगाह से देखते हैं ? और आप विकास को किस तरह से देखते हैं ? विनाश के साथ विकास कैसे हो सकता है ? तकनीकों को, विकास के औजारों को मनुष्यों के शवों के ऊपर स्थापित नहीं किया जा सकता है। यह सभ्यता के विनाश का रास्ता है।
एक न्यायाधीश, एक वैज्ञानिक और एक यंत्री क्या कहता है, इसके बरक्स यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह सुना जाए कि एक विस्थापित हुआ आदमी क्या कहता है। उसकी आवाज से प्रामाणिक कुछ नहीं हो सकता। यह संसद, प्रशासन और न्यायालय यदि उजड़ते हुए आदमी की आवाज को कैद करने के लिए काम करेंगे तो यह हमारे समय की सबसे बड़ी अमानवीयता और ऐतिहासिक भूल होगी।
एक गांव, एक आदमी और एक शहर जब डूब में आता है तो वह मानचित्र पर एक निशान मिट जाने भर की घटना नहीं है। इसके साथ वे गलियां भी डूबती हैं जो कई आदमियों के, कई सालों तक एक साथ चलने से, व्यवहार करने से बनती हैं। वे पेड़, वे वनस्पतिय़ां डूब जाती हैं जो आपसे एक जीवित मनुष्य की तरह बर्ताव करती रहीं और दुख, सुख रोग-शोक में काम आती रहीं। वह चंद्रमा, वे तारे और वह सूर्य भी डूब जाता है जो सिर्फ उसी गांव से, उसी कोण से और उसी जगह से इतना आत्मीय और सुंदर दीख सकता था। दिशाएं डूब जाती हैं और वे घर डूब जाते हैं जिनमें जन्म हुआ, जिनकी खिड़कियों से दुनिया को देखने का काम शुरू हुआ और जिनमें गाने गाए गए, उत्सव मने, जिनकी छाया में विपत्तियां झेलीं जिनके सीने से लग रोना रोया, जिनकी मुंडेरों पर सुबह का स्पर्श देखकर सुंदरता का पहला सबक सीखा और जिनमें विलाप हुआ और जिनकी दीवारों के सहारे फिर से खड़े होकर जीवन में वापसी हुई। एक गांव जब डूबता है तो मनुष्यों केवे तमाम संबंध और एक परंपरा ही डूब जाती है जो गांव में पीढ़ियों तक रहकर ही संभव हो पाती हैं। कुओं, खेतों, ढूहों और चौपालों का डूब जाना क्या सिर्फ अजीवित चीजों का डूब जाना है ? क्या हमारी स्मृतियों का डूब जाना एक साधारण और उपेक्षणीय घटना हो सकती है?
सवाल ये भी है कि क्या आप एक आंदोलन को सिर्फ एक विरोध की तरह देखते हैं ? क्या कोई आंदोलन आपके लिए महज एक सामाजिक बाधा है? जब आंदोलनकारी चढ़ते हुए पानी में मृत्यु की परवाह किए बिना खड़ा रहता है तो क्या यह एक जिद भर है ? जो बुद्धिजीवी और समाजसेवी लोग आंदोलन का हिस्सा बन गए हैं क्या यह उनके लिए शगल है ? क्या नर्मदा और नदियों को बचाने का जिम्मा आंदोलनकारियों और समाजसेवियों का ही है, शासन का नहीं ? सरकार का प्रमुख होने के नाते इन सवालों पर चलताऊ तरीके से निष्कर्ष निकाल लेना घातक होगा। संभव है कि आंदोलन की ऊष्मा और उसकी ताकत को शासन-प्रशासन के जरिए एक दिन परास्त भले ही कर दिया जाए लेकिन उसके बीज मर नहीं सकते। मनुष्य की निराशा सबसे ताकतवर और दुस्साहसिक होती है। सबसे ज्यादा हिंसक और सबसे ज्यादा विध्वंसक। आपको चाहिए कि आपके राज्य में कोई मनुष्य इतना निराश न हो जाए कि वह सृजनात्मकता का, प्रेम का रास्ता छोड़कर अन्य किसी नकारात्मक रास्ते पर चला जाए, यह हार-जीत का, जय-पराजय का मामला नहीं है। और यदि है भी तो जनता की जीत में ही लोकतंत्र की राज्य की जीत शामिल है। बातचीत के लिए प्रस्तुत होने और समाधान के लिए प्रस्तुत होने में गहरा फर्क है।
एक डूबते हुए गांव के निवासी का विस्थापित होना, गांव से शहर में पढ़ने-लिखने, नौकरी करने गए आदमी के विस्थापित होने जैसा नहीं है। डूब में आ रहे गांव के निवासियों के लिए, यह प्रलय आने जैसा है। उनके संसार को नष्ट किए जाने जैसा है। उसे देशनिकाला देने जैसा है। उसीकी अनुभूति और कष्ट को शब्दों में अभिव्यक्त करना लगभग असंभव है है। इसलिए उसे राजनीतिक चेष्टाओं और कानूनी शब्दावली से समझने का प्रयास भी हास्यास्पद भी है और दारुण भी। पुनर्वास का अर्थ इतना सीमित नहीं हो सकता कि आप एक बीघा जमीन की जगह एक बीघा जमीन दे दें। क्या डाल से तोड़ दिए गए पत्ते का पुनर्वास संभव है ? जबकि हद यह कि हजारों परिवार उजड़ चुके हैं। उनकी बलि दे दी गई है। उनका न्यूनतम पुनर्वास भी नहीं हुआ है। और हजारों परिवार इन्हीं हालातों का शिकार होनेवाले हैं।

मैं कहना चाहता हूं कि आप विकास के वैकल्पिक माध्यमों और तरीकों पर ध्यान दें। अभी सिर्फ धन की बर्बादी हुई है जिसका मूल्य मनुष्यों के जीवन के आगे कुछ भी नहीं है। यह घोषणा अविलंब की जाए कि बड़े बांधों का निर्माण तत्काल रोका जाएगा और अन्य विकल्पों को सामने लाकर, विचार कर अमल किया जाएगा। जो लोग बेघर, बेगांव हो चुके हैं उनकी पुनर्वास समस्या का तुरंत हल किया जाए और आगे इस बर्बादी को एकदम रोक दिया जाए। यह कितना भयावह और क्रूर दृश्य है कि संपन्न, खाते-पीते खुशहाल लोगों को एक विपन्न, नारकीय जीवन में धकेल दिया जाए।
इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाना चाहूंगा कि जब-जब जनपक्षधरता के आंदोलन को नकारा जाता है, उसकी उपेक्षा की जाती है उनकी उग्रता विकट हो जाती है। इतिहास ऐसे ही उदाहरणों से भरा पड़ा है। जब शासनतंत्र गफिल होने लगता है तो यह समाज में एक बड़े संकट की सूचना होती है। आप एक विचारशील व्यक्ति की तरह इन बिंदुओं पर विचार करें और अविलंब बड़े बांध बनाने, ऊंचे बांध बनाने की शासकीय प्रतिज्ञा को तोड़ दें। यही एक बेहतर विकास का रास्ता होगा।
हमारे प्रदेश के पड़ोसी राज्यों, महाराष्ट्र और गुजरात शासन से बात करने के लिए आपसे अधिक सक्षम व्यक्ति कौन हो सकता है। यदि आप बड़े बांधों और विस्थापन के कष्ट को समझते हैं तो इससे अधिक सौभाग्य, डूब में आ रहे लोगों का और क्या हो सकता है ? क्योंकि तब आपकी दूरदर्शिता, संवेदनशीलता और कूटनीतिक निपुणता का लाभ विनाश के कगार पर खड़े लाखों लोगों को मिल जाएगा। और इसकी उम्मीद आपसे करना उचित ही है क्योंकि आप जिस जगह हैं वहां आपसे संरक्षण की अपेक्षा सहज और अधिकारपूर्ण है।
मुझे आशा है कि आप इस पत्र को जिम्मेवारी और गंभीरता से लेने की कृपा करेंगे।

शुभकामनाओं के साथ,

कुमार अंबुज,

सेवा में,
श्री दिग्विजय सिंह,
मुख्यमंत्री,
म.प्र. शासन, भोपाल। (सौजन्य पत्र लेखक)

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

सामाजिक सरोकार कहीं भी निभाए जा सकते हैं – विनोद सिंह

-एक युवा विधायक के सरोकार-
(राजनीति का मतलब ही सत्ता से लिया जाता है और कला का मतलब ही साधना से लिया जाता है। एक क्षेत्र निहायत बहिर्मुखता से होकर भोग की ओर चला गया है तो दूसरा क्षेत्र सर्वथा अंतर्मुखताकी गली से होकर उदासी में निर्लिप्तता में चला जाता है। इस घोर बाजारवादी दौर में दोनों ही क्षेत्र में विपरीत उदाहरण देखने को मिलेंगे। लेकिन यह सोचना थोड़ा अचरज लग सकता है कि क्या कोई एक ही साथ दोनों कर्मों को साध सकता है। हमारे दौर में पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्या बांग्ला के नामचीन कवि हैं और कभी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके तथा फिलहाल में केद्र में कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कन्नड़ के कवि है। हम यहां कविता और राजनीति को एक साथ साधने की बात तो नहीं करेंगे, पर हमारा मकसद इसी से थोड़ा आगे चलकर यह देखना-जानना है कि कैसे कोई संस्कृतिकर्मी एक साथ अपनी कला व राजनीति को साध रहा है। ऐसे ही एक संस्कृतिकर्मी झारखंड विधानसभा में भाकपा माले के विधायक विनोद सिंह हैं। उनकी कला चेतना देखनी हो तो कोई शहीद महेंद्र सिंह की पुण्यतिथि के मौके पर बगोदर में (झारखंड के गिरिडीह जिला का हजारीबाग से सटा एक विधानसभा क्षेत्र) उनके कविता पोस्टरों को देखे। इसी संदर्भ में बेहद संभावनाशील मूर्तिकार रहे माले विधायक विनोद सिंह से हुई बातचीत का अंश प्रस्तुत है। )

