हमसफर

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

चिदंबरम साहब हिरन आपके ही दरवाजे रुकेगा!

ग्लैड्सन डुंगडुंग


(उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चित हुए ग्लैड्सन डुंगडुंग की कहानी से जनजातीय उत्पीड़न और विस्थापन का दर्द जाना जा सकता है। आवारा राजनीति और निर्बंध विकास के गल्ले से विस्थापन की पीड़ा नहीं सुनी जा सकती है। इसे विस्थापन के खिलाफ लड़नेवालों से जाना जा सकता है। यह वही सच है जिसे निराला ने लोहे का स्वाद मे कहा है –

लोहे का स्वाद
उस लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
नीचे दिया जा रहा पत्र उन्होंने छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के कोट्टेगुडा में आततायी राज्यसत्ता के सीआरपीएफ बर्बरता के बाद 10 जुलाई 2012 को केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम को लिखा था। आसपास के तीन गांवों से आए ग्रामीण आगामी बीजोत्सव के आयोजन के लिए बैठक कर रहे थे। हिंदी मे उल्था कर इसे यहां दिया जा रहा है। डुंगडुंग झारखंड ह्यूमन राइट्स मूवमेंट (जेएचआरएम) के महासचिव है। लगातार पुलिस अत्याचार तथा जनजातीय मसलों पर लिख-बोल रहे हैं।  33 वर्षीय यह आदिवासी युवा योजना आयोग की उपसमिति का सदस्य है। ग्लैडसन डुंगडुंग देश के चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।
- मोडरेटर।)


गृहमंत्री पी चिदंबरम के नाम ग्लैडसन डुंगडुंग का खुला पत्र


जुलाई 10, 2012
ग्लैडसन डुंगडुंग
झारखंडमिरर.ओआरजी

आदिवासी प्रकृति के साथ ही जीते और प्रकृति के साथ ही मरते हैं। वे अति प्राकृतिक ईश्वर में विशावस करते हैं, इसीलिए सभी अवसरों पर वे प्रकृति की पूजा करते हैं। आदिवासियों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि और वन पर निर्भर है, वह भी सर्वथा वर्षा पर आश्रित। इसीलिए खेती से पहले और बाद में ग्रामीण एकत्र होकर अपने अति प्राकृतिक ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। इन आदिवासी समुदायों की सर्वथा सर्वसम्मति पर आधारित अपनी जनतांत्रिक व्यवस्था भी है, जो व्यवहारतः ग्रामीण आयोजनों में दीखती है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिला के कोट्टागुडा गांव में कोट्टागुडा, सरकेगुडा और राजपेंटा के ग्रामीण दिनांक 28 जून 2012 को परंपरागत उत्सव बीजपेंडुम(बीजोत्सव) के आयोजन की योजना के मकसद से एकत्र हुए थे, ताकि उत्सव आयोजित करने के बाद वे अपने खेतों में बीज बोना शुरू कर सकें क्योंकि क्षेत्र में मौनसून आ चुका है।     

दुर्भाग्यवश, उनमें से 17 लोगों के लिए अपनी तरह की यह आखिरी बैठक साबित हुई। क्षेत्र से माओवादियों के खात्मे के नाम पर तैनात सीआरपीएफ की कोब्रा बटालियन व छत्तीसगढ़ पुलिस ने ग्रामीणों को चारों तरफ से घेरकर उन्हें कोई संकेत दिए बगैर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। फलस्वरूप उनमें से 16 को छाती, सिर और शरीर के दूसरे भागों पर गोलियां लगीं और घटनास्थल पर ही उन्होंने दम तोड़ दिया तथा एक को दूसरी सुबह क्रूरतापूर्वक मार डाला। सुरक्षाबलों ने 18 नृशंस माओवादियों को मौत के घाट उतारने का दावा किया है और इस मौके को उन्होंने नक्सलविरोधी अभियान की एक बड़ी कामयाबी के जश्न के रूप में मनाया। इसी तरह केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दावा किया कि सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ में शीर्ष नक्सल नेताओं को भून डाला और मुठभेड़ पर सवाल उठते ही उन्होंने सफाई देने की कोशिश की।  

हालांकि, टीवी चेनलों और अखबारों में मुठभेड़ की ब्रेकिंग न्यूज चलने के साथ ही कहानी पूरी तरह से झूठी लगने लगी। तत्काल ही सभी के दिमाग में एक सवाल कौंध गया कि सीआरपीएफ कैंप से बमुश्किल तीन किमी की दूरी पर स्थित गांव में 18 शीर्ष माओवादी कैसे बैठक कर सकते हैं? अंततः बीजापुर मुठभेड़ की सचाई का खुलासा हो ही गया। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के खिलाफ राज्यपोषित अपराध की अथक रिपोर्टिंग करनेवाले जांबाज पत्रकार अमन सेठी के प्रयास से एक बार फिर सुरक्षाबल के शीर्ष अधिकारियों, छत्तीसगढ़ सरकार व केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की झूठ खुलकर सामने आ गई। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षाबलों ने ग्रामीणों की शांतिपूर्ण जुटान पर गोलियां दागी। 12-15 वर्ष के पांच बच्चों समेत 20 ग्रामीण मारे गए और चार लड़कियों के साथ बदसलूकी की गई। खबर का सार यही था कि उस दिन उस गांव में कोई माओवादी नहीं था। आगामी बीजोत्सव को ले विचार-विमर्श के मद्देनजर सभी ग्रामीण एकत्र हुए थे, जब सुरक्षाबलों ने उनपर गोलियां चलाईं, जिसके परिणामस्वरूप पांच बच्चों समेत 20 ग्रामीण मारे गए।
3 तथा 4 जुलाई 2012 को जेपी राव, कोपा गुंजम तथा डा. नंदिनी सुंदर के तीन सदस्यीय तथ्यान्वेषी दल द्वारा कोट्टागुडा, सरकेगुडा तथा लिंगागिरि गांवों के दौरा के बाद की रिपोर्ट ने और भी दहलानेवाले तथ्यों का खुलासा किया। रिपोर्ट के अनुसार इन गांवों पर 2005 में सलवा जुड़ुम मिलिशिया द्वारा हमले हुए थे तथा तीनों गांवों के लगभग सभी घर फूंक दिए गए थे। फलस्वरूप सभी ग्रामीण आंध्र प्रदेश पलायन कर गए थे और वर्ष 2009 में ही फिर अपने गांव आ सके। सुरक्षाबलों ने दुबारा उनपर हमला कर 7 नाबालिग समेत 17 लोगों को मार डाला। इसके अलावे 9 ग्रामीण जख्मी हुए और पांच महिलाओं के साथ मारपीट और बदसलूकी गई।     

पोल-पट्टी खुलने के बाद केंद्रीय गृहमंत्री तथा आपरेशन ग्रीन हंट के शिल्पकार पी चिदंबरम ने निर्दोष ग्रामीणों की हत्या पर गहरा शोक जताया। एक हठभरा सवाल रह जाता है कि 17 आदिवासियों की नृशंस हत्या पर खेद कह देना भर काफी है क्या ? दूसरा, कि इस मामले में राजनीतिक दलों खासकर विपक्षी पार्टी भाजपा चुप क्यों है ? क्या 17 निर्दोष गैर आदिवासियों की जघन्य हत्या पर वह ऐसा ही सलूक करतीं ? कांग्रेस शासित राज्य में ऐसी ही घटना होने पर क्या भाजपा चुप रह जाती ? बेगुनाह आदिवासियों के नरसंहार के लिए कौन जिम्मेवार है ? क्या पी चिदंबरम इसके लिए जिम्मेवार नहीं हैं जो क्षेत्र से माओवादियों के खात्मे के नाम पर वर्ष 2009 से सुरक्षाबलों की तैनाती करते रहे हैं ? 
सीआरपीएफ महानिदेशक विजय कुमार यह कह कर बेशर्मी से सुरक्षाबलों के आपराधिक कृत्य का औचित्य सिद्ध करते हैं कि यह जानना नामुमकिन था कि उस रात वे (सुरक्षा बल) गोलियां किन पर चला रहे थे। आगे वह कहते हैं कि वह क्षेत्र एक बड़ा ही रहस्यमय संसार है, जहां कौन नक्सल है और कौन नहीं यह चिह्नित कर पाना नामुमकिन है। इसलिए यह सवाल उठाया जा सकता है कि उन ग्रामीणों को सुरक्षाबलों ने क्यों भूना जिनको लेकर वे आश्वस्त नहीं थे कि वे कौन हैं ? किसने उन्हें बेगुनाह ग्रामीणों पर गोली चलाने का हुक्म दिया ? क्या सुरक्षाबल महज शक के बिना पर किसी पर भी गोली चला सकते हैं ? घटना की जांच के लिए नियुक्त एसडीएम कुरुवंशी ग्रामीणों से पूछते हैं कि उन्होंने रात को बैठक क्यों की ? वे (कुरुवंशी) गांव भी नहीं जाते हैं और अपने दफ्तर में ही ग्रामीणों को बुलाते हैं, जो स्पष्टतः इंगित करता है कि राज्य का इरादा न सिर्फ आदिवासियों को न्याय में देर करना है, बल्कि यह भी स्पष्ट है कि उनके खिलाफ राज्यपोषित अपराध जारी रहेगा।

तहलका संपादक शोमा चौधरी ने अपने स्तंभ एडिटर कटमें बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि बस्तर का जीवन इतना सस्ता क्यों है ? इस सवाल का सीधा सादा जवाब है कि चुंकि भारतीय राज्य अमूमन यह विश्वास करता है कि देशभर में जंगल में रहनेवाले आदिवासी माओवादी या नक्सली हैं, जो कि निवेश के वातावरणके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इसके नागरिकों के प्रति संवैधानिक दायित्व की अपेक्षा हमेशा ही निवेश के वातावरणको लेकर परेशान रहते हैं। दरअसल भारतीय राज्य ने किसी भी कीमत पर आदिवासी क्षेत्रों के संसाधनों पर कब्जादारी करने का तय कर लिया है, जो कि भारत के महाशक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त करेगा। इसीलिए विकास और प्रगति के नाम पर जल, जंगल, जमीन और अन्य संसाधन भारतीय राज्य को सौंपने से इनकार कर चुके आदिवासियों की हत्या करने के लिए वन क्षेत्रों में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है।

हालांकि, जैसे ही हम फर्जी मुठभेड़ पर सवाल उठाते हैं, तो हम से प्रतिप्रश्न किया जाता है कि माओवादियों द्वारा सुरक्षाबलों की हत्या पर हम चुप क्यों रहते हैं ? इस सवाल का जवाब दूसरे सवाल में मिल सकता है, जब गत साठ सालों में जिन जंगलों में वे नहीं पहुंच सके, तो उन जंगलों में अब भारतीय राज्य सुरक्षा बलों को क्यों भेज रहा है ? क्या ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए या फिर खनिज की लूट को आसान करने के लिए ? यदि भारतीय जनता की सुरक्षा के लिए सुरक्षाबलों को वहां भेज जाता है तो फिर वही सुरक्षा बल बेगुनाह ग्रामीणों की रक्षा के बजाए उनकी हत्या, उनका उत्पीड़न व महिलाओं से बलात्कार क्यों करता है ? आखिर किसकी सुरक्षा के लिए वनों में सुरक्षा बल तैनात किए जाते हैं ? क्या सच यह नहीं है कि वनक्षेत्रों में सुरक्षाबलों की तैनाती जनता को बचाने की बजाए कारपोरेट हित की रक्षा के लिए की जाती है ?  