झारखंड में सरकार के भविष्य को लेकर इन दिनों उहापोह तो नहीं रही, पर यह भी तय है कि जिंदा मेढ़क को लेकर कोई अधिक दिनों तक बहुमत में नहीं रह सकता है। जब पूरा सियासी माहौल सरकार गिराने-बनाने की जद्दोजहद से गंधा रहा हो तो वैसे में एक विधायक से संस्कृतिकर्म पर बातचीत के लिए मोहलत लेना एक ज्यादती कही जाएगी। ज्यादती राजनीतिक प्रतिबद्धता के संदर्भ में। सदन की गहमा-गहमी भरे माहौल में कैसे कोई एक विधायक से कला-संस्कृति, सामाजिक सरोकार और नागरिक चेतना पर बात करने के लिए वक्त लेने की सोचे। यह तो सिर्फ लेनिन ही हो सकते थे जो मजदूरों की बैठक में भी किसी कविता का सविस्तार जिक्र छेड़ देते और उसके निहितार्थों और सामाजिक अर्थवत्ता से लोगों को अवगत कराते। लेनिन तो नहीं, पर भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माले) के कर्मठ और प्रतिबद्ध विधायक के रूप में महेंद्र सिंह ने जैसा जीवन जीया पूरे राजनीतिक परिवेश के लिए संदेश से भरा है। उनकी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता और उसकी परिणतियां इतिहास हो गई हैं। बुद्धिजीवियों के बीच स्व. सिंह अपनी गंभीर सांस्कृतिक-साहित्यिक चेतना के लिए विशेष रूप से जाने जाते रहेंगे। हम यहां उन्हींके विधायक पुत्र विनोद सिंह की बात कर रहे हैं जो अपनी कला-संस्कृति संबंधी सक्रियताओं के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके विधायक पिता की जब गिरिडीह में नक्सलियों ने हत्या की थी, तबवे कला कम्यून में थे और कश्तूरी नाम की फिल्म के निर्माण में व्यस्त थे। आज भी वे अपने साथ के लोगों-परिचितों को कला-कम्यून में ले जाते हैं। दूसरों की तरह कला के नाम पर दोहन के लिए नहीं, वहां उनमें आम जीवन की कला के संस्कार से भरने के लिए। ऐसा इसलिए कि उनमें लोगों को कला-संस्कृति की चेतना से जोड़ने की भूख है। वे वहां तलाशते हैं आमजन की कला-संस्कृति की चेतना। अपने पिता से विरासत में मिले प्रतिरोध के संस्कार से लैस होकर विनोद सिंह जनता के बीच अपनी कला से प्रतिरोध की चेतना को एक नया आयाम दे रहे हैं। कविता पोस्टर और मूर्तिशिल्प से उन्होंने अपने गांव दुर्गीधवैया को लगभग पाट दिया है। गांव का एक हिस्सा तो जैसे कलाग्राम के अहसास से भर देता है। विरासत में पाया बौद्धिक संस्कार किन-किन रूपों में फल-फूल रहा है और कला चेतना की गहनता के साथ यथार्थ से उनके सरोकारों की सघनता का आज क्या हाल है, इसे जानने के लिए हमने उनसे बातचीत की। 2007 में पार्टी लाईन से हटकर विनोद सिंह संप्रग सरकार को बचे रहने के विरोध में थे। इससे जाहिर है कि उन दिनों विनोद काफी शिद्दत के साथ उधेड़बुन में थे। जाहिर है कि राजनीतिकर्म में वे काफी गहरे उतर चुके हैं। दूसरी बार जब वे विधान सभा के लिए चुन लिए गए तो पार्टी के एक हल्के में चर्चा थी बगोदर से किसी और को टिकट दिए जाने की और विरोधियों में भी इसे लेकर रणनीति बन रही थी। लेकिन जमीनी काम को दरकिनार किया जाना मुनासिब नहीं हुआ और जीत उसका प्रमाण बनी। कभी-कभी लगता है जैसे जनसरोकारों को लेकर वे किसी भी हद तक जा सकते हैं और विधायकी या गंभीर अनुशासनात्मक कार्रवाई की उन्हें परवाह नहीं।

राजनीति बाध्यता है या अभियान, इस पर उनका कहना है कि राजनीति में आने से पहले मैं भले ही कला-संस्कृति में सीधे सक्रिय था, पर इसका मतलब यह नहीं कि वहां मेरा कोई सामाजिक सरोकार नहीं था। हां, यह अलग बात है कि सीधे राजनीति की तरह नहीं। कहीं न कहीं जो वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकार थे, शायद उन्हीं कारणों से राजनीति में भी रह गया। हां, यह बात जरूर है कि राजनीति में हमारे सामाजिक सरोकार सीधे हमारे कर्म को प्रभावित करते हैं। यहां प्रत्यक्षतः सामाजिक सरोकार राजनीति को प्रभावित करते हैं। कला में यह काम घुमाफिराकर होता है। और चूंकि इस सारी प्रक्रिया में शिल्पगत कौशल का बड़ा हाथ होता है, इसलिए बहुत बार कलाकार के सामाजिक सरोकार को रेखांकित करना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है। फिर भी मेरा मानना है कि राजनीति सामाजिक सरोकारों को सिद्ध करने का सीधा जरिया नहीं। आप कला में अपने सरोकारों को लेकर सीधे प्रवेश करते हैं, अभिव्यक्ति के लिए रूपों के चुनाव में, युक्तियों के चुनाव में सरोकार थोड़ा दब जाते हैं। रूप-वस्तु के द्वंद्व में यह अंडरकरेंट रह जाता है।

वे अपनी बात के विस्तार में जाकर कहते हैं कि राजनीति में आपकी संलग्नता बहुत बार सीधे नहीं हो पाती। तंत्र की बाध्यताएं आड़े आती हैं।

कला-संस्कृति, वैचारिक बहस की गुत्थम-गुत्थी में डूबे रहनेवाले विनोद सिंह क्या कुछ मिस नहीं कर रहे? इस पर विनोद जी का कहना है कि अब राजनीति में सीधे जुड़ने के बाद तो तरह-तरह की व्यस्तताएं और सक्रियताएं आ जाने से समय की घोर कमी आ गई है। पहले की तरह सक्रिय होकर उस क्षेत्र के लिए कुछ नहीं कर पाने की कसक तो है, पर उसकी भरपाई के लिए सृजनात्मक कार्यों में लगे रहने से खुशी मिलती है।

कला की गहन चेतना और यथार्थ के सघन सरोकारों से जुड़ा एक गंभीर कलाकार राजनीति में एलिएन (विजातीय) तो नहीं ? विनोद जी कहते हैं कि लगभग सभी लोग राजनीति को गाली देते हैं। कुछ लोग इसे एक गंदी नाली तक कह ते हैं। एक हद तक यह बात सही भी है और यह भी कि उसमें रहनेवाले कुछ लोग उसे और भी गंदी करते हैं। कभी-कभी शातिर सियासी कलाबाजियों से तो कभी बेहद फूहड़ता और टुच्चई से गंधा रहे इस माहौल में ऊब भी होती है। लेकिन ऊब कर वहां से निकल जाना इसका कोई उपाय नहीं। लगता है यह पलायन होगा और इससे अवांछितों को आसानी से जगह मिल जाएगी। वे कहते हैं कि अपनी प्रतिबद्धताओं और सरोकारों को बचाकर रखते हुए कुछ भी कर सका तो पाजिटिव ही होगा।

कला के प्रति आपकी जैसी गंभीर दिलचस्पी थी, क्या उसे देखते हुए अब आप उसके साथ न्याय कर पा रहे हैं (वह पैशन फैशन में तो कन्वर्ट नहीं हो गया?) छूटते ही विनोद जी कहते हैं पहले भी मैं कला के क्षेत्र में कोई बड़ा काम नहीं कर रहा था। कुछ साथी थे, जिनके प्रयास में मैं भी शामिल था। जहां तक कला के सरोकार की बात है तो आप जिस किसी भी क्षेत्र में हों वहां एक हद तक तो आपका सामाजिक सरोकार होता ही है। उन्हीं सरोकारों से प्रेरित होकर कलाकार भी अपना काम करता है। इसलिए राजनीति में आने के बाद ऐसी कोई बात नहीं कि यहां आते ही हमारे सरोकार बदल जाते हैं। जहां तक समाज के लिए कुछ करने की बात है, तो वह कहीं भी किया जा सकता है। यह तय होता है आपकी प्राथमिकता से।

राजनीति से सीधे जुड़ाव के बाद कला के क्षेत्र में पहले की तरह सक्रिय न रह पाने की कसक तो है ही, पर अभी भी कुछ न कुछ कर ही लेता हूं। यह अलग बात है कि पहले सी निरंतरता उसमें नहीं रही। इन दिनों राजनीति से हटकर क्या कुछ कर रहे हैं, इस जिज्ञासा पर वह अपने पढ़ने की भूख के बारे में बताते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों नेपाल पर लिखी एक किताब का हिंदी अनुवाद पढ़ा। जब कभी वक्त मिलता है उसे खंगाल लेता हूं।
क्या आप इसे मानेंगे कि कला (किसी भी संस्कृति कर्म ) के बजाए राजनीति सामाजिक बदलाव लाने के लिए एक कारगर जरिया है ? क्या यहीं कारण तो नहीं कि इसने शिद्दत से आपको बांध रखा है।

‘कश्तूरी’ का अनुभव कैसा रहा ? क्या इसे आप विस्तार देने की सोच है ?
फिल्म निर्माण बस एक अनुभव के लिए था। बहुत कुछ सीखा, जाना। लेकिन ऐसा नहीं कि यहां फुलस्टाप हो गया। इससे मिली सीख के आधार पर आगे भी कुछ करेंगे। यह फिल्म निर्माण के लिए फिल्म निर्माण कम और कलाकर्म के अनुभव के लिए अधिक था।

रविवार, 31 अक्टूबर 2010

बाजार से फार्मूलाबाजी नहीं बचा सकती

मार्क्स, हीगेल, लोहिया, सुकरात, गांधी, काफ्का
सबपे भारी पड़ रहा है, फलसफा बाजार का।
- उर्दू शायर देवेंद्र गौतम
यह शेर अपने परिप्रेक्ष्य में बाजार की दिशा और उसकी सरपरस्ती की मंजूरी का आतंक बुनता है। अर्थ के विस्तार ने और फिर उसके दबाव ने चेतना को संकीर्ण किया। भोगवाद को बढ़ावा देनेवाले तंत्रों ने अपना हसीन जाल बुना। हम सिमटते गए उन जालों में। खोते गए खुद को। और इस तरह सांस्कृतिक तत्वों के लिए दुर्वह परिस्थितियों को हमने और हमारी उदासीनता ने मजबूत होने, हावी हो जाने दिया। सभी पढ़े-लिखे संवेदनशीलों ने इसे करीब से शब्दजगत में इस हलचल की रेकार्डिंग देखी-सुनी। सूचना के विस्फोट में संवेदनाएं बह गईं। आकस्मिक नहीं कि अखबार की तादाद बढ़ती गई और किताब सिमटती गई। गणित की भाषा में मस्तिष्क और हृदय, सूचना और संवेदना व्युत्क्रमानुपाती कही जाएंगी। इस दौरान संस्कृति के समक्ष भविष्य का संकट, अस्तित्व रक्षा का प्रश्न विकट वैताल बनकर खड़ा है। और एक फार्मूला विकसित हुआ कि बाजार में जगह बनाकर ही बचा जा सकता है। सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट के दर्शन में फिटनेस की यह शर्त चस्पां कर दी गई। जितनी सहूलियतों के साथ बाजार की महाठगिनी अपने नखदंत लेकर प्रकट हुई है उसके मुकाबले दोगले मीडिया और सत्ता के दलाल मठाधीशों की नपुंसकता किसी काम की नहीं। यह तो बाजार के बेडरूम में सज-धजकर पहुंची हुई कालगर्ल है। और राजनीति हरपल किसी भी बोलीपर नीलाम को तैयार...और जिस साहित्य के पास पाठकों का रोना हो भला वह किस फौज को लेगा अपने साथ। साम्राज्यवादी ताकत जब कभी संकट में पड़ती है तो वह किसी न अबूझ से लगते मोहक-दुरूह-पहेलीनुमा दर्शन लेकर प्रकट होती है। इतिहास का अंत, नई विश्वव्यवस्था, उत्तरआधुनिकता... क्या इस पर लट्टू होनेवाले विमर्श कार? या कारपोरेट वामपंथी या सजावट के लिए ड्राइंगरूम में विचार रखनेवाली गाड आफ स्माल थिंग्स ? क्या किसी राष्ट्रीय समझ के बगैर भी आपका काम चल जाएगा। आखिर किस राष्ट्रीय समझ और इस समझ के किस सातत्य का परिचय वह दे रही है ?