बौद्धिक तर्क चाहे जो भी हो, लेकिन सचाई है कि वर्ष 2009 के बाद नक्सलविरोधी अभियान के नाम पर देश भर में सैकड़ों बेगुनाह नागरिकों की हत्या की गई है, लेकिन आज तक एक भी प्रमुख जांच नहीं बैठी। इसलिए कारपोरेट गृहमंत्री पी चिदंबरम को हर हाल में इस्तीफा दे देना चाहिए, सारतः क्योंकि छत्तीसगढ़ के कोट्टागुडा, सरकेगुडा और राजपेंटा के बेगुनाह 17 आदिवासियों समेत सभी बेगुनाह ग्रामीणों की जघन्य हत्या के एकमात्र जिम्मेवार वे ही हैं। पी चिदंबरम से सवाल पूछा जाना चाहिए कि 17 बेगुनाह लोगों की बेशकीमती जान ले लेने के बाद खेद भर कह देना काफी है क्या ? क्या नक्सलविरोधी अभियान के नाम पर देश भर में हुए फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में वे सीबीआई जांच करवाएंगे ? और क्या बेगुनाह नागरिकों की हत्या करने के लिए वे शीर्ष सैन्य अधिकारियों को दंडित करेंगे या फिर इस जुर्म से रियायत पर मस्ती करने देंगे ? याद रखिए, पर चिदंबरम साहब हिरन आपके ही दरवाजे रुकेगा!    

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

संगीत की मठाधीशी का जवाब है भारती बंधु का सूफियाना अंदाज

                सूफी गायक की कबीर की अनूठी प्रस्तुति


बाजारवाद की सहूलियतों ने कई तरह से दौर को रिझाकर अंधा किया है। उसकी हसीन गोद में बैठकर मीडिया से ले लेकर राजनीति, विज्ञान से लेकर संस्कृति तक सभी अपने को धन्य मान रहे हैं। यह नए तरह का रीतिकाल है। सभी पैबस्त हैं किसी न किसी फार्मेट में। सभी के लिए कोई न कोई लकीर है। और सब के सब बिकाऊ। सभी भरोसा तो करते हैं – जो दीखेगा वह बिकेगा, पर वे क्यों भूल जाते हैं जो चीज बिकती है वह टिकती नहीं। रीतियों (ढर्रों-पाखंडों) पर प्रहार करनेवाले कबीर तो बाजार को और भी कभी नहीं सुहाए। और ऐसे में किसी ने कबीर को अपना ओढ़ना-बिछौना कर लिया हो तो यह दौर उसे सिरफिरा ही कह सकता है। और सिरफिरा जब कबीर को गाने लगे तो आप माथा ही धुन सकते हैं न। लेकिन नहीं, आप जहां भी हों एक बार स्वामी जीसीडी भारती उर्फ भारती बंधु को सुन लें, कई भ्रांतियां वैसे ही छिन्नमूल हो जाएंगी जैसे कबीर का जीवनदर्शन करता है। पिछले 45 सालों से सूफियाना अंदाज में कबीर को गानेवाले भारती बंधु की करीब छह हजार प्रस्तुतियां हो चुकी है।

प्रस्तुतियों के वैशिष्ट्य ने कबीर गायन की भारती बंधु शैली को ही जन्म दे दिया। कबीर की सीख और कबीर का मर्म, कबीर का वैभव और कबीर का फक्कड़पना, कबीर का गांभीर्य और कबीर की अल्हड़ता के अलावे भारतीय काव्य का वैभव व शास्त्रीय संगीत का वैविध्य, सब कुछ एक साथ दिखे पिछले दिनों झारखंड की कोयला राजधानी में जब 3 जनवरी को जांबाज पुलिस अधिकारी रणधीर प्रसाद वर्मा की 21 वीं पुण्य तिथि पर उनको सुनने का मौका मिला। शास्त्र और लोक, चाहे वह संगीत के पैमाने पर हो या कविता के संसार का, सबकुछ सहज ही भारती बंधु दिखा गए। कबीर के यहां राग-रागीनियों में बंधे पद हैं तो समाज-धर्म की जड़ताओं पर प्रहार भी। मिश्र शिवरंजनी राग पर ही आधारित कबीर का पद जरा धीरे-धीरे गाड़ी हांको, मोरे राम गाड़ी वालेगाना शुरू किया तो क्रमशः शांत रस की इस रचना को श्रोताओं की भागीदारी तक ले जाकर उन्होंने फक्कड़पना और अल्हड़ता से पूरे माहौल को कबीरमय कर दिया। दुनिया से विदा हो रहे शव का अनुरोध है कि श्मशान थोड़ा धीरे-धीरे ले चलो, ताकि संसार में रहने का और मौका मिल जाए। संगीत का वैभव अर्थ-विन्यास को विखंडित करते हुए जब आगे बढ़ता है तो पूरे मजमा जैसे करुणा की एक उदास चादर (मर्म) से बाहर मस्ती में रम जाता है। कबीर का जीवन राग बनता है ठाठ और मस्ती से। भारती बंधु यहां इसे ही साबित करते हैं अपने अंदाज में। शास्त्रीय संगीत की बंदिश टूटेगी तभी वह लोक का कंठहार बनेगी, यह भी साबित कर दिखाया है इन्होंने।

जड़ों की तलाश में निकला साधक जमीन तोड़ेगा ही। भारती बंधु ने अपने अंदाज में शास्त्रीय संगीत की जमीन तोड़ी है। उनकी सगभग सभी प्रस्तुति में संगीत के वैभव का नजारा साहित्य की गंभीर समझ के साथ है। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने यूं नहीं कहा होगा कि भारती बंधु भारतीय संगीत की नई खोज हैं। यह वह आलोचक है जो खुद कबीर के मर्मज्ञ है। कबीर के अनन्य अध्येता और अनुसंधाता हजारीप्रसाद द्विवेदी से उनकी जो परंपरा बनी वह दूसरी परंपरा की खोज से आगे बढ़कर डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल तक आती हुई आग बढ़ रही है। और कबीर पर जब भारती बंधु बोलते हैं, तो यह आलोचक एकटक देखता रह जाता है (भारती बंधु के हवाले) । बकौल भारती बंधु उन्होंने कबीर का शास्त्रीय अध्ययन नहीं किया है। उन्हें नामवर की भी सलाह थी कि समीक्षकों को पढ़कर मौलिकता आहत होगी। 

कबीर को दुर्लभ अंदाज में तो कुमार गंधर्व ने भी गाया है। और वह संगीत के लिए मील का पत्थर भी है। संगीत के इस मूर्तिभंजक का गायन चुनिंदे श्रोताओं को रिझाता है। लेकिन दुर्लभ कबीर को यानी कबीर के बहुत विरल पहलू या अनदेखे पहलू का उदघाटन जिस अनोखे अंदाज में भारती बंधु करते हैं, वह एक अदभुत संसार हमारे सामने खोलता है। यह भारतीय संगीत के लिए प्रयोग भी हो सकता है और शास्त्रियों के लिए विकार भी। आखिर कबीर को ही इसकी परवाह कहां थी, जो साहेब की बंदगी करनेवाले साधक को होगी। यही कारण है कि कबीर के रस्ते इनके यहां अमीर खुसरो भी धड़ल्ले से पहुंच जाते हैं। राग कल्याण में जब खुसरो की रचना छाप-तिलक सब छीनीको उन्होंने पेश किया तो यह प्रस्तुति यह साबित कर रही थी कि कबीर गायन की भारती बंधु शैली शैलियों का समागम और प्रयोगों के वैभव से समृद्ध है। जहां संगीत का वैविध्य और काव्य वैभव एक साथ है।

अभी पंडित शिवकुमार, वसुंधरा कोमकली, प्रहलादसिंह टिपानिया भी कबीर को गाते हैं। पर कबीर को इस तरह से गाना किसी मर्मज्ञ के लिए ही संभव है। उनको सुनकर आप बरबस कह पड़ेंगे कोई परम विद्वान हो सकता है, कोई संगीत का मर्मज्ञ हो सकता है, पर एक विद्वान गा भी सकता है तो यह भारती बंधु संभव करते हैं। उनका पूरा परिवार कबीरमय है। 45 सालों से वे कबीर को गाते हैं। कबीर पर ही उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी की है। बड़ी बात यह नहीं, बड़ी बात यह है कि शास्त्रीय संगीत को जिस खिलंदड़ेपन से वे लोक तक पहुंचाते हैं, वह बड़ी बात है। कबीर से जुड़ा कोई भी उपक्रम लकीर का फकीर नहीं हो सकता। उनकी प्रस्तुति आत्मसात करने लायक है। और यही टिकता है। जो चीज बिकती हैं, वह टिकतीं नहीं। नामवर से लेकर अशोक वाजपेयी तक उन्हें चाहनेवालों में हैं। वाजपेयी ने उनमें कबीर की जीवंतता पाई है। कबीर को जब वे गाते हैं तो जैसे किसी शोधयात्रा में शामिल होने जैसा लगता है।

श्रोताओं में बैठे उपन्यासकार मनमोहन पाठक को बरबस लगने लगा कि कबीर के पद और साखी को सूफियाना फार्मेट में पेश करने का उनका अंदाज बाजारवाद के गिरफ्त में सिसकते भारतीय संगीत के लिए जैसे नया बिहान है। वो कहते हैं उनका संगीत शास्त्रीय संगीत की यात्रा को दीखाता है। जो कबीर अपनी अक्खड़ता और फक्करपना के लिए मशहूर हैं वीर रस की उनकी विरल रचना जो लड़े दीन के हेत सूरा सोई,...” को मिश्र सारंग में पेश किया तो ओज के इस अदभुत रस में श्रोता बरबस झूम उठे। सूरा सोई, सूरा सोई... का बहुआयामी दुहराव ओज और शांत तक श्रोताओं को पहुंचाता है। अहं को तिरोहित कर करुण रस की ओर ले जाने वाली कबीर की रचना मन फूला-फूला फिरे जगत मेंको उन्होंने पहाड़ी राग में पेश किया।

और यह सब हो रहा था शहर के हृदयस्थल रणधीर वर्मा चौक पर। चौक पर दोपहर के तीन बजे तक श्रोताओं की उमड़ी पड़ी भीड़ छंटने का नाम नहीं ले रही थी। पूरे चार घंटे चौक पर शास्त्रीय संगीत में भीड़ यदि बंधी रही तो यह इस बात का सबूत है कि लोकरंजन सिर्फ फूहड़ गीतों और उत्तेजक संगीत से ही नहीं किया जा सकता है। कुर्सी कम पड़ गई, सदर अस्पताल की छत पर श्रोता टिके रहे। यह तो चूके हुए बिकाऊ लोग हैं जिनका तर्क है कि शास्त्रीय संगीत आज नहीं चल सकता। यह उस शहर की बात है जहां संस्कार निर्माण की अल्पवय में ही पैसे का चस्का लग जाता है। यहां भी मल्टीप्लेक्स और माल हैं, अपार्टमेंट के कंक्रीटी जंगल यहां भी हैं, और यहां मुल्क में पहली बार चला शब्द माफिया का तंत्र है। लेकिन भारती बंधु ने कबीर को सूफियाना अंदाज में पूरी मस्त भीड़ को झूमने पर बेबस कर दिया। भारती बंधु की टोली में तबले पर संगत कर रहे थे अनुभव भारती, डफली पर साथ दे रहे थे लक्की भरती तथा मुख्य कोरस में भूषण भारती, दूसरे और तीसरे क्रमशः इरफान खान व नीतेश भारती।