(प्रभात खबर की ओर से ‘संस्कृति और बाजारवाद’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी (2004-5) के संचालन के क्रम में संबोधन पर आधारित। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रामजी राय व विशिष्ट अतिथि संजीव थे। )

आखिर नामवर सठियाए तो क्या हुआ

(मोहल्ला में नामवर पर केंद्रित दिलीप मंडल के 9 जुलाई 2010 के पोस्ट यह कौन बोल रहा है? तोगड़िया या ठाकुर नामवर सिंह? पर प्रतिक्रिया – (29.10.2010) )
याद कीजिए जब निराला की कविताएं सिर्फ आलाप हुआ करती थीं, वह भी चूके थे। निराला की स्पर्द्धा में पंत की ग्रंथियां निराला की पैरोडी बनकर बहने लगी थी। हम बिहारी जिसे भसियाना कहते हैं उसे ही सठियाना भी कहते हैं। जब आप दुर्बल होते हैं तो छोटी-छोटी चीजों से परास्त होने लगते हैं। बैक्टीरिया से और आसक्ति से। आप रोगी होने लगते हैं, पर नहीं मानते कि इलाज की जरूरत है तो यहीं से हम भसियाते हैं। आखिर कितने दिनों तक नामवरीय कुहासा (यह संजीव का दिया हुआ शब्द है। याद हो कि न याद हो, उन्होंने कभी राष्ट्रीय सहारा में लिखा था) कायम रहेगा। फिलहाल याद कीजिए आचार्य प्रवर किसी भी व्याख्यान में अब विषय केंद्रित नहीं हो पाते। अध्ययन, अनुभव, दक्षता, मेधा पर कोई ऊंगली उठा नहीं सकता। पर ज्ञान के साथ संवेदना और विवेक की भी जरूरत पड़ती है। कम से कम उन्हें बताने की जरूरत नहीं। आखिर क्या वजह है कि अपने अंतरंग क्षणों में जिस विभूति नारायण राय के विवादास्पद बयान को वस्तुगत और सही ठहराते हैं, उसे सार्वजनिक रूप से कहने में उन्हें कौन रोकता है। इलियट की पंक्ति याद रहनी चाहिए प्रेजेंट इंफ्लुएंशेज द पास्ट। क्या इस बिना पर उन्हें नहीं कसा जाएगा कभी। याद है दूरदर्शन के सुबह-सबेरे कार्यक्रम में एक से एक गुलशन नंदा टाईप किताबों पर उनके अनमोल वचन प्रकटिया रहे थे। आखिर यह सब क्या है। मैं जानता हूं यह सब कहकर अपने कई मित्रों को नाराज कर रहा हूं, पर नाराजगी से बचने के लिए कोई गूंगा तो नहीं हो सकता ! कोई अपनी उपयोगिता खत्म हो जाने के बाद खुद को दुहराता रहता है या फिर खतरे – मुश्किल पैदा करता है। गांधी जी का हस्र हमारे सामने है। विवेकानंद अपनी भूमिका के बाद नहीं रहे। भगत सिंह नहीं रहे। सुभाष नहीं रहे। मंडेला रहे तो निर्लिप्त रहे। मान लीजिए कि आचार्य का समय अब नहीं रहा, लेकिन क्या इससे उनका अवदान कम हो जाएगा...लेकिन अपने अवदान की महत्ता बरकरार रखने की चिंता खुद में भी है, इससे कौन इनकार करेगा।
मुझे याद है और कोयलांचलवासियों को याद होगा कि नामवर के निमित्त की श्रृंखला में धनबाद के खनि विद्यापीठ में उनके सम्मान में एक आयोजन था। पूरे व्याख्यान में साहित्यकार की राजनीतिक प्रतिबद्धता को सर्वप्रमुख बताया था। उनकी कथनी का नतीजा में कहा जाना चाहिए कि राजनीति आगे और साहित्य पीछे। उनका स्पष्ट आग्रह था के लेखक पार्टी करे। उनकी नजरों में दुग्ध-धवल वामपंथी पार्टियां। उसमें संजीव और अरुण कमल भी पधारे थे। आचार्य प्रवर के व्याख्यान के बाद सवाल-जवाब का सत्र आय़ा। मैंने सहज जिज्ञासा की कि यदि लेखक राजनीति करेगा तो किसी न किसी पक्ष में होना उसकी बाध्यता होगी। ऐसे में क्या साहित्य दर्पण की भूमिका निभा पाएगा? घुमा-फिराकर उनकी बात राजनीतिक प्रतिबद्धता की अनिवार्यता पर टिकी थी। मैंने कहा कि साहित्य जब खुद ही प्रतिरोध की राजनीति है तो अलग से राजनीति की क्या जरूरत? छोटी सी जगह से उठा सवाल उनको कैसा लगा नहीं, पर उनका जवाब था कि अब तुम कुतर्क कर रहे हो।
इसी तरह अभी हिंदी के तर्पण (हिंदी दिवस व पखवाड़ा के लिए, यह उन्हीं की शब्दावली है, यह २९ सितंबर की बात है। मैंने १७ सितंबर के अपने पोस्ट में हिंदी दिवस की साठवीं बरसी पर मैंने हिंदी के पितरों को याद करनेके लिए पितृ पक्ष कहा था) में इस बार जब कोयलांचल आए तो मैंने किसी पल उनसे अपनी जिज्ञासा रखी कि आपने एक जगह अपने व्याख्यान में जिस रामविलास शर्मा को आचार्य कहकर संबोधित किया था उनके सिधार जाने पर 'इतिहास की शवसाधना नाम से रामविलास शर्मा की इतिहास चेतना को टार्गेट कर आलोचना पूरा एक अंक ही केंद्रित किया था। बात पल्ले नहीं पड़ी। इसपर उन्होंने कहा कि रामविलास जी चमरशौच कर रहे थे। हिदी में बहुत काम बाकी पड़ा था तो वेद पर अध्ययन करने लगे। जबकि संस्कृत का कोई खास अध्ययन उनका नहीं था। ठहरे अंग्रेजी के शिक्षक।
इसी तरह मैंने अपने ब्लाग में अजय तिवारी के बहाने टिप्पणी से एक अंश दे रहा हूं-
अपनी आलोचनाओं में अंतर्राष्ट्रीय रीडिंग रूम दिखानेवाले तो बहुतेरे हुए, पर पोलिश सौंदर्यशास्त्री जान पारांदोव्स्की वाला पन्ना किसी ने नहीं पलटा था। मुक्तिबोध ने बगैर किसी का हवाला दिए कला के जिन तीन क्षणों की बात की है, वह जान पारांदोव्स्की की अवधारणा है। ऐसा इस संदर्भ में इसलिए कह रहा हूं कि मुक्तिबोध पर गहन आलोचन-अध्ययन उन्होंने किया है। उन्होंने भी इस पर कुछ नहीं कहा।
ऐसा लगता है जैसे वर्ष 1957 में पुस्तक ‘नई कविता के प्रतिमान’ नहीं आती तो ‘कविता के नए प्रतिमान’ जैसा प्रतिमान गढ़ा भी जाता या नहीं, संदेह ही है।

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

....और आदमी को मार डाला

(हंस-राष्ट्रीय सहारा के ज्ञानरंजन के खिलाफ विषवमन वाले प्रकरण पर 25 मई-2003 को लिखा गया था)
संस्कृति (मीडिया समेत) और बाजार ये सत्ता के दो उत्तरआधुनिक खंभे हैं और ये खंभे जिनके पास हों तो वह अपनी सत्ता का दुर्ग बना ही लेता है। इन दिनों पहल पर आक्षेपों, आरोपों की जो बौछार हो रही है इन्हीं दुर्गों से। लेकिन ये बेहद सशंकित भी होते हैं और भयभीत भी अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं के कारण। पूंजी के पोषक सत्ता प्रतिष्ठानों की इन्हीं मनोरचना के लिए बादल राग में बहुत पहले निराला ने कहा था – ‘अट्टालिका नहीं है रे, आतंक भवन’ में व्यापारियों के दाम और संस्कृति विभाग के खजाने के दम पर निकल रहे पत्र-पत्रिका व अलभ्य आयोजनों के प्रभुओं को अपना पीएफ झोंक कर कर्ज से लद कर तीन दशक से निकल रही पत्रिका पहल का मर्म समझ में न आए तो ताज्जुब क्या। वामपंथी आंदोलनों की जो ट्रेजेडी रही है, कुछ-कुछ वही वजह रही है ज्ञानरंजन पर इस हमले की पहल। हमलों के पीछे निहित मकसद तथा उसके संयोग से ही यह संगठित और सुनियोजित हो जाते हैं। पहल ने यदि राजेंद्र यादव घराने को छापा है तो मुद्राराक्षस को भी और समीक्षा पुरुष नामवर के लिए सदैव विशेष सम्मान भाव रखा। एक भारी-भरकम विशेषांक तक निकाला। प्रमुखता के साथ उनके व्याख्यान छापे। शायद ही किसी पत्रिका ने नामवर सिंह को केंद्रित कर ऐसा कोई आयोजन किया। यह अलग बात है कि उन्हें हिंदी का अंतिम आलोचक साबित करने वाले सिवाए उपाधि वितरण के और कुछ न किया। इसका मतलब यह नहीं कि पहल ने ऋणशोध की अपेक्षा करते हुए ऐसा किया है। हीन तो पहल ही रही। प्रगतिशील आकल्प में छपे जिस साक्षात्कार को बवाल का मूल बताया जा रहा है उसमें कहीं भी साथी पत्रिकाओं पर समझौतापरस्ती का आरोप नहीं। एक सहज अपेक्षाभाव के तहत ही वैसा कहा गया था कि उनसे अपेक्षा थी कि वे ऐसे नहीं करते। वैसे कथादेश का मंसूबा साफ था तो उसे पूरा साक्षात्कार साभार छाप देना था। परिप्रेक्ष्य से काटकर किसी के भी कथन के निहितार्थ विकृत किए जा सकते हैं। डालर में अपना शुल्क मांगना गुनाह है तो महामहिम अशोक वाजपेयी अपने बहुवचन और राजेंद्र यादव अपने हंस की कीमत डालर में क्यों छापते हैं। क्या बदनाम राकेश मंजुल की सोहबत से पहल या पहल संपादक की भूमिका या अवदान का अन्यथाकरण हो जाता है ? फिर तो जनाब मजदूरों के लिए समर्पित उस मार्क्स का क्या होगा जिनकी सोहबत अपने पूंजीपति फ्रेडरिख एंगेल्स से रही। कई कृतियों के तो वह सहलेखक रहे हैं। पिछड़ों के मसीहा लालू यादव का वंशवाद और मसखरेपन में निहित तानाशाही कहां छूट जाती है शिखर सम्मान लेते समय। अमूर्त लड़ाइयां लड़नेवालों के लिए ये पेचीदगियां बनी रहेंगी। बेहतर होता कि जिन हितैषियों को बदनामी का इलहाम रहता है वे साथियों को सतर्क किया करें बजाए कि छीछालेदर की स्थिति तैयार करने में हाथ बंटाएं। यदि सचमुच उनकी चिंता पहल को लेकर वाजिब होती तो वे आरोप-प्रत्यारोप से क्षोभ को घनीभूत नहीं होने देते। बेहतर होता कि दुश्मन ताकतों को हावी होने से रोकें संगठित होकर। अच्छा होता कि एक बार प्रायश्चित कर लेते। संस्कृति के सत्ता प्रतिष्ठानों पर काबिज ऐसे महाप्रभुओं के लिए राजेश जोशी की कविता ‘इन्होंने रंग उठाए’ के इस अर्थपूर्ण अंश को बार-बार गुनें-समझें –
उन्होंने रंग उठाए,
और आदमी को मार डाला
उन्होंने संगीत उठाया
और आदमी को मार डाला
उन्होंने शब्द उठाए
और आदमी को मार डाला।

बेहतर होता कि यह विवाद और कड़वाहट के पहले ही खत्म हो जाती।
(अगले पोस्ट में ज्ञानरंजन का पक्ष - सांस्कृतिक उपद्रव के उस्तादों का वितंडा)