Kabir Bani -"Zara Dheere Dheere Gaadi Haanko" by Bharti Bandhu near Somnath Temple
http://www.youtube.com/watch?v=DfnmoORv0zU

MANN LAGO MERO YAAR FAKIRI MEIN--BY--BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=M_Iooz5RmDI

SAB DIN HOTA NA EK SAMANA BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=2d3t6Es9xJA

CHHAP TILAK BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=QPpPppYRZAA

MANN FULAA FULAA FIIRE JAGAT MEIN BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=rnZrzb83X9s

BHAJAN MEIN LAGE RAHNA BHAI--BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=DMNnsJdux44

MORE RAM GADI WALE PART-II BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=AwMn8AQZGiE

CHUNRI KAHE NA RANGOULI GORI BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=veZbn1iHg3Q

SADHO RE SADHO BY BHARTI BANDHU
http://www.youtube.com/watch?v=KAiXDagFpto


 

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

समाजविरोधी विकास की नींव में है राजनीतिक संस्कार

       पल रहा है विकास का कीटनाशक सिद्धांत


सन दो हजार के नवंबर में जब तीन नए राज्य बने तो उनमें से झारखंड शायद एकमात्र राज्य था जहां किसी मुल्क से आजाद होने जैसा उल्लास था और उम्मीदों के पुल कुछ उसी तरह बांधे जा रहे थे जैसे कि भारत में सुराज से बांधे गए थे। उन तीनों मे से उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ का लगभग कायाकल्प हो चुका है। विकास के लिए भारतीय राज्य मे संभव माहौल वहां खड़ा हुआ। और दूसरी तरफ झारखंड में  जनजातीय उत्पीड़न और भ्रष्टाचार के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। यदि बिहार मे 900 करोड़ रु का चारा घोटाला था तो झारखंड में मधु कोड़ा का चार हजार करोड़ रु का घोटाला। यहां कोड़ा जैसे दर्जनों नेता पैदा हो गए। यह सब कुछ हो रहा है मांदर की थाप पर। हां, एक विशेष बात यह हुई कि यूपी और मध्य प्रदेश बीमारू प्रदेश में आज भी आदर्श बने हैं, तो बिहार राष्ट्रीय फलक पर विकास और सुशासन के मानक गढ़ रहा है। उसकी प्रशंसा मे विरोधी पार्टियों के नेता भी जी नहीं चुराते। छत्तीसगढ़ भी तो आदिवासी बहुल राज्य था, लेकिन क्या विकास के लिए उसने सामाजिक सौहार्द्र का ताना-बाना छिन्न-भिन्न किया। क्या वहां भी बाहरी-भीतरी का कोई कुरुक्षेक्ष बना ?  इसे कौन नहीं जानता कि असंतोष और वैमनस्य की राजनीति में आसानी तो है, पर यह विकास का कोई रास्ता नहीं दे सकती। झारखंड अलग राज्य बन जाने से किसका कल्याण हुआ ? दलितों को रामराज का ख्वाब दिखानेवाली माया जिस तरह 87 करोड़ रु की निजी संपत्ति की मालकिन हो गई, पर दलितों को दलित नेताओं की प्रतिमा देखने के अलावा क्या हासिल हुआ। झारखंड मे भी निरीह आदिवासियों को अपने संपत्तिशाली सीएम व नेताओं को देखने के अलावे क्या हासिल हुआ। सारे सीएम आदिवासी हुए, पर विकास का जखीरा किनके पास हैं। हमे समझना चाहिए कि जन्म की प्रक्रिया मे ही जीवन के विकास सूत्र निहित होते हैं। बेहद कृत्रिम परिस्थिति मे, एक राजनीतिकि प्रतिशोध के माहौल मे इस झारखंड का जन्म हुआ। कौन नहीं जानता है कि झारखंड पार्टी (जयपाल सिंह) एक जमाने मे कांग्रेस के हाथों बिक गई थी। झारखंड स्वायत्त परिषद (जैक) की सुविधाओं के लिए झारखंड के धुर विरोधी लालू यादव के पीछे शिबू सोरेन और सूरज मंडल (झामुमो) लट्टू हो गए थे, आखिर इसे कौन नहीं जानता ? हम सभी उसके नतीजे को भोग रहे हैं। यहां कोई भी आंदोलन कुछ दिनों तक चलता जरूर है, पर शीघ्र ही शीर्ष पर पहुंचा नेता खरीद-फरोख्त मे शामिल हो जाता है। या तो उसे ही बेच दिया जाता है या फिर वही आंदोलन को बेच डालता है। यहां हमेशा ही एक विजनरी नेता की कमी रही। रामदयाल मुंडा का अध्ययन गहरा हो सकता है, पर मूलवृत्ति तो उनकी भी सूरज मंडल जैसी ही थी। 1992 में एक बार दुमका के ललमटिया में श्री मंडल ने खुलेआम अपने भाषण मे बाहरी लोगों को मारकर भगाने की बात कही थी। लगभग झारखंडी नेता के सुर मिलते रहे हैं। इधर अपनी मौत से कुछ पहले डा. रामदयाल मुंडा की यह मान्यता प्रबल और प्रखर रूप मे सामने आ रही थी कि प्रदेश के विकास के लिए जमीन को बाहरी लोगों के हाथों मे जाने से रोकना होगा। दुर्गा उरांव द्वारा छेड़े गए सीएनटी के इस उफान की पृष्ठभूमि मे इसे देखा जा सकता है। सर्वाधिक विचित्र बात यह है कि जिस बिहारी के विरोध मे सारी मान्यताएं, विचार और आंदोलन पनप रहे हैं, उसी झारखंड को बिहारी सलाहकारों (सुरक्षा-डीएन गौतम, विकास-आरसी सिन्हा) की जरूरत पड़ रही है। हां, यह अलग बात है कि सरकार मे मौजूद अंतर्विरोध से कार्यबल को बल मिलता है और नतीजतन असहयोग का माहौल तैयार होता है। इसी माहौल से आजीज आकर दोनों ही सलाहकार प्रदेश को अलविदा कर दें तो ताज्जुब नहीं। इस मुल्क को जितनी मुश्किल अल्पसंख्यकों को स्वीकार करने मे नहीं हुई, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल झारखंडी नेताओं-मंत्रियों को बाहरियों को स्वीकारने मे हो रही है। नतीजा सारा प्रदेश भुगत रहा है। महाराष्ट्र में बाहरियों पर जब गाज गिरती है तो इसी झारखंड के लोग पानी पी-पीकर राज ठाकरे को कोसते रहते हैं। और जब राजनीति की बारी आती है तो राज उनके रालमाडल बन जाते हैं। राज ठाकरे के कई रूप हैं।

समझौतों के रास्ते चलकर विकसित आंदोलन के नेता आखिर क्या दे सकते हैं सिवाए डोमिसाइल या सीएनटी के ? साठ के दशक में जब विनोद बिहारी महतो की धनबाद कचहरी में वकालत चमक रही थी तो उनका गुमाश्ता कौन था ? बोकारो स्टील प्लांट लगने से विस्थापित हुए लोगों पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा था। इन विस्थापितों के मामले (केस) वकील साहब को लाकर कौन दे रहा था ? इसी लेन-देन में अविश्वास के सवाल पर बोकारो से आया एक आदिवासी धनबाद के हीरापुर मे लाठी लेकर उनपर टूट पड़ा था। लहूलुहान वकील साहब के माथे पर वह दाग अमिट रहा, पर झारखंड के चप्पे-चप्पे पर लगी प्रतिमाओं में किसी भी प्रतिमा पर यह दाग नहीं। कोई बता सकता है ऐसा क्यों हुआ। वकील साहब के इस गुमाश्ते को रोज के हिसाब से खाना-खोराकी दी जाती थी, इसका भी हिसाब दर्ज है। कहा जाता है कि वकील साहब के किसी नवाब के पास आज भी वह रिकार्ड है। वकील साहब का वह गुमाश्ता झारखंड ही नहीं देश की आदिवासी राजनीति का हीरो बना हुआ है। विनोद कुमार के उपन्यास समर शेषऔर मनमोहन पाठक के  “गगन घटा घहरानी में इसका कोई जिक्र नहीं। एक मूर्ति गढ़ी गई है, निष्प्राण-सी। जिन विनोद कुमार को पत्रकार हरिवंश की आंखों मे भूरापन दीखता है, उन्हे किन कारणों से यह सब नहीं दीखा। ताज्जुब। यह समझने की बात है। निजी असंतोष-क्षोभ के बुखार से पीड़ित हो उन्होंने एक कहानी ही लिख दी – भूरी आंखें। चर्चित हिंदी पत्रिका 'कथादेश' के 2011 के मीडिया विशेषांक  में यह कहानी छपी थी। सर्जना साधारणीकरण जरूर है, लेकिन दृश्य पर व्यक्तिगत का आरोप नहीं। सर्जना तो व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठाती है। झारखंड बनने पर विजनरी नेताओं की घोर कमी रही। जो नेता थे, उन्हें या तो चाटुकार चाहिए थे या फिर कमजोर दिल-दिमाग वाले भोले नेताओं को घेरने के लिए दलाल स्ट्रीट तैयार थी। यही कारण है कि जिन्हें पूरे राज्य के लिए पूज्य, सम्माननीय, होना चाहिए था, उन्हें एक विधानसभा क्षेत्र मे बेजमीन कर दिया जाता है। कौन नहीं जानता कि इसके पीछे कई विद्रूपताएं, विकृतियां हैं। गुरुजी की यह गलाजत भले एक दिन की नहीं है, पर कीटाणु जो रहता है वही प्रबल होकर आक्रांत करता है।

विकास के लिए विस्थापन और विस्थापन से उठे पुनर्वास के सवालों के साए मे इसकी दूरगामी चिंताएं यदि धूमिल कर दी जाती है तो इसका कारण समझा जा सकता है। कारपोरेट दबाव व प्रलोभन के अपने सियासी समीकरण हैं। तात्कालिक राहत के लिए मुआवजे, नियोजन और पुनर्वास की जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, वह उस दूरगामी चिंता और संकट का हल नहीं हो सकती। विस्थापन से जब एक पूरी नस्ल उजड़ जाती है, भाषा-संस्कृति का तानाबाना गुम हो जाता है, एक पराएपन के आश्रय मे जीवन का हक दिखाया जाता है। सवाल है कि ऐसे में उस समाज को वापस लाया जा सकता है क्या जो अपनी भली-बुरी, छोटी-बड़ी पहचान की रोशनी मे सतत संघर्ष का आधार खोजकर सपने को सच करने मे जुटा रहता है। जिस जंगल से मानव अस्तित्व का सवाल जुड़ा है, क्या उसके रखवाले को उजाड़कर उस जंगल को बचाया जा सकता है। और नहीं तो फिर हरियाली के बिना किस जीवन का ख्वाब है नशीली आंखों मे ? -- क्या झारखंड मे बंजर व गैर-कृषियोग्य भूमि खत्म हो गई जो जंगल काटे जा रहे हैं और बस्तियां उजाड़ी जा रही है ? 38 लाख हेक्टेयर कुल सिंचाई योग्य भूमि होने के बावजूद 1.57 लाख हेक्टेयर यानी 8 प्रतिशत ही भूमि सिंचित है। यहां किस सीएनटी की मेड़ ने पानी को रोक रखा है ? आखिर पलायन कर चुके हजारों-लाखों झारखंडियों को महानगर के जाल में उलझकर कबतक रहने दिया जाएगा। किस सीएनटी के उल्लंघन ने रास्ता रोककर रखा है। जिस दुमका की जमीन पर दिशोम गुरु और बाबूलाल मरांडी अपनी सियासी बिसात बिछाते रहे हैं, आखिर उन्हें उसी प्रमंडल के पाकुड़ और साहिबगंज में वनाधिकार का उल्लंघन क्यों नहीं दीखता। वन माफियाओं ने पहाड़-जंगल काटकर जिस तरह ऐतिहासिक विरासतों को संकट में डाल दिया है वह बड़ा सवाल है, लेकिन इस पर किस का ध्यान है। क्या वन माफिया जब जंगल और पहाड़ काटते हैं तो कोई आदिवासी संकटग्रस्त नहीं हो रहा। आखिर माफिया की गलबांही कौन कर रहा है। वहां जिंदगी बहाल करने के लिएकिस सीएऩटी की जरूरत है।

आप आरएंडआर की पालिसी से एक पीढ़ी के प्रतिरोध को खत्म कर देंगे, पर अस्तित्व की चिंता से जब आगामी पीढ़ियां व्याकुल होंगी, प्रश्नाकुल होंगी और उनकी छटपटाहट किसी सामाजिक-राजनीतिक हिलोर को पैदा करेगी तो क्या राज्य-व्यवस्था उसे संभाल पाएगी। विकास के ये औजार ऐसे है जिनके दुष्प्रभाव तत्काल नहीं दीखते, पर कीटनाशक की तरह आगामी पीढ़ी को निगलते हैं और क्रमशः पूरा समाज इसकी चपेट मे आ जाता है। जिस तरह कीटनाशकों से अस्थमा, जन्मजात विकृतियां, कैंसर, हार्मोन जन्य विकृतियां, तंत्रिका संबंधी गड़बड़िया आदि उत्पन्न होती हैं, उसी तरह विकास के कीटनाशकों का भी अपना असर होता है। झारखंड के मर्म से जुड़े नेताओं का हाल देखिए। राज्य बनने के आठ साल बाद एक आरएंडआर पालिसी बनी भी तो बाद मे आई शिबू सोरेन की सरकार मे शिबू सोरेन ने खुद ही इस पर दुबारा विचार करने के नाम पर इसे ठंडे बस्ते मे डाल दिया।

अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए प्रशासन अमानवीय रुख तो अख्तियार कर सकता है, पर विकास के नाम पर भऱी-पूरी आबादी का विस्थापन भी तो एक अतिक्रमण है। आखिर यहां मानवाधिकार को कौन बहाल कराएगा। कौन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका है जो समाज को सरकारी अतिक्रमण से मुक्ति दिलाएगी। सिमडेगा के ग्लैड्सन डुंगडुंग के खाते-पीते घर के पास तीस एकड़ जमीन थी। बांध के नाम पर गई उसकी सारी जमीन के एवज मे उनके घर को कुल 11 हजार रुपए मिले। यह बस दो दशक पहले की बात है। वन-विभाग की ज्यादतियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई के चक्कर मे उनके माता-पिता की निर्मम हत्या कर दी गई। यदि ग्लैड्सन डुंगडुंग आज खुद के बूते पढ़े-लिखे नहीं होते तो कितनों को राज्य सत्ता का यह सच पता होता ? क्या किसी सरकार के पास या सत्तापोषित किसी संस्था के पास ऐसे ग्लैड्सन डुंगडुंगों का कोई आंकड़ा है ? किस सीएनटी एक्ट ने उन्हे उजड़ने से रोका। उनके अधिकारों की कितनी रक्षा हुई ? यह 33 वर्षीय नामी मानवाधिकार कायकर्ता ग्लैड्सन डुंगडुंग यदि आज झारखंड इंडिजेनस पिपुल्स फोरम का संयोजक, नवजीवन का संस्थापक सचिव, झारखंड ह्यूमन राइट मूवमेंट का महासचिव तथा योजना आयोग की एक उपसमिति का सदस्य है तो यह किसी की कृपा से नहीं। लेकिन सवाल है कि कितनों में ऐसा प्रतिरोध है जो जीवन-मरण के संकट के बीच से अपने को इस रास्ते पर ले चलने का माद्दा पैदा कर पाता है। क्या इतने के बाद भी राज्य का यह विकास किसी समाज के हित में दीखता है या मुट्ठी भर लोगों ने इसे अपनी लुगाई मान रखा है। जिस विकास ने जनहित से मुंह मोड़ रखा है, जिसने जीवन को और भी दुरूह किया है उसे समाजविरोधी ही तो कहा जा सकता है। 

जिन्हें (अखड़ा जैसी संस्थाओं को) झारखंडी भाषाओं को राजकीय दर्जा मिल जाने की खुशी है और यदि उसे वे किसी संघर्ष का परिणाम मान रहे हैं तो यह उनकी भयंकर भूल होगी। राज्य सत्ता की बेहद आसान कुटिल चाल को वे यदि नहीं पढ़ पा रहे हैं तो यह उनका भोलापन है या फिर...जब इस देश में 198 आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के खतरे से जूझ रही हैं तो क्या यह खुशी अपने प्रति प्रतिकूल माहौल (व्यापक तौर पर) बनने देने की स्थिति को छूट देना नहीं है ? अपनी लड़ाई सभी जनजातीय भाषा को लेकर होनी चाहिए।    

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

क्या मैं माओवादी हूं ?

ग्लैड्सन डुंगडुंग


(उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चित हुए ग्लैड्सन डुंगडुंग की कहानी से जनजातीय उत्पीड़न और विस्थापन का दर्द जाना जा सकता है। आवारा राजनीति और निर्बंध विकास के गल्ले से विस्थापन की पीड़ा नहीं सुनी जा सकती है। इसे विस्थापन के खिलाफ लड़नेवालों से नहीं जाना जा सकता है। यह वही सच है जिसे निराला ने लोहे का स्वाद मे कहा है –

लोहे का स्वाद
उस लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुंह में लगाम है।
नीचे दिया जा रहा उनका लेख 2010 की जुलाई मे लिखा गया था और www.countercurrents.org मे छपा पा। हिंदी मे उल्था कर इसे यहां दिया जा रहा है। डुंगडुंग झारखंड ह्यूमन राइट्स मूवमेंट (जेएचआरएम) के महासचिव है। लगातार पुलिस अत्याचार तथा जनजातीय मसलों पर लिख-बोल रहे हैं।  33 वर्षीय यह आदिवासी युवा योजना आयोग की उपसमिति का सदस्य है। - मोडरेटर।)

मैं अपने मानवाधिकार संबंधी कार्यों, लेखन तथा भाषणों के जरिए सार्वजनिक जीवन मे आया। हालांकि, गत सप्ताह (03 May, 2010) सीएनएन-आईबीएन तथा एनडीटीवी 24x7 पर नक्सलवाद पर चल रही एक बहस से एक बड़े श्रोता वर्ग तक पहुंचा। इन बहसों के बाद देश भर से मुझे ढेरों सकारात्मक व नकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिलीं। नकारात्मक प्रतिक्रियाओं मे से अधिकांश उन युवाओं के थे जो अनजाने ही बाजार की ताकत के पीछे लट्टू हैं, थोड़े समय के लिए मैं इससे कुछ परेशान रहा। वे बड़े कठोर अंदाज मे पूछ रहे थे कि मुझे राज्य के खिलाफ बोलने के लिए पाकिस्तान, नेपाल या चीन किससे पैसे मिल रहे हैं। उनमे से कुछ को तो मैने विस्तृत स्पष्टीकरण दिया, लेकिन बहुतों को इसके विरोध या समर्थन मे पी चिदंबरम की थ्योरी का प्रभाव दीखता था, इसीलिए वे मेरे तर्कों को मानने के लिए तैयार नहीं थे।