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

हमारे दौर का जरूरी और भयावह आख्यान

पिछले दिनों जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में आयोजित प्रसिद्ध एक्टिविस्ट छायाकार रजनीकांत यादव की नर्मदा घाटी संस्कृति : छायाचित्र प्रदर्शनी एवं व्याख्यान के अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार पहल संपादक ज्ञानरंजन के दिए गए महत्वपूर्ण वक्तव्य के जरूरी अंश हम दे रहे हैं। ये वक्तव्य भर नहीं, हमारे दौर का जरूरी आख्यान प्रस्तुत करते हैं। यह तो ज्ञान दा की अप्रतिम विरल खूबी है।
जिसे आज रेड कोरिडोर कहा जाता है और जो देश के सर्वाधिक अशांत इलाके हैं, अनेक राज्यों का जीवन, जिसकी चपेट में है, वे आदिवासी बहुल्य अंचल हैं। इस देश का सर्वोच्च खनन लकडी, बिजली, औषधि और शिल्प जिन इलाकों से आ रहा है, वहीं सर्वाधिक रक्तपात, हिंसा और युद्ध है। इसलिए नर्मदा घाटी का विपुल जीवन भले आपको रसिक, सुंदर, श्रद्धालु, शांत और समृद्ध दिख रहा हो, उस पर विकास के गिद्ध मंडरा रहे हैं। गरीबी, भोलेपन और सुंदरता को यह सेलेब्रट करने का समय नहीं है। हिंसा के अंखुए कभी भी फूट सकते हैं। ज्वालामुखी जो अभी ठंडा है, कभी भी गरम हो सकता है। नर्मदा घाटी के प्रति हमारा नया आचरण एक जिम्मेदार और चिंता प्रमुख नागरिक का होना चाहिए।
00000000000000000000000000000000
यह जो हमारी तत्कालिक दुनिया है, उसमें कब पापुलर कल्चर ने सेंध लगा दी, यह हमें भी पता नहीं चला। संभवतः भू-मण्डलीकरण के दौर में ऐसा हुआ है। बाजार संगीत और शोर के कारण यह हुआ है और इसलिए कि सिनेमा, मीडिया की चमक ने भी इस मीना बाजार को समर्थन दिया है। मुझे याद है, वह दौर हाल ही का जब अखबार ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीनी की तरफ पलटे थे, तो एक हल्की सी मुठभेड़ विचारों की हुई थी, पर फिर सब कुछ परास्त हो गया। हम उन लोगों को तो जानने लगते हैं, जो मीडिया में प्रतिदिन आते है, जाते हैं, रमते हैं, बोलते हैं, पर हर शहर के खंडहरों में कुछ खोए हुए लोग बचे हैं, जिन्हें हम स्वमेव नहीं पा लेते, उन्हें खोजना पड़ता है। अब हीरों के खोजी लोग दुर्लभ है, गायब हैं, इसलिए हीरों की तलाश भी खत्म हो गई है।
00000000000000000000000000000000विकास की अवधारणाओं पर हमारा देश बंटा हुआ है। बुनियादी तौर पर हम जिस ढांचे को निर्मित कर रहे हैं, वह हमारे देश में मिस फिट है। जिसके कारण असंखय समस्याएं पैदा हो रहीं हैं। हमारे वास्तविक सुर मंद पड़ गए हैं। हम इमारतों, बाजारों, मशीनों के विप्लव, हाईटेक जिंदगी को विकास मानते हैं। यह तेजी-मंदी की धारणा विनाशकारी है। जिस तरह से संसार के महान्‌ आदिवासियों, जन जातियों को मौत के कंसों ने निगल लिया है, हम उसके खिलाफ हैं। हम अल्पसंख्यक भी हों, पर हम उसके खिलाफ हैं।

यह तो होना ही था

ज्ञानरंजन के नाम को मानद उपाधि के लिए राजभवन से स्वीकृति न मिल सकी पहल के संपादक ज्ञानरंजन जी इस बात से न तो भौंचक हैं ओर न ही उत्तेजित जितना स्नेही साहित्यकार.इस घटना को बेहद सहजता से लिया.रानी दुर्गावती विश्व विद्यालय की प्रस्तावित मानद उपाधि सूची का हू-ब-हू अनुमोदित होकर वापस न आना कम से कम ज्ञानजी के लिए अहमियत की बात नहीं है. इस समाचार पर आज सुबह सवेरे ज्ञान जी से फोन पर संपर्क साधा तो समाचार को सहजता से लेने की बात कहते हुए ज्ञान जी ने कहा :-गिरीश अब तुम लोग ब्लागिंग की तरफ चले गए हो बेशक ब्लागिंग एक बेहतरीन विधा है किन्तु तुम को पढ़ना सुनना कई दिनों से नहीं हुआ.
हां दादा वास्तव में अखबारों के पास हम जैसों को छापने के लिए जगह नहीं है और मेरा मोहभंग भी हो गया है.
"तो तुम लोगों को सुनु पडूँ कैसे कम से कम एक बार महीने में गोष्ठी तो हो "
भारत ब्रिगेड वेबसाईट पर उक्त का अंश पढ़ने के बाद- --

याद है एक बार मैं एक दैनिक के साहित्यिक परिशिष्ट संपादन के क्रम में हिंदी के तीन दिग्गज कथाकारो भीष्म साहनी, अमरकांत तथा ज्ञानरंजन पर आठ पन्ने का एक परिशिष्ट निकालना चाह रहा था। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में ऐसे आयोजनों से बचने को कहा था। फिर हरि भटनागर से संपर्क साधा उन्होंने कहा उनसे समय लेकर साक्षात्कार लेकर दूंगा। ज्ञान दा को भनक मिल गई होगी सो यह भी नहीं हुआ। परिशिष्ट निकला। चर्चा भी हुई। याद है एक बार मध्यप्रदेश शासन से वहां के संस्कृति परिषद का सचिव बनाया जा रहा था। माह भर के उधेड़बुन के बाद उन्होंने आफर को ठुकरा दिया। उन्हें लगा इससे महत्वपूर्ण है पहल का संपादन। इस पत्रिका को वह अपने खून-पसीने से सींच रहे थे। इसके प्रतिनिधित्व से जुड़े लोगों को अपनी पत्रिका के लिए विज्ञापन के अंबार रहते थे, पर पहल के नाम पर इनके पास टोटा होता था। एक बार कैसे न कैसे ज्ञानरंजन-नामवर का बड़ा बवेला मचा था। आचार्य नामवर के पक्ष के तरकश से एक से एक तीर दागे जा रहे थे। यह सब तब हुआ जब ज्ञान दा पहल में पहली बार नामवर पर बेहद महत्पूर्ण विशेषांक निकाल चुके थे। सालों से संचित उनके चरित्रहनन का भी प्रयास हुआ। उन्होंने बड़े ही बेलाग भाव में उसका स्पष्टीकरण भी दिया था। मैंने एक अंक में पूरे प्रकरण पर लिखते हुए उनके स्पटीकरण को छापा था। कभी किसी को पहल सम्मान देते तो सूचना होती थी, सम्मानित साहित्यकार से संबंधित कुछ रचनाएं और आग्रह (वे आदेश देने की हैसियत रखते थे) भी हो सके तो कुछ छाप दो। मैं अपने ज्ञान-विवेकानुसार उसे बरतता था। एक बार कवि अरुण कमल के पत्र से ज्ञात हुआ कि कवि राजेश जोशी अपने ऊपर केंद्रित अंक देखकर बहुत खुश थे। यह तो है यारबाश ज्ञान दा का मिजाज। यदि एक शासन ने उन्हें मानद उपाधि से वंचित ही कर दिया तो क्या ज्ञान दा का कुछ ले तो नहीं लिया। वह ऐसी चीजों के लिए बने भी नहीं हैं। मुझे संदेह है कि ऐसे शासन की अनुशंसा पर यह स्वीकार भी करते। लेकिन शासन के द्वारा यह बर्ताव ज्ञानानुरागियों के लिए ही नहीं, रचानाकार जमात के लिए घोर अपमानजनक है। इससे साफ दीखता है कि इस वटवृक्ष ने कैसी विचार-संस्कृति का बिरवा बोया है, शासन को इस ऐतिहासिक अवदान से कोई सरोकार नहीं। और ऐसे शासन का सरोकार होगा भी कैसे। इस शासन का यह व्यवहार अचरज का विषय नहीं। आखिर प्रतिरोधी चेतना शासन से सम्मानित भी तो नहीं होगी। चोर से सम्मानित होना कहीं न कहीं चोरी को मंजूरी तो देने के बराबर ही है। खुशी है कि ज्ञान दा एक धब्बे से बच गए। अन्यथा इसे शासन की अनुकंपा का रंग दे दिया जाता।