इसी बीच, भारत के अंतिम कतार के लोगों से जुड़े वाजिब मुद्दों को उठाने का काम मैने जारी रखा। बीच मे माओवादियों के साफए के नाम पर झारखंड मे आपरेशन ग्रीन हंट लाया गया। पूरे आवेग के साथ मैने आपरेशन ग्रीन हंट की सचाई, इसके पीछे निहित राज्य के मंसूबे तथा आपरेशन से पैदा ग्रामीणों की पीड़ा को सामने लाने की कोशिश की। नतीजतन तथाकथित शिक्षित लोगों ने मेरे खिलाफ अधिक व्यक्तिगत हमलों को तीव्र किया। कुछ ई-ग्रूप हैं, जहां माओवाद के हमदर्द और समर्थक के रूप मे मुझे उछाला गया। अंततः उन्होंने मुझे माओवादी विचारक के रूप मे चित्रित किया। मै सिर्फ हंसकर रह जाता हूं। संक्षेप मे यही कि कैसे कोई माओवाद का गहन अध्ययन किए बगैर अचानक माओवादी विचारक बन जाता है ? मैने माओवाद का कभी कोई अध्ययन नहीं किया।
मैने इरादतन किसी विचारधारा का अध्ययन नहीं किया, क्योंकि मै जानता हूं कि माओवादी आदिवासियों को माओवाद का पाठ पढ़ाते हैं, गांधीवादी गांधीवाद का उपदेश देते हैं और मार्क्सवादी मार्क्स के बताए रास्ते पर चलने को प्रेरित करते हैं ; लेकिन किसी को आदिवासीवाद की चिंता नहीं, जो कि इनमे सर्वोत्कृष्ट है, शायद वही न्यायपूर्ण समतामूलक समाज तक ले जाता है। भारतीय समाज ने किस तरह आदिवासीवाद को नष्ट किया है, इस पर मै लगातार सवाल उठाता रहा हूं। जनजातीय धर्म को भारतीय संविधान की मान्यता नहीं मिली थी, परंपरागत स्थानीय स्वशासन उपेक्षित थे, संस्कृति नष्ट कर दी गई, जमीन हड़प ली गई और विकास के नाम पर हमारे संसाधन छीन लिए गए। लेकिन हम इस सबसे क्या पाते हैं ? क्या हमे चुप रहना चाहिए ? क्या हम इस देश के नागरिक नहीं है जिन्हें समान बर्ताव की जरूरत है ? क्या उन्हें हमारी पीड़ा का ख्याल है ?
मैं उन अभागे लोगों मे से एक हूं, जिसने देश के तथाकथित विकास के नाम पर सब कुछ खोया है और आज भी बचे रहने की लड़ाई लड़ रहा हूं। मै जब सिर्फ एक साल का था, मेरा परिवार विस्थापित हो गया था। विकास के नाम पर हमारी 20 एकड़ उपजाऊ जमीन ले ली गई। हमारी पुश्तैनी एक बांध मे डूब गई, जो 1980 मे सिमडेगा शहर के निकट चिंदा नदी पर आया। हमने अपना घर, खेती की जमीन तथा बागान खोया और मुआवजे के रूप मे सिर्फ 11 हजार रुपए मिले। जब पूरे गांव ने इसका विरोध किया तो उन्हें हजारीबाग जेल भेज दिया गया। क्या छह लोगों का कुनबा इस 11 हजार रुपए से अपना खाना, कपड़ा, आशियाना, पढ़ाई तथा सेहत की भरपाई कर सकता है ?
विस्थापन के बाद जीवन निर्वाह के लिए हमारे पास घने जंगल मे जाने के सिवा और कोई चारा नहीं था। जमीन का एक छोटा टुकड़ा खरीद कर जंगल मे हम व्यवस्थित हो गए। फल-फूल, जलावन चुनकर हम परिवार को सहारा दे रहे थे। हमारे पास पर्याप्त पशुधन भी थे, जिससे घर की अर्थव्यवस्था को सहारा मिला। कहने की जरूरत नहीं कि राज्य का उत्पीड़न फिर भी जारी रहा। जंगल मे रहते हुए ही मेरे पिता को वन विभाग (मुल्क का सबसे बड़ा जमींदार) ने अतिक्रमणकारी और लकड़ी काटनेवाले के रूप मे आरोपित कर कई केस में जेल मे डाल दिया। हमारे गांव मे कोई विद्यालय भवन नहीं था, इसलिए हम पेड़ के नीचे पढ़ा करते थे और बारिश होने पर हमारे विद्यालय बंद हो जाते। लेकिन मेरे पिता ने हमेशा हमें न्याय के लिए लड़ना सिखाया। हालांकि वे घर को संभालने के लिए संघर्षरत थे, पर समुदाय के लिए अपनी लड़ाई उन्होंने कभी नहीं छोड़ी।
दुर्भाग्यवश, 20 जून 1990 को एक केस की सुनवाई के लिए सिमडेगा सिविल कोर्ट जाते समय मेरे माता-पिता की क्रूर हत्या कर दी गई और चार बच्चे अनाथ कर दिए गए। कोई कल्पना नहीं कर सकता है कि उसके बाद हम पर क्या गुजरी ? सबसे बुरी बात यह है कि दोषियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। कोई बता सकता है कि भारतीय राज्य ने हमें न्याय क्यों नहीं दिया, जिसने विकास के नाम हमारी जमीन छीन ली ? आज तक हमारे गांव मे बिजली क्यों नहीं है ? मेरे लोगों के खेत को सिंचाई के लिए पानी क्यों नहीं मिलता जिनकी जमीन सिंचाई परियोजना के लिए ली गई थी ? उन घरों मे बिजली नहीं पहुंची है जिन्होंने अपनी जमीन बिजली परियोजना के लिए दी थी ? और अब भी वे मिट्टी के घरों मे क्यों रहते हैं जिनकी जमीन इस्पात संयंत्र के लिए ली गई थी ? इसका मतलब कि आदिवासियों का जन्म सिर्फ तकलीफ उठाने के लिए हुआ है और दूसरे हमारी कब्र पर मस्ती करें।
एक लंबी जद्दोजहद के बाद हम सभी को जीवन तो मिला, पर मेरे दुख और पीड़ा यहां खत्म नहीं हुए। एक बार जब मै यूरोपीय आयोग द्वारा वित्तपोषित एक परियोजना मे राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी के रूप में काम कर रहा था तो राज्य के एक वरीष्ठ पदाधिकारी और एक अखबार के संपादक (दोनों ही उच्च जाति के) ने मेरी पात्रता पर सवाल उठाया कि एक आदिवासी होकर मै इस बड़े ओहदे पर कैसे पहुंचा ? इसी तरह एक बार मेरा एक दोस्त उच्च जाति के एक नवविवाहित जोड़े से मिलाने मुझे रांची ले गया। मुझे यह कहते हुए दंपती से मिलने नहीं दिया गया कि मै आदिवासी हूं और मैं यदि उनसे मिल लूं तो वे अशुभ हो जाएंगे और उनका समस्त जीवन दांव पर लग जाएगा। क्या में उनके लिए शैतान था ?
फिर भी, दूसरे प्रतिष्ठान मे जाने पर मुझे पूरी तरह प्रभावशून्य रखा गया और मुझे वह जगह नहीं दी गई, जिसका मै प्रबल दहकदार था। नस्लीय आधार पर मेरे साथ पक्षपात किया गया, आर्थिक रूप से मेरा शोषण हुआ और मानसिक रूप से परेशान रहा। क्या कोई मुझे बताएगा कि मुझे न्याय के लिए क्यों नहीं लड़ना चाहिए ? क्या अन्यायपूर्ण विकास प्रक्रिया के समर्थकों मे से कोई भी, जिन्होंने देश के तथाकथित राष्ट्रीय हित के नाम पर अपनी एक इंच जमीन तक नहीं दी, बता सकता है कि माओवादी विचारक, हमदर्द और समर्थक के रूप मे मेरा नाम क्यों उछाला गया : अन्याय, असमानता और भेदभाव के खिलाफ क्यों मुझे क्यों चुप रहना और लेखन बंद रखना चाहिए ?  
विकास के नाम पर मैने अपना सब कुछ खो दिया और अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है इसलिए मैंने अपने लोगों के लिए लड़ना तय कर लिया है, क्योंकि मै नहीं चाहता कि वे भी मेरी तरह विकास के नाम छले जाएं। मैने संघर्ष के लिए जनतांत्रिक रास्ता अख्तियार किया है, संविधान के अनुच्छेद 19 मे इसका प्रावधान है। कलम, मुंह और मन मेरे हथियार हैं। मैं न तो माओवादी हूं और न ही गांधीवादी, लेकिन मै एक आदिवासी हूं, जो कि अपने लोगों के लिए लड़ने को कटिबद्ध है, जिसे भारतीय राज्य ने अलग-थलग, विस्थापित और संसाधनों से बेदखल कर दिया है। और आज भी रह-रहकर विकास के नाम पर, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हित के नाम पर जारी है।  

बुधवार, 21 सितंबर 2011

नीतीश जी आप पाकिस्तान में होते तो बेहतर होता

फेसबुक पर अपनी टिप्पणी के कारण अरुण नारायण के निलंबन पर

देश को नए बिहार से रू ब रू कराने के लिए धन्यवाद, नीतीश जी ! आपका यह बिहार होर्डिंगों व अखबारों में जगरमगर करता है। कौन नहीं जानता कि आउटडोर मीडिया (होर्डिंग, बैनर) व प्रिंट मीडिया (अखबार-पत्रिका) से झल्लाई जनता ने इन होर्डिंगों को किस तरह जलाया। निर्मल ग्राम की धूम जिस प्रदेश में मची हो और प्रधानमंत्री ग्रामसड़क योजना से चप्पे-चप्पे को सड़क से जोड़ने की सुविधा हो गई हो उस बिहार के झंझारपुर विधानसभा क्षेत्र में कोई आकर बताए कि यह किस प्रदेश में आता है। यहां की लाखों की आबादी सड़क के दोनों ओर मलमुत्र विसर्जित करती है। आप उन इलाकों से गुजर जाएं तो लगेगा कि बहुत बड़ा किला फतह कर लिया आपने। सैकड़ों गांव हैं जहां बारिश में आप किसी भी वाहन से नहीं जा सकते। खरंजा (सिर्फ ईंटों बिछी सड़क को कहते हैं) की जो ईंट बीस साल पहले निकली थी, वहां कोई नई ईंट नहीं लगी, भले ही दस ईंट और भी खाली हो गई। कोई पोल झुकी थी तो वह गिर गई या बिला (लुप्त हो) गई, पर माथे पर तार नहीं टंगा। बिजली को विकास के माथे का सिंदुर कहा जाए तो ऐसे सैकड़ों गांव हैं जो अभी भी विधवा हैं। यहां बिजली क्या, उसके पोल तक नहीं बिछे। और एक बार ट्रांसफार्मर के कारण बिजली गई तो फिर इसकी सुनवाई कहीं नहीं। इस विधान सभा क्षेत्र के विधायक उन्हीं के समनाम डा. नीतीश मिश्रा जी हैं। रामदेव भंडारी वहीं के हैं और दो बार राज्य सभा सदस्य रहे। ऐसे इलाके बिहार में भरे होंगे। चूंकि मैं इस इलाके से आता हूं, तो यहां की जानकारी है।

पटना के नाला रोड में जन समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरे प्रदर्शनकारियों पर हुआ बर्बरतापूर्ण लाठी प्रहार किसी पटनावासी को भूला नहीं होगा। ठकुरसुहातियों के बीच विजातीय स्वर को बर्दाश्त नहीं कर पाने का लक्षण है यह नीतीश जी। उत्तेजित होना ताकत की निशानी कहीं भी कभी नहीं समझी गई। बीमार, बूढ़ा और कमजोर ही उत्तेजित होते हैं, गाली देते हैं। मारपीट पर उतारू होते हैं। स्वस्थ व्यक्ति तो जवाब देगा। तर्क देगा नीतीश जी।

नीतीश जी अपनी छवि को लेकर कितने चौकन्ने हैं वह तो बाढ़ को लेकर गुजरात सरकार द्वारा बिहार सरकार को भेजी गई राशि के लौटाने से जगजाहिर हो ही चुका है। सरकार मोदी की होती या फिर बाघेला की, राहत तो आनी ही थी। मोदी ने बिहार की जनता को भाजपा के कोष से वह रकम नहीं दी थी। और मोदी ने वह राशि नीतीश जी आपको को नहीं दी थी। अखबार में छपे कटआउट वाले गुजरात के विज्ञापन पर छिड़े चर्चा से घबड़ाकर नीतीश जी आपने यह कदम उठाया था। इसे भी कौन नहीं जानता। क्या यह तानाशाही का एक रूप नहीं।

बिहार सरकार ने विधान परिषद कर्मी अरुण नारायण को जिस आधार पर बगैर कारण बताओ नोटिस के निलंबित किया है, वह राज्य सत्ता की तानाशाही को ही प्रकट करता है। और रही बात फेसबुक पर सरकार और अधिकारी के खिलाफ टिप्पणी करने की बात तो उसे कौन रोक सकता है।

चेकबुक से फेसबुक तक

मैं आता हूं, पहले आरोप पर। मैं अरुण को डेढ़ दशक से जानता हूं जब वह बोरिंग रोड तरफ रहते हुए स्नातक की पढ़ाई करते हुए साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हाथ बंटा रहे थे। समकालीन भारतीय साहित्य व पहल जैसी पत्रिकाओं में मेरी रचनाओं को पढ़कर संपर्क में आए थे। आज के कवि कुमार मुकुल तब होमियोपथी की डाक्टरी कर रहे थे। मैं दावे के साथ कह सकता हूं पूरे हिंदी संसार में कोई भी सामने आकर कहे कि कभी-भी अपने सामने आए मौके को अरुण ने भुनाया है। एकाध होंगे तो वे निजी खुन्नस पाले लोग ही होंगे। हां, इतना जरूर है कि दिल्ली से लेकर पटना तक दर्जनों लोग होंगे जिन्होंने इस अरुण का इस्तेमाल (शोषण की हद तक) किया। मैं अपने को इससे अलग नहीं मानता। एक दैनिक में फीचर संपादन के क्रम में उन्होंने मेरे दिए कई एसाईनमेंट पूरे किए। मेरा अनुमान है कि हिंदी जगत अरुण को इतना तो जानता ही है।
सुविधा न होने के कारण बगैर किसी पारिश्रमिक के। डाक विभाग की गलती से हमनाम अरुण कुमार का चेकबुक यदि लेखक अरुण नारायण (इसका भी औपचारिक नाम अरुण कुमार ही है) तो डाक वालों का फर्ज क्या होना चाहिए। और मान्यवर अरुण कुमार (सिंह) जी आपने तो आवेदन दिया होगा न चेकबुक के लिए ? चेकबुक नहीं मिल पाने की स्थिति में आपने बैंक से शिकायत की या नहीं ? बैंक ने चेक आने पर क्या किया ? क्या नहीं माना जा सकता है कि सबकुछ साजीशन अरुण नारायण को फंसाने के लिए रचा गया हो। आखिर एक पैसे की भी गलत निकासी जब उस खाते से नहीं हुई तो अरुण कुमार सिंह जी कुछ भी नहीं कर सकते। और बैंक को अरुण नारायण ने अपना हस्ताक्षर करके चेक दिया था। नादान अरुण की गलती सिर्फ यह है कि अपने पते पर आए चेकबुक को अपना मान बैठा बगैर यह देखे कि इस पर किसकी खाता संख्या अंकित है। आखिर फर्जीवाड़ा ही करना होता तो वह अपने हस्ताक्षर से बैंक में चेक क्यों जमा करता ? बैंकिंग विशेषज्ञों की मानें तो ऐसे मामले में बैंक सिर्फ उस चेक को खारिज करने के और कुछ नहीं कर सकता है। क्या उलट मामला अरुण कुमार सिंह, बैंक, डाक विभाग पर मिलजुलकर साजिश रचने का मामला नहीं बनता है।
रही बात फेसबुक पर विधान परिषद के सभापति और सरकार के खिलाफ असंवैधानिक टिप्पणी की तो सरकारी सेवा आचार संहित के दायरे में पहले तो कारण बताओ नोटिस देनी चाहिए थी। यह ठीक है कि सभापति को विशेषाधिकार प्राप्त है, पर सवाल है कि यह विशेषाधिकार ऐसे ही मामलों के लिए विवेकाधीन है क्या। क्या ेक भी आपराधिक पृष्ठभूमि के विधान पार्षद के मामले में उन्होंने कोई फरमान जारी किया है ?
मिस्र के तहरीर चौक पर छिड़ी जंग फेसबुक की आग थी और वहां की सरकार ने तो अपने सुरक्षा तंत्र तक को फेसबुक के सहारे युवाओं के संपर्क में रहने को कहा था। वित्तीय झंझावात के कारण 2008 से भीषण उथल-पुथल का सामना कर रहे आईस लैंड में इन दिनों संविधान संशोधन की कवायद चल रही है। नीतीश जी, आपको पता ही होगा कि वहां 25 सदस्यीय परिषद के जिम्मे संविधान संशोधन का उपक्रम चल रहा है। इसीके साथ इंटरनेट के जरिए सभी आईसलैंडवासियों को संशोधन की प्रक्रिया में आनलाईन भागीदारी का विकल्प दिया गया है। और शासन का आदेश था कि जून के अंत तक आई वाजिब सलाह को परिषद द्वारा अनुमोदित कर प्रारूप में शामिल कर लिया जाए। लेकिन नीतीश जी आप फेसबुक पर असहमति का धीमा स्वर भी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। क्या मायावती का ‘प्रतिमा’ प्रेम और आपका ‘छवि’ प्रेम कहीं से भी अलग है? हालांकि सबकुछ होते हुए भी मायावती ने अभी तक ऐसा रुख तो नहीं अपनाया है। क्या फेसबुक को फेस नहीं कर पाना आपको कठमुल्लावादी पाक हुकूमत के करीब नहीं ले जाता जहां अभी-अभी लाहौर उच्च न्यायालय ने प्रशासन को फेसबुक पर बंदिश लगाने का आदेश दिया है। फेसबुक समेत वैसे सभी सोशल नेटवर्किंग साईट की पहुंच पर आईटी मंत्रालय को रोक लगाने का फरमान दिया गया है जो मजहबी नफरत फैलाने में शामिल हैं। (मजहबी नफरत को देखिए- फेसबुक पर पैगंबर मोहम्मद की आकृतियों वाली स्पर्द्धा आयोजित करने का आरोप है। याचिकाकर्ता वकील मुहम्मद अजहर का मानना है कि इससे इस्लाम बदनाम होता है) फरमान देनेवाले न्यायाधीश शेख अजमत सईद ने छह अक्तूबर तक इस बाबत रिपोर्ट देने को कहा है। नीतीश जी, बहुत कोसते होंगे आप यहां की व्यवस्था को जिसमें आपको पाकिस्तान जैसी वह आजादी नसीब नहीं। क्या आपको मालूम नहीं कि प्रेमकुमार मणि को लेकर जो भी विवाद हुआ उसने कितनी खिन्नता पैद की है। क्या आप इससे उत्पन्न परिदृश्य से अनजान हैं। कौन सी वजह है कि कोई यह न माने कि मुसाफिर या अरुण के मामले से आप अलग हैं। नीतीश जी राज्य सत्ता की सुविधा है तो आप आक्सीजन के सिलिंडर को आऊट आफ मार्केट कर सकते हैं, पर हवा पर बैन नहीं लगा सकते।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

लेखक भाषा का आदिवासी है, लेकिन उदय प्रकाश जी आप ?

(उदय प्रकाश के ब्लाग पर 22 जुलाई के पोस्ट "लेखक भाषा का आदिवासी है" को पढ़कर लिखा गया। दरअसल यह साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए स्वीकार वक्तव्य था। यह पोस्ट उनके ब्लाग पर 24 अगस्त को किया था।)
पहले तो यह कह दूं कि मैं जिस उदय प्रकाश को जानता हूं वह अबूतर-कबूतर से शुरू होता है, जबकि इससे पहले कविता ‘सुनो कारीगर’ से काफी चर्चित हो चुके थे। और उसके बाद तो तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, मोहनदास, मेंगोसिल, वारेन हेस्टिंग्स का सांड़ और भी न जाने कहां-कहां किन-किन गलियों और राजमार्ग होते हुए हमारे उदय प्रकाश का सृजन हुआ। हम जिस उदय प्रकाश को जानते हैं वह किसी भी साहित्य अकादमी से ऊपर है। उदय प्रकाश जी आप तो खुद हिंदुस्तान दैनिक के साथ एक साक्षात्कार में कह चुके हैं- आप कैमरा जहां रखते हैं, वहीं से उसका फ्रेम तैयार हो जाता है। तो फिर उस राज्य सत्ता के लिए प्रशंसा के शब्द कैसे निकले जिस राज्यसत्ता को आप भी आततायी मानते हैं। प्रतिबद्धता सिर्फ रचनाओं से ही नहीं दीखाने की चीज नहीं, जीने की चीज है। आखिर अशोक वाजपेयी ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिया जानेवाला सम्मान ठुकराया तो ? यह अलग बहस का विषय हो सकता है कि उन्होंने अपने इस कदम से क्या खारिज किया है और किसे आवाज दी है। पर इतना तो है ही कि संस्कृतिकर्मी अपनी स्वायत्तता खुद ही सिरजता है। ऐसे में व्यावहारिक तौर पर प्रतिबद्धता दीखाने के मौके गंवाना हमारी विचारधारा को ही व्यक्त्त करता है। आपने खुद ही ‘मोहन दास’ को दिए गए सम्मान के लिए अपने वक्तव्य में कहा है - कोई भी पुरस्कार किसी भाषा और भूमि में किसी मनुष्य का पुनर्वास तो नहीं कर सकता। क्या इस मौके पर औपचारिक वक्तव्य देने के लिए आपकी असमंज और दुविधा का हिस्सा यह भी तो रहा होगा। राज्यसत्ता से नाखुश संस्कृतिकर्मी इससे संरक्षण की अपेक्षा जैसे ही पालता है, वैसे ही संस्कृति की स्वायत्तता का खंडन करता है। गाली भी दें और कहें शाल भी ओढ़ाओ। यह कैसे हो सकता है। इस शासन का यह व्यवहार अचरज का विषय नहीं। आखिर प्रतिरोधी चेतना शासन से सम्मानित भी तो नहीं होगी। चोर से सम्मानित होना कहीं न कहीं चोरी को मंजूरी देने के बराबर ही है। मैं कवि नहीं हूं। इधर कथादेश के जून (2011) अंक में मेरी कुछ कविताएं है। उनमें से एक कविता ‘यह वक्त’ देखना बड़ा मौजूं होगा।

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

तहखाने से

लड़की

जैसे हम अपने तलुए देखते हैं
उसकी जांघें सहलाते हैं
नितम्बों को थपथपाते हैं खुले में
अपने स्तन के घाव का दर्द
उसकी आँखों में दिखना तो दूर
पीठ के खरोंच तक नहीं देख सकती

खुले में यह सोचकर वह सिहर उठती है वह
क्योंकि वह मल्लिका शेरावत और राखी सावन्त नहीं

अपनी पीठ की खरोंच तक देखने के लिए
खिड़की-दरवाजे बना लेती है अंगोपांग को
और आँखें चिपक जाती हैं दसों दिशाओं पर
खतों में कलेजा’ को झोंककर चूल्हे पर रसोई बनाती है
तो धुआँ और चेहरे के बीच
पिघलती बर्फ नहीं दिखती

अपनी नागरिकताओं से वंचित
वह नहीं बोल पाती अपनी जबान
अपनी हँसी नहीं हँस पाती
कब का भूल चुकी है अपना रोना
अकेले में खुद को खटखटाकर
खौफनाक गलियों से गुजरती है वह


माँ की शिक्षा

माँओं ने हमें
क ल म, क म ल और न जाने कितने शब्द
खाने को भूलकर नहाने को टालकर
इसलिए नहीं सिखाये होंगे कि
हम किसी के दिलो-दिमाग में सुराख करें कलम से
कमल से हम किसी मूरत को खरोंचें
और दूध पीकर खून बहाएँ

माँओं ने नहीं सोचा होगा
त्याग और धैर्य, कष्ट और तप से सींचे गये असंख्य शब्द
उसी के शरीर पर कोड़े की तरह पड़ेंगे

अपने खून से सींचे गये, पोसे गये शब्दों को
जब आग में झुलसते देखती होगी माँएं
तो क्या गुजरता होगा, माँएं ही जानती हैं!
पढ़े-लिखे बड़े बच्चों को यह समझ न आएगी

हमारे छुटपन में सिखाये गये शब्द ही हैं
कभी हिजड़े उन्हें ले जाते हैं अपनी गली
उनसे खेलते-ठठाते हैं
तो कभी खद्दरधारी मसखरा करते हैं
उन शब्दों का गला घोंटते हैं
जैसे मूक मजदूरों का बोनस, तनख्वाह हो

माँएं किस तरह अबूझ लगने वाले शब्दों को
हमारे स्मृतिगर्भ में डालती हैं
यह उसके आँसू, हँसी या मौन में छिपा है