गुरुवार, 21 अक्टूबर 2010

जोखिमों से खेलता हंगारीकवि : अतिला यूसूफ

मेरा कोई पिता नहीं, न माँ, न ईश्वर, न देश, न झूला, न कफन, न चुंबन और न ही प्यार। तीन दिनों से मैंने खाया नहीं, कुछ भी नहीं। मेरे २० साल एक ताकत हैं। मेरे ये बीस साल बिकाऊ हैं। यदि खरीदनेवाला कोई नहीं, तो शैतान उसे खरीद ले जाएगा। मैं सच्चे दिल से फूट पडूँगा। जरूरत हुई तो मैं किसी को भी मार डालूँगा। मैं कैद कर लिया जाऊँगा और जिस घास से मेरी मौत आएगी, विस्मयकारी ढंग से वह मेरे सच्चे दिल पर उग आएगी। ये पंक्तियाँ हैं-२०वीं शती के उस महान हंगरी कवि की, जिसके पिता ने तीन साल की उम्र में घर को छोड दिया, १४ साल की उम्र में माँ गुजर गयी, कविताओं के कारण स्कूल-कॉलेजों से निकाला गया, मारक आलोचना के कारण फैलोशिप जाती रही, प्रेमिकाओं ने दगा दिया, वैचारिक स्वतंत्रता ने कम्यूनिस्ट पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया। अतिला यूसुफ नाम के इस हंगरी कवि का जन्म ११ अप्रैल १९०५ को एक साबुन फैक्ट्री के मजदूर ऐरन यूसुफ और किसान की बेटी बोलबला पोज के परिवार में हुआ था। तीन साल की उम्र में पिता के घर त्याग देने के बाद, दो बेटियों और एक बेटे के निर्वाह में अक्षम माँ बोलबला ने बच्चों को अनाथालय में दे दिया। यहाँ अतिला को सूअर चराने तक का काम करना पडा। यहाँ के नारकीय जीवन से उकताकर बालक अतिला माँ के पास आ गया। लाचार और अशक्त माँ काम के बोझ और कैंसर से सिफर् ४३ साल की उम्र में चल बसीं। बीच के दिनों में, नर्वस ब्रेकडाउन के शिकार बालक अतिला ने नौ साल में ही खुदकुशी की कोशिश की थी। रोज-ब-रोज बचने के इस दौर की जद्दोजहद को याद करते हुए अतिला आत्मवृत्त में लिखते हैं कि कई बार ऐसा हुआ कि भोजन के लिए कतार में नौ बजे रात को लगने के बाद, दूसरे दिन साढे आठ बजे बारी आने पर पता चलता कि खाना ख्ात्म हो चुका है। जीविका में अपनी माँ की हरसंभव मदद की। विलाग सिनेमा में ताजा पानी बेचने का काम किया। जलावन के लिए कुछ भी न रहने पर लडकी और कोयला चुराया। अपनी उम्र के बच्चों के लिए रंगीन कागज के खिलौने बनाकर बेचे। टोकरी और पार्सल ढोये। अतिला के इन हालात के बरअक्स हिंदी कथाकार शैलेश मटियानी, पंजाबी के कज्जाक जहीर ही याद आते हैं। सामाजिक व्यवस्था में संतुलन की जिस चाहत से इन लोगों की आस्था समाजवाद या माक्र्सवाद से जुडती है, वह जीवन से उनका मानवीय सरोकार है। यह विचारणीय है कि लगभग ऐसी ही स्थिति से निकले दलित लेखकों में, वैसी आस्था की जगह प्रतिशोध और आवेश क्यों होता है ? भला ऐसी त्रासद व कारुणिक स्मृति की छाप अमिट कैसे न रहे। इन्हीं अनुभवों ने अतिला की रचनाशीलता का भावलोक तैयार किया। आकस्मिक नहीं कि लागोस हटवानी ने इनकी कविताओं को, पूरी युद्धोत्तर पीढी के लिए दस्तावेज कहा। यथार्थ के गहरे और सघन बोध के साथ वैचारिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की प्रखरता से जीवन कभी स्थिर और व्यवस्थित नहीं हो सका। मानसिक अवसाद के घोर दौर में रहते हुए, रचनाशीलता को अक्षुण्ण रखकर, उन्होंने विकट जीवन का उदाहरण प्रस्तुत किया। माँ की मृत्यु के बाद जीजा ने अभिभावकत्व निभाते हुए कवि को एक माध्यमिक विद्यालय में डाल दिया। बाद में उसने रोज विश्वविद्यालय में नामांकन के लिए आवेदन कर दिया। लेकिन शीघ्र ही, एक क्रांतिकारी कविता के कारण उसे वहाँ से निकाल दिया गया। इसी के साथ शिक्षक बनने का सारा ख्वाब जाता रहा। शिक्षक बनने के ख्वाब चूर होने का प्रसंग बेहद दुखद है, जिसका अतिला अपने आत्मवृत्त में उल्लेख करना भूला नहीं। तब तक उनकी कविता ’विद प्योर हर्ट‘ को काफी ख्याति मिल चुकी थी। उस पर सात अखबारों में आलेख छपे। प्रो. लाजोस डेजसी को बेहद गर्व के साथ याद करते हुए कहते हैं कि उनका विचार था कि मैं अपने ऊपर खुद ही शोध करूँ। लेकिन, जैसे ही प्रो. अंटाल होर्जर ने हंगरी भाषा की जाँच ली तो सारा भूत ही उतर गया। प्राथमिक विद्यालय के दो शिक्षकों के सामने, उन्होंने लगभग ताना देते हुए कहा कि तुम्हारी तरह की कविताएँ लिखने वालों को भावी पीढी की शिक्षा कत्तई सुपुर्द नहीं की जानी चाहिए। इतना ही नहीं, उस प्रोफेसर ने इसे मुद्दा बना दिया। उनका कहना था कि वह जब तक वहाँ रहेंगे, उन्हें शिक्षक नहीं बनने दिया जाएगा। यह विडंबना ही है कि तब कक्षा में मिलने वाले साप्ताहिक ५२ पाठों में से २० में अतिला को सर्वोत्तम श्रेणी मिली थी। प्रतिभाशाली होने के कारण छात्रावास का कोई शुल्क अदा नहीं करना पडता था। रहने का सारा खर्च उनकी कविताओं से मिलने वाले मानदेय निकाल ले रहे थे।प्रो. अंटाल होर्जर का वह ताना इतना जहरीला साबित हुआ कि हंगरी लौटने के बाद भी उन्होंने शिक्षक की परीक्षा फिर कभी नहीं दी। शिक्षक की नौकरी पाने पर तो जैसे भरोसा ही नहीं रहा। फिर उन्होंने विदेशी व्यापार संस्थान में हंगरी-फ्रांसीसी संवाददाता की नौकरी कर ली। यहाँ भी दुर्भाग्य ने उनका पीछा नहीं छोडा। कठोर जीवन-संघर्ष से अभी उबरना शेष था। नौकरी से बैठा दिये गये। सामाजिक सुरक्षा संस्थान ने उन्हें आरोग्यशाला भेज दिया। वहाँ चिकित्सा के दौरान् अतिला को ’न्यूरस्थेनिया ग्रैविस‘ नामक एक मनोरोग से ग्रस्त बताया गया। वहाँ उन्हें इस स्वीकृति के साथ कि वह संस्थान पर बोझ नहीं बनना चाहते, नौकरी छोड देनी पडी। उनके अनुसार, जीने की जद्दोजहद तो जैसे बालपन से ही शुरू हो गयी थी, पर एक कवि के अर्थ में यहीं से दुविधा, अंतर्द्वंद्व, जोख्ाम, असुरक्षा के रास्ते असंतुलन से होकर मनोविदलता (सिजोफ्रेनिया) तक उनकी यात्रा चलती रही। मनोचिकित्सा होने लगी। उन्होंने शादी तो कभी नहीं की, पर मनोचिकित्सा के क्रम में आने वाली महिलाओं से कुछ प्रेम-प्रसंग जरूर चले। अभिव्यक्ति में बेलौसपन और बेबाकी के साथ वैचारिक स्वतंत्रता के कारण कोई भी संफ भावनात्मक राग-रेशे की हद तक न आ सका। कवि, उपन्यासकार तथा आलोचक मिहाली बैबिट्स पर एक आक्रामक समीक्षा के कारण बामगार्टेन फाउंडेशन ने उनसे सहयोग का हाथ खींच लिया। वह इससे न तो तिलमिलाये और न उनके लिए यह अचरज का विषय बना। मानो वह इस हश्र के लिए पहले से ही तैयार बैठे थे। आख्ार, इस फाउंडेशन के अध्यक्ष भी तो बैबिट्स ही थे। अभिव्यक्ति के जोखिमों से खेलने की ठान लेने के बाद, कोई किसी की, किस हद तक मदद तक सकता है, इसे भारतीय उपमहाद्वीप निराला, मुक्तिबोध, मंटो, नजरूल, पाश के उदाहरण से अच्छी तरह समझ सकता है। विश्व-साहित्य में अतिला इसके निराले उदाहरण न हों, पर उस तरह से भुलाने लायक तो नहीं हैं, जिस तरह उन्हें उनके जन्म शती वर्ष में भुला दिया गया। १० अक्टूबर, २००६ को तो आत्महत्या पर नियंत्रण का दिवस ही घोषित कर दिया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट तो कहती है कि दुनिया में प्रति घंटा १०४ लोग खुदकुशी कर रहे हैं। इसका कारण अति महत्त्वाकांक्षा, तनाव और हिंसा हैं, लेकिन अतिला के अंत को इस सरलीकृत खाँचे में नहीं बिठाया जा सकता है। उनका अंत तो अभिव्यक्ति के उस खतरे से खेलने के कारण हुआ, जिसके बिना उनकी रचनाशीलता बची नहीं रह सकती थी। पाश के शब्दों में, ’बीच का कोई रास्ता नहीं होता।‘ दूधनाथ सिंह के निराला ः आत्महंता आस्था के इस मार्मिक अंश से अतिला के द्वंद्व और नियति को सहजता से समझा जा सकता है ः कला रचना के प्रति अनंत आस्था एक प्रकार के आत्महनन का पर्याय होती है, जिससे किसी मौलिक रचनाकार की मुक्ति नहीं है। जो जितना अपने को खाता जाता है, बाहर उतना ही रचता जाता है। पर दुनियावी तौर पर वह धीरे-धीरे विनष्ट, समाप्त, तिरोहित तो होता ही जाता है। महान और मौलिक सर्जना के लिए यह आत्मबलि शायद अनिवार्य है। यह महान और मौलिक सर्जना कबीर की लुकाठी ही तो है, जिसे लेकर वह कहते फिरते हैं - जो घर जारै आपना चले हमारे साथ। यानी कबीर की तरह आत्मबलि का न्यौता। स्कूल-कॉलेज से निष्कासन, प्रेमिकाओं का तिरस्कार; अचानक उनके जीवन में नहीं आया। यह उनके चुनावों का नतीजा ही तो था। पर मनोविदलता के खतरनाक दौर में हों या अवसाद के घोर क्षणों में, उनकी क्रांतिकारिता कभी क्षीण नहीं हुई। स्कूल से निकाले जाने के बाद कॉलेज के दिनों में अध्ययन की तन्मयता और शोधवृत्ति इस कदर सुरक्षित थी कि इस दौरान् ऑस्ट्रिया और पेरिस में शिक्षार्जन करते हुए, उन्होंने १५वीं सदी के फ्रांसीसी साहित्य के एक विख्यात कवि फ्रैंकोइस विलन की खोज कर डाली। विलन कवि के साथ-साथ शातिर चोर भी था। विश्व विद्यालय से निष्कासन के बाद अतिला अपनी पांडुलिपियाँ लेकर विएना आ गये। यहाँ उन्हें आजीविका के लिए अखबार बेचने से लेकर होटल रेस्त्रां में सफाई तक का काम करना पडा। इसी दौरान् उन्होंने मार्क्र्स और हीगेल को पढ डाला। इनकी छाप भी उनकी विचारधारा और रचनाओं पर पडी। इस दौर की रचनाओं की सराहना तत्कालीन शोधकर्ताओं और नामी-गिरामी समीक्षकों ने भी की। १९७२ में कई फ्रांसीसी पत्रिकाओं ने उनकी कविताएँ प्रकाशित की। १९२९ में प्रकाशित कविता-संग्रह पर फ्रांसीसी अतियथार्थवाद की छाप देखी जाती है। अगले ही साल वे अवैध रूप से हंगरी कम्यूनिस्ट पार्टी में शामिल हो गये। इस दृष्टि से पाल हेलर का वह संस्मरण काफी दिलचस्प है जिसमें उन्होंने उनके साथ अपनी मुलाकात को याद किया है। तत्कालीन हंगरी में होनेवाले अत्याचार से व्यथित जोसेफ में इसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया थी। इसे समझे बगैर आप उनकी कविताएं जो गरीब हैं या कितना बड़ा राजा जैसी कविताएं नहीं पढ़ सकते और न ही उसका अहसास कर सकते हैं। दुनिया भर में फैले अपने समकालीन तथा साथी कवियों की तरह वह भी 30 के दशक में कम्यूनिस्ट पार्टी में शामिल हुए। लेनिन उनकी अद्वितीयता को नहीं पचा सके और उन्हें पार्टी से निकाल – बाहर कर दिया। जोसेफ की तीव्र बौद्धिकता, तीक्ष्ण –मारक आत्मसजगता, अटूट-अडिग ईमानदारी, विरल थी। बुडापेस्ट के जिस कब्रिस्तान में जोसेफ अपने परिजनों के साथ दफनाए गए हैं, वहां उनकी मां नहीं हैं, जिसे उन्होंने अपनी मेरी मां में अमर कर दिया। हालांकि उनकी मां की मृत्यु उनके छुटपन में ही हो गई थी, फिर भी उनके लिए सिर्फ वही साफ-सुथरी रही। ताजिंदगी वे उनके साथ रहीं तथा कवि ने अपने संपर्क में आनेवाली जिस महिला को भी प्यार करना चाहा, उसमें मां को तलाशा है। गीत कविता इसकी ज्वलंत साक्ष्य है-


मैं तुम्हें प्यार करता हूं
जैसे एक बच्चा अपनी मां को प्यार करता है। ....