चुप्पी की गहराई में तैरते
खुशी की हवा में लहराते
अबूझ शब्दों ने खोली
अपनी अर्थ पेटियाँ
माँओं के सिखाये गये असंख्य शब्द
उनके ही बदन पर कोड़े की तरह बरसते हैं

 माँएं ही हैं जो
आज भी हमें कलम, कमल, प्रेम और न जाने कितने शब्द
खाने में लगी हैं


काबुल से बगदाद

काबुल और बगदाद से खुली गाड़ी
कहाँ रुकेगी
यूएनओ के ढहते गुम्बद से आती है फुसफुसाहट

बहुत भोले हैं वे जिन्हें इस गाड़ी का
धुआँ दूसरे किसी देश के किसी प्रान्त के किसी गाँव में नहीं दिखता
कुली का काम पा जाने के लालच में उस धुएँ का प्रदूषण नहीं दिखता
नहीं जानते कि यह गाड़ी
रेडियो वेव के वेग से चलती है

शायद यह धुआँ ही इतना छा गया कि पार का नजारा
नहीं दिखता कमजोर आँखों को

वे नहीं जानते
कि यह गाड़ी पटरी पर नहीं चलती
इसलिए जितना डर बैंकों के लुट जाने का है
उतनी ही आशंका खेत-खलिहानों के रौंदें जाने की भी है
कभी भी कुचली जा सकती है पेड़ के नीचे चलती पाठशाला
और कभी भी पाँच सितारा होटल मिट्टी के ढेर में बदल सकता है
हारमोनियम और मृदंग पर हाँफते चौता और
रघुपति राघव... कभी भी गुम हो सकते हैं इक्वलाइजर में
और कभी भी जेनिफर लोपेज, ब्रिटनी स्पीयर बनती बालाएँ मिट सकती हैं

खतरा जब एक जैसा हो हर जगह
तो बचने के अलग-अलग रास्ते
और भी खतरनाक हो जाते हैं


यह वक्त


यह वक्त
गोल-मटोल बात कर निकल जाने का नहीं.

यह वक्त
 सभी व्यवस्था में झक-झक सफेद बने रहने का नहीं.

सन्त और नादान बनकर
साहित्य अकादमी बटोरने का भी वक्त नहीं है यह.

ये बहुत नादान चतुर हैं
जो किसी का नाम लेकर बात नहीं करते
किसी पर उंगली उठाकर किसी का निशाना नहीं बनते.

हमारे अभाग्यों और कष्टों का कारण
कौन बतायेगा?

उस पर उंगली उठानी ही होगी
गाली देनी ही होगी.
कालर पकड़ना ही होगा

सिर्फ प्रधानमंत्रियों-मुख्यमंत्रियों को
गाली देना काफी नहीं

हमारे कष्ट और अभाग्यों की शुरुआत
हमारे प्रबन्धक से है, प्रशासक से है
हमारे मुखिया से है, विधायक से है, सांसद से है
हैड मास्टर से है, सम्पादक से है
डाक्टर से, इन्जीनियर से है.
इन्हें कौन कर्मचारी, मतदाता, शिक्षक, पत्रकार, मरीज
गाली देगा?
कौन पकड़ेगा इनकी कालर?
सड़क पर खदेड़ेगा इन्हें कौन?
थानेदारों को जेल में ठूसेगा कौन?
कौन सजा सुनाएगा न्यायाधीशों को?

जब राष्ट्रपति को गाली देना आसान हो जाए
इसका मतलब मुखिया का बेहद ताकतवर हो जाना है

यह वक्त है वही.

कौन सिल रहा है इनकी जबान?
कौन बोल रहा है इनकी जबान से?

हम सभी जिस वक्त के सुअरबाड़े में रहते हैं
वहाँ के गंधाते चरवाहे को ढूँढ़ना होगा.

यह वक्त
जनतंत्र को शौचालय बनानेवालों को
माला से लादने का नहीं है

जनतंत्र के इस सार्वजनिक मूत्रालय में
कोई अपने शब्द पकड़कर
कोई अपने फरमान लेकर
कोई अपनी वर्दी लेकर
तो कोई अपनी लाल बत्ती लेकर
चला आता है मूतने.

नंगे-भूखे मरनेवालों की भाषा वह नहीं
महंगाई-बेकारी से बलात्कृत सपनों
के गर्भपात की वह भाषा नहीं

जिस भाषा में लिखकर कोई
झटक ले जाता है अकादमी
और कोई शिखर सम्मान
उसकी कलम को कौन तोड़ेगा?
जो गूंगों की स्याही सोख रहा है
जो फैला रहा है स्याही उनकी रातों में
जो उनकी जबान से छेड़खानी करता है.

कुर्सी को कुर्सी और लाठी को लाठी
पैरवी को पैरवी और घूस को घूस
हत्या को हत्या और लाल को लाल
नहीं कह सकनेवाली भाषा
कवि की भाषा नहीं,
वह बलात्कारी का स्वांग है.

यह वक्त
स्वांग करने वालों का नहीं
उनके मेकअप खरोंचने का है. 

(देवेंद्र जी, ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद ! ये सभी कविताएं मेरी हैं जो कथादेश के जून 2011 वाले अंक में प्रकाशित हैं। )

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

साख में सुराख !

अन्ना के लिए अब चौकन्नेपन की जरूरत

आंदोलन का खर्च कहां से आया, जांच हो : दिग्विजय सिंह

केवल लोकपाल से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा। - कपिल सिब्बल, केंद्रीय मंत्री
जितनी मर्जी हो लोकपाल बना लो भ्रष्टाचार बिल्कुल ही नहीं समाप्त होगा। जिसने भूख हड़ताल की है चाहे उसे लोकपाल बना दो तो भी कुछ नहीं होगा। - प्रकाश सिंह बादल, पंजाब के मुख्यमंत्री
आखिर संसद में तो आना ही है। - रामपाल यादव, समाजवादी पार्टी सुप्रीमो पुत्र सांसद
क्या हजारे महात्मा गांधी, जेपी या गौतम बुद्ध से भी बड़े हैं, जो राजनेताओं को बुरा बता रहे हैं। केवल राजनेताओं को कोसने से देश का सिस्टम नहीं बदल सकता। - अमर सिंह
भाजपा ने ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे पहले मुहिम छेड़ी थी– राजनाथ सिंह,वरिष्ठ भाजपा नेता
हाल के दिनों में नेताओं के खिलाफ जिस तरह से मुहिम चलाई जा रही है वह लोकतंत्र के खिलाफ है। नेताओं के खिलाफ जो लोग शक का वातावरण बना रहे हैं वह लोकतंत्र का अपमान कर रहे हैं। - आडवाणी
अगर नेता अपनी जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभाते तो उन्हें आंदोलन करने की जरूरत नहीं पड़ती – अन्ना

हम बात शुरू करते हैं 10 अप्रैल 2011 को केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के उस बयान से जिसमें उन्होंने बिल पास कराने में भाजपा से पुरजोर सहयोग की अपील की है। उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष सहयोग करता है तो संप्रग सरकार संसद के अगले सत्र में लोकपाल विधेयक पेश करने और पारित करने को तैयार है। संसद के अगले सत्र में लोकपाल विधेयक पारित करने की आडवाणी की मांग पर उन्होंने यह बात कही थी। उन्होंने कहा कि मैं वास्तव में इस सुझाव का स्वागत करता हूं। यदि वह (आडवाणी) अपने सदस्यों को राजी कर लेते हैं तो हमें इसे बिना स्थाई समिति के पास भेजे पारित करने में खुशी होगी। लेकिन किसी मंच से घोषणा करने के बदले यह सुनिश्चित करें कि लोकसभा और राज्यसभा में उनके सदस्य हमारे साथ सहयोग करें। यह उस कांग्रेस का स्वर है जिस कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की सफलता लोकतंत्र के लिए प्राणदायक है, बल्कि उसके लिए अब मसला हो गया है कि अभियान कैसे और क्यों सफल हुआ। आखिर अभियान में हुए खर्च की जांच की मांग क्यों।