१९३१ में आया संग्रह जब्त कर लिया गया और ’साहित्य तथा समाजवाद‘ शीर्षक लेख के कारण उन पर अभियोग तक चला। १९३१ से १९३६ के दौरान् आये संग्रहों से उन्हें समीक्षा-आलोचना जगत् में व्यापक मान्यता मिली। इसी दौरान् भीषण अवसाद के कारण उन्हें अस्पताल में भरती होना पडा। ’मेरी आँखें उछल-कूद करती हैं, इसी बीच लिखी गयी कविता है। अपने मनोचिकित्सक की हौसला अफजाई से प्रोत्साहित होकर उन्होंने ’हवा की एक साँस‘ १९३६ में लिखी, जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं ः ’वे मेरे सभी टेलीफोन कॉल टेप कर सकते हैं/ (न जाने कब, कौन और किससे बातचीत का)/ मेरे सपनों और योजनाओं की उनके पास एक फाइल है/ और वे उसे पढते हैं/ और कौन जानता है कब उन फाइलों को खोदने के उन्हें पर्याप्त कारण मिल जाएँ/ जो मेरे हकों का उल्लंघन करें। भयंकर गरीबी और असुरक्षा से घिरे होने के बावजूद उन्होंने अपनी वैचारिक स्वतंत्रता को अक्षत रखा और अभिव्यक्ति की मौलिकता को अक्षुण्ण। उनकी वैचारिक स्वतंत्रता तथा फ्रायड में दिलचस्पी का नतीजा ही था कि वे फ्रायड के मनोविश्लेषण तथा माक्र्सवाद के संश्लेषण करने की योजना पर गंभीरता से काम करने लग गये थे। दरअसल, यह दोनों ही विचारधाराएँ जीवन में चरम भौतिकता की प्रतिष्ठा करने वाले सिद्धांतों पर टिकी हैं। अपने स्वाभाविक संस्कार के तहत ही कम्यूनिस्ट पार्टी इस नवीनता और मौलिकता की आँच को बर्दाश्त नहीं कर सकी और अतिला को निष्कासित कर दिया। पॉल हेलर ने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि उनकी विरल बौद्धिक मारकता और अटूट ईमानदारी से उपजी उग्र अद्वितीयता को पार्टी नहीं झेल सकी। निरंतर बढते अकेलेपन में भयंकर मानसिक असंतुलन और मनोविदलता से वह पार नहीं पा सके। ३ दिसंबर, १९३७ को सिफर् ३२ साल की उम्र में अतिला ने एक मालगाडी से कटकर अपनी जान दे दी। उनकी इस नियति को हिंदी के विख्यात कवि रघुवीर सहाय की इस पंक्ति से समझा जा सकता है ः सबसे मुश्किल और एक ही सही रास्ता है कि मैं सब सेनाओं में लडूँ, किसी में ढाल सहित, किसी में निष्कवच होकर-मगर अपने को अंत में मरने सिफर् अपने मोर्चे पर दूँ (’आत्महत्या के विरुद्ध‘ की भूमिका में)। अतिला ने इसी दशक के शुरू साल में खुदकुशी करने वाले विख्यात रूसी कवि मायकोव्स्की की कविता ’सेर्गेंई एसेनिन‘ को अपनी मौत से जैसे जीवंत किया ः तुम अगर मुझसे पूछो / मैं पसंद करूँगा पीकर मर जाना बनिस्बत मृत्यु की प्रतीक्षा में ऊबने/ या ऊबते हुए जीने से (सेर्गेनिन ने भी वर्ष १९२५ में खुदकुशी की थी।
(पहली बार वर्तमान साहित्य/ जून, 2007) दुबारा साक्षात्कार ने जनवरी 2008 के अंक में छापा। फिर WWW.KHABAR EXPRESS.COM में छपा।

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

डायरी के पन्ने से

सम्मान
विकास का अर्थशास्त्र में दुनिया का लोहा मनवानेवाले 64 वर्षीय अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा भारत के लिए आह्लादकारी तो है ही, यह पूंजीवादी देश को दिया गया एक जवाब भी है जो मनुष्यमात्र के लिए उपलब्धि है। समाज कल्याण के क्षेत्र में श्री सेन के अर्थशास्त्रीय अध्ययन से गरीबी और भूख के आर्थिक तंत्र की जो गहरी समझ विकसित हो रही थी उसे और नजर अंदाज किया जाना संभव नहीं था। कल्याणकारी राज्य की संकल्पना तो थी, पर उसके लिए अर्थशास्त्र
नहीं था। निश्चय ही विकासात्मक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में किए गए कार्य के कारण श्री सेन के पुरस्कृत किए जाने से स्वतः ही कल्याणकारी अर्थशास्त्र को मान्यता मिल जाती है।
इतिहास, दर्शनशास्त्र के साथ अर्थशास्त्र के विद्वान श्री अमर्त्य सेन की दावेदारी पहले से ही नोबल पुरस्कार के लिए दस्तक दे रही थी। वर्ष 1995-96 में ही उन्हें पुरस्कार दिए जाने की जोर-शोर से चर्चा चल रही थी। कहा जा सकता है कि उन्हें पुरस्कार दिए जाने में देर ही हुई। उनके सिद्धांतों व स्थापनाओं को गरीब व पिछड़े मुल्कों में पहले ही अमल में लाया जाने लगा था। यही उनके कामों की असल मान्यता भी थी। पर नोबल पुरस्कार मिल जाने से श्री सेन के अध्ययन के लिए पश्चिमी जगत में व्यापक स्वीकार की स्थिति बनी है। पुरस्कार इसका भी प्रमाण है।
गरीबी किसी मुल्क विशेष की समस्या नहीं, यह एक मानव स्थिति है जो हर कहीं संभव है जैसे अखाल के लिए जरूरी नहीं कि खाद्यान्न की उपज में कमी ही एक वजह हो। जहां से खाद्यान्न के निर्यात हुए वहां भी अकाल पड़ा था। इसलिए श्री सेन के अध्ययन की महत्ता इसी में है कि यह सभी मुल्कों और अर्थव्यवस्थाओं के लिए समान रूप से उपादेय है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा भी है कि किसी समाज या अर्थव्यवस्था में हो रहे परिवर्तनों का आकलन केवल समृद्ध वर्ग को आधार बनाकर करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है। इसके लिए गरीबों को भी देखना होगा। स्पष्ट है कि उनका आशय आर्थिक नीतियों में वंचितों को और वंचित करने के प्रतिरोध से है। जैसे एशियाई समाज की चेतना प्रतिरोध की चेतना है, उसी तरह श्री सेन के अध्ययन को प्रतिरोध का अर्थशास्त्र कहा जा सकता है।
जब विश्व भर में रीगन और थैचर की तूती बोलती थी, उस दौर में श्री सेन ‘रीगन-थैचर अर्थनीति
’ का जमकर और खुलकर विरोध किया था और इस काम में दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों में श्री सेन अकेले थे। बाजार को सौ फीसदी खुले क्षेत्र को सौंपने की वकालत का उन्होंने सदैव मुखर विरोध किया। यह विरोध केवल विरोध के लिए विरोध होता तो उनके अध्ययन के निष्कर्षों की पुष्टि वैश्विक स्थितियों ने नहीं की होती। यह श्री सेन की प्रतिरोधी चेतना ही थी जो गरीबी, अपढ़, बेकारी बहुल समाज की प्राणशक्ति होती है। इसे श्री सेन ने अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ले जाकर प्रतिष्ठित किया।
श्री सेन का अध्ययन अध्ययन के लिए अध्ययन नहीं था। यदि ऐसा होता तो उनके निष्कर्ष, स्थापनाएं उपभोक्तावादी नृशंस बाजार के उपकरण भर रह जाते। पर श्री सेन का एक रचनात्मक मकसद था, एक सार्थक कार्यक्रम था। अकाल और दुर्भिक्ष की विकट और एकांतिक समझदारी ने वह औरों की तरह संवेदनहीन ज्ञान के क्षेत्र में नहीं गए। यह निकटता ज्ञानात्मक संवेदन थी, जो अंततः संवेदनात्मक ज्ञान में तब्दील हुआ। यही कारण है कि गरीबी की कारक शक्तियां और गरीबी उन्मूलन के उपाय खोजने में उन्होंने अपनी जिंदगी लगा दी। यह नोबल सचमुच में अल्फ्रेड नोबल के मूल्यों और आदर्शों के सम्मान में इजाफा करता है।
(16.10.1998, एक हिंदी अखबार के संपादकीय टिप्पणी के रूप में लिखा गया।)

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

सबके अपने माफिया

हिंदी में मठाधीशी की अपनी परंपरा रही है। कभी यह परंपरा पत्रिका के कंधे पर चली तो कभी संपादक-आलोचक की उंगली पकड़ कर। इस परंपरा ने कई गुल खिलाए हैं। इसकी गंध हिंदी जमात में अब तक मौजूद है। पिछले दिनों जब एक प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका ‘आउट लुक’ ने ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव का अधूरा ख्वाब (उपन्यास !) का अंश छापा तो जैसे यह एक डान के ख्वाब को पूरा करने जैसा था। नहीं मालूम पत्रिका उसके अंडरवर्ल्ड की छवि से अवगत है या नहीं। हिंदी पट्टी ही नहीं, यह देश-दुनिया उसके इस रूप को, नेटवर्क को बखूबी जानती है। इस टिप्पणी का एकमात्र मकसद इससे पदै हुई हिंदी जमात की चिंता और आगामी खतरे की निशानदेही है।

माल इटली का हो या इंग्लैंड का, भारत में आकर बेहद सस्ता हो जाता है। भार और मात्रा में, गुण में और गण में। यह अलग मसला है कि यह जनवाद का असर है या जनतंत्र का। कुछ ऐसा ही हुआ है माफिया शब्द का। माफिया शब्द को लाच करना भर था कि माफियागीरी का बूम आ गया इस मुल्क में। जनजागरण के दौर से लेकर उत्तरआधुनिक दौर तक में। मुंबई से लेकर कोयलानगरी तक में। बनारस से लेकर दिल्ली तक। सबका अपना अर्थसंसार, सबका अपना अपराध संसार। इसलिए सबके अपने-अपने माफिया। जो जगह मुंबई ने दाऊद को दी, वही जगह कोयलानगरी में सूर्यदेव सिंह को। साहित्य के क्षेत्र में, संस्कृतिकर्म के क्षेत्र में जिन्होंने अपना आतंक संसार रचा, वे उस संसार के क्या कहे जा सकते हैं ?
बहुत कम लोग जानते होंगे कि एक दौर था जब इटली के द्वीप में यह पद डिराइव हो रहा था। तो एक और दौर था जब हिंदी के द्वीप में साहित्य के इतिहास निर्माताओं ने इस प्रवृत्ति को जन्म दिया। जाने-अनजाने जार्ज ग्रियर्सन से लेकर भारतेंदु हरिश्चंद्र और रामचंद्र शुक्ल तक इसमें शरीक रहे। महावीर प्रसाद द्विवेदी तो इसमें एक कड़ी के रूप में रहे। बेहद सचेत रूप में। नतीजा बड़ा ही विकट रहा इस घालमेल का। एक की भूल ने निराला को महिमामंडित करवा दिया, तो दूसरे के कारण निराला के पागलपन तक की नौबत आई। दरअसल मुक्तछंद की पहली कविता लिखनेवाले महेश नारायण श्रीवास्तव को कोई जानता तक नहीं। वह जगह नियंताओं की भूल की वजहसे निराला को मिल गई, सो मिल गई। बाद में तो 20 वीं सदी के ढलान पर कान पर हाथ रखकर आलोचकों, इतिहासकारों को आवाज लगाने का डा. चंद्रेश्वर कर्ण को किसी ने सुना तक नहीं। हिंदी सदी का 20 वीं सदी का इतिहास से लेकर हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, हिंदी जाति का इतिहास, हिंदी साहित्य व संवेदना का विकास तक न जाने कितनी पोथियां स्याही से पोत दी गईं। इतिहास की आलोचना और आलोचना का इतिहास रचनेवाले आचार्यों को इस ओर झांकने की फुर्सत तक नहीं। अभी कई ऐसे गाडफादर हैं जिन्होंने हिंदी की फजीहतें देखीं और जबान पर ताला जड़े रखा। किसी ने कदाचित महेश बाबू का जिक्र तक करना मुनासिब नहीं समझा। और यह बात कौन नहीं जानता कि आचार्य द्विवेदी ने निराला की कविता जूही की कली को छापने लायक नहीं समझा। निराला ने ‘सरोज स्मृति’ में इस दंश को बेहद मार्मिकता के साथ रेखांकित किया है। उन्हीं आचार्यों के मानस पुत्रों या वंशजों के कारण मुक्तिबोध को अपनी कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ के लिए क्या नहीं देखना पड़ा। आज के दौर में यह प्रसंग नए सिरे से नया रूप ले रहा है। इसके एक नहीं कई उदाहरण मिले। एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका ने इसका ताजा उदाहरण पेश किया है। कुल मिलाकर यह मीडिया का आतंक था। पहले सीमित अर्थों में जो शब्द मीडिया का काम कर रहे थे, वह इस इलेक्ट्रानिक दौर में एक व्यापक कारोबार कर रहा है। सूचना से लेकर संचार तक की सारी व्यवस्था तक इसके किरदार हैं।
सारी बातें बेसिर पैर की लगती हों, पर बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी। एक प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका (आउट लुक) ने अभी पिछले दिनों अंडरवर्ल्ड डान बबलू श्रीवास्तव का उपन्यास अंश छापा है। विचित्र यह नहीं कि पत्रिका ने इस अंडरवर्ल्ड को छापा है। विचित्र यह है कि उसके प्रलाप को उपन्यासा कहकर छापा गया है। इतना ही नहीं इसी पत्रिका ने हाल में हिंदी कहानी का विशेषांक निकाला है जिसमें हिंदी कहानी में स्त्री उसकी चिंता थी। मीडिया का वश चले तो वह प्रेमचंद का माडल खड़ा कर दे। किसी को लेखक और कवि करार दे। क्या एक कवि-कलाकार बनना मजाक है ? मजाक तो पहले भी हो रहा था। करनेवाले कोई और थे। फर्क यह हो गया कि अब हमीं में से निकल कर कोई हमें खलनायक करार दे रहा है और खलनायक को समाज के शीर्ष पर बैठा दे रहा है। कमोबेश हो भी यही रहा है। यह माडल किसी कुख्यात अपराधी से लेकर बलात्कारी तक कोई भी हो सकता है। कुछ दिनों पहले श्रीलंका में बलात्कार के एक सजायाफ्ता मुजरिम को वहां का श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। क्या इससे यही साबित करने की चेष्टा हुई न कि कला का संवेदना से कोई सरोकार नहीं, इस नाते कलाकार की कोई सामाजिक उपस्थिति नहीं बनती और कला का कोई सामाजिक हस्तक्षेप नहीं होता ? अगर हस्तक्षेप ही होता तो इसे नामांकन तक नहीं मिलता। खैर। ऐसा नहीं कि दलितों-वंचितों-दमितों को रचना के संसार में प्रवेश का हक नहीं, इजाजत नहीं। पहले भी हीरा डोम से लेकर शैलेश मटियानी जैसे उदाहरण हमारे सामने आ चुके हैं। पंजाबी विश्वविद्यालय के पंजाबी व अंग्रेजी के मानद प्रोफेसर रहे किरपाल कज्जाक से लेकर इस दौर में लक्ष्मण चायवाला और रामलखन यादव इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। कज्जाक का अतीत असामाजिक कृत्यों में लिप्तता का रहा तो रामलखन रात्रिप्रहरी रह चुके हैं। दोनों ही साहित्य में परिचय के मोहताज नहीं।
अभिव्यक्ति को विधाओं का नाम देना और वाचक को लेखक का दर्जा देने का कोई निकष न हो तो आम जीवन की धांधली से वह अलग कहां। माफिया किसी निकष पर नहीं चलता। उसका अपना संसार होता है। इसलिए उसके अपने निकष होते हैं। हां, ये निकष सामान्य व्यवस्था को उलट-पुलट कर देनेवाले होते हैं। पत्रकारिता जैसे गंभीर व जिम्मेवार कर्म में जिस गरिमा का निर्वाह इस पत्रिका ने किया है, इतने कम समय में यह बेहद मुश्किल है। खासकर तब, जब बाजार की लगातारा गलाकाट स्पर्द्धा अनाप-शनाप करवा रही है। सेक्स सर्वे के नाम पर लगातार जो गलीज चीजें परोसी जा रही हैं, उसे किस मानक के सहारे उचित ठहराएंगे आप ? कल को दाऊद यदि तहलका डाट काम को अपनी लंबी चिट्ठी भेजे तो यह उसकी प्राथमिकता और आजादी हो जाएगी कि वह उसे नए अंदाज की कहानी कहकर पेश करे। करीब डेढ़ दशक पहले इसी तरह साहित्य अकादमी ने अंडरवर्ल्ड से रिश्ता रखनेवाले किसी उर्दू लेखक के ‘आई कार्ड’ नामक उपन्यास को पुरस्कार से नवाजा था। यह भी एक माफियागीरी ही थी। लेकिन ऐसी माफियागीरी को जस्टीफाईड होने के लिए साहित्यिक जमात के आलोचना संसार से गुजरना पड़ता है। आखिर रचना को परखने का निकष क्या है। क्या यह कसौटी रचनाओं से स्वायत्त होती है या फिर पाठ के बाहर खड़े आलोचक के संसार से ? ये हादसे तब से घटित होने लगे जब से संपादक-प्रबंधक के काम में अदला-बदली हो गई। बाजार की दादागीरी से दरअसल संपादक का काम अब चीजों को बाजार के साथ मैनेज करना रह गया है। और मैनेजर का काम घराने के मकसदों को उसके बाजार को संपादित करना है। यहीं से परख की कसौटी पाठ के संसार से निकल कर बाजार की कोख से निकलने लगी। बाजार में सनसनीखेज मालों को लानेवालों, पहले लानेवालों में विचित्र होड़ मच गई है। परखनेवाले परखें, उसके शास्त्र की खींचतान करें। अपन तो पहले माल ला दिया है।

(एक समाचार पत्रिका 'माइंड' के साहित्य संपादन के क्रम में अक्तूबर 2005 में लिखी टिप्पणी)

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

अब कुछ किताबों की

भारतीय समाज के व्यामोहों का द्वंद्व यानी निन्यानबे


पात्र और तिथि को छोड़ इतिहास में कुछ भी सच नहीं होता और साहित्य में इसका उलट होता है, क्योंकि इतिहासविद के पास पात्रों के अंतर्जगत में प्रवेश का अवसर नहीं होता। जो इतिहासकार का कार्य नहीं वही उपन्यासकार का धर्म होता है। इसे हम लेस्ली स्टीफन की तरह भी नहीं देख सकते जिनका मानना था कि ऐतिहासिक उपन्यास साहित्यिक वर्णसंकर हैं। 1857 के काल से शुरू होकर 20 वीं सदी के अंतिम दशक की आहटों को सुनानेवाले उपन्यास निन्यानबे को देखकर ऐसा नहीं लगत। अपने साहित्यिक कौशल की छौंक से ऐतिहासिक उपन्यासों की रूक्षता को दूर रखने में सक्षम उपन्यासकार रवींद्र वर्मा का छठा उपन्यास है। बहुत बार विराट अध्ययन, शोध, चिंतन व व्यापक जीवनानुभव से संपृप्त के कारण ऐतिहासिक उपन्यास की मूल गलतियों पर भी उंगली रखने वाले साबित होते हैं। इतिहास की भूलों के परिर्माजन का ऐसा आह्वान इतिहासकारों के लिए चुनौती है। शायद इन्हीं कारणों से पाल ग्रेप ने ऐतिहासिक उपन्यासों को इतिहास का शत्रु बताया है। ग्रेप की इस पीड़ा को बखूबी समझा जा सकता है दिनकर की कविता ‘कलम आज उनकी जय बोल’ के जरिए जिसमें एक जगह उन्होंने कहा है –

जो अगणित लघुदीप हमारे
तूफानों में एक किनारे
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।
कलम आज उनकी जय बोल।
अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बिचारा
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य, चंद्र, भूगोल-खगोल
कलम आज उनकी जय बोल।