लोकपाल विधेयक को नाकाफी माननेवाले मंत्री कपिल सिब्बल वाली सरकार में ही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी यदि भाजपा से उम्मीद करते हैं कि वह बेखटके बिल को पारित कराने में आंख मूंद कर मदद करे तो यह उनका अबोध भोलापन ही होगा कि श्रेय की लड़ाई में वह (भाजपा) सबसे पीछे रहना कबूल ले। यह वही सिब्बल हैं जिन्हें आईटी मंत्री बनने के बाद 2 जी स्कैम में कुछ दीखा ही नहीं, आरोप फिजूल लगे। समिति में उनकी शिरकत एक सियासी एजेंडे को पूरा करने के लिए किया गया नहीं लगता है क्या।
अपनी सदिच्छा जो भाजपा यह बोल कर प्रकट कर रही हो कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम पहले उसी ने शुरू की थी और अन्ना का रुख लोकतंत्र विरोधी और लोकतंत्र के लिए अपमानजनक है। आडवाणी यह इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उनके अनुसार सिर्फ नेता ही लोकतंत्र के वफादार सिपाही हैं और उन्हीं से लोकतंत्र की पहचान है। नेता का अपमान यानी लोकतंत्र का अपमान। क्या जिस अमर सिंह के वे धुर विरोधी हैं उनसे उनका सुर नहीं मिलता जो कहते हैं कि नेताओं को गाली देने से सिस्टम नहीं बदल सकता। यह रुख किस सियासी पार्टी से नहीं मिलता। तुर्रा यह कि कांग्रेस नुकसान की भरपाई इसी भाजपा के सहयोग की बदौलत करने की सोच रही है। सवाल यह है कि वह आडवाणी या भाजपा को नहीं जानते कि वह अन्ना के अभियान के प्रति क्या रुख रखते हैं। वे जानते हैं कि भाजपा मदद को सामने आ नहीं सकती तो क्यों न गेंद उसीके पाले में दे दें। आजमाना जरूरी ही था तो सरकार प्रारूप समिति में भाजपा के जिम्मेवार-समझदार कानूनविदों को जगह तो देकर देखती। आखिर पं. नेहरू ने संघ के श्यामाप्रसाद मुखर्जी को मंत्रिमंडल में रखा था या नहीं। यह अलग बात है कि उसी कांग्रेस पर उन्हें मार डालने के भी आरोप हैं।
समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो पुत्र सांसद अखिलेश यादव हों या राजद सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह, वे इस बिल के संसद में आने का इंतजार कर रहे हैं। जैसे इसे पारित करना और लंबित करना उनके बस में हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के तारीक अनवर व नवाब मलिक की खीझ तो फिर भी समझी जा सकती है कि अन्ना मसले पर विचार के लिए बने ग्रुप औफ मिनिस्टर से उनके सुप्रीमो को न सिर्फ इस्तीफा देना पड़ा था, बल्कि नौबत तो सरकार से इस्तीफे की मांग तक आ जाती। सियासी पार्टियों का दावा है कि वे एक अदना सा चुनाव लड़कर दिखा दें। जैसे लोकतंत्र पर भरोसा साबित करने के लिए चुनाव का बिल्ला लगाना जरूरी हो गया है। इस तरह तो सवा अरब की आबादी में लोकतंत्र पर सबसे अधिक भरोसा रखनेवालों में वे 300 करोड़पति और 150 अपराधी सबसे आगे आएंगे जो आज संसद में कुंडली मार कर बैठे हैं। जिस तंत्र ने पूंजीपति-अपराधी को संसद में आसानी से प्रवेश कराया है उस भ्रष्ट चुनाव प्रणाली पर उनका भरोसा उन्हें इतना लाऊड कर रहा है तो आश्चर्य क्या। अन्यथा क्या बिसात कि वे अन्ना को एक वार्ड का भी चुनाव लड़ने को ललकारते। ऐसा लगता है जैसे चुनाव रूपी ब्रह्मा ने रक्तबीजरूपी नेताओं को अमरता का वरदान दे दिया है और उनका खून भी कहीं गिरेगा तो वह सांसद-विधायक ही होगा। आखिर हो भी यही रहा है कि नेता पिता या पति के मर जाने पर पत्नी-पुत्र नेता चुन लिए जाते हैं। क्या वे नहीं जानते कि इस जनतंत्र में लोकप्रियता और चुनावी सामर्थ्य दोनों एक नहीं। जिन लोगों ने कलाम को दुबारा राष्ट्रपति बनने से रोका, उन्हीं की जमात ने शेषण जैसे व्यक्ति के लिए संसद में प्रवेश सपना कर दिया। क्या वे नहीं जानते कि करोड़ों दिलों पर राज करनेवाले सचिन किसी क्षेत्र विशेष से अपने दम पर कोई चुनाव शायद ही जीत पाएं जब तक कि इस राजनीति को वे गवारा न हों। क्या इस बिना पर उनकी हैसियत घट जाएगी। किसी टुच्चे नेता से भी वे गए-बीते हो जाएंगे। क्या 150 अपराधी-300 करोड़पति को संसद में पनाह देनेवाली यही राजनीति यदि चरित्र-साधना, अभियानी जुनून की हिफाजत का पैमाना इस चुनाव को बनाएगी। क्या वे बताएंगे कि इस चुनावी पैमाने पर कितने पद्म सम्मान और भारत रत्न दिए जाते हैं।
अभियान को व्यर्थ बतानेवाले यह बखूबी जानते हैं कि एकबार अन्ना अपने मुहिम में सफल हो गए तो पब्लिक उन्हें कहीं का नहीं छोड़ेगी। ऐसे में सुर्खाब के इस पर को उड़ने के पहले ही कतर दिया जाना चाहिए। यही कारण है कि विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए होनेवाली चर्चा की रिकार्डिंग के प्रस्ताव का विरोध किया गया है।
तात्कालिक सरोकारों में लिपटी सत्ता की राजनीति को इसका अंदाजा नहीं कि अन्ना को जनतंत्र के लिए नया खलनायक साबित करने की कोशिश उन्हें कितनी महंगी पड़ सकती है। अपने निकम्मेपन और सड़ांध को छिपाने के लिए की जा रही मरहमपट्टी और भी सड़ांध बढ़ाएगी। लेकिन यह जरूरी होगा कि अन्ना अभियान से लोगों को जोड़ने में सतर्कता बरतें और जवाबी वार से बचें। अन्यथा न जाने वाकपटु नेता किस शब्दजाल में उन्हें उलझाकर अभियान को मोड़ने या डाइल्यूट करने का काम करने लगें।
भ्रष्ट नेता, मंत्री, अधिकारी को फांसी पर चढ़ाए जाने की बात जिन्हें कड़वी लगी उनमें कोई नेता अकेले नहीं। योग गुरू स्वामी रामदेव को भी कम मिर्ची नहीं लगी। उन्हें लग रहा कि कालेधन की देश में वापसी और भ्रष्टाचार को लेकर उनका देश भर में छेड़ा गया अभियान फिस्स कर गया। करोड़ों भक्तों और योग विश्वासियों को उन्होंने अपनी जेब का सिक्का मान लिया था तभी तो उन्हें यह मुगालता हो गया था कि अब वे मुल्क पर छा जानेवाली पार्टी बनाकर सत्ता पर दुग्धधवल छवि के लोगों को बिठा देंगे। योग को लेकर जुटे सारे भक्त जैसे उनकी जेब के सिक्का हों बस उस जेब से इस जेब में डालना भर है। उन्हें यह समझना चाहिए कि लाखों की भीड़ एकत्र करनेवाले रामदेव ऐसा मंजर क्यों पैदा नहीं कर सके। स्वामीजी, दरअसल अपने शिविरों व दवा दुकानों में जानेवाले बीमार श्रद्धालुओं से कालेधन व भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का संकल्प पत्र भरवा लेने से आंदोलन नहीं हो जाता। जिस योग को कहा जाता है कि यह चित्त-वृत्तियों का निरोध है (योगश्चित्तवृत्ति निरोधः- पतंजलि सूत्र) क्या उन्होंने सूत्र को इसी रूप में रहने दिया है? क्या सार्वजनिक स्थलों पर योग का प्रदर्शन कर वे भीड़ को ध्यान की ओर अग्रसर कर पा रहे हैं या यह काम वह अपनी सीडी से कर-करवा रहे हैं। क्या योग आसक्ति और लिप्तताएं पैदा करता है ! अपनी उम्र का सारा हिस्सा जिस किरण बेदी ने निर्लिप्त – निष्काम भाव से बेहद मर्यादित ढंग से जिम्मेवारियां निभाने में बिताया, कहीं भी कोई लस्ट नहीं रहा, न ही दिखा, उस किरण बेदी तक को असंतोष से भर भटकाने का प्रयास किया उन्होंने। लेकिन जब योगबाबा रामदेव उनसे प्रारूप समिति में शामिल नहीं किए जाने की कैफियत मांगते हैं तो क्या इसे उनमें आसक्ति-असंतोष-क्षोभ की किरण जगाने की कोशिश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। साफ शब्दों में क्या नहीं कहें कि जो किरण उनके प्रति भी श्रद्धावान रहीं, उनकी नजर में उस श्रद्धा को खोने का काम नहीं कर रहे। यह तो उन किरण बेदी की श्रेष्ठता है कि उन्होंने कहा कि समिति में कौन शामिल होगा, नहीं होगा यह उनका मसला नहीं। यह तय करनेवाली वह कोई नहीं होतीं। उनका मकसद तो सिर्फ अभियान को मुकाम तक ले जाने का था, उसमें वह लगी रहीं। और काम उसी दिशा में हो रहा है। बाबा कहते हैं कि 121 करोड़ लोगों की श्रद्धा का सवाल है यह। जिस भ्रष्टाचार ने समाज में जड़ जमा ली है उस समस्या को बाबा कहते हैं कि यह सोशल प्राब्लम नहीं, पालिटिकल प्राब्लम है। क्या उनका इशारा इस ओर तो नहीं कि स्वैच्छिक संस्थाओं को इससे दूर रखा जाए। 
जो हवा बन रही है वह अन्ना की राह में नए झंझावात पैदा करने की कोशिश करनेवाली है। वे नहीं जानते कि क्षुद्र और टुच्चे तात्कालिक कारणों से अभियान में शामिल लोगों में यदि फूट डालने की कोशिश हुई तो संसद में बैठे 300 से अधिक करोड़पति और 150 से अधिक आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग क्या इसे आसानी से पचा लेंगे ? जो संविधान इतनी जटिलताओ को पोषित कर रहा है, उसके लिए बनी संविधान सभा का स्वरूप देखेंगे तो आपको आज की स्थिति का हस्र समझ में आ जाएगा। यह सभा उन प्रान्तीय विधानमंडल के सदस्यों से बनी थी, जिनका चुनाव देश की कुल वयस्क आबादी के मात्र 11.5 प्रतिशत हिस्से से बने निर्वाचक मण्डल से हुआ था। मुट्ठी भर चुने गये प्रतिनिधियों को छोड़ बाकी समृद्ध सामंतों-कुलीनों के नुमाइंदे थे। इनमें चुने गये नुमाइंदों के अलावे उसमें राजाओं-नवाबों के चुने गए नुमाइंदे भी थे। हमें तभी सोचना चाहिए था कि वे कैसा संविधान बनाएंगे। क्या आज की संसद इससे अलग है? क्या एक बार फिर संविधान पर  गौर करने का वक्त नहीं आ गया है। यह साबित करना होगा कि यह लड़ाई का एक अध्याय है पूरी किताब बाकी है। आमूल बदलाव की लड़ाई जब कभी भी होती है तो यथास्थितिवादियों के लिए यह बेहद असुविधाजनक वक्त होता है। जिस तरह शोषण बढ़ने पर सामंतों के प्रति क्षोभ-असंतोष को बड़े फलक पर संघनित-एकत्र होने का अवसर लाता है, कुछ उसी तरह बदलाव का प्रहार जितना कठोर होगा यथास्थितिवादियों में एकजुट होने की विकलता भी उतनी ही अधिक होगी। अपनी हैसियत और औकात को छोड़ अवाम के साथ होना उनके लिए आसान नहीं। यह शत्रु वर्ग को चिह्नित कर अभियान को जारी रखने का वक्त है और कठोर वक्त है। एक तरह से सत्ता पक्ष, विपक्ष सभी अपनी एकजुटता से अन्ना हजारो को मुगालते पालने से दूर रह अगली रणनीति बनाने को मजबूर कर रहे हैं।

अथ मुख्य आर्थिक सलाहकारोवाच -

अब थोड़ा हाकिमों के हलके में झांककर देख लेना दिलचस्प होगा कि उनपर क्या लोट रहा है। वे किस तरह इस अभियान को अभी से नाकाम करने की जुगत भिड़ाने में लगे हैं। वे बड़े ही साजिशन सोचते हैं कि आप निर्णय ही नहीं लेंगे तो गलती की संभावनाएं नहीं होगी। उनका मानना है कि आरटीआई और लोकपाल को प्रभावी बनाने के लिए व्यापक पैमाने पर प्रशासनिक सुधार को अंजाम देकर ही भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु घूस को संस्थागत रूप देने की सलाह देते हैं। पिछले दिनों बिजनेस स्टैंडर्ड के साथ एक बातचीत में उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार संबधी कानूनों में उत्पीड़न के जरिए ली जानेवाली रिश्वत तथा प्रणालीगत रिश्वत में अंतर किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि आम नागरिकों को वैधानिक सेवा के एवज में ली गई रिश्वत ही उत्पीड़न वाली रिश्वत है। ये बातें तब सामने आ रही हैं जब अन्ना हजारे का अभियान अपने चरम पर है।
उन्होंने उदाहरण से इसे और स्पष्ट किया – देश के अनेक नागरिकों को ड्राइविंग लाइसेंस के लिए रिश्वत देनी होती है। यह रिश्वत नहीं देने पर भी लाइसेंस मिलेगा तो जरूर, पर अनावश्यक विलंब से। ऐसे मामले में कानून की प्रवर्तक संस्थाओं को श्री बसु की सलाह है कि रिश्वत देनेवाले को आरोपी के रूप में नहीं देखना चाहिए। इस बाबत उपचारात्मक उपायों पर विचार करना चाहिए। सिर्फ प्रणालीगत रिश्वत के मामलों में ही रिश्वत लेने और देनेवालों को आरोपी बनाना चाहिए। क्योंकि ऐसी रिश्वत से व्यवस्था को तोड़ने-मरोड़ने और वित्तीय अनुग्रह हासिल करने की कोशिश की जाती है।