वैसे उपन्यास के प्रतिपाद्य से इसका कोई खास सरोकार नहीं, फिर भी रह-रहकर नायकों से आक्रांत – अभिभूत इतिहास के शोर में डूबे चीत्कार को निन्यानबे का पाठक सुने बगैर नहीं पाता। उपन्यास के केंद्रीय पात्र रामदयाल के अपनी शादी के बाद अपनी पत्नी से बयान इसका साक्ष्य है – तु्महें मालूम है गांधी जी ने अपनी पत्नी से टट्टी साफ करवाई थी। यदि मुझे अपनी शादी और आजादी में से एक को चुनना है तो मैं आजादी चुनूंगा। और तबसे इस किशोरी को लगातार रामदयाल के अचानक गायब हो जाने का राज समझ मे आने लगा। वह बहस नहीं करती। सुंदरकांड का पाठ करती। संकटमोचन का व्रत रखती। यह एक किशोरी की कथा नहीं। यह उन सभी किशोरियों की कथा है जिसके जीवन का खाद पानी पहले तो गुलामी की बैडियों को तोड़ने-काटने में सूखा और फिर आजादी के उपभोक्ताओं का निवाला बना।
करीब डेढ़ सदी के विस्तार में फैला यह उपन्यास उन अर्थों में ऐतिहासिक नहीं जिन अर्थों में प्रसाद के उपन्यास आते हैं या फिर गढ़कुंडार, रानी लक्ष्मीबाई, दिव्या, चित्रलेखा है। जिस तरह बड़े से बड़े सच का एक स्थानीय संदर्भ होता है, उसी तरह इतिहास भी निरपेक्ष नहीं रहता, वहीं हमारी जीवनदृष्टि इतिहासबोध से रूपाकार पाती है। रानी लक्ष्मीबाई लिखते समय वृंदावन लाल वर्मा के पास जो इतिहास उपलब्ध था, आज वह वहीं नहीं अंटका है। नए साक्ष्य और नए विमर्श इतिहास को गतिशील बनाए रखते हैं। काल का उत्खनन सतत जारी है और अनावृत्त परतों से उभरनेवाला सच इतिहास को गीता या कुरान नहीं रहने देता। स्मृति की सत्ता का जीवन की तात्कालिकताओं के सदैव संवाद चलता रहता है, जिसे युवा आलोचक ज्योतिष जोशी सामाजिकता-ऐतिहासिकता का द्वंद्व कहते हैं। काल का यह द्वंद्व व्यक्ति के सरोकारों प्रकट करता है और यही वह सरोकार है जिसने निन्यानबे को उपरोक्त की श्रेणी से बाहर रखा है। 1857 से 1993-94 तक के विस्तृत काल क्षेत्र का यह उपन्यास केंद्रीय पात्र रामदयाल की पांच पीढ़ियों के इर्द-गिर्द बुना गया है।
आंदोलनों और उसके स्वप्नों में ऊंघता एक कस्बाई जीवन है जिसे मूलतः समाज-राज का रूपक कह सकते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के अवशिष्ट जो बदलती परिस्थितियों के साथ अपने आदर्शों को नहीं बदल पाते, जीवन की मुख्यधारा से उसी तरह दूर होते गए हैं जैसे तलछट, जहां कुछ भी आकर्षक व भोग्य नहीं रहता। वह पात्र है रामदयाल, जो नेहरू के स्वप्नों के भारत से इस कदर डूबता-उतरता है कि अपने निहायत निजी क्षणों में वैयक्तिक दबावों तक को नहीं समझ पाता। अपनी जरूरतों से दरकनिरा होता जाता है। पारलौकिक आसक्तियां भौतिक जीवन रुग्ण बना डालती हैं। ‘उस’ जीवन के लिए इस जीवन के लिए कुछ भी मोल नहीं समझने वालों की स्थिति हो जाती है रामदयाल की। भारत स्वप्नों के नायक के भ्रमजाल में उलझा यह पात्र अपने ही जीवन संदर्भों को वास्तविक जमीन नहीं दे पाता और स्वप्न में टहलते के रोग (सोम्नैंबुलिज्म) की स्थिति में आ जाता है। यहां राष्ट्रीय विकास के सांस्कृतिक आयाम के संदर्भ में व्यक्त प्रख्यात समाजशास्त्री पूरनचंद्र जोशी के विचारों को देखा जाना रोचक है – जिन मानसिक बेड़ियों की रचना भारतीयों को गुलाम रखने के लिए विदेशी शासकों ने की थी उनसे कहीं अधिक सशक्त वे बेड़ियां थीं जिन्हें भारतीयों ने गुलामी की कटु वास्तविकता के संदर्भ में मानसिक संतुलन और सामंजस्य बनाने के लिए सृजित किया था। (परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयाम) क्योंकि इसी धूर्तता और पाखंड से भरी वह चालबाजियां थीं, जो एक ओर लक्ष्मीबाई की वास्तविकता में डूबने नहीं देतीं और लेखक भी उसे महिमामंडित करने से नहीं चूकता। ‘सबको मालूम था कि रानी ने झांसी मांगी थी और उन्हें मौत मिली थी।‘ झांसी में डूब गया लेखक लक्ष्मीबाई की राष्ट्रीय निष्ठा को समझ नहीं पाता या समझना नहीं चाहता। विख्यात इतिहासकार विपिन चंद्र संपादित ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ की स्थापना के अनुसार विद्रोह के मौके पर उन्होंने अंग्रेजों से समझौते की पेशकश भी की
कि अगर उसकी मांगें मंजूर कर ली जाएं (राज्य वापस कर दिया जाए यानी डाक्ट्राईन आफ लैप्स खत्म कर दिये जाने की स्थिति में) वह अंग्रेजों का साथ देंगी और इस तरह झांसी की तरफ से अंग्रेजों को कोई खतरा नहीं रहेगा। वैसे राष्ट्रीय परिदृश्य में विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के पीछे स्वराज्य की गुलाम लालसा-समझ काम कर रही थी। एक गुलामी की बजाए दूसरी गुलामी का चुनाव ही तो था यह। यही लालसा लक्ष्मीबाई के पास राष्ट्रविरोधी (अ-राष्ट्रीय) फार्मेट में थी। यदि नाजियों का त्रिगुट मानवविरोधी था तो अंग्रेजों का आधिपत्य कहां से मानवीय कहा जा सकता था। यही अमानवीय लालसा लक्ष्मीबाई के यहां राष्ट्रविरोधी (अराष्ट्रीय) के फार्मेट में थी या राष्ट्र के प्रति उदासीनता के रूप में थी। लेकिन नेहरू का इंद्रजाल था जिसकी वास्तविकता को संग्राम में शामिल पीढ़ी शायद देखना नहीं चाहती थी। रामदयाल की मनोदशा का ब्यौरा (लेखक के शब्दों में) इसका उदाहरण है – घर की क्या हालत थी? नेहरू जी नहीं रहे थे, बड़ा लड़का शराब पीने लगा था, छोटा सौर में था। बिलू मां जितनी लंबी हो गई थी। नेहरू के न रहने से कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक शून्य छा गया। अब आवडी स्वप्न का क्या होगा ? दरअसल इसके ठीक निचली सतह पर देखना होगा कि कहीं यह किसी को रिझाने का अंदाज तो नहीं।
ऐसे संजय की तरह तो अतीत जीवी था, एक सामंती समाज सृजन की पीड़ा और प्रफुल्लता से आधुनिक समाज में बदलता हुआ नजर आता है। अपनी सारी भीषण विफलताओं और विडंबनाओं के बाद भी, नई पीढ़ी फटती हुई आवाजों में अपनी माली हालत की प्रतिध्वनि तक नहीं सुन पाते। और आंखें ऐसी कि जिसमें विराट स्वप्न तो होते हैं, पर उसमें बेटे का पट्टीदार जांघिया होता है और न ही बेटी की कमर के नीचे वही जांघिया। 22 जनवरी 1955 के अखबार में ‘भारत समाजवाद की ओर’ शीर्षक से छपी कांग्रेस की आवडी सम्मेलन की रपट में खोए रामदयाल को पता भी नहीं चलता कि उसका बेटा बलराम दयाल कब आया और बैठक के दूसरी ओर बैठे-बैठे उकता रहा था। अपनी उकताहट में वह बाबू कहकर चिल्लाता है। पूरा संवाद लेखक के उपरोक्त आशय को प्रतिध्वनित करता है –
बाबा
हां उन्होंने अखबार से सिर ऊपर उठाया, लेकिन शायद अखबार की कोई पंक्ति अधूरी छूटी थी। उन्होंने तुरंत अपनी आंखें अखबार में गड़ा दीं।
बाबू
हां, बोलो, रामदयाल ने अखबार में आंखें गड़ाए पूछा।
मुझे रुपए चाहिए
कितने
पचास।
पचास रुपए का क्या होगा
डाक्टरी का फार्म भरना है।
ऐसा लगा जैसे अखबार के बहुत मसले हैं और रामदयाल के लिए सबसे जरूरी है कि वे चुपचाप अखबार पढ़ते रहें जैसे पहले पढ़ रहे थे। रामदयाल अखबार ऐसे पढ़ रहे थे जैसे बल्लों बैठक में न हो और न ही उसने कुछ बोला हो। यह स्थिति उस पिता की है जो अब भी स्वतंत्रता संग्राम में खोए अपने भाई की बलि को नहीं भूल पाया है। जबकि यह पुत्र आजादी के बाद के जीवन संघर्षों और उसके व्यामोहों में भटक रहा है। इसके भी तो खोने का भय है। यह व्यामोह हैं पराधीन व स्वातंत्र्योत्तर भारत का और व्यामोहों का द्वंद्व है जो उन्हें अपनी लालसाओं से मुक्त नहीं होने देता और अपनी जमीन को भी बंजर कर दे रहा है। यह एक उदाहरण भर है। ऐसी स्थितियां बारहा है उपन्यास में।
उपन्यास का नायक रामदयाल अपने एक पुत्र का नाम संग्राम में शहीद भाई के नाम पर हरि रखता है। यही हरि है जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अर्जित जीवन के उच्चतर मूल्यों को ध्वस्त करते हुए सपने की सौदागीरी तक करने लगता है। आपातकाल में संजय गांधी की अराजक टोलियों में शामिल होने से लेकर ठेकेदार बनने तक यह बेटा रामदयाल के आदर्श को तिलतिलकर मिट्टी में मिला देता है और रामदयाल को लगने लगता है कि इस सदी में हरि दो बार पेदा हुआ। पहली बार उसने आजादी के लिए घर छोड़ा। दूसरी बार उसने मारूति के लिए और तब रामदयाल का क्षोभ उसका व्यक्तिगत नहीं रह जाता। पहले हरि को देश की आजादी ढूंढ़ते हुए खो गया। अब हरि अपनी आजादी ढूंढ़ते हुए खो रहा है। अपनी आजादी आजादी नहीं होती, अपनी उठाईगीरी होती है। यह उन रामदयालों की मनःस्थिति है जो मोहभंग से गुजर चुका है ऐसा नहीं। इस दिग्भ्रमित बेटे के बारे में यह रामदयाल का ही मंतव्य नहीं हो सकता कि इसके पास नंगईका विकल्प खादी का कुर्ता पाजामा है। ऐसा नहीं कि आवडी पर रामदयाल को पूरा भरोसा था – भरोसा – भरोसा होता तो रामदयाल आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी छोड़ते ही क्यों।
निहायत निजी सुख-सुविधाओं के आपदग्रस्त होते गए मध्यवर्ग मध्यवर्ग में अपनी जमीन, सरकार के साथ एक उपभोक्तावादी सलूक शेष रह जाता है। रामदयाल का छोटा पुत्र कृष्णकुमार कला के बाजारू सरोकारों से जुड़कर ही एक दिन अजनबी निष्ठुर हो जाता। यह है हमारे समय की कला और उसका संवेदना से सरोकार। बहन की चिंता में डूबा परिवार उसे अपनी ओर नहीं खींचता और वह पेरिस जाने के लिए इसी घर से पैसे तक की अपेक्षा करने लग जाता है। अपने भाई के स्वप्न को बेटे (हरि) में जीवित करने की जिद/हसरत पाले रामदयाल बेबस, लाचार व ठूंठ से बने रह जाते हैं। निन्यानबे लाख तक पहुंचकर करोड़पति बनने का स्वप्न हरि में हहरा रहा है और दूसरी ओर रामदयाल जीवनृ-मृत्यु से जूझ रहे हैं। उनका सोचना कितना वाजिब लगता है – क्या करोड़पति होने के लिए दुनिया को भोग का चारागाह बना देना जरूरी है ? इस तरह रामदयाल के घात-प्रतिघात पर खड़ा जिन त्रासदियों का शिकार आज भारत है, उसी के अक्स यहां हैं।
अब जब कविता में गद्य का प्रवेश हो रहा है, वहीं गद्य में भी उसकी ही शर्तों पर कविता की आवाजाही भी दिखती है, जिसे निन्यानबे में प्रचुरता से देखा जा सकता है। गद्य में कविता की यह आवाजाही ही सूक्ष्मता, अर्थमयता, बिंबात्मकता व सारगर्भितता के धरातल पर जारी है। कविता में गद्य के प्रवेश के साथ सपाटबयानी के खतरे से बचने के लिए जिस सतर्क काव्य विवेक की जरूरत है, यहां भी यह प्रासंगिक है। भाषा के साथ जो क्रीड़ा वृत्ति कुरु कुरु स्वाहा, अठारह सूरज के पौधे, रागदरबारी में है, वह यहां नहीं। इन उपन्यासों में अपनी शैली से मुग्ध हो जाने के कारण वहां फार्मूलाबद्धता का खतरा (संकट) पैदा नहीं हुआ है। भले वह उनकी अन्विति को ग्रसता नहीं। वर्णन की फार्मूलाबद्धता के कारण बहुधा परिवेश की यथार्थता के साथ लेखक के संबंध विच्छिन्न से हो जाते हैं। वह विच्छिन्नता एक हद तक यहां भी दीखती है, पर इतर कारणों से।
डा सुरेश सिन्हा को अपनी रचना प्रक्रिया बताते हुए वृंदावन लाल वर्मा का लिखा पत्र यहां देखने योग्य है – ‘ऐतिहासिक उपन्यास लिखना एक दुःसाध्य कार्य है। जिस काल का उपन्यास लिखा जाता है, जब तक उस काल की राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिस्थिति, मानवजीवन और इतिहास का स्पष्ट चित्र सामने न हो, तब तक यह कार्य सरल नहीं होता।‘ शायद इन्हीं कारणों से 200 पृष्ठों के इस उपन्यास का तीन चौथाई हिस्सा बीसवीं सदी के पांचवें-छठे दशक के बाद से जुड़ा हुआ है तो पिछले सौ साल को एक चौथाई में समेट लिया गया है।
( उपन्यास वाणी प्रकाशन से प्रकाशित)
(पहल-61,1999